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Thursday, 2 July, 2026
होममत-विमतमद्रास हाई कोर्ट, लोक कलाकारों की पोशाक पर निगरानी मत कीजिए, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा कीजिए

मद्रास हाई कोर्ट, लोक कलाकारों की पोशाक पर निगरानी मत कीजिए, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा कीजिए

'शालीनता' का पूरा कानूनी बोझ डांसर के पहनावे, और खासकर महिलाओं के काम करने वाले शरीर पर डालकर, अदालत उनके अनिश्चित जीवन को कानूनी मुश्किलों के जाल में बदल देती है.

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आइए तमिल निर्देशक मारी सेल्वराज की फिल्म के एक सामान्य दृश्य की कल्पना करें. उनकी फिल्मों में कैमरा तमिलनाडु की सांस्कृतिक जिंदगी की उथल-पुथल का गवाह बनता है, खासकर गांवों में, जहां ध्यान समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों की जिंदगी पर रहता है. हम परीयेरुम पेरुमाल में परई ढोल की जोरदार और चुनौती भरी आवाज़ को महसूस कर सकते हैं, या कर्णन में गांव के त्योहारों के फट पड़ने वाले गुस्से को देख सकते हैं.

इन दोनों मौकों पर, सेल्वराज उस आरामदायक अभिजात नजरिए को ठुकरा देते हैं. यह नजरिया लोक कला को सिर्फ एक सुंदर, सजावटी तमाशा मानता रहा है. वह अपनी कला के जरिए सबाल्टर्न प्रदर्शन को उसके असली रूप में फिर से सामने लाते हैं. यानी सम्मान, ऐतिहासिक याद और जीने के साधनों की लड़ाई के मैदान के रूप में. जब हम दर्शक के तौर पर किसी असली गांव के तिरुविझा (मंदिर उत्सव) में तेज हैलोजन लाइटों के नीचे यह सब देखते हैं, तो यह देर रात का ऐसा मंच होता है जो एक लोकतांत्रिक सांस्कृतिक साझा जगह की तरह काम करता है. कई पीढ़ियों से यह जगह उन समुदायों की रही है जो आदल पाडल और करगट्टम जैसे प्रदर्शन देखने के लिए इकट्ठा होते हैं. ऐसे प्रदर्शन जिनमें चलती हुई देह आर्थिक मजबूती और धार्मिक अधिकार का आधार बनती है.

लेकिन, जब राज्य या उसकी एजेंसियां नापने की फीता लेकर आती हैं, तो असली चिंता कपड़े को लेकर नहीं होती. असली बात सत्ता, जगह पर नियंत्रण और सबसे बढ़कर यह तय करने की होती है कि सार्वजनिक नजर में किसे रहने का अधिकार है. मद्रास हाई कोर्ट का हाल का आदेश, जिसे जस्टिस एल विक्टोरिया गौरी ने दिया, राज्य की इन्हीं गहरी चिंताओं को सामने लाता है. अदालत ने महिला उत्सव नर्तकियों पर ऐसा व्यापक प्रतिबंध लगाया है कि अगर उनके पेट का बीच का हिस्सा, जांघें, पैर या सीना दिखाई देता है, तो उसे रोका जाएगा. अदालत का कहना है कि यह छात्रों और युवाओं के “नाजुक दिमाग” को बिगड़ने से बचाने के लिए है. कागज पर यह न्यायिक कट्टर नैतिकता जैसा लगता है. लेकिन असल में यह कहीं ज्यादा सोची-समझी और संरचनात्मक मिटाने की कार्रवाई है. साफ शब्दों में कहें तो राज्य गांवों के प्रदर्शन स्थलों पर अभिजात, ऊंची जाति की सौंदर्य संबंधी सोच को जबरदस्ती लागू कर रहा है. वह अनौपचारिक रोजगार को कानूनी खतरे में बदल रहा है और कानून का इस्तेमाल हाशिए पर रहने वाली महिलाओं के खिलाफ हथियार की तरह कर रहा है.

इस घटना को समझने के लिए सांस्कृतिक विस्थापन के इतिहास पर एक छोटी नजर डालना जरूरी है. अदालत का यह जरूरत से ज्यादा दखल आज के समय में “सौंदर्य घेराबंदी” का उदाहरण है. मेरा मतलब है कि यह कदम 19वीं सदी के आखिर में चले औपनिवेशिक एंटी-नौच अभियानों जैसा है. ब्रिटिश अफसरों और अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय अभिजात वर्ग ने “सामाजिक सुधार” के नाम पर पीढ़ियों से प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को अपराधी बना दिया. उन्होंने हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को देश की सांस्कृतिक पहचान से सफलतापूर्वक बाहर कर दिया. मुझे याद आता है कि इतिहासकार जानकी नायर ने बहुत शानदार तरीके से दिखाया है कि कैसे शुरुआती दौर में राज्य ने सार्वजनिक जगहों पर दखल देकर लगातार कामकाजी वर्ग की महिलाओं के श्रम को बीमारी की तरह पेश किया, ताकि मध्यमवर्गीय व्यवस्था और सम्मान की चिंता पूरी हो सके. जब जज फैशन डिजाइनर बनने लगते हैं, तो आज का राज्य गांव की कला में सुधार नहीं करता. वह सांस्कृतिक साझा जगहों को अमीरों के हिसाब से बदल रहा है, गांव के मंदिरों को साफ-सुथरा बनाकर मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं, रियल एस्टेट के विस्तार और कॉरपोरेट प्रायोजित पर्यटन के लिए रास्ता तैयार कर रहा है.

हाशिए पर रहने वाले लोगों को अपराध बनाना

ग्रामीण अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की आर्थिक नींव पर इस ऐतिहासिक संरक्षणवादी सोच का साफ असर पड़ता है. तमिलनाडु के गांवों में रहने वाली हजारों हाशिए की महिलाओं के लिए आदल पाडल और करगट्टम सिर्फ शौक नहीं हैं. यही उनकी बुनियादी आर्थिक जरूरतें पूरी करने का सहारा हैं. ये लोक प्रदर्शन पीढ़ियों से चले आ रहे इन कलाकार समुदायों की आर्थिक नींव हैं. वे बिना किसी सुरक्षा के अपना जीवन चलाती हैं. जब अदालत “शालीनता” की पूरी कानूनी जिम्मेदारी एक नर्तकी के कपड़ों पर डाल देती है, खासकर इन मेहनतकश महिलाओं के शरीर पर, तो वह पहले से मुश्किल जिंदगी को कानूनी जाल में बदल देती है.

राजनीतिक अर्थशास्त्री एमएसएस पंडियन के विचारों को देखें, तो उन्होंने अपनी रचनाओं में बार-बार बताया है कि तमिलनाडु का अभिजात वर्ग अपनी सभ्यता की सोच को आगे बढ़ाने के लिए राज्य की ताकत का इस्तेमाल करता है. वे गरीबी में जी रहे लोगों की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को “असभ्य” कहकर किनारे धकेल देते हैं और कामकाजी वर्ग के जीने के तरीकों को भी उसी तरह पेश करते हैं.

ग्रामीण त्योहारों के इस अस्थिर माहौल के बारे में सोचिए. कपड़ों को लेकर एक विवाद या किसी की मनमानी शिकायत से कार्यक्रम तुरंत रद्द हो सकता है. यह सिर्फ एक कार्यक्रम का रद्द होना नहीं है. यह उन महिलाओं के लिए तुरंत आर्थिक बर्बादी है जो पूरे साल अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए इन मौसमी त्योहारों पर निर्भर रहती हैं. जब किसी कलाकार के कपड़े ही उसके लिए खतरा बन जाते हैं, तो राज्य किसी की रक्षा नहीं कर रहा होता. वह सीधे उनके बुनियादी मानवाधिकारों पर हमला कर रहा होता है, साथ ही उनके संविधान से मिले आजीविका के अधिकार पर भी. क्योंकि ये कलाकार पूरी तरह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं, खासकर गांवों में, इसलिए उनके पास न कोई औपचारिक अनुबंध होता है और न ही किसी यूनियन का सहारा, जिससे वे ऐसे मनमाने आदेशों के खिलाफ लड़ सकें.

पुलिस का नजरिया

अब अदालत के आदेश को लागू करने का तरीका इस आर्थिक कमजोरी को और बढ़ा देता है. यह लंबे समय से दबाए गए समुदायों पर राज्य की निगरानी बढ़ा देता है. स्थानीय पुलिस अधिकारियों को यह अधिकार देना कि वे लाइव कार्यक्रमों की वीडियो रिकॉर्डिंग करें और अगर उन्हें किसी का पहनावा “शालीन” नहीं लगे तो कार्यक्रम बंद कर दें, एक ऐसा पागलपन भरा तरीका है जो कानून लागू करने वालों को सचमुच फैशन पुलिस बना देता है.

यह जरूरत से ज्यादा निगरानी इन कमजोर महिलाओं से बची हुई थोड़ी-बहुत आजादी भी छीन लेती है. यह उन्हें सीधे राज्य की सजा देने वाली व्यवस्था के सामने खड़ा कर देती है. मानवशास्त्री गजेंद्रन अय्याथुरई का काम यहां बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने गांवों में स्थानीय सरकारी व्यवस्था का अध्ययन किया है. उनका कहना है कि यह व्यवस्था अक्सर प्रभावशाली जातियों की सत्ता का विस्तार बनकर काम करती है. स्थानीय पुलिस को सबाल्टर्न जगहों पर पूरी मनमानी ताकत देना कभी भी हाशिए पर रहने वाले लोगों की रक्षा नहीं करता. इसके बजाय यह जबरन वसूली, रिश्वत और चुनकर परेशान करने के दरवाजे खोल देता है. अब कलाकारों को सरकारी उलझनों से भरे अजीब व्यवहार का सामना करना पड़ता है. अब उनकी कमाई इस बात पर निर्भर करती है कि वे किसी स्थानीय पुलिस वाले की नैतिक सोच को कितना खुश कर पाते हैं. किसी अधिकारी के प्रदर्शन के बीच में ही कार्यक्रम बंद कर देने का लगातार डर एक नया ताकत का रिश्ता बना देता है. इससे महिलाएं शोषण के सामने पूरी तरह असहाय हो जाती हैं.

वर्गवादी फर्क: लोक कला बनाम अभिजात शास्त्रीय नृत्य

इतिहास में राज्य की निगरानी वाली नजर हमेशा बहुत चुनिंदा रही है. इसमें वर्ग और जाति का साफ पक्षपात दिखाई देता है. यही तय करता है कि किसका शरीर पवित्र माना जाएगा और किसका अपवित्र कहा जाएगा. चेन्नई के एयर कंडीशनर वाले शहरी मंचों पर अभिजात भरतनाट्यम नर्तकियां नियमित रूप से खुले पेट के साथ प्रदर्शन करती हैं. इन कार्यक्रमों को “दिव्य शास्त्रीय विरासत” के प्रतिष्ठित नाम के तहत सम्मान दिया जाता है. उनके नृत्य को ऐतिहासिक, पवित्र, बौद्धिक और भारी सरकारी मदद तथा कॉरपोरेट प्रायोजन के योग्य माना जाता है.

लेकिन जब गांवों की हाशिए पर रहने वाली महिलाएं करगट्टम या आडल पाडल करने के लिए उसी तरह के पारंपरिक कपड़े पहनती हैं, तो पूरी कहानी उलट जाती है. उनके शरीर को तुरंत “अश्लील” और सार्वजनिक नैतिकता के लिए खतरा बता दिया जाता है. इसे समझने के लिए विद्वान गोपाल गुरु की प्रसिद्ध किताब एस्थेटिक्स ऑफ द दलित बॉडी में दिए गए विचारों को देखा जा सकता है. उनका कहना है कि अभिजात सौंदर्य की सोच हमेशा सबाल्टर्न शरीर से उसकी स्वाभाविक कलात्मक पहचान छीन लेती है और उसे सिर्फ मजदूरी या जरूरत से ज्यादा यौन नजरिए से देखती है.

नियंत्रण का यह तरीका एक बड़े वैश्विक सच का स्थानीय रूप है. अश्वेत नारीवादी विचारक और कवयित्री ऑड्रे लॉर्ड ने बताया है कि सत्ता में बैठे लोग हाशिए पर रहने वाले समूहों की स्वाभाविक अभिव्यक्तियों को दबा देते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मालिक के औजार कभी मालिक का घर नहीं गिरा सकते. लॉर्ड का कहना था कि प्रभावशाली संस्कृतियां “शालीनता” जैसी कट्टर नैतिक धारणाओं को हथियार बनाकर सबाल्टर्न अभिव्यक्तियों की गहरी और असली जीवंतता को दबा देती हैं. वे उन्हें असल में “संदिग्ध” बना देती हैं क्योंकि उन्हें राज्य की सत्ता आसानी से नियंत्रित या दर्ज नहीं कर सकती. यह दोहरा मापदंड एक गहरा और साफ वर्गवादी नजरिया दिखाता है. एक तरफ राज्य मेहनतकश शरीर को साफ-सुथरा बनाने और सजा देने में पूरी ताकत लगा देता है. दूसरी तरफ वही राज्य एक जैसी शारीरिक बनावट में प्रदर्शन करने वाले ऊंची जाति के शरीर की प्रशंसा करता है. यहां संदेश बिल्कुल साफ है. शरीर पर अपना अधिकार और सौंदर्य की आजादी सिर्फ अभिजात लोगों और अभिजात जगहों के लिए सुरक्षित विशेष अधिकार हैं.

‘सभ्य बनाने के मिशन’ के नाम पर सांस्कृति मिटाना

इन दोहरे मापदंडों को लागू करके न्यायपालिका आक्रामक तरीके से एक “सभ्य बनाने का मिशन” चला रही है. इसका मुख्य उद्देश्य गांवों की अभिव्यक्तियों को अपने हिसाब से ढालना है. मद्रास हाई कोर्ट के निर्देश इतने आगे तक चले गए कि उसने करगट्टम नर्तकों को गंगई अमरन की 1989 की फिल्म करगट्टकारन में पहने गए खास और साफ-सुथरे फिल्मी कपड़ों की नकल करने का आदेश तक दे दिया. यह पूरी तरह नजरअंदाज करता है कि ये लोक परंपराएं समय के साथ स्वाभाविक रूप से बदलती और आगे बढ़ती रहती हैं.

गांव की कला पर सम्मानजनक दिखने का एक सख्त नियम थोपना इतिहास से चली आ रही शरीर को स्वीकार करने वाली सबाल्टर्न परंपराओं को धीरे-धीरे मिटा देता है. ये प्रदर्शन परंपराएं पीढ़ियों से साफ-सुथरी ब्राह्मणवादी नजर से बाहर गर्व के साथ जीवित रही हैं. इनमें शरीर को शर्म की चीज नहीं बल्कि उत्सव और धार्मिक सहनशक्ति की जगह माना जाता है. इन कला रूपों को बाहर से थोपे गए अभिजात पवित्रता के आदर्श के अनुसार बदलने के लिए मजबूर करके न्यायपालिका खुद सांस्कृतिक मिटाने की प्रक्रिया में शामिल हो जाती है. यह सबाल्टर्न शरीर की अभिव्यक्ति के समृद्ध और विविध इतिहास को एक जैसा और सपाट बना देती है ताकि वह उस मध्यम वर्ग को पसंद आए जो लोक विरासत को हमेशा गहरी तिरस्कार भरी नजर से देखता है.

कानूनी सीमा से आगे बढ़ना और संवैधानिक अधिकार

यह फैसला एक खतरनाक कानूनी मिसाल कायम करता है जो सीधे संविधान से मिले बुनियादी अधिकारों को कमजोर करता है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें आजीविका का अधिकार भी शामिल है. इसी तरह अनुच्छेद 19(1)(g) किसी भी पेशे या काम को करने का अधिकार देता है. इंडियन होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन (एएचएआर) बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) के ऐतिहासिक मामले में, जिसे आम तौर पर मुंबई डांस बार केस कहा जाता है, सुप्रीम कोर्ट ने महिला नर्तकियों पर लगाए गए जरूरत से ज्यादा प्रतिबंधों को सख्ती से रद्द कर दिया था. सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा था कि राज्य “सुरक्षा” या लोगों की अपनी-अपनी “सार्वजनिक नैतिकता” के नाम पर महिलाओं की आजीविका पर रोक नहीं लगा सकता. किसी नागरिक के आर्थिक जीवन को शालीनता की बदलती हुई परिभाषाओं से जोड़कर मद्रास हाई कोर्ट इन साफ कानूनी सीमाओं से आगे बढ़ जाता है. यह पहले से तय संवैधानिक सिद्धांतों की जगह मनमानी नैतिक चिंताओं को रख देता है. इससे भी बड़ी बात यह है कि इससे ऐसी खतरनाक मिसाल बन रही है जिसमें किसी भी हाशिए पर रहने वाले समुदाय की आजीविका सिर्फ इसलिए खत्म की जा सकती है क्योंकि वह अभिजात वर्ग की सोच को पसंद नहीं आती.

अंत में, न्यायपालिका की जरूरत से ज्यादा दखल देने की यह प्रवृत्ति पूरी तरह बेतुकी है. यह सिर्फ सांस्कृतिक मर्यादा या धार्मिक शिष्टाचार पर होने वाली कोई अलग बहस नहीं है. यह सीधे तौर पर हाशिए पर रहने वाली महिलाओं की आर्थिक आजादी और उससे भी ज्यादा उनकी सांस्कृतिक विरासत पर एक संगठित हमला है. न्याय व्यवस्था का काम कमजोर वर्गों की रक्षा करना है, लेकिन यहां ऐसा लगता है कि वह एक साफ-सुथरी, ऊंची जाति की सौंदर्य संबंधी सोच को लागू कर रही है जो उनके अस्तित्व को ही अपराध बना देती है. अदालत को गरीब लोगों के कपड़ों की निगरानी करना छोड़कर फिर से उनके जीवन, काम और सम्मान के साथ अपनी बात कहने के बुनियादी अधिकार की रक्षा करने पर ध्यान देना चाहिए.

निखिल संजय-रेखा अडसुले कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ के एक्सपर्ट और IIT दिल्ली में सीनियर रिसर्च स्कॉलर हैं. वे @Surajya_Raje_ पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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