चांगथांग घाटी, लद्दाख: न भीड़भाड़ वाली सड़कें, न मोबाइल नेटवर्क, न ही इंसानी बस्ती का कोई खास निशान. बस थेनले नुरबू का परिवार और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों में रहने वाले सैकड़ों याक. सुबह 9 बजे तक याक का दूध निकालने का काम पूरा हो जाता है. यहीं से शुरू होता है यहां बनने वाले साधारण हिमालयी चुरपी चीज़ का दुनिया भर में पहचान बनाने का पहला कदम. आज लद्दाख का यह अनमोल चुरपी चीज़ ब्राजील के मुंडियल दो केजो दो ब्राजील 2026 (Mundial do Queijo do Brasil) में गोल्ड मेडल जीत चुका है.
इसके बाद परिवार मक्खन बनाने में जुट जाता है. आग पर बड़े बर्तनों में ताजा पीला याक का दूध उबल रहा होता है. पास ही याक के चुरपी चीज़ की नई खेप अगले चरण के लिए तैयार रहती है. चांगथांग घाटी में पीढ़ियों से यह परिवार याक के दूध से चुरपी चीज़ बनाता आ रहा है.
35 वर्षीय डेयरी उद्यमी थेनले नुरबू ने दिप्रिंट से कहा, “मेरे दादा-दादी भी चुरपी बनाते थे. लद्दाख के हर घर में पीढ़ियों से यह चीज़ बनती आई है. मैंने इसका आविष्कार नहीं किया. मैंने सिर्फ इसे लद्दाख के इस छोटे से गांव से ब्राजील तक पहुंचाने का काम किया. यह जीत सिर्फ मेरी नहीं, पूरे चांगथांग क्षेत्र की है.”
अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्राजील के अंतरराष्ट्रीय चीज़ महोत्सव में मेडल जीतने वाले चार भारतीय चीज़ निर्माताओं को बधाई दी थी. एलेफ्थेरिया गुलमर्ग ने सुपर गोल्ड जीता. गोल्ड मेडल याक चुरपी-सॉफ्ट, नॉर्डिक फार्म (लेह, लद्दाख) और एलेफ्थेरिया ब्रूनोस्ट (व्हे चीज़) को मिला. वहीं सिल्वर मेडल एलेफ्थेरिया काली मिरी (बेलपर नॉले स्टाइल) को मिला.
एलेफ्थेरिया के मौसम नारंग के लिए यह एक और अंतरराष्ट्रीय सफलता थी. लेकिन याक चुरपी के लिए यह बड़ी उपलब्धि साबित हुई. हिमालय के खानाबदोश समुदायों के बीच लंबे समय से खाया जाने वाला यह चीज़ अब दुनिया के मंच तक पहुंच गया और प्रधानमंत्री मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी जगह बना चुका है.
73 वर्षीय त्सेरिंग मोटुप, जो थेनले नुरबू के पिता हैं, अपने फार्म पर याक का दूध मथते हैं.

मोज़रेला या अमूल और मदर डेयरी के पैक वाले प्रोसेस्ड चीज़ से अलग, याक चुरपी अपने साथ हिमालय की कहानी लेकर चलता है. कठिन पहाड़, संघर्ष और पीढ़ियों पुरानी पशुपालन की परंपरा इसकी पहचान है. लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में मिलने वाला चुरपी स्वाद बढ़ाने और प्रोटीन के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जाता था.
अब यह हेल्थ कॉन्शियस लोगों और फिटनेस पसंद करने वालों के बीच भी लोकप्रिय हो रहा है. फार्म से खरीदे जाने पर एक किलो याक चुरपी की कीमत 1,600 से 2,000 रुपये के बीच होती है. चुरपी सिर्फ चीज़ नहीं, बल्कि एक परंपरा, आजीविका और ऐसी कहानी है जिसे दुनिया तक पहुंचने में कई पीढ़ियां लग गईं.



राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमें हमेशा अपने इस पारंपरिक चीज़ पर गर्व था, लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी. ब्राजील की प्रतियोगिता में प्रदर्शित 2,500 चीज़ों के बीच चुरपी का गोल्ड जीतना दिखाता है कि हमारे पारंपरिक उत्पाद भी दुनिया के बेहतरीन चीज़ों के बराबर खड़े हो सकते हैं.”
उन्होंने कहा, “भारत में बहुत संभावनाएं हैं. हमारे पास ऐसे कई पारंपरिक उत्पाद हैं जो पीढ़ियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं. अगर उन्हें सही तरीके से पेश किया जाए और सही अवसर मिले, तो वे भी दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं.”
ब्राजील का गोल्ड लेकर आया नया मौका
सुबह 5 बजे एक पिकअप गाड़ी लेह-पैंगोंग रोड पर स्थित त्सोलटक के खानाबदोश फार्म पहुंचती है. नुरबू अपने भतीजे, बुजुर्ग माता-पिता और 85 साल की दादी के साथ वहां पहुंचते हैं. वे दुर्बुक गांव से 35 किलोमीटर का सफर तय करके ठीक समय पर याक का दूध निकालने पहुंचते हैं.
पिछले सात साल से उनका यही रोज का काम है. न बीमारी उन्हें रोक सकी, न कठिन पहाड़ी रास्ते. वे हर दिन मक्खन, लस्सी, घी और चुरपी चीज़ बनाते रहे. लेकिन कई सालों तक इन उत्पादों की कोई खास बाजार कीमत नहीं थी. इन्हें ज्यादातर खानाबदोश परिवार खुद इस्तेमाल करते थे या आसपास के गांवों और स्थानीय बाजारों में थोड़ी मात्रा में बेच देते थे.

सालों की मेहनत अब रंग लाई है. ब्राजील में गोल्ड मिलने के बाद चुरपी दुनिया के मंच पर पहुंच गया है और नुरबू के लिए नए रास्ते खुल गए हैं.
उन्होंने कहा, “इस पुरस्कार ने चांगथांग के हर याक पालक के लिए बाजार खोल दिया है. अब चुरपी बनाने वाला हर व्यक्ति इससे कमाई कर सकता है.”
चांगथांग घाटी में करीब 2,000 याक पालक रहते हैं. यह इलाका चुरपी और याक दोनों के लिए मशहूर है. यहां की हरी घास याकों के चरने के लिए बेहतरीन मानी जाती है, इसलिए यह चरवाहों की पसंदीदा जगह है. ज्यादातर पशुपालक परिवारों में रोज छह से सात लोग मिलकर काम करते हैं और हर किसी की अपनी अलग जिम्मेदारी होती है.
नुरबू के फोन पर लगातार मिस्ड कॉल की सूचना आती रहती है. नेटवर्क न होने की वजह से वह कॉल नहीं उठा पाते. शाम को जब वह याकों के पीछे पहाड़ के दूसरी तरफ जाते हैं, तभी उन्हें थोड़ा इंटरनेट मिलता है. उसी समय वह व्हाट्सऐप के जवाब देते हैं और लोगों को फोन करते हैं. पिछले तीन महीनों में उन्हें कितने फोन और संदेश आए, उन्हें खुद याद नहीं.
उन्हें गोल्ड मेडल मिलने की खबर भी कुछ दिन बाद ही मिली.
उन्होंने कहा, “पुरस्कार मिलने के बाद से होटल, शेफ और खरीदारों के लगातार फोन और संदेश आ रहे हैं. लेकिन मैंने अभी बड़े स्तर पर बाहर बिक्री शुरू नहीं की है क्योंकि पहले मैं सही ब्रांडिंग और पैकेजिंग करना चाहता हूं.”

लेकिन उनका सपना इससे भी बड़ा है.
नुरबू सबसे पहले काले रंग की याक का दूध निकालते हैं. उनका भतीजा भूरे रंग की याक को संभालता है, जो बार-बार भागने की कोशिश करती है. उनकी मां और दादी याक का गोबर इकट्ठा करती हैं, जिसे सुखाकर ईंधन बनाया जाएगा.
वह कहते हैं, “अगली कौन है?” दूध निकालते समय वह गुनगुनाते रहते हैं, जिससे याक शांत रहती हैं. उनके लिए याक परिवार का हिस्सा हैं.
नुरबू ने कहा, “ये गाय और भैंस नहीं हैं. ये बहुत शांत स्वभाव के जानवर हैं.”
चुरपी, पोषण का खजाना
नुरबू के परिवार के लिए हर सुबह समय और मौसम से मुकाबला करने जैसी होती है. आज उनका लक्ष्य कम से कम 60 लीटर याक का दूध इकट्ठा करना था. जुलाई में मौसम खत्म होने के साथ ही याक का दूध कम होने लगता है. सीजन के दौरान एक याक रोज करीब एक लीटर दूध देती है, लेकिन सर्दियां नजदीक आते ही दूध की मात्रा घट जाती है.
पूरे इलाके में यही स्थिति है. इसलिए परिवार की पहली प्राथमिकता ज्यादा से ज्यादा दूध इकट्ठा करना और उसे सुरक्षित रखना होती है.
करीब चार घंटे बाद दूध निकालने का काम खत्म होता है. इसके बाद शुरू होता है अगला चरण. दूध उबालना, मक्खन मथना और चीज़ तैयार करना. यह लंबी प्रक्रिया पूरे दिन चलती है. इसी बीच लद्दाख में पर्यटन सीजन शुरू होने के कारण परिवार को अपना रेस्तरां भी चलाना पड़ता है.

नुरबू के 73 वर्षीय पिता त्सेरिंग मोटुप नीले, सफेद और लाल रंग की बाल्टियों में भरा ताजा याक का दूध एक साधारण एक मंजिला डेयरी यूनिट में ले जाते हैं. बड़ी व्यावसायिक फैक्ट्रियों से अलग, यह डेयरी मुख्य सड़क के किनारे एक छोटे से भूभाग पर बनी है, जहां से ऊंचे पहाड़ी घास के मैदान दिखाई देते हैं.
हर गर्मियों में आसपास के गांवों के पशुपालक अपने याकों को चराने के लिए चांगथांग घाटी लेकर आते हैं. इस डेयरी की पहचान इंटरनेट से नहीं बल्कि लोगों के बीच की बातों से बनी है, जो 21वीं सदी में एक दुर्लभ बात है.
परिवार द्वारा चलाया जाने वाला यह फार्म कई हिस्सों में बंटा हुआ है. यहां आने वाले लोगों के लिए एक छोटा रेस्तरां, याकों के लिए खुले चरागाह, एक पारंपरिक रेबो (याक के बालों का तंबू) और तीन अलग-अलग कार्यस्थल हैं, जहां दूध उबाला जाता है, मथा जाता है और उससे मक्खन, चीज़ और दूसरे डेयरी उत्पाद बनाए जाते हैं.

मोटुप कभी चूल्हे पर रखे दूध के पास जाते हैं तो कभी मक्खन मथने वाली मशीन के पास.
उन्होंने कहा, “मेरे सभी बच्चों को यह काम आता है. मेरे चार बेटे और तीन बेटियां हैं. जो भी आता है, वह मदद करता है. कोई याक का दूध निकालता है, कोई मक्खन बनाता है, कोई गोबर साफ करता है, तो कोई जानवरों को चराने ले जाता है. यह हमारे पूरे परिवार का काम है.”
इसी बीच नुरबू और उनका भतीजा याकों को सुरक्षित सड़क पार कराते हैं. इस दौरान पैंगोंग झील जाने वाला ट्रैफिक कुछ देर के लिए रुक जाता है. यही वह मशहूर झील है जो फिल्म 3 इडियट्स में दिखाई गई थी.
पर्यटकों के लिए सड़क पार करते याक किसी आकर्षण से कम नहीं होते. लोग तुरंत कैमरे और मोबाइल निकालकर तस्वीरें लेने लगते हैं. भारत के दूसरे हिस्सों से आने वाले लोगों के लिए यह अलग अनुभव होता है, क्योंकि उन्होंने आमतौर पर सिर्फ गायों को सड़क पार करते देखा होता है.


नुरबू खुद डेयरी उत्पाद लेकर बाजार में नहीं बेचते. समय के साथ उन्होंने ऐसे ग्राहक बना लिए हैं जो सीधे फार्म पर आकर चीज़ और मक्खन खरीदते हैं. उनकी कुल बिक्री का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा चुरपी से आता है.
नुरबू ने कहा, “अगर दूध नहीं बिकता तो हम दही बना लेते हैं. दही नहीं बिकता तो मक्खन बनाते हैं. मक्खन नहीं बिकता तो घी बना लेते हैं. अगर छाछ बच जाती है तो उससे चुरपी बनाते हैं. कुछ भी बर्बाद नहीं होता.”
चीज़ अलग करने के बाद उसे सुखाया जाता है. पहले इसे खुली हवा में सुखाया जाता था. लेकिन पहाड़ों में चलने वाली ठंडी हवाओं और कम धूप की वजह से चीज़ सुखाना सबसे मुश्किल कामों में से एक था. अब परिवार प्लास्टिक शीट से बने एक छोटे ग्रीनहाउस जैसे कमरे का इस्तेमाल करता है, जहां रैक पर रखकर चीज़ को ज्यादा आसानी से सुखाया जाता है.
हर खेप को तैयार करने में पूरे परिवार का लगातार ध्यान, धैर्य और मेहनत लगती है.
नुरबू अपने फार्म पर चुरपी की तीन किस्में बनाते हैं. सॉफ्ट चुरपी घर में बने रिकोटा चीज़ जैसी दिखती है. यह ताजा, सफेद और मुलायम होती है. हार्ड चुरपी देखने में परमेज़ान चीज़ के बाहरी हिस्से जैसी होती है. इसका रंग हल्का पीला होता है और यह बहुत सख्त होती है. तीसरी किस्म मीठा स्नैक है, जो पूरे चांद के आकार का होता है और गाढ़े याक के दूध से बनाया जाता है. सॉफ्ट और हार्ड चुरपी 1,800 से 2,000 रुपये प्रति किलो बिकती है. चांद जैसी चुरपी 20 रुपये प्रति पीस में बेची जाती है.


नुरबू ने बताया कि पहले यही चीज़ 600 रुपये प्रति किलो बिकती थी. अब स्थानीय लोगों के बीच बढ़ती मांग की वजह से इसकी कीमत दोगुनी हो गई है. याक के दूध की कीमत भी इसी तरह बढ़ी है.
नुरबू ने कहा, “2019 तक लद्दाख एक उपेक्षित इलाका था. बेहतर अवसर और शिक्षा के लिए युवा शहरों की ओर चले गए.”
लेकिन अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है. जो लोग यहीं रुके, वे सिर्फ पर्यटन या सर्विस सेक्टर तक सीमित नहीं रहे. वे प्राकृतिक संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं. छोटे-छोटे उद्यमी सामने आ रहे हैं. नुरबू इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं.
नुरबू परिवार प्लास्टिक शीट से बने छोटे ग्रीनहाउस जैसे कमरे का इस्तेमाल करता है, जहां रैक पर चीज़ सुखाई जाती है.

इस सपने की शुरुआत उन्होंने पारंपरिक चीजों को नए तरीके से इस्तेमाल करने के विचार से की. उन्होंने मोज़रेला चीज़ बनाने की कोशिश की, लेकिन लद्दाख का मौसम इसके लिए अनुकूल नहीं था. इसके बाद वह अपने घर से 70 किलोमीटर दूर लेह स्थित पशुपालन विभाग गए, जहां उन्होंने विशेषज्ञों से संपर्क किया और नई बातें सीखीं. उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) से भी बात की, उन्हें चुरपी के बारे में बताया और इसके पोषण संबंधी फायदे समझाए.
कई असफल कोशिशों के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब और संघर्ष नहीं करेंगे.
उन्होंने कहा, “जब हमारे पास अपना पारंपरिक चीज़ चुरपी पहले से है, तो मैं विदेशी चीज़ की नकल करने की कोशिश क्यों करूं. इसलिए मैंने चुरपी पर ही ध्यान देने का फैसला किया. चुरपी कोई नई चीज़ नहीं है जिसे मैंने बनाया हो. लद्दाख के लोग इसे पीढ़ियों से बनाते आ रहे हैं. मेरे पूर्वज, मेरे दादा-दादी, सभी सालों से यही चीज़ बनाते रहे हैं.”
चुरपी लद्दाख की परंपरा का अहम हिस्सा है. त्योहारों, शादियों और पारिवारिक कार्यक्रमों में मेहमानों को थुकपा, बटर टी और स्क्यू के साथ चुरपी परोसी जाती है. चुरपी के बिना वहां का खाना और जश्न अधूरा माना जाता है. जैसे जापान में मियाजाकी आम को खास माना जाता है, वैसे ही पशुपालकों के लिए चुरपी एक कीमती तोहफा मानी जाती है. सर्दियों में जौ के सूप में चुरपी मिलाकर खाना लोगों का पसंदीदा आरामदायक भोजन होता है.
ब्रांडिंग और समुदाय
जब नूरबू ने गांव लौटकर अपने परिवार के साथ काम करने का फैसला किया, तो समुदाय के लोग उन्हें अच्छी नजर से नहीं देखते थे. लेकिन अब लोगों की सोच बदल गई है. अब ज्यादा लोग अपने याकों की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंपते हैं.
लोगों को अब उनका सम्मान करते देखकर नूरबू को बहुत संतोष मिलता है. अब लोग धीरे-धीरे याक पालन की अहमियत समझने लगे हैं.
पहले जब बच्चे छोटे होते थे, तो उन्हें डराने के लिए कहा जाता था कि अगर बात नहीं मानोगे तो याक चराने भेज देंगे. लेकिन अब नूरबू कहते हैं कि हमारी परंपरा को आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है.

इसके लिए नूरबू के पास अपने कारोबार को बढ़ाने के कई नए विचार हैं. साथ ही उन्हें उम्मीद है कि सरकार भी इसमें मदद करेगी.
उन्होंने कहा, “अगर सरकार याक डेयरी को भी वही समर्थन दे, जो पश्मीना को मिला है, तो हम याक से बनने वाले उत्पादों के लिए बहुत बड़ा बाजार तैयार कर सकते हैं.”
नूरबू ने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है. उनका पहला विचार है कि चीज़ बनाने के बाद बचने वाले याक के व्हे (Whey) से प्रोटीन पाउडर बनाया जाए.


35 वर्षीय नूरबू टिकाऊ विकास (सस्टेनेबल ग्रोथ) की दिशा में काम कर रहे हैं. यह सोच उन्होंने अपने “गुरु” सोनम वांगचुक से सीखी है.
उन्होंने कहा, “उन्होंने मुझे सिखाया कि टिकाऊ जीवनशैली का असली मतलब क्या होता है. उन्होंने इसकी सही सोच और तर्क मुझे समझाए. उन्हीं की वजह से आज मुझे यहां काम करके खुशी मिलती है.”
नूरबू का लक्ष्य उत्पादन को दोगुना करना और ऑर्गेनिक व टिकाऊ उत्पादों का एक मजबूत ब्रांड बनाना है.
शायद तब उनके भाई भी लद्दाख के इन कठिन पहाड़ों में उनके इस कारोबार से जुड़ने के लिए तैयार हो जाएं. हो सकता है कि 21वीं सदी में चुरपी चीज़ पर काम करना फिर से एक शानदार और सम्मानजनक पेशा बन जाए.
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