मुंबई: 1965 की फिल्म वक्त की एक पार्टी में चमकदार सफेद गाउन पहने एक महिला गाना गाने के लिए आगे आती है, जबकि राज कुमार, साधना, शर्मिला टैगोर और सुनील दत्त उसके आसपास फ्रेम में आते-जाते रहते हैं. यह उस दौर का सबसे खास क्लब सॉन्ग था. एक आकर्षक महिला गाना गा रही है और डांस फ्लोर पर कपल्स झूम रहे हैं. यह गाना था ‘आगे भी जाने ना तू’, जो साहिर लुधियानवी के आज में जीने के दर्शन और जिंदगी की सीख से भरा साढ़े पांच मिनट का गाना था, जिसे आशा भोसले ने गाया था. और वह महिला थीं एरिका लाल.
यह गाना बॉलीवुड का सबसे खास रूप था, जो समय के साथ अमर हो गया. हर फिल्म-दीवाने भारतीय की पार्टी, पिकनिक और अंताक्षरी में यह गाना गाया जाता रहा. जिस तरह ‘जो भी है बस यही एक पल है’ ने लाखों यादों को जन्म दिया, उसी तरह एरिका लाल भी एक पल में चर्चा में आ गईं और फिर एक बड़े अंजान संसार में गायब हो गईं.
दरअसल, बॉलीवुड के तीन मशहूर गानों में ऐसी महिला कलाकार थीं, जो बाद में गुमनामी में चली गईं. बाकी दो थीं, शागून के ‘तुम अपना रंज-ओ-गम’ (1964) की निवेदिता और मिस्टर एंड मिसेज 55 (1955) के ‘जाने कहां गया’ की यास्मिन.
गीत के बोल थे: “अनजाने सायों का राहों में डेरा है, अनदेखी बाहों ने हम सबको घेरा है, ये पल उजाला है बाकी अंधेरा है, ये पल गंवाना ना ये पल ही तेरा है. (इसके दूसरी तरफ इंतजार कर रहा अंधेरा तय है, और यह पल, चाहे कितना भी छोटा हो, वही एक पल है जो सच में तुम्हारा है).”
आज भी यह गाना लोगों की यादों में ताजा है, लेकिन चमकती आंखों और गालों पर डिंपल वाली वह महिला, जिसने इस गाने को मशहूर किया, सिर्फ एक गाने की कलाकार बनकर रह गईं.
इन तीनों आकर्षक महिला कलाकारों ने हमें ऐसे गाने दिए जो हमेशा याद रखे गए, लेकिन इनमें से किसी का भी वह करियर नहीं बन पाया जो इसके बाद बनना चाहिए था. इन तीनों कलाकारों की पहचान उन अमर गानों से जुड़ी हुई है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बाद में इन कलाकारों के साथ क्या हुआ.
ऐसी इंडस्ट्री में जो सिर्फ बड़ी और शानदार सफलताओं का जश्न मनाने के लिए बदनाम है, वे लोग आसानी से भुला दिए जाते हैं जो पूरी तरह असफल भी नहीं हुए थे. फिर भी निवेदिता, यास्मिन और एरिका लाल इस नियम को भी तोड़ती हैं. उन्हें याद किया जाता है, उनसे प्यार किया जाता है, लेकिन फिर भी वे गुमनामी में चली गईं.
आज किसी भुला दिए जाने वाले फिल्मी किरदार का मतलब कहानी का अंत नहीं है. कोई कलाकार इंस्टाग्राम पर अपनी फैन फॉलोइंग बना सकता है, वायरल हो सकता है या किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर खुद को नए रूप में पेश कर सकता है. लेकिन 1950 और 1960 के दशकों में यास्मिन, निवेदिता और लाल के पास ऐसी कोई मदद नहीं थी. वे ऐसे समय में आई थीं जब मधुबाला, नूतन, वहीदा रहमान और साधना का उस दौर की कल्पना पर लगभग बिना बोले कब्जा था, जिससे किसी नए कलाकार के लिए बहुत कम जगह बचती थी.
फिल्ममेकर महेश भट्ट कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री उन लोगों के लिए कभी “माफ न करने वाली” थी जो फिल्मी परिवारों से नहीं आते थे.
भट्ट ने दिप्रिंट से कहा, “फिल्म इंडस्ट्री ज्यादातर फिल्मी परिवारों द्वारा चलाई जाती थी. जो लोग उस पृष्ठभूमि से नहीं आते थे, उनके लिए अपने लिए जगह बनाना बहुत मुश्किल था.”
उन्होंने कहा कि उस समय के लोगों के पास आज की तरह कोई “अटेंशन इकॉनमी” नहीं थी, जो आज सोशल मीडिया, विज्ञापनों और दूसरे विकल्पों की वजह से बहुत ज्यादा मौजूद है.
हालांकि निवेदिता और यास्मिन को कम से कम एक दूसरा मौका मिला, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, लेकिन अमेरिका में जन्मी भारतीय महिला एरिका लाल को ऐसा मौका कभी नहीं मिला.
‘एरिका लाल को विदेशी अंदाज दिखाने के लिए लाया गया था’
दशकों बाद लाल के गाने को अब अचानक दूसरी जिंदगी मिल गई है. यह गाना मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टॉरी (Made in India: A Titan Story) के साउंडट्रैक में फिर से सामने आया, जिससे नए श्रोता यूट्यूब पर मूल गाने तक वापस पहुंचे और इसे बड़े स्तर पर फिर से लोकप्रियता मिली.
फिल्म इतिहासकार अंजिला गूगनानी ने कहा, “वह हीरोइन बनने के लायक नहीं थीं. हां, वह हेलेन जैसी दिखती थीं, थोड़ी झलक थी. लेकिन हेलेन के विपरीत, उनमें वह ‘नमक’ नहीं था. हेलेन हर किरदार और हर आइटम सॉन्ग पर काम करती थीं. वह अपने प्रदर्शन में मसाला ले आती थीं, लेकिन लाल को जो एक मौका मिला, उसमें वह ऐसा नहीं कर पाईं.”
भट्ट को याद है कि लाल की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक उनके लिप-सिंक को लेकर थी. यह गाना फिल्म के लिए बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें फिल्म का मुख्य संदेश था. और लाल को इसके साथ लिप-सिंक करने में परेशानी हुई. वह उन्हें थोड़ी छूट देते हुए कहते हैं, “वह भारतीय नहीं थीं.”
भट्ट ने आगे कहा, “उन्हें एक विदेशी अंदाज दिखाने के लिए लाया गया था… फिल्म में एक खास तरह की चमक जोड़ने के लिए.” वह उस गाने के दृश्य को याद करते हैं जिसमें कुमार हार चुराने की कोशिश करते हैं.

लेकिन फिल्म आलोचक भावना सोमाया इस बात को अलग नजरिए से देखती हैं. वह इसे खोया हुआ मौका नहीं मानतीं, बल्कि ऐसा किरदार मानती हैं जिसे शुरू से ही ज्यादा ध्यान खींचने के लिए बनाया ही नहीं गया था.
वक्त, वह बताती हैं, हिंदी सिनेमा की पहली असली मल्टी-स्टारर फिल्म थी: सुनील दत्त, राज कुमार और शशि कपूर, साधना, शर्मिला टैगोर और शशिकला. फिल्म को उस एक पार्टी वाले दृश्य के लिए ऐसी अभिनेत्री की जरूरत नहीं थी जिसका अपना करियर बचाना जरूरी हो. चोपड़ा को बस “ध्यान खींचने के लिए एक सुंदर चेहरा” चाहिए था.
सोमाया ने कहा, “यह यश चोपड़ा की शैली के बिल्कुल मुताबिक था कि वह ऐसी खूबसूरत महिला चुनें जो थोड़ी भारतीय और थोड़ी पश्चिमी दिखे.”
फिल्म आलोचक के अनुसार, लाल को गलत किरदार नहीं दिया गया था, बल्कि बिल्कुल सही तरह से चुना गया था. वह उन्हें “गाउन में एक बेहद खूबसूरत महिला” बताती हैं, जिसे सेक्सी दिखने के लिए तैयार किया गया था. यह बिल्कुल वैसा ही रूप था जिसके लिए चोपड़ा जाने जाते थे.
उन्होंने कहा, “वह अपनी हर चीज को लेकर बहुत सौंदर्यपूर्ण सोच रखते थे: एक खूबसूरत चेहरा और एक खूबसूरत शरीर. लेकिन वह पैसे को लेकर सावधान रहते थे और उसे बेवजह खर्च नहीं करते थे.”
वह एक समानता भी बताती हैं. उनकी नज़र में लाल लगभग दुबली राखी जैसी दिखती थीं. सोमाया का कहना है कि शायद यही वह खास तरह का चेहरा था जिसे चोपड़ा लगातार तलाश रहे थे, जब तक कि कई साल बाद उन्हें कभी कभी में वह नहीं मिल गईं.
लेखिका मधुलिका लिडल ने एक ब्लॉग पोस्ट में वक्त के संगीत पर लिखा है और कहा है कि रवि और साहिर ने “शानदार गानों का एक समूह” बनाया था, जिसमें “आगे भी जाने ना तू” एक अलग गाना था. उन्होंने साहिर के दार्शनिक बोल, रवि की धुन और आशा भोसले की आवाज की तारीफ की.
फिर भी यह गाना बिनाका गीतमाला में जगह नहीं बना पाया. भट्ट इसे उस समय का सबसे बड़ा मानक और शायद किसी गाने की लोकप्रियता मापने का सबसे भरोसेमंद तरीका बताते हैं.
लेकिन रेडियो चार्ट ही किसी गाने की पहुंच मापने का एकमात्र तरीका नहीं थे. भट्ट लोकप्रियता के दो और संकेत बताते हैं: क्या कोई गाना शादियों और त्योहारों में पहुंचा, और क्या तवायफों ने उसे अपनाया और गाया.
उन्होंने कहा, “मैं ऐसी जगहों पर जाने के लिए बहुत छोटा था, लेकिन मैंने सुना है कि वॉकर साहब का गाना, जाने कहां मेरा जिगर, बहुत गाया जाता था.”

लाल भी “आगे भी जाने ना तू” की आखिरी पंक्तियों की तरह गुमनामी में चली गईं. इसकी आखिरी पंक्तियां थीं, “कल किसने देखा है कल किसने जाना है, इस पल से पाएगा जो तुझको पाना है, जीनेवाले सोच ले यही वक्त है कर ले पूरी आरजू. (कल किसने देखा है, कल क्या लेकर आएगा कौन जानता है? जो तुम चाहते हो उसे पाने के लिए तुम्हारे पास यही पल है. इसलिए जब तक जिंदा हो, इसके बारे में सोचो. यही अपनी इच्छाएं पूरी करने का समय है).”
किसी को पूरी तरह पता नहीं है कि वह कहां चली गई. एक बात कही जाती है कि एक मुंबई के रहने वाले व्यक्ति से शादी करने के बावजूद वह आखिरकार अमेरिका वापस चली गईं.
लेकिन उनकी पहचान ने खुद भी पुरानी बॉलीवुड से जुड़ी एक कहानी को जन्म दिया है. यह कहानी Atul’s Song A Day नाम के पुराने बॉलीवुड ब्लॉग पर है.
लंबे समय से चल रहे कमेंट थ्रेड में दावा किया गया है कि लाल कथित तौर पर एयर इंडिया में एयर होस्टेस थीं. फिल्म के क्रेडिट में उनका नाम दिखाई देता है और निर्माता बीआर चोपड़ा की तरफ से एयरलाइन को खास तौर पर धन्यवाद भी दिया गया है.
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सपनों जैसी शुरुआत जो अचानक खत्म हो गई
अगर मिस्टर एंड मिसेज 55 की ऑफिस टाइपिस्ट जूली के पास कोई खास हथियार था, तो वह उसकी आंखें थीं. मिस्टर एंड मिसेज 55 में जॉनी वॉकर की मजाकिया छेड़छाड़ का मुकाबला यास्मिन की बड़ी और भावपूर्ण आंखों से होता है. दोनों साथ में डेस्क के नीचे झुकते हैं और अपने सहकर्मियों की नजरों से बचते हुए गाने “जाने कहां मेरा जिगर गया जी” के जरिए अपनी भावनाएं जाहिर करते हैं. यह गाना मोहम्मद रफी और गीता दत्त ने गाया था.
गुरु दत्त ने यास्मिन को पहली बार बैंगलोर एमेच्योर ड्रामेटिक सोसाइटी में देखा था और उसी समय उन्हें एक किरदार की पेशकश कर दी थी. उन्होंने शुरुआत में यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था. कई साल बाद उन्होंने अपनी शुरुआत की, जिसमें गुरु दत्त के साथ-साथ मधुबाला और वॉकर भी उनके साथ स्क्रीन पर थे.
दशकों बाद भी इस गाने के यूट्यूब कमेंट सेक्शन में यास्मिन की खूब तारीफ होती है.

एक व्यक्ति ने कमेंट में लिखा, “ब्लैक एंड व्हाइट रंग भी उनकी खूबसूरती को प्रभावित नहीं कर सकते.” दूसरे ने कहा कि यास्मिन ने उस एक गाने में जितने भाव दिखाए, उतने कुछ आधुनिक अभिनेत्रियां अपनी पूरी फिल्मी जिंदगी में भी नहीं दिखा पातीं.
कमेंट में लिखा था, “अनन्या पांडे के पूरे करियर में उतने भाव नहीं हैं, जितने यास्मिन ने सिर्फ एक गाने में दिए.”
फिल्मफेयर ने इस गाने को एक “हल्का-फुल्का” गाना बताया था, “जिसमें ऑफिस के सहकर्मी जॉनी वॉकर और यास्मिन एक-दूसरे से छेड़छाड़ करते नजर आते हैं.” वहीं हाल की रिपोर्टों में इसे ओपी नैय्यर के संगीत का एक “हमेशा याद रहने वाला उदाहरण” बताया गया, जो दशकों बाद भी लोगों को पसंद आता है.
रफी और गीता के गाए इस पुराने गाने ने उन्हें उतनी शानदार शुरुआत दी, जितनी किसी नए कलाकार को मिल सकती थी.
लेकिन नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीत चुके लेखक और बॉलीवुड टिप्पणीकार विट्ठल बालाजी के अनुसार, आखिर में जाने कहां मेरा जिगर गया जी “जॉनी वॉकर का गाना ही था, बस.” वह गुरु दत्त के गंभीर किरदार और सामाजिक आलोचक वाली भूमिका का हल्का-फुल्का संतुलन थे.
बालाजी, जिन्होंने कई किताबों के अलावा ‘गाता रहे मेरा दिल – 50 क्लासिक हिंदी फिल्म सॉन्ग्स’ भी लिखी है, कहते हैं कि यह गाना फिल्म के सबसे लोकप्रिय गानों में से एक था, लेकिन किसी ने यास्मिन के बारे में बात नहीं की.
बालाजी ने कहा, “उन्हें इस तरह पहचाना गया: ‘जॉनी वॉकर के साथ जो लड़की थी.'”
जहां गूगनानी यास्मिन की शुरुआत को “करियर शुरू करने का आदर्श तरीका” मानती हैं, वहीं बालाजी एक और कारण बताते हैं कि उन्हें अपनी पहचान बनाने में परेशानी क्यों हुई. वह किरदार जो उन्होंने मिस्टर एंड मिसेज 55 में निभाया था.

उस दौर की फिल्मों में सचिव या टाइपिस्ट का किरदार आमतौर पर किसी शहरी, पश्चिमी सोच वाले परिवार की युवा लड़की का होता था, जो थोड़े अलग लहजे में हिंदी बोलती थी और फ्रॉक पहनती थी. उसे अक्सर एक पहचाने हुए स्टीरियोटाइप के रूप में लिखा जाता था, जो कहानी के किनारे पर रहता था.
बालाजी ने कहा, “हालांकि बाजी (1951) में गीता बाली द्वारा निभाई गई लीना या चलती का नाम गाड़ी (1958) में कुक्कू मोरे द्वारा निभाई गई शीला भी इसी स्टीरियोटाइप का हिस्सा थीं. लेकिन बाजी से पहले बाली को कुछ सफलताएं मिल चुकी थीं और मोरे पहले से ही एक स्थापित डांसर थीं.”
यास्मिन को भी बिल्कुल इसी तरह के किरदार में रखा गया था. लेकिन मिस्टर एंड मिसेज 55 में उनके पास इस तरह की कोई पहचान नहीं थी. न ही वह बाद में जाने कहां मेरा जिगर के मौके का फायदा उठा सकीं. उन्होंने फिर एक ऐसी ही स्टीरियोटाइप लड़की का किरदार निभाया, जिसे खुद उस तरह के किरदार से अलग पहचानना मुश्किल था.
जिस व्यक्ति को शायद उन्हें सबसे ज्यादा जानना चाहिए था, वह भी उनके संपर्क में ज्यादा समय तक नहीं रहा.
जॉनी वॉकर के सबसे छोटे बेटे नासिर खान ने दप्रिंट को बताया कि उन्हें आज भी याद है कि उस समय इस गाने को लेकर कितना क्रेज था. लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि फिल्म के बाद दोनों परिवारों का संपर्क नहीं रहा. उनके पिता और स्क्रीन पर उनकी साथी कलाकार के बीच जो भी रिश्ता था, वह समय के साथ खत्म हो गया. आज भी उस दौर के कई लोगों के मन में एक सवाल है: क्या यास्मिन आखिरकार पाकिस्तान चली गईं या पश्चिमी देशों में कहीं बस गईं?
खान ने कहा, “जब पिता ने अभिनय छोड़ दिया, तो उन्होंने इंडस्ट्री छोड़ दी और किसी के संपर्क में नहीं रहे, सिर्फ कुछ लोगों जैसे गुरु दत्त और देव आनंद के.”
हालांकि यास्मिन की उस शुरुआत तक पहुंचने की राह सीधी नहीं थी. फिल्म इतिहासकार सुरेश सरवैया के अनुसार, उन्होंने अपने शुरुआती सात साल कश्मीर में बिताए, फिर पहाड़ी इलाकों के कई स्कूलों में पढ़ाई की और आखिर में उच्च शिक्षा के लिए बैंगलोर आईं. वहीं उन्होंने बैंगलोर एमेच्योर ड्रामेटिक सोसाइटी जॉइन की और नाटकों में काम करना शुरू किया. यहीं गुरु दत्त ने पहली बार उन्हें देखा, उन्हें अपनी अगली फिल्म में भूमिका की पेशकश की और बॉम्बे आने के लिए कहा.
उस समय उन्हें विनिता भट्ट के नाम से जाना जाता था. उनका जन्म 1937 में रावलपिंडी में हुआ था. मिस्टर एंड मिसेज 55 के लिए गुरु दत्त ने ही उनका नाम बदलकर यास्मिन रखा, और आज भी उन्हें इसी नाम से याद किया जाता है.
गूगनानी ने कहा, “यास्मिन ने पहली बार उन्हें मना कर दिया था.”

सरवैया और गूगनानी, दोनों के अनुसार, इंडस्ट्री में उनका असली प्रवेश बिल्कुल अलग रास्ते से हुआ. जब यास्मिन आखिरकार बॉम्बे आईं, तो उनकी मुलाकात अनवर हुसैन से हुई, जो अभिनेत्री नरगिस के भाई थे. दोनों परिवार पहले से दोस्त थे.
गूगनानी ने कहा, “हुसैन ने उन्हें रंजीत स्टूडियो के मालिक चंदूलाल शाह से मिलवाया, जिन्होंने उन्हें उत्पतांग (1955) में एक छोटी भूमिका दी. फिल्म की शूटिंग महबूब स्टूडियो में हुई, जहां संयोग से गुरुदत्त भी उसी समय शूटिंग कर रहे थे.”
शूटिंग के बीच एक ब्रेक के दौरान दोनों फिर मिले और दत्त ने दूसरी बार उन्हें एक फिल्म का प्रस्ताव दिया, जो बाद में मिस्टर एंड मिसेज 55 बनी. इस बार यास्मिन मना नहीं कर सकीं.
उन्होंने कहा, “उनकी आंखें सुंदर और बहुत भावपूर्ण थीं और उनके चेहरे की बनावट एक क्लासिक सुंदरता जैसी थी. लेकिन उन्होंने इतना काम ही नहीं किया कि कोई उनके अभिनय की क्षमता को आंक सके. शायद वह बहुत बड़ी स्टार बन सकती थीं. मैं कहूंगी कि वह ‘खोई हुई क्षमता’ थीं.”
मिस्टर एंड मिसेज 55 के बाद, महबूब स्टूडियो में उनकी मुलाकात जुल वेल्लानी से हुई, जिन्होंने 1956 के फिल्मफेयर के एक पुराने अंक के अनुसार, थिएटर ग्रुप के खुले मैदान में होने वाले ओथेलो के एक नाटक में उन्हें डेस्डेमोना का किरदार दिया.
इसी वजह से उन्हें अगला कॉन्ट्रैक्ट मिला. हॉलीवुड अभिनेता एलेक्स डी’आर्सी उनसे मिले और प्रभावित हुए. इसी तरह उन्हें फिल्मिस्तान की महत्वाकांक्षी सिनेमास्कोप और टेक्नीकलर फिल्म थ्री हेडेड कोबरा में रुक्मिणी का किरदार मिला. इस फिल्म का मूल नाम बॉम्बे फ्लाइट 417 था.
फिल्मफेयर के अगस्त 1955 के अंक में उन्हें इस महत्वाकांक्षी अंतरराष्ट्रीय फिल्म में “स्टार बनने की कोशिश करने वाली” अभिनेत्री बताया गया था.
वरिष्ठ पत्रकार भारती दुबे के पास इस बात का ज्यादा स्पष्ट जवाब है कि वह क्षमता कभी असली करियर में क्यों नहीं बदल पाई.
उनके आकलन में यास्मिन में “ग्लैमर क्वोटिएंट था, लेकिन वह रहस्यमयी एक्स फैक्टर नहीं था” जो सपनों जैसी शुरुआत को लंबे करियर में बदलने के लिए जरूरी होता है.
कमजोर उच्चारण, सपाट भाव
जहां लाल को फिल्मों में दोबारा मौका नहीं मिला और यास्मिन ‘खोई हुई क्षमता’ बनकर रह गईं, वहीं ‘तुम अपना रंज-ओ-गम’ के लिए मशहूर निवेदिता ने इसके उलट अपनी काबिलियत साबित करने की लगातार कोशिश की, जब तक कि एक दिन उन्होंने भी हार नहीं मान ली.
फिल्म शागून में निवेदिता पियानो पर बैठी हैं और मदन को, जिसका किरदार कमलजीत ने निभाया है, गाना गा रही हैं. मदन किसी और का है. यह गाना प्यार का ऐसा इकरार है, जिसके बारे में वह जानती हैं कि बदले में उन्हें प्यार नहीं मिलेगा.
गणेश अनंतनारायण की किताब Bollywood Melodies: A History of the Hindi Film Song (बॉलीवुड मेलोडीज़: हिंदी फ़िल्म संगीत का इतिहास) में बताया गया है कि वह गाने को जीने के अलावा बहुत कुछ नहीं करतीं. गाना जगजीत कौर की आवाज में है. साहिर लुधियानवी के शब्द इसमें ज्यादातर भावनाएं पैदा करते हैं.
जगजीत कौर को याद करते हुए 2021 में लिखे गए एक लेख में ‘तुम अपना रंज-ओ-गम’ को उनका सबसे जाना-पहचाना और सबसे लोकप्रिय गाना बताया गया है. कहा गया है कि इस गाने ने उन्हें ऐसी पहचान दी जो पूरी जिंदगी उनके साथ रही.

महफ़िल में मेरी के ब्लॉग पोस्ट में लिखा है, “इस गाने ने उन्हें जिंदगी भर की पहचान दी. इसमें कोई शक नहीं कि इसे बहुत लगन से और बिल्कुल सही भावों के साथ गाया गया है. हालांकि अभिनेत्री निवेदिता बहुत खूबसूरत हैं, लेकिन उनके चेहरे पर ज्यादा भाव नहीं दिखते. शायद इस गाने में कौर ने अपने पति के लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था.”
स्क्रीन पर निवेदिता की झुकी हुई आंखें, हल्की सी मुस्कान और कभी-कभी कमलजीत की ओर देखना ही यह बताने के लिए काफी है कि किरदार जो बात खुलकर नहीं कह सकता, वह क्या महसूस कर रहा है. उनका अभिनय बहुत शांत है. कविता ही गाने को अपने आप में भावनात्मक जीवन देती है.
सोमाया की बात का यही मतलब है. उस दौर के महान गानों को बेचने के लिए जरूरी नहीं था कि कोई बड़ा स्टार या जाना-पहचाना चेहरा हो. क्योंकि गीतकार इतनी गहराई और भावनात्मक समझ के साथ लिख रहे थे.
सोमाया ने कहा, “फिल्ममेकर उस कलाकार को ले सकता था जिसे प्रोडक्शन संभाल सकता था, और शब्द, संगीत और स्थिति उस पल को संभाल लेते थे, भले ही कलाकार का अभिनय बहुत कम हो. अगर कलाकार बहुत कम भाव भी देता था, तो भी फिल्ममेकर के लिए वह काफी था.”
यह भरोसा अब इंडस्ट्री में काफी हद तक खत्म हो गया है. पहले फिल्ममेकर अपने लेखकों और संगीत निर्देशकों पर इतना भरोसा करते थे कि उन्हें लगता था कि एक शानदार गाना अपने आप में किसी को स्टार बना सकता है, चाहे उसे पेश करने वाला व्यक्ति कोई भी हो.
सोमाया के अनुसार, ‘तुम अपना रंज-ओ-गम’ किसी भी टूटे हुए दिल वाले इंसान का गाना हो सकता था, या किसी ऐसे व्यक्ति का जो अपने किसी प्रिय को बता रहा हो कि वह उसके दर्द का बोझ बांटने के लिए तैयार है.
आज, फिल्म का सबसे छोटा पल भी किसी पहचाने जाने वाले स्टार या बिकाऊ चेहरे के साथ होना जरूरी माना जाता है. सोमाया के शब्दों में, यह “सेलिब्रिटी संस्कृति की ओर एक व्यावहारिक बदलाव है और फिल्म इंडस्ट्री के अंदर यह बढ़ती चिंता है कि क्या कोई प्रोजेक्ट किसी जाने-पहचाने नाम की गारंटी के बिना दर्शकों को अपने साथ जोड़ पाएगा.”
लेकिन इस सोच की भी सीमाएं हैं. वह कहती हैं कि लगातार लोगों की नजरों में बने रहने की कोशिश आखिरकार थका देती है. और जब सेलिब्रिटी की मशीनरी बहुत बड़ी हो जाती है, तो वह बुलबुला फूटने से पहले केवल एक सीमा तक ही फैल सकता है.

शागून में थोड़ी देर नजर आने के बाद, निवेदिता ने तू ही मेरी जिंदगी, रॉकी मेरा नाम, धरती कहे पुकार के और बैंक रॉबरी जैसी फिल्मों में छोटी भूमिकाएं कीं. ये ऐसी भूमिकाएं थीं जो किसी कलाकार को काम देती रहती हैं, लेकिन कभी यादगार नहीं बनाती हैं.
एक फिल्म इस रास्ते को बदलने के करीब पहुंची थी: 1969 की फिल्म ज्योति, जिसे दुलाल गुहा ने निर्देशित किया था. इसमें निवेदिता ने राधा नाम की एक धार्मिक महिला का किरदार निभाया था, जिसकी शादी नास्तिक निर्मल से हुई थी, जिसका किरदार संजीव कुमार ने निभाया था. लेकिन यह फिल्म भी नहीं चली.
गूगनानी ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि उन्होंने इस किरदार के साथ न्याय किया. उनके पास इस किरदार को निभाने की ताकत नहीं थी. यह एक खोया हुआ मौका था.”
गूगनानी के अनुसार, निवेदिता की सीमाएं सिर्फ एक कमजोर प्रदर्शन तक नहीं थीं. उनका उच्चारण कमजोर था, उनके भाव सपाट थे और ऊपर से दिखने वाली खूबसूरती के अलावा उनमें मुख्य भूमिका निभाने के लिए जरूरी अभिनय की पूरी क्षमता नहीं थी.
निवेदिता का करियर 1976 में धीरे-धीरे खत्म हो गया. उनकी आखिरी फिल्मों में से एक सब से बड़ा रुपैया थी, जिसमें उन्होंने मिस बेला नाम की स्टेनोग्राफर की भूमिका निभाई.
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने लगभग दो दशक बाद एक बार फिर किस्मत आजमाई. उन्होंने वापसी की. निवेदिता ने अजय देवगन और ट्विंकल खन्ना की फिल्म जान (1996) में बिना क्रेडिट वाली भूमिका निभाई. यह उनकी पिछली उपस्थिति के लगभग 20 साल बाद था. जान वह आखिरी फिल्म थी जिसमें उन्होंने कभी काम किया.

उनके नाम को लेकर भी भ्रम है. कुछ लोग उन्हें लिबी राणा के नाम से याद करते हैं. यही नाम उनकी पहली फिल्म शागून (1964) और फिर वलैत पास (1961) में भी था. बाद की फिल्मों में उनका नाम निवेदिता दिया गया. यह साफ नहीं है कि इनमें से कौन सा नाम पहले आया या नाम बदलने की वजह क्या थी. यास्मिन का नाम बदलने की तरह इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता.
फिल्मों से दूर जाने के काफी समय बाद उन्होंने इंडस्ट्री के बारे में प्यार और साफ समझ, दोनों के साथ बात की. IMDb ने 2006 के एक इंटरव्यू में उनके हवाले से लिखा, “ठीक है, हां, मैं कभी फिल्मों में थी. मजा आया, लेकिन जब तक आप सनसेट बुलेवार्ड पर परेशान होते रहना नहीं चाहते, तब तक टिके नहीं रह सकते.”
अमर उजाला में प्रकाशित एक फोटो गैलरी में बताया गया है कि फिल्म आलोचक खालिद मोहम्मद की मुंबई के ताज होटल की एक किताब की दुकान पर लिबी राणा से मुलाकात हुई. खालिद ने तुरंत उन्हें पहचान लिया और उनके पास जाने की कोशिश की. लेकिन राणा कथित तौर पर मुड़ीं और वहां से भाग गईं.
मोहम्मद ने उस मुलाकात को याद करते हुए कहा, “जब मैंने उनसे बात करने की कोशिश की, तो लिबी भाग गईं और कहने लगीं, ‘नहीं, आपको गलतफहमी हुई है.'”
बताया जाता है कि 2014 में उनकी मौत हो गई. शादी के काफी समय बाद भी वह मुंबई में ही रही थीं, जबकि लाल और यास्मिन दोनों देश छोड़कर चली गई थीं.
‘शादी एक रास्ता था’
अगर लाल, निवेदिता और यास्मिन की कहानियों को जोड़ने वाली एक चीज है, तो वह है शादी. तीनों अपने-अपने तरीके से शादी के बाद ज्यादा समय तक स्क्रीन से गायब हो गईं.
यह याद रखना जरूरी है कि वह एक अलग दौर था. किसी महिला स्टार के शादी करने या मां बनने के बाद वापसी के लिए कोई प्लेटफॉर्म नहीं था. फिल्मों से दूर होने का मतलब शायद ही कभी दोबारा वापस आना होता था.
यास्मिन के लिए अंत बहुत जल्दी आ गया. थ्री हेडेड कोबरा की शूटिंग के दौरान उन्हें फिल्म के मेकअप मैन जिमी वाइनिंग से प्यार हो गया और दोनों ने नवंबर 1955 में शादी कर ली. यह मिस्टर एंड मिसेज 55 में उनकी बड़ी शुरुआत के कुछ ही महीनों बाद हुआ था. उन्होंने इंडस्ट्री छोड़ दी और विदेश में जाकर बस गईं.
कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि वह आखिरकार पाकिस्तान लौट गईं. कुछ का दावा है कि वह यूरोप में कहीं चली गईं. लेकिन एक रिपोर्ट यह भी कहती है कि वह गुजरात के वलसाड में बस गई थीं.
सरवैया उनकी कहानी में एक और बात जोड़ते हैं, हालांकि वह खुद इसे अपुष्ट बताते हैं: बताया जाता है कि उनका बेटा आगे चलकर स्पाइसजेट में पायलट बना.
निर्माता और फिल्म इतिहासकार विवेक वासवानी को इसके पीछे एक सीधी बात दिखाई देती है.
उन्होंने कहा, “वे सहायक अभिनेत्रियों से भी छोटी भूमिका में थीं. जब उन्हें अच्छे पति मिल गए, तो यह उनकी निराशा से बाहर निकलने का एक रास्ता था. उन्हें समझ आ गया था कि वे हीरोइन नहीं बन सकतीं, इसलिए उन्होंने इंडस्ट्री छोड़ दी.”
वह एक बड़े पैटर्न की ओर इशारा करते हैं: साधना, कल्पना कार्तिक, तनुजा, राखी गुलजार, बिंदिया गोस्वामी, मुमताज और कुमुद चुघानी जैसी कई अभिनेत्रियां, जिन्होंने निर्माताओं, निर्देशकों या कारोबारियों से शादी की और उसके बाद काफी हद तक अभिनय छोड़ दिया.
वासवानी के लिए शादी इसलिए बाहर निकलने का रास्ता बनी क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था.
उन्होंने कहा, “सिनेमा तब भी उतना ही आसान या मुश्किल था जितना आज है. उनके पास उस समय कोई दूसरा विकल्प नहीं था.”
आज की स्थिति को लेकर यह तस्वीर शायद पूरी तरह सही नहीं बैठती. वासवानी का कहना है कि आज भी सोशल मीडिया पर बड़ी फॉलोइंग होना कुछ हद तक एक भ्रम है.
उन्होंने कहा, “आज आप सोशल मीडिया स्टार बन सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि लोग आपको थिएटर में फिल्म देखने आएंगे. अगर किसी के 25 मिलियन फॉलोअर्स भी हैं, तो जरूरी नहीं कि 25 लोग भी उसकी फिल्म देखने आएं.”
वासवानी की यह बात काजोल, रानी मुखर्जी और आलिया भट्ट के करियर के सामने थोड़ी अजीब लगती है. ये सभी आज भी फिल्मों, OTT प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर एक साथ काम कर रही हैं. वासवानी जिस “कोई विकल्प नहीं था” वाले दौर की बात करते हैं, वह शायद इंडस्ट्री का कोई स्थायी नियम नहीं, बल्कि 1950 और 1960 के दशकों की खास स्थिति थी.
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