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Sunday, 23 August, 2026
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राहुल ने ‘मनुस्मृति मानसिकता’ पर साधा निशाना, महिलाओं से पितृसत्ता को चुनौती देने की अपील

पुणे में हुए एक कार्यक्रम में लोकसभा में विपक्ष के नेता ने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को CJP के विरोध-प्रदर्शन के दौरान लड़कियों द्वारा उन्हें अपशब्द कहे जाने पर तो 'कल्चरल शॉक' लगा, लेकिन लड़कों के ऐसा करने पर नहीं. उन्होंने महिलाओं को भारत की 'सबसे बड़ी संपत्ति' बताया.

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नई दिल्ली: शनिवार को पुणे में अपने चौथे ‘छात्रों की गूंज’ संबोधन में महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण को सबसे ज्यादा अहमियत देते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उस सोच पर सवाल उठाया, जिसे उन्होंने “मनुस्मृति वाली मानसिकता” बताया. उन्होंने कहा कि यह सोच महिलाओं को पुरुषों के नियंत्रण में रखती है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा और पिछले महीने कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन को लेकर प्रधानमंत्री की कही बातों पर सवाल उठाया.

प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री की सोशल मीडिया पर डाली गई वीडियो पोस्ट का जिक्र करते हुए, जिसमें उन्होंने उन्हें गाली देने वालों को “माफ” करने की बात कही थी, गांधी ने कहा, “मेरा आपसे सवाल है कि जंतर-मंतर पर लड़कों ने भी गाली दी और लड़कियों ने भी गाली दी. लेकिन प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि उन्हें ‘सांस्कृतिक झटका’ लगा क्योंकि लड़कियां भी गाली दे रही थीं. अगर लड़के गाली देते हैं, तो कोई समस्या नहीं है. उनके लिए इसकी इजाज़त है. लेकिन अगर कोई लड़की गाली देती है, तो यह सांस्कृतिक झटका है. यह अच्छा नहीं लगता.”

गांधी ने RSS प्रमुख मोहन भागवत और BJP नेता मनोहर लाल खट्टर के बयानों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, “मोहन भागवत जी कहते हैं कि रेप भारत में होता है, लेकिन ‘भारत’ में नहीं होता. खट्टर जी कहते हैं कि 80 प्रतिशत रेप महिलाओं की वजह से होते हैं.”

इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि समाज में महिलाओं को बराबर क्यों नहीं माना जाता. उन्होंने कहा कि महिलाओं को सिर्फ तीन पहचान तक सीमित कर दिया गया है – “बेटी, पत्नी और मां”. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को पुरुषों के नियंत्रण के बिना अपनी आजादी और अपने सपनों के साथ आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए.

मनुस्मृति का जिक्र करते हुए गांधी ने कहा, “बचपन में एक महिला को अपने पिता के अधीन रहना चाहिए. जवानी में वह अपने पति की होती है. जब उसका पति मर जाता है, तो वह अपने बेटों की हो जाती है. एक महिला को कभी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए.” उन्होंने कहा कि यह “शर्म की बात” है और महिलाओं का मालिक कोई नहीं होना चाहिए, वे सिर्फ खुद की होनी चाहिए.

उन्होंने महिलाओं को भारत की “सबसे बड़ी ताकत” बताते हुए उनसे इस सीमा को तोड़ने की अपील की.

उन्होंने कहा, “लोग मुझसे पूछते हैं, ‘भारत की सबसे बड़ी ताकत क्या है?’ आपको कई जवाब मिलेंगे. कोई कहेगा हमारी अर्थव्यवस्था, कोई कहेगा हमारी सेना, कोई कहेगा हमारी मेडिकल व्यवस्था, कोई शायद हमारे लोगों को सबसे बड़ी ताकत बताएगा. लेकिन मैं इस बात को लेकर बिल्कुल साफ हूं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत, हमारी सबसे बड़ी संपत्ति क्या है. वह ताकत भारत की महिलाओं की 70 करोड़ अनोखी यात्राएं, अनोखी कल्पनाएं और अनोखे सपने हैं, जिन्हें वे जी रही हैं.”

“महिलाएं स्वभाव से पुरुषों से ज्यादा संवेदनशील, नरम दिल, दयालु और आगे की सोच रखने वाली होती हैं. इसलिए मेरा मानना है कि भारत की युवा और उम्रदराज महिलाएं उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं.”

इसके बाद गांधी ने उन अलग-अलग तरीकों के बारे में बात की, जिनसे समाज महिलाओं को नियंत्रित करता है. इसमें हिंसा के साथ-साथ उनके मौकों और समय पर लगाई जाने वाली पाबंदियां भी शामिल हैं. उन्होंने कहा कि हर साल 4.5 लाख लड़कियों को जन्म से पहले ही मार दिया जाता है, जबकि 80 प्रतिशत महिलाओं को परेशान किया जाता है और 29 प्रतिशत महिलाओं को शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा कि छह प्रतिशत महिलाओं के साथ रेप होता है और दावा किया कि सामाजिक बदनामी के डर से यौन हिंसा के 99 प्रतिशत मामले दर्ज ही नहीं होते.

उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा को लेकर चिंताओं का महिलाओं की शिक्षा और नौकरी पर भी असर पड़ता है. “सुरक्षा के नाम पर 50 प्रतिशत महिलाओं को शिक्षा या नौकरी के मौके नहीं दिए जाते. 84 प्रतिशत महिलाओं को नौकरी करने के लिए अपने परिवार की अनुमति की जरूरत होती है. महिलाएं पुरुषों से 25 प्रतिशत कम कमाती हैं और उन्हें आसानी से प्रमोशन नहीं मिलता है. सिर्फ आठ प्रतिशत महिलाओं के पास जमीन है.”

गांधी ने यह भी बताया कि कितनी लड़कियों को अकेले घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं होती. उन्होंने कहा, “हमारी 60 प्रतिशत लड़कियां अकेले घर से बाहर नहीं जा सकतीं. अगर उन्हें घर से बाहर जाना है, तो उन्हें किसी के साथ जाना पड़ता है.”

उन्होंने घर के काम का असमान बोझ भी बताया. उन्होंने कहा कि 15 से 29 साल की महिलाएं हर दिन औसतन 5.5 घंटे घर के काम में बिताती हैं, जबकि पुरुष करीब 30 मिनट घर के काम में लगाते हैं.

कार्यक्रम के दौरान कई महिला छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाली छात्राओं ने भी गांधी के साथ अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने घर, पढ़ाई और काम के दौरान आने वाले दबाव के बारे में बताया.

एक छोटे गांव की फैशन टेक्नोलॉजी की छात्रा तेजस्विनी ने बताया कि उसका परिवार उस पर पढ़ाई जारी रखने के बजाय शादी करने का दबाव डाल रहा था. उसने कहा, “मैंने फैसला किया कि नहीं, मैं काम करूंगी और पढ़ाई करूंगी.”

जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास्टर डिग्री पूरी कर चुकी ज्ञानेश्वरी ने अपनी पढ़ाई, करियर और परिवार की संपत्ति में अपने हिस्से को लेकर झेले दबाव के बारे में बताया. उन्होंने कहा, “क्या यह मेरा अधिकार नहीं है? ऐसा लगता है जैसे मैं संपत्ति मांग रही हूं.”

एक आदिवासी महिला ने पुणे में आदिवासी छात्रों के भूख हड़ताल करने और आदिवासी आश्रम स्कूलों की स्थिति को लेकर चिंता जताई. इस पर राहुल ने कहा कि वह उसके आंदोलन में उसके साथ शामिल होंगे. उन्होंने उससे कहा, “मुझे वहां बुलाओ, मैं आकर तुम्हारे साथ बैठूंगा.”

कार्यक्रम के अंत में गांधी ने महिलाओं से पितृसत्ता को चुनौती देने और समाज में अपने अधिकार और जगह के लिए लड़ने की अपील की.

उन्होंने कहा, “पितृसत्ता आपको दबाती है, डराती है, धमकाती है और आपको नियंत्रित करती है. हमें मिलकर इस पितृसत्ता को खत्म करना है. खुलकर बोलिए, गर्व से रहिए और समाज में अपनी जगह के लिए लड़िए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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