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Thursday, 5 February, 2026
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यूपी से कश्मीर तक — PM मोदी पसमांदा मुसलमानों को ऐसे संबोधित कर रहे हैं, जैसा पहले कभी नहीं हुआ

एक पसमांदा मुस्लिम महिला के रूप में एक राजनीतिक दल द्वारा एक महत्वपूर्ण वोटिंग ब्लॉक के रूप में संबोधित किए जाने के गहरे मायने हैं.

आपातकाल की विरासत? 1977-1989 के लोकसभा चुनावों ने भारत के राजनीतिक परिदृश्य को कैसे बदला

कांग्रेस की पहली बार हार से लेकर टीडीपी के भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी बनने तक, 1977 से 1989 तक के लोकसभा चुनाव कई आश्चर्य लेकर आए.

यदि पार्टियां जजों को राजनीतिक व्यवस्था में शामिल कर लेंगी तो भारतीय लोकतंत्र का आखिरी किला भी ढह जाएगा

हम ऐसे युग में रहते हैं जब पूरा देश विधायी और कार्यकारी शाखाओं पर नियंत्रण रखने के लिए न्यायपालिका की ओर देखता है. क्या हमें राजनीतिक दलों को न्यायाधीशों को अपने पक्ष में करने की अनुमति देनी चाहिए?

तीसरी और पांचवीं लोकसभा चुनाव के बीच भारतीय लोकतंत्र कैसे बदला?

1971 के लोकसभा चुनाव का तीखा विश्लेषण करते हुए अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक मायरोन वेनर ने लिखा कि यह राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा गया पहला चुनाव था.

भारत में लोकसभा चुनाव कराने की रणनीति कितनी चौंका देने वाली है? पहली से 18 तारीख तक

96 करोड़ से अधिक मतदाता, जिनमें से 47 करोड़ महिलाएं हैं, जल्द ही 28 राज्यों और नौ केंद्र शासित प्रदेशों में 15 लाख अधिकारियों की देखरेख में 12 लाख बूथों पर बहु-चरणीय चुनाव में अपने मतपत्र डालकर 543 लोकसभा सांसदों का चुनाव करेंगे.

मोदी सरकार में संस्थानों का दुरुपयोग इंदिरा गांधी के 1971 के अधिनियम को मामूली अपराध जैसा बनाता है

मोदी-शैली की राजनीति में ईडी, राज्यपाल, रिटर्निंग अधिकारी, संक्षेप में राज्य के लगभग सभी संस्थानों को राजनीतिक विरोधियों के लिए जीवन को असंभव बनाने के लिए सेवा में लगाया जाता है.

बीते कल के हथियारों से आगामी युद्ध न लड़ें, सेनाएं करें भावी जंग की तैयारी

एक सर्वोत्तम प्लेटफॉर्म के लिए सब कुछ हासिल करने के चक्कर में सिफर ही हमारे हाथ आ सकता है. सर्वश्रेष्ठ जो है वह अच्छे का दुश्मन होता है.

ध्रुव राठी का सवाल अच्छा है, बस थोड़ा बदल कर पूछें कि भारत किस क़िस्म के ‘अ-लोकतंत्र’ में बदल रहा है

भारत में भले ही आदर्श लोकतंत्र कभी नहीं रहा लेकिन अभी चीजें इस हद तक रसातल को पहुंच गई हैं कि भारत को न्यूनतम अर्थों में भी लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता.प्रतिस्पर्धी अधिनायकवाद बेहतर नाम है.

राजनीति में नेताओं के दलबदल और बने रहने के कारण? विचारधारा, धन, सत्ता से इतर भी जवाब खोजिए

भारतीय राजनीति इतनी आकर्षक नहीं होती अगर इसकी राहें टेढ़ी-मेढ़ी न होतीं, इसकी खासियत यही है कि साफ-सपाट सी दिखने वाली किसी बात का भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता, किसी भी स्थिति को लेकर दावे के साथ नहीं कहा जा सकता-बेशक इसका कारण यही होगा.

शेख शाहजहां ने ED बनाम बंगाल पुलिस की लड़ाई शुरू की, लेकिन टीएमसी vs बीजेपी उनकी किस्मत का फैसला करेगी

ईडी अधिकारियों पर हमले के बाद संदेशखाली से शेख शाहजहां के भागने से टीएमसी बनाम बीजेपी युद्ध छिड़ गया. अब लगभग दो महीने बाद उनकी गिरफ्तारी ने हिरासत की लड़ाई शुरू कर दी है.

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शिवसागर/सोनारी (असम), चार फरवरी (भाषा) असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने बुधवार को दावा किया कि कांग्रेस नेता गौरव गोगोई के पाकिस्तान से...

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