मोदी सरकार ने इस बजट और इसके संकेतों में जो गलती की है, वह यह है कि वह अपने आम तौर पर आशावादी संदेश, ‘भारत उन्नति कर रहा है, विकास और तेज होगा, बाजार बहुत गर्म हैं’ से दूर चली गई है.
इस बजट की कोई कमजोरी है तो यह कि वह कोई आर्थिक संदेश नहीं दे रहा है. आर्थिक सुधारों पर कोई बड़ा बयान नहीं; निजीकरण, विनिवेश का कोई जिक्र नहीं; न करों में कोई बड़ी छूट, प्रोत्साहनों और विनियमन को लेकर कोई कदम नही.
अमेरिका भारत की चिंताओं को दूर करे और भारत पर उंगली उठाने से पहले उन उपदेशों पर खुद अमल करे जो वह दूसरों को देता है. रणनीतिक स्वायत्तता कई कारणों से भारत के हित में है
‘सीडीएस’ और तीनों सेनाध्यक्ष तत्काल और बड़ा कदम यह उठा सकते हैं कि वह सेवा अवधि की लंबाई के बारे में एक फैसला करें. इसके लिए चार साल की सेवा अवधि खत्म होने का इंतजार करने की ज़रूरत नहीं है.
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की 99 सीटों पर जीत ने दो दशकों से राहुल गांधी को परेशान कर रहे तीन नुकीले सवालों की धार खत्म तो कर दी है मगर उनके अब तक के सियासी सफर पर भी गौर करना ज़रूरी है.
भ्रष्टाचार भारतीय समाज में मौजूद है और पनपता है क्योंकि इसे अक्सर सामाजिक रूप से स्वीकार किया जाता है और कुछ मामलों में इसे आकांक्षा के रूप में भी देखा जाता है.
2026 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव AIADMK के लिए चुनौती बने हुए हैं. अगर MGR के वफादारों की अध्यक्षता वाली ‘शांति समिति’ सफल नहीं होती है, तो एक और विभाजन हो सकता है.
इस तरह राजनीति के जातिकरण ने जातियों के राजनीतिकरण की प्रगतिशीलता को कुंद करके उसे सिर के बल खड़ा कर दिया है. फलस्वरूप बिहार पूरी तरह प्रतिगामी राजनीति और जातिगत संकीर्णता में फंसकर प्रगति के मार्ग से भटक गया है.