भारत में 10 करोड़ से ज्यादा आदिवासी हैं, जो ब्रिटेन या जर्मनी की आबादी से ज्यादा हैं. देश में जंगल सिर्फ वहीं बचे हैं, जहां आदिवासी रहते हैं. जंगल में रहने के उनके अधिकार की रक्षा होनी चाहिए.
जातीय सम्मेलनों में प्रायः ऐसे नेता होते हैं जो चुनाव लड़ने के लिए टिकटों के इंतज़ाम में लगे होते हैं और भारी भीड़ जमा कर अपनी ताकत राजनीतिक पार्टियों को दिखाते हैं.
अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल की छवि एक ऐसे नेता ही है, जिन्होंने केंद्र सरकार में मंत्री रहते हुए भी सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सरकार के गलत कामों की खिंचाई करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी.
सुज़ुकी का आधे कार बाज़ार पर कब्ज़ा है, चीनियों का मोबाइल फोन क्षेत्र पर और कोरियाइयों का उपभोक्ता सामान सेक्टर पर. और एतिहाद शायद जेट को उड़ाने लगे. विदेशी खिलाड़ियों के बिना भला हम कहां रहेंगे?
उद्योगपति अनिल अंबानी व एरिक्सन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कर्ज़मंद किसानों ने गुहार लगानी शुरू कर दी है कि उन्हें भी ऐसी सजा से नवाज़ा जाय.
मुलायम सिंह जो कर रहे हैं, उससे सपा और बसपा की चुनावी संभावनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है. इसका ज्यादा नुकसान बीएसपी को होगा, क्योंकि सपा में फैली उलझन के कारण सपा का वोट बीएसपी को ट्रांसफर नहीं हो पाएगा.
आत्मबोधानंद उन्हीं चार मांगों पर अनशन कर रहे हैं जिन पर अडिग जीडी अग्रवाल ने शहादत दे दी थी, पर सरकार केवल सफल कुंभ के आयोजन व नमामि गंगे के प्रचार से काम चला रही है. उसने अभी तक उनसे बात भी नहीं की है.
1977 के बाद देश के तमाम राज्यों में क्षेत्रिय दलों का तेज़ी से उभार शुरू हो गया. इन दलों ने उन क्षेत्रिय मुद्दों और समस्याओं के आधार पर जनप्रचार कर जनाधार बनाना शुरू कर दिया.
जो भी सच में सच्चाई जानना चाहता है, वह आसानी से उन कई घटनाओं को देख सकता है—कश्मीर से लेकर लखनऊ तक, जहां भारतीय मुसलमान आतंकवादी हमलों के खिलाफ सबसे आगे खड़े होकर आवाज़ उठाते रहे हैं.