चुनाव के दौरान उन मुद्दों पर बात क्यों नहीं हो रही है, जिनके कारण करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हुआ? उन वादों की चर्चा क्यों नहीं है, जो 2014 में किए गए थे? उन्माद के सवाल सतह पर क्यों हैं?
परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों से कथनी और करनी में जिम्मेदार होने की उम्मीद की जाती है. भारत को परमाणु अस्त्रों को लेकर पाकिस्तान की तरह गैरजिम्मेदाराना बातें करने से परहेज करना चाहिए
जस्टिस रंजन गोगोई चीफ जस्टिस के पद पर आसीन हैं और एक महिला जूनियर कोर्ट असिस्टेंट द्वारा लगाया गया यौन उत्पीड़न व प्रताड़ना का आरोप झेल रहे हैं, तो भी लगता है कि न्यायालय के अंदरूनी हालात सुधरने के बजाय और विकट हो गये हैं.
फिल्मी हस्तियों के प्रशंसकों की बड़ी संख्या होती है जो वोटों में भी परिवर्तित होती रहती हैं. इसीलिए राजनीतिक पार्टियां विरोधी नेताओं के खिलाफ उन्हें चुनावी मैदान में उतारती हैं.
जब भाजपा विपक्ष में थी तब कानून व्यवस्था के लिए आवाज़ उठती थी. उसके नेताओं को शालीन भाषा का इस्तेमाल करने के लिए जाना जाता था. साध्वी प्रज्ञा को टिकट देना इन सभी चीजों के खिलाफ है.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण चुनाव जीतने की संभावना बढ़ाने के लिए किया गया लगता है, लेकिन एक बड़ा कानूनी सवाल है: क्या इससे उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है?