ग्राम्शी इटली के वंचितों, गरीबों, सबऑल्टर्न के सवालों पर लगातार मुखर रहे और जेल में भी उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़ी. उसी तरह लालू प्रसाद भी भारत में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर लगातार मुखर रहे हैं.
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ख़ुद एक मुसलमान नहीं हैं लेकिन वो नमाज पढ़ती हैं और रोजा भी रखती हैं. बहुतों का कहना है कि वो इस सच्चे दिल से नहीं करतीं और वो ये सब सिर्फ मुस्लिम वोटों के लिए करती हैं.
भारत में वामपंथ के नेतृत्व पर उच्च जातियों का क़ब्ज़ा रहा. जिसकी वजह से उनको जाति की समस्या को न देख पाने की बीमारी लग गयी है. यही वजह है कि जो पार्टी आजादी से लेकर 1962 तक देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी थी, वह विलोप की ओर बढ़ रही है.
अति-पिछड़ों की अनदेखी करने की सपा-बसपा की राजनीति की सीमाएं अब उजागर हो गई हैं. ऐसे में सैकड़ों अति-पिछड़ी जातियां अपना हक मांगने लगी हैं. इसी परिस्थिति में ओम प्रकाश राजभर का उभार हुआ है.
मोदी अगर ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के तौर पर मजबूत होते जाते हैं तो बेहतर यह है कि ऐसा वे मध्ययुग की मस्जिदों को ढहाने की जगह प्राचीन मंदिरों का उद्धार करके बनें, जैसा कि वे वाराणसी में कर रहे हैं.
जब-जब केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकारे रहीं, ज्यादातर फैसले पूंजीपतियों और सामंती शक्तियों के हक़ में किए गए. ऐसे शासन में क्षेत्रीय आकांक्षाओं, लोक-कल्याण और जनहित के कार्यों को नज़रंदाज़ किया गया.
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.