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अमित शाह और उद्दव ठाकरे ने मुंबई में की मुलाकात/ फोटो-पीटीआई
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लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना ने आखिरकार अपनी शत्रुता भुलाकर महाराष्ट्र में गठबंधन कर लिया. तो, इस समझौते में कौन ‘जीता’ और कौन ‘हारा’? इन दोनों हिंदुत्व दलों के बीच मतभेदों की बात को दोनों ही पक्ष के नेताओं ने हवा दी थी, जिससे ऐसा लगने लगा था कि उनके बीच अलगाव बस होने को ही है.

पर जैसा कि मैं पहले लिख चुका हूं, बनावटी आंतरिक संघर्ष का अंत रोमांच रहित रहा, जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि उनके आरोप-प्रत्यारोप ‘दफन हो चुके हैं, और इस क्षण से हम एक संयुक्त मोर्चे के रूप में संघर्ष करेंगे’. वे हिंदुत्व की विचारधारा से परस्पर बंधे हुए हैं.

हालांकि, वास्तविकता में, दोनों को इस बात का अहसास हो चुका था कि जुदा होकर वे पिछड़ जाएंगे, जबकि साथ रहने में उनके प्रभावी बने रहने का मौका है. वे इस राजनीतिक बाध्यता की अनदेखी नहीं कर सकते थे. गठबंधन होने के बावजूद दोनों दलों ने अक्टूबर 2014 के विधानसभा चुनावों में अलग-अलग भाग लिया था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मई 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाने के बाद मोदी-शाह को लगने लगा था कि उन्हें अब शिवसेना की ताकत की कोई ज़रूरत नहीं.


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मोदी और शाह का वो अति आत्मविश्वास खोखला साबित हुआ. राज्य में भाजपा पूर्ण बहुमत पाने से चूक गई और उसे अपनी गलती स्वीकार करते हुए साझा सरकार बनानी पड़ी. पर अक्टूबर 2014 के चुनावों से पूर्व भाजपा के गठजोड़ तोड़ने के समय से ही दोनों पक्षों में तनाव बना हुआ था. वे एक छत के नीचे रह तो रहे थे, पर अलग रसोई और अलग बेडरूम में.

मामला वारेन एडलर के उपन्यास ‘द वॉर ऑफ दे रोज़ेज़’ सरीखा था, जिसमें परस्पर प्यार में बंधे एक जोड़े में धीरे-धीरे अलगाव आता है, पर वे एक ही घर में रहते हैं, परस्पर छल करते हैं और यहां तक कि हिंसा पर भी उतारू हो जाते हैं. अंत में, दोनों की मौत उसी घर में होती है, जिसका स्वामित्व दोनों के बीच विवाद का मुद्दा बन गया था.

महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन के मामले में अंत त्रासद-हास्य वाला नज़र आता है. उद्धव ठाकरे ने पिछले चार महीनों के दौरान बारंबार राफेल सौदे को लेकर नरेंद्र मोदी पर राहुल गांधी के तीखे हमले ‘चौकीदार चोर है’ को दोहराया था. उन्होंने अमित शाह को ‘अफज़ल ख़ान’ भी बताया, जो शिवाजी के काल में औरंगज़ेब का क्रूर प्रतिनिधि था. जबकि अमित शाह ने उद्धव ठाकरे को ‘चूहा’ करार दिया था.


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शिवसेना का मुखपत्र ‘सामना’ लगभग रोज ही मोदी सरकार पर हमला कर रहा था. वास्तव में, कांग्रेस को कुछ करने की ज़रूरत नहीं थी, बस विरोधी खेमे के तीखे आंतरिक संघर्ष का नज़ारा देखना था. राज्य में विपक्ष की अधिकतर ज़िम्मेदारी शिवसेना के हाथों में थी.

वास्तव में, शिवसेना के भाजपा, खास कर मोदी, के खिलाफ अभियान को कई टिप्पणीकारों ने संभावित शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-कांग्रेस मोर्चे के पूर्वसंकेत के रूप में देखा था. पर ऐसा संभव नहीं था. माना जाता है कि शरद पवार ने इस असामान्य साझेदारी के लिए काफी प्रयास किए थे. दोनों के पास कुल मिलाकर इतनी संख्या में विधायक थे कि देवेंद्र फडणवीस सरकार को गिराया जा सके.

तो अब सीटों को लेकर हुए ताज़ा समझौते में किसकी जीत और किसकी हार हुई है? नरेंद्र मोदी और अमित शाह, दोनों की इस समझौते में कभी कोई रुचि नहीं रही थी. उद्धव ठाकरे को व्यक्तिगत रूप से अपमानित कर, शिवसेना को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाकर, उनके मंत्रियों को हाशिये पर डालकर और अपने बल पर सत्ता में लौटने के अहंकारपूर्ण बयान को बारंबार दोहराते हुए दोनों ने अपने इस रुख को अनेकों बार स्पष्ट किया था.

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी गठबंधन के विवाद के मुद्दों पर चर्चा करने और बालासाहेब ठाकरे के प्रति सम्मान जताने उनके घर जाया करते थे. मोदी और शाह ने उद्धव के प्रति कभी इस तरह सम्मान का इजहार नहीं किया. दिसंबर 2014 में फडणवीस मंत्रिमंडल के शपथग्रहण समारोह के दौरान मोदी ने मंच पर उद्धव की मौजूदगी पर ध्यान तक नहीं दिया.

इस अपमान से आहत और क्रुद्ध उद्धव और ‘सामना’ के संपादक संजय राउत नियमित रूप से संघीय मोर्चे को समर्थन की बात करने लगे. राज्यसभा सदस्य राउत सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार की तारीफ किया करते, और यह सचमुच में मोदी का सबसे बुरा अपमान था.

इस विवाद और टकराव के बावजूद, अमित शाह उद्धव ठाकरे से व्यक्तिगत रूप से मिलने गए, और दोबारा मेलमिलाप करने का प्रस्ताव किया. कहीं न कहीं, भाजपा को इस बात का अहसास होने लगा कि दक्षिणी राज्यों में उसकी उपस्थिति नाममात्र की ही है. पूर्वी भारत में भी, ममता बनर्जी के सत्ता में रहते शाह के लिए बंगाल में पांव जमाना मुश्किल लग रहा था. ओडिशा में नवीन पटनायक भाजपा की तरफ कदम नहीं बढ़ा रहे थे. चंद्रबाबू नायडू एनडीए छोड़कर जा चुके थे. अब असम गण परिषद भी एनडीए को छोड़ चुका है.

ऐसे में, कांग्रेस के समान भाजपा को भी एक ‘महागठबंधन’ की दरकार है. इसीलिए शाह ने जल्दबाज़ी दिखाते हुए अन्नाद्रमुक और शिवसेना के साथ समझौते कर लिए. लेकिन यह रिश्ता इतना नाजुक है कि भाजपा के अपने दम पर 200 सीटें नहीं जीतने की स्थिति में फिर से टूट सकता है. शिवसेना अब भी इस बात पर ज़ोर दे रही है कि गठबंधन के सत्ता में आने पर दोनों ही दल ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री का पद साझा करें. भाजपा ने इस पर हामी नहीं भरी है.

शिवसेना के नेता निजी तौर पर यह भी कह रहे हैं कि यदि मोदी को पर्याप्त संख्या में सीटें नहीं मिलती हैं, तो पार्टी प्रधानमंत्री पद के लिए नितिन गडकरी का समर्थन करेगी. यदि तीसरे मोर्चे ने शरद पवार को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो शिवसेना उनका समर्थन कर सकती है. गडकरी और पवार मराठी हैं, और शिवसेना की पहली निष्ठा मराठी माणूस के प्रति है. (शिवसेना ने हिंदुत्व गठबंधन के रहते प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था।)

हालांकि वास्तविक धरातल पर ना तो शिवसैनिक और ना ही संघ परिवार एक-दूसरे के लिए काम करने को लेकर उत्साहित दिखते हैं. निष्ठावान शिवसैनिक एक गुजराती प्रधानमंत्री को वापस लाने के लिए काम नहीं करेंगे. उधर संघ परिवार नहीं चाहता की सेना ज़्यादा सीटें जीते, ताकि उन्हें औकात में रखा जा सके.

इस तरह, यह गठबंधन एक कमज़ोर बुनियाद पर टिका है. उद्धव ने एक बार कहा था कि उनका गठजोड़ भाजपा के साथ है, ना कि मोदी और शाह के साथ. अभी ‘द वॉर ऑफ रोज़ेज़’ समाप्त नहीं हुआ है. ये सिर्फ मध्यांतर है.

(लेखक पूर्व संपादक और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं.)

(अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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