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दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर जम्मू कश्मीर के पुलवामा में हुए अातंकी हमले में मारे गये जवानों को श्रद्धांजलि देते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी | टि्वटर
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पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के महज 2 घंटों के भीतर टेलीविजन एंकर और विशेषज्ञ नरेंद्र मोदी के चुनावी नफानुकसान का हिसाब लगाना शुरू कर चुके थे. जबकि राजनीतिक नेतृत्व, मुख्यत: विपक्ष, गंभीर बना रहा. इस तरह का अविवेकपूर्ण विश्लेषण 1999 के कारगिल युद्ध के बाद के दिनों में भी नहीं देखने को मिला था, जो भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव में हारने के एक महीने बाद ही हुआ था.

1999 में भी आज की तरह ही लोकसभा चुनावों का माहौल बन रहा था. इस हफ्ते कुछ टिप्पणीकारों ने आम चुनाव टाले जाने की भी अटकलें लगाई हैं. आखिरकार, पुलवामा हमला एक आपात स्थिति है और राष्ट्र खतरे में है.


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पाकिस्तान को तबाह कर दो’, ‘पाकिस्तान को नक्शे से मिटा दो’, ‘पाकिस्तानियों को दिखा दो कि मोदी के नेतृत्व में सुपर पावर भारत क्या कर सकता है’, या ‘उन्हें बता दो कि अब उनका सामना कमज़ोर कांग्रेस से नहीं, बल्कि बहादुर हिंदुओं से है’ जैसे नारे लोकप्रिय हो रहे हैं.

टेलीविजन पत्रकारिता की 1999 में आज जितनी पहुंच नहीं थी और टिप्पणीकारों ने तब तक चीखनेचिल्लाने और भड़काऊ बातें कहने की कला में महारत नहीं हासिल की थी. तब न तो स्मार्टफोन थे और न ही सोशल मीडिया. आज, वाट्सएप के मैदानजंग पर पूर्ण युद्ध छिड़ा हुआ है, जबकि फेसबुक पर परमाणु हमले का आह्वान किया जा रहा है.

कुछ चैनल तो इस हद तक चले गए कि उन्होंने इस बात पर चर्चा शुरू कर दी कि कौन सी भारतीय मिसाइल सबसे कम समय में इस्लामाबाद, लाहौर या कराची को निशाना बनाएगी, और वो भी एक औचक हमले में! एंकरों और स्वयंभू सैन्य विशेषज्ञों दोनों ने ही युद्ध में इमरान खान को सबक सिखाने की आवश्यकता पर बढ़चढ़ कर बातें की.

एक चैनल ने तो यह दावा तक कर दिया कि उन्हें अंदर की बात पता है कि कैसे सेना मसूद अज़हर पर आधी रात हमला करने की तैयारी कर रही है. हमारे सुरक्षा बल अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज़ की तरह ‘मिशन इम्पॉसिबल’ को अंजाम देंगे, जैसे उन्होंने ओसामा बिन लादेन को खत्म करने के लिए उसके गुप्त ठिकाने पर दिलेरी दिखाते हुए हमला किया था.

मीडिया विशेषज्ञों ने पाकिस्तानी शहरों पर संभावित (ये भी स्तब्धकारी) हमले के परिणामों का भी विश्लेषण किया. हालांकि, उन्हें इस बात का भान नहीं था कि मात्र 80 साल पहले तक कराची बंबई प्रांत का हिस्सा था, और भारत की व्यापारिक राजधानी से इसकी निकटता के कारण परमाणु बादल मुंबई को भी अपने आगोश में ले सकते हैं.

पर टीवी बहसों में देशभक्ति और ‘मारक प्रवृत्ति’ अपने चरम पर थी, मानो वे ड्राइंग रूम में चर्चा कर रहे हों. न तो टीवी एंकरों ने, और न ही उनके अधिकांश दर्शकों ने कभी युद्ध देखे हैं; वे शायद अपने स्मार्टफोन्स पर युद्ध वाले गेम्स भी नहीं खेलते होंगे. (फोन में इस तरह के गेम्स खेलने वाले बच्चे टीवी पर युद्ध संबंधी गहन बहसों को नहीं देखते!)

विश्लेषकों और टीवी एंकरों ने यह तक संकेत किया कि चुनाव से पहले पुलवामा हमला ‘सख्त कदम’ उठाने वाले नेता की नरेंद्र मोदी की छवि को पुष्ट करेगा, और तटस्थ मतदाताओं को भाजपा के खेमे में लाएगा.

चुनावी दलील की विवेकशून्यता तब हास्यास्पद हो गई जब एक विशेषज्ञ ने कहा, ‘अब राहुल राफेल सौदे की आलोचना करने की हिमाकत नहीं करेंगे, क्योंकि कश्मीर में हमले से इसकी आवश्यकता सिद्ध हो गई है.’ टीवी पर अधिकांश बहसें मनोरंजन में तब्दील हो गईं, क्योंकि कार्यक्रमों में शामिल तर्कशील भारतीय पाकिस्तानियों और विपक्ष में अंतर नहीं कर पा रहे थे. वे दोनों के विरुद्ध समान उत्साह और विद्वेष से तलवारें लहरा रहे थे.

इससे पहले कभी भी एक बड़ी मानव त्रासदी को तत्काल युद्ध की पुकार और चुनाव अभियान में बदलते नहीं देखा गया था. दिसंबर 2001 में संसद पर हमले के बाद माहौल गरमाया था, पर तब चुनाव करीब नहीं थे. पाकिस्तान के खिलाफ 1965 के युद्ध ने भी देशभक्ति का माहौल बनाया था, पर उससे 1967 के चुनावों की रूपरेखा निर्धारित नहीं हुई थी.

बांग्लादेश की मुक्ति का ज़रिया बनने वाला 1971 का युद्ध ‘गरीबी हटाओ’ के मुद्दे वाले चुनाव के नौ महीनों के बाद हुआ था. इस तरह, सिर्फ कारगिल युद्ध ही चुनावों के ठीक पहले होने वाला युद्ध था. पर टीवी पर चौबीसों घंटे बहस और सोशल मीडिया की अनुपस्थिति में कारगिल आज के जैसा उन्माद पैदा नहीं कर सका था.

पुलवामा हमले का चुनाव पर असर पड़ेगा, पर उसका स्तर क्या होगा इस बारे में भविष्यवाणी करना अभी जल्दबाज़ी होगी.

सरकार के लिए हमारी सुरक्षा व्यवस्था की घोर नाकामी पर सफाई देना आसान नहीं होगा. कैसे टनों विस्फोटक से लदा एक वाहन सीआरपीएफ के काफिले से आ टकराता है? वह जांच चौकियों की पकड़ में क्यों नहीं आया? जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने स्पष्टवादिता दिखाई, जब उन्होंने सुरक्षा चूक होने की बात को स्वीकार कियाअब तो कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया जा रहा है कि संभावित हमले को लेकर खुफिया सूचनाएं पहले से उपलब्ध थीं.


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इसके बावजूद, यदि मोदी सरकार युद्ध का विकल्प चुनती है, तो इससे चुनाव कार्यक्रम और परिणाम सब बदल जाएंगे. भारतीय उपमहाद्वीप पर युद्ध का प्रभाव विनाशकारी होगा.

हम वास्तव में एक ज्वालामुखी पर बैठे हैं, पर क्या मीडिया को इसकी परवाह है? क्या इन्हें युद्ध की गंभीरता और उसके परिणामों की समझ भी है?

सामूहिक उन्माद आत्मघाती फैसलों का कारण बन सकता है. हमें माध्यम को हमारी नियति का स्वामी नहीं बनने देना चाहिए.

(लेखक पूर्व संपादक और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं.)


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