मुंबई: शिवसेना (उद्धव बाल ठाकरे) ने किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल का नाम बदलने का विरोध किया है. यह उनके पहले के रुख से अलग है, जब वे जगहों और स्मारकों के अंग्रेजी नामों के खिलाफ रहते थे.
बॉम्बे से मुंबई; विक्टोरिया टर्मिनस से छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, एलफिंस्टन रोड से प्रभादेवी—इन सभी नामों को बदलने में एकजुट शिवसेना आगे रही थी और मराठी संस्कृति को मजबूत करने की बात करती रही थी, लेकिन इस हफ्ते की शुरुआत में, जब महाराष्ट्र के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) को KEM अस्पताल का नाम बदलकर ‘कौशल्या एकलव्य मेमोरियल अस्पताल’ करने का प्रस्ताव भेजा, तो शिवसेना (यूबीटी) नेताओं ने इसका विरोध किया और बीएमसी कमिश्नर को लिखित ज्ञापन देकर नाम न बदलने की मांग की.
शिवसेना (यूबीटी) के एमएलसी सुनील शिंदे ने दिप्रिंट से कहा कि किसी भी नाम बदलने के प्रस्ताव से पहले उसके पीछे की मंशा देखनी चाहिए.
उन्होंने कहा, “सरकार की मंशा गलत है. वे नकली हिंदुत्व का इस्तेमाल कर रहे हैं. अपने प्रोफेशनल कामों में इनके सारे नाम अंग्रेजी में हैं. KEM के मामले में स्थानीय लोगों की भावना को ध्यान में रखना चाहिए.”
शिंदे ने कहा, “KEM अस्पताल के नाम के पीछे एक इतिहास है और स्वास्थ्य क्षेत्र में एडवर्ड का योगदान भी है, जिसे नकारा नहीं जा सकता. हमने और मौजूदा सरकार ने जो किया, उसमें फर्क है. हमने सिर्फ उन जगहों के नाम बदले थे जिनका अंग्रेजी शासन से कोई मतलब या मकसद नहीं था.”
राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई ने कहा कि शिवसेना हमेशा तर्क के आधार पर फैसले नहीं लेती.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “वे ज्यादा भावनात्मक रुख अपनाते हैं और परेल, लालबाग का इलाका शिवसेना (यूबीटी) का मजबूत गढ़ है. और क्योंकि यह प्रस्ताव लोढ़ा ने दिया है, जो गुजराती भाषी नेता हैं, इसलिए इसे गुजराती बनाम मराठी का मुद्दा माना जा रहा है और इसी वजह से इसे उठाया गया होगा.”
उन्होंने कहा, “शिवसेना का विरोध बहुत ज्यादा बौद्धिक नहीं है. वे अपने रुख पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करते. स्थानीय कॉरपोरेटर्स ने यह मुद्दा उठाया होगा.”
फिलहाल बीएमसी द्वारा चलाया जा रहा KEM अस्पताल मुंबई के सबसे पुराने सरकारी अस्पतालों में से एक है. करीब 390 स्टाफ डॉक्टर और 550 रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ, 1800 बेड वाला यह अस्पताल हर साल लगभग 18 लाख आउट-पेशेंट और 85,000 इन-पेशेंट का इलाज करता है. रेजिडेंट डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ ने भी नाम बदलने का विरोध किया है और प्रशासन से सुविधाएं बेहतर करने पर ध्यान देने की मांग की है.
स्थानीय विधायक अजय चौधरी ने दिप्रिंट से कहा, “KEM अस्पताल की 100 साल पुरानी विरासत है और उस समय किंग एडवर्ड ट्रस्ट ने 1926 में 7 लाख रुपये दान दिए थे और अस्पताल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. तो इस विरासत को बदलने की क्या जरूरत है?”
उन्होंने कहा कि KEM ने सालों में लाखों लोगों की जान बचाई है और देशभर से लोग यहां इलाज कराने आते हैं.
उन्होंने कहा, “इसके अलावा, KEM हमारी पहचान है. हम कौशल्या श्रेष्ठ एकलव्य नाम के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन मुंबई में नाम बदलने का फैसला लोढ़ा कौन होते हैं? मुंबई को महाराष्ट्र में लाने में उनका क्या योगदान है? हमने—मिल मजदूरों और मध्यम वर्ग ने—मुंबई के लिए अपना खून दिया है, तो क्या हमें यह तय करने का हक नहीं है कि क्या होना चाहिए? इस प्रस्ताव से पहले संबंधित लोगों से राय क्यों नहीं ली गई?”
डबल स्टैंडर्ड?
नाम बदलने का ट्रेंड खुद शहर के नाम से शुरू हुआ था. बॉम्बे, जो पहले पुर्तगाल के समय सात द्वीपों का समूह था और जिसे “बॉम बहाई” कहा जाता था, बाद में ब्रिटिशों ने इन सातों द्वीपों को जोड़कर इसका नाम बॉम्बे रखा.
हालांकि, स्थानीय लोग इसे मुंबई कहते थे, जो स्थानीय देवी मुंबा देवी के नाम से लिया गया है.
आज़ादी के बाद, जब बाल ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना 1970 और 1980 के दशक में मुंबई में एक मजबूत ताकत बनकर उभरी, तब शहर का नाम मुंबई करने की मांग तेज़ हुई. आखिरकार 1995 में जब शिवसेना-बीजेपी सरकार सत्ता में आई, तो अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही यह फैसला लिया गया और उसी साल केंद्र सरकार ने भी मंजूरी दे दी.
शिंदे ने कहा, “जब मुंबई नाम रखा गया, तो मकसद स्थानीय संस्कृति और उन 106 हुतात्माओं का सम्मान करना था, जिन्होंने मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल कराने के लिए अपनी जान दी. मराठी गर्व इसका बड़ा कारण था.”
वह 1955 से 1960 के बीच संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में मारे गए 106 प्रदर्शनकारियों की बात कर रहे थे. इसके बाद बारी आई मशहूर विक्टोरिया टर्मिनस (वीटी) स्टेशन की, जिसका नाम 1996 में छत्रपति शिवाजी टर्मिनस कर दिया गया और 2017 में बीजेपी नेताओं के जोर देने पर इसमें ‘महाराज’ जोड़ा गया. अब इसे छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस कहा जाता है.
2017 में, शिवसेना सांसद अरविंद सावंत ने मुंबई के कई उपनगरीय रेलवे स्टेशनों के नाम बदलने की एक लिस्ट पेश की थी. उन्होंने एलफिंस्टन रोड का नाम बदलकर प्रभादेवी करने का सुझाव दिया, जो स्थानीय देवी के नाम पर है.
स्टेशन जिस इलाके में हैं, उसके आधार पर उन्होंने कहा था कि चर्नी रोड स्टेशन का नाम गिरगांव, करी रोड का नाम लालबाग और सैंडहर्स्ट रोड का नाम डोंगरी किया जाए. एलफिंस्टन रोड स्टेशन, जिसका नाम 1850 के दशक में बॉम्बे के गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन के नाम पर रखा गया था, 2018 में बदलकर प्रभादेवी कर दिया गया.
बाकी नाम बदलने के प्रस्ताव अभी प्रक्रिया में हैं और केंद्र सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.
दिप्रिंट ने इस मामले में शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत से कॉल और मैसेज के जरिए संपर्क किया.
बीएमसी में विपक्ष की नेता किशोरी पेडनेकर ने दिप्रिंट से कहा कि जब शिवसेना अंग्रेजी नामों का विरोध कर रही थी, तब उसकी मंशा अलग थी, जबकि लोढ़ा की मंशा राजनीतिक है.
उन्होंने कहा, “लोढ़ा अपने बनाए हुए बिल्डिंग्स जैसे लोढ़ा ट्रंप, लोढ़ा वर्ल्ड वन आदि के नाम क्यों नहीं बदलते? वह कहते हैं कि अंग्रेजी असर हटाना है, तो अपने कंस्ट्रक्शन बिजनेस से शुरुआत क्यों नहीं करते? यह दोहरा मापदंड है.”
शिवसेना (यूबीटी) नेता ने कहा, “सिर्फ हम ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोग और डॉक्टर भी इसका विरोध कर रहे हैं. सीएसटी (प्रोटेस्ट) के समय किसी ने हमारा विरोध नहीं किया था.”
शिवसेना (यूबीटी)) नेताओं ने कहा कि लोढ़ा को पहले केईएम जैसा कुछ बनाना चाहिए और फिर उसका नाम जो चाहे रख लें, न कि ऐसे एकतरफा फैसले लें.
चौधरी ने सवाल उठाया कि सत्ताधारी पार्टी और खासकर मंगल प्रभात लोढ़ा ने मलाबार हिल और केम्प्स कॉर्नर जैसे इलाकों के नाम क्यों नहीं बदले. उन्होंने कहा, “कल को वह कह सकते हैं कि सेंट जॉर्ज अस्पताल या जेजे अस्पताल का नाम बदल दो, फिर क्या होगा? ऐसे नहीं चलता. हम सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध नहीं कर रहे हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)