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जंगल की प्रतीकात्मक तस्वीर । पिक्साबे
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देश के 16 राज्यों के करीबन 11 लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से बेदखल करने के सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से न सिर्फ आदिवासी बल्कि पर्यावरण के जानकार भी चौंक गए हैं. इस फैसले का असर न सिर्फ आदिवासियों पर पड़ेगा, बल्कि देश के जल, जंगल और जमीन तथा पर्यावरण संतुलन के लिए भी इसके दूरगामी परिणाम होंगे.

भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के विशेषज्ञ इस बात को जानते हैं कि आदिवासियों का जंगल से क्या रिश्ता रहा है.

आदिवासियों के लिए जंगल कोई नेचुरल रिसोर्स या प्राकृतिक संसाधन नहीं है, कि जिसका इस्तेमाल करना है. उनका जीवन और उनकी पूरी संस्कृति ही खेती और जंगल पर आधारित है. अंग्रेजों के आने के पूर्व कभी किसी ने उनके इस अधिकार को चुनौती नहीं दी. हमेशा से यही माना गया कि जंगल आदिवासियों के हैं और उन पर पहला अधिकार उनका ही है.

सन् 1765 में नवाब मीर कासिम की पराजय के बाद हुए समझौते में बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी अंग्रेजों को प्राप्त हुई. छोटानागपुर उस वक्त बिहार का हिस्सा था. प्रारंभ के तीन चार वर्षों में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में कोई दखलंदाजी नहीं की, लेकिन कैप्टन कैमक ने इस क्षेत्र में प्रशासनिक अधिकार प्राप्त करने के बाद 1769 में प्रशासनिक व्यवस्था कायम करने का प्रयास शुरु किया. इस पूरे इलाके में जमींदारी प्रथा शुरू की गई.

औद्योगिक क्रांति और रेल पटरियां बनाने और बिछाने के क्रम में अंग्रेजों ने जंगल के महत्व को समझा और जंगल पर भी जमीन की तरह अपना एकाधिकार माना. इस तरह जो जंगल सदियों से आदिवासियों के थे, उन पर सरकार ने अपना अधिकार जता दिया. आदिवासी बहुल इलाकों में जमींदारों, ठेकेदारों का प्रवेश हुआ और आदिवासियों का अधिकार जंगल पर से छिनता गया. लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग शुरू हुआ तो उसकी अंधाधुंध कटाई भी शुरु हो गई और फिर जंगल बचाने के नाम पर अंग्रेज सरकार को जंगल पर अधिकार कायम करने का अवसर मिल गया. आरक्षित वनों के नाम पर जंगल का बड़ा हिस्सा उनके कब्जे में चला गया.

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बावजूद इसके, 1902-1908 के सर्वे सेटलमेंट के वक्त जंगल पर आदिवासियों के परंपरागत अधिकारों को मान्यता दी गई. ये अधिकार निम्न रूप में चिन्हित किये गए- अपना घर बनाने के लिए या उसकी मरम्मत के लिए जंगल से लकड़ी काटने का अधिकार, कृषि औजार, हल आदि बनाने के लिए लकड़ी काटने का अधिकार, जंगल में मवेशी चराने या घास काटने का अधिकार, महुआ और अन्य फलदार वृक्षों से गिरने वाले फलफूल को चुनने का अधिकार.

जंगल में बसे आदिवासी गांवों को उजाड़ने का और आदिवासियों को जंगल से बेदखल करने का क्रूर विचार तो विदेशी हुक्मरानों को भी नहीं आया था. यह विचार तो कारपोरेट पोषित इस व्यवस्था को ही आया. इसलिए आप देखेंगे कि आजादी के बाद बड़ी संख्या में आदिवासी जंगलों से बेदखल किए गए और देश का फॉरेस्ट कवर घटता चला गया.

यहां यह जिक्र करना प्रासंगिक होगा कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी उनके बनाये जंगल कानून लगभग जारी रहे. एक बड़ा बदलाव 2006 में यूपीए सरकार द्वारा पारित वन अधिकार कानून से आया, जिसके तहत आदिवासियों या पारंपरिक रूप से जंगलों में निवास करने वालों के प्रति किये गये ऐतिहासिक अन्याय देखते हुए, जंगल में रहने वाले प्रत्येक परिवार को 4 एकड़ भूमि देने का प्रावधान किया गया.

इसके बाद ही सिर्फ झारखंड में ग्रामसभा के अनुमोदन पर 1,07,187 आदिवासी परिवार एवं 3569 अन्य पारंपरिक वन्य निवासियों को जमीन के पट्टे देने के लिए सरकार के समक्ष दावा पेश किया गया था. पूरे देश में लगभग 11,27,446 आदिवासी एवं अन्य वन निवासियों ने वनभूमि पर नये अधिनियम के तहत दावे पेश किये थे, जो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खारिज हो गये.

उन लाखों आदिवासियों पर अपने निवास से उजड़ने का खतरा मंडरा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का वनों की हिफाजत या पर्यावरण की सुरक्षा से कोई वास्ता नहीं. यह तो स्वयंसिद्ध है कि जंगल आज उन्हीं जगहों पर बचे हैं, जहां आदिवासी बसे हुए हैं. क्योंकि आदिवासी ही इस बात को समझते हैं कि प्राकृतिक जंगल उगाये नहीं जा सकते, खुद बनते हैं. आदिवासियों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था के तहत कुछ बंदिशें स्वयं पर लगा रखी हैं. इन बंदिशों के तहत महुआ, आम, करंज, जामुन, केंद, आदि के वृक्ष वे नहीं काटते हैं. सखुआ के पेड़ की बंदिश यह कि तीन फीट छोड़ कर ही उसे काटना है. वे जलावन के लिए हमेशा सूखे पेड़ ही काटते हैं. इसलिए जहां आदिवासी हैं, वहां जंगल बचे हुए हैं. जहां वे नहीं, वहां जंगल का नामोनिशान मिट चुका है.

सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला वनों से आदिवासियों को उजाड़ कर, वन क्षेत्र को कारपोरेट को देने का रास्ता प्रशस्त करने वाला है. दरअसल,बाक्साईट के तमाम खदान विशाखापटनम से रायगढ़ा तक फैले नियमगिरि पर्वतमाला क्षेत्र में हैं. झारखंड में यूरेनियम और सोने के नये खदान वन क्षेत्र में हैं. ये सभी इलाके आदिवासियों के प्राकृतिक निवास क्षेत्र हैं और इस पूरे इलाके में खनन के खिलाफ आदिवासी आंदोलनरत हैं. राजनीतिक कारणों से सरकारें इन आंदोलनों के सामने झुकती रही है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आदिवासियों को इन जंगलों से हटाने का रास्ता साफ हो सकता है. मुमकिन है कि इसी वजह से इस केस में आदिवासियों के पक्ष को किसी ने सही तरीके से रखा ही नहीं.

इस फैसले का भयानक असर आदिवासी जन जीवन पर पड़ने वाला है, क्योंकि जंगल से खदेड़े जाने पर वे न सिर्फ अपने परंपरागत निवास स्थल से वंचित हो जायेंगे, बल्कि उनके जीवन का आधार ही छिन जायेगा. आदिवासी अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि आधारित नहीं. कुछ महीने यदि वे खेती पर निर्भर रहते हैं तो कई महीने वनोत्पादों पर. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लाखों आदिवासियों का जीवन संकट में पड़ गया है.


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क्या आदिवासी सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को आसानी से स्वीकार कर लेंगे? कहना मुश्किल है. अतीत को देखें तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका सर्वत्र विरोध होगा. ऐसा माना जा सकता है कि इस केस की सरकार ने सही पैरवी नहीं की है. उचित होगा कि सरकार इस आदेश में बदलाव के लिए पुनर्विचार याचिका दायर करे या कोई और कानूनी तरीका अपनाए या फिर अध्यादेश या कानून के जरिए आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण करे.

(लेखक जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े रहे. ‘समर शेष है’ उनका चर्चित उपन्यास है.)

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