ओबीसी की राजनीतिक चेतना में जब तक अधिकार और हिस्सेदारी का सवाल महत्वपूर्ण नहीं होता, तब तक सिर्फ आरक्षण देकर उन्हें साम्प्रदायिक होने से रोका नहीं जा सकता.
उच्चतम न्यायालय का कहना था कि सामाजिक नैतिकता की वेदी पर संविधान को शहीद नहीं किया जा सकता और कानून के शासन में सिर्फ संविधान की हुकूमत को ही इजाजत दी जा सकती है.
भारतीय रिजर्व बैंक लगातार रेपो रेट में कमी कर रहा है, लेकिन उसका असर नहीं दिख रहा है. डूबते धन के संकट से जूझ रहे बैंक ब्याज दर घटाने को तैयार नहीं हो रहे हैं.
ऐसा कैसे मुमकिन हो पा रहा है कि अपने ही देश कि किसी हिस्से से संबंधित किसी कानूनी प्रावधान में फेरबदल को किसी 'दुश्मन देश' पर जीत के मर्दाना उत्सव में तब्दील करने की कोशिश की गई.
एक तरह से हम यह भी कह सकतें हैं कि ये सभी गणमान्य व्यक्ति उस भयावह हिंसा को देखने से बच गये, जो स्वतंत्र भारत के उनके सपने के हकीकत मे पूरा होने से पहले हीं पूरे भारत को लहू-लुहान कर चुकी थी.
पश्चिमी लिबरलिज़्म अधिकारों से शुरू होता है और समाज को पीछे की ओर डिज़ाइन करता है. धर्म रिश्तों से शुरू होता है. यह मानता है कि आप ज़िम्मेदारियों के जाल में पैदा हुए हैं, और यह जाल एक तोहफ़ा है.