Monday, 27 June, 2022
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एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्राप्त हो

उच्चतम न्यायालय का कहना था कि सामाजिक नैतिकता की वेदी पर संविधान को शहीद नहीं किया जा सकता और कानून के शासन में सिर्फ संविधान की हुकूमत को ही इजाजत दी जा सकती है.

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देश में समलैंगिक विवाह को भले ही कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं हो, लेकिन हाल के वर्षों में इस तरह के विवाह सुर्खियों में रहे हैं. शायद, ऐसा करने वाले समलैंगिक जोड़ों को उम्मीद है कि देर सवेर उनके समुदाय को विवाह करने सहित कई अन्य नागरिक अधिकार मिल जायेंगे.

इसी उम्मीद के साथ ही एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्य बार-बार उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा रहे हैं. हालांकि, उन्हें अभी तक इसमें सफलता नहीं मिल सकी, लेकिन वयस्कों के बीच स्वेच्छा से बनाये गये समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था के बाद इस समुदाय को उम्मीद है कि वे समलैंगिक विवाह, गोद लेने और किराये की कोख का इस्तेमाल करके संतान सुख प्राप्त करने जैसे नागरिक अधिकार प्राप्त करने में सफल होंगे. इन अधिकारों के लिये उनका संघर्ष जारी है.

इस समुदाय ने अपने इन नागरिक अधिकारों के लिये शीर्ष अदालत के सितंबर, 2018 के फैसले के बाद ही उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी. न्यायालय ने उनकी यह याचिका ही नहीं बल्कि उनकी पुनर्विचार याचिका भी पिछले महीने खारिज कर दी. इस समुदाय के पास अभी भी उपचारात्मक याचिका दायर करने का विकल्प है.

इस समुदाय को अपने नागरिक अधिकारों को प्राप्त करने में सफलता मिलने की उम्मीद की वजह संविधान पीठ द्वारा छह सितंबर, 2018 को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त करने का फैसला है, जिसके तहत अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखा गया था.

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति के फैसले में कहा था कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों को भी संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के तहत गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्राप्त है.

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समलैंगिक यौन संबंधों के संदर्भ में यह तथ्य भी दिलचस्प है कि इसे अपराध की श्रेणी में रखने के खिलाफ नयी याचिकाओं पर संविधान पीठ के फैसले से पहले इसी मुद्दे पर न्यायालय के दिसंबर 2013 फैसले में सुधार के लिये उपचारात्मक याचिकायें शीर्ष अदालत में लंबित थी.


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लेकिन, आधार योजना प्रकरण पर सुनवाई के दौरान न्यायालय में निजता के अधिकार का मुद्दा उठा. इस पर विचार के लिये न्यायालय ने नौ सदस्यीय संविधान पीठ गठित की थी. संविधान पीठ द्वारा अगस्त, 2017 में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के दायरे में शामिल करने की व्यवस्था के साथ ही समलैंगिकता का मुद्दा नये सिरे से न्यायालय पहुंचा था.

आधार योजना से जुड़े निजता के अधिकार के सवाल पर अपने फैसले में संविधान पीठ ने कहा था कि लैंगिक रूझान निजता की एक आवश्यक विशेषता है और लैंगिक रूझान के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव करना ऐसे व्यक्ति की गरिमा को गंभीर ठेस पहुंचाना है.

निजता के अधिकार के बारे में संविधान पीठ की व्यवस्था के बाद नर्तक नवतेज जौहर, शेफ ऋतु डालमिया, पत्रकार सुनील मेहरा, ललित होटल के कार्यकारी निदेशक केशव सूरी और आईआईटी के 20 पूर्व तथा वर्तमान छात्रों एवं शिक्षकों ने धारा 377 की संवैधानिक वैधता को सीधे चुनौती दी. पहले के फैसले में सुधार के लिये दायर याचिका लंबित रहने के दौरान ही इन याचिकाओं को न्यायालय ने संविधान पीठ को सौंप दिया था.

संविधान पीठ ने छह सितंबर, 2018 को अपने फैसले में एकांत में सहमति से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर करते हुये कहा था कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों को भी संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के तहत गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्राप्त है.

न्यायालय ने समाज और लोगों के नजरिये में बदलाव लाने पर जोर देते हुये दो टूक शब्दों में कहा था कि, ‘समलैंगिकता एक जैविक तथ्य है और इस तरह के लैंगिक रूझान रखने वाले समुदाय के सदस्यों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव उनके मौलिक अधिकारों का हनन है.’

इसी व्यवस्था का नतीजा था कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्य तुषार नैयर ने अपने वर्ग के सदस्यों के लिये समलैंगिक विवाह, बच्चा गोद लेने और किराये की कोख से संतान सुख प्राप्त करने जैसे नागरिक अधिकारों की मांग की। यह अलग बात है कि शीर्ष अदालत ने 29 अक्तूबर, 2018 को यह याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद न्यायालय ने 11 जुलाई को उनकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी.

पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुये न्यायालय ने संविधान पीठ की छह सितंबर, 2018 की व्यवस्था का हवाला दिया है जिसमें संविधान पीठ ने समलैंगिकता से संबंधित मुद्दे पर विस्तार से फैसला सुनाया गया था.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि धारा 377 के प्रावधान के बारे में संविधान पीठ की व्यवस्था के साथ ही इस बात की संभावना बढ़ गयी थी कि भविष्य में समलैंगिक जीवन गुजार रहे जोड़ों की शादी, उनके द्वारा बच्चे गोद लेने की कवायद, ऐसे जोड़ों में उत्तराधिकारी का मुद्दा, घरेलू हिंसा और संबंध विच्छेद होने की स्थिति में गुजारा भत्ता जैसे कई अन्य मुद्दे भी उठेंगे जिनका संबंध दूसरे कानूनों से होगा.

इस समय हमारे देश के दीवानी और विभिन्न धर्माे के कानूनों में समलैंगिक जोड़ों के विवाह का कोई प्रावधान नहीं है. इसी तरह, कानून में ऐसे जाड़ों के लिये बच्चा गोद लेने की भी व्यवस्था नहीं है.

इसके बावजूद, संविधान पीठ के फैसले के बाद एलजीबीटीक्यू समुदाय चाहता है कि उनके नागरिक अधिकारों को बुनियादी मानव अधिकारों का हिस्सा बनाया जाये क्योंकि धारा 377 के बारे में संविधान पीठ के फैसले में इन अधिकारों पर विचार ही नहीं किया गया. यह समुदाय चाहता है कि समलैंगिक विवाह, उनके द्वारा बच्चा गोद लेने, किराये की कोख से संतान प्राप्त करने और आईवीएफ जैसे अधिकारों को मान्यता दी जाये ताकि वे भी सेना, नौसना और वायु सेना में खुलकर शामिल हो सकें और उनके यौन रूझान के आधार पर उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो.


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इस वर्ग की यह भी दलील है कि इन अधिकारों को मानव अधिकार के रूप में मान्यता नहीं मिलने की वजह सेे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 और 29 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है.

संविधान पीठ ने अपने फैसले में सर्वसम्मति से व्यवस्था दी की धारा 377 का एक हिस्सा संविधान में प्रदत्त समता और गरिमा के साथ जीने की आजादी प्रदान करने वाले अनुच्छेद 14 और 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करता है.

संविधान पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार की ओर से तत्कालीन अतिरिक्त सालिसीटर जनरल अब सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने एकांत में परस्पर सहमति से दो वयस्कों के बीच संबधों के संदर्भ में धारा 377 की संवैधानिक वैधता का मसला न्यायालय के विवेक पर छोड़ दिया था. लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया था कि अपने साथी के चयन का अधिकार किसी विकृति की ओर नहीं बढ़ना चाहिए और अपना साथी चुनने की आजादी के तहत व्यक्ति को अपनी बहन जैसे सगे संबंधी को ही साथी चुनने या उसके साथ यौनाचार का अधिकार नहीं मिलना चाहिए क्योंकि इस तरह का कृत्य हिन्दू कानून के सिद्धांतों के विपरीत होगा.

संविधान पीठ ने दशकों से भय के साये में जिंदगी बसर कर रहे इस समुदाय के सदस्यों के प्रति जनता की सोच पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि बहुमत संविधान और इसके प्रावधानों को कुचल नहीं सकता है. न्यायालय का कहना था कि, ‘सामाजिक नैतिकता की वेदी पर संविधान को शहीद नहीं किया जा सकता और कानून के शासन में सिर्फ संविधान की हुकूमत को ही इजाजत दी जा सकती है.’

साथ ही संविधान पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि बगैर सहमति के समलैंगिक यौन संबंध स्थापित करना, पशुओं के साथ अप्राकृतिक कृत्य करना या बच्चों के साथ ऐसे शारीरिक संबंध बनाना, भले ही ऐसा उनकी सहमति से किया गया हो, धारा 377 के तहत अपराध माना जायेगा. इस अपराध के लिये दस साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि बदलती सामाजिक सोच के मद्देनजर भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत सहमति से समलैंगिक संबंध स्थापित करने के कृत्य को अपराध के दायरे से बाहर कराने में मिली सफलता के बाद एलजीबीटीक्यू समुदाय एक बार फिर अपने नागरिक अधिकारों को प्राप्त करने में कामयाब होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं.यह आलेख उनके निजी विचार हैं)

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