भारतीय उद्योग ने निजी तौर पर, आवाज उठाने के लिए राजीव बजाज की प्रशंसा की, लेकिन लॉकडाउन के लिए मोदी सरकार की आलोचना करने की बजाय, पूरे तीन महीने नुक़सान सहना पसंद किया.
अगर सरकार किसानों के फायदे के लिए खेती-बाड़ी से संबंधित कानूनों में सचमुच ऐतिहासिक बदलाव ही लाना चाहती थी तो उसे इन कानूनों पर संसद और सर्वजन के बीच बहस और जांच-परख से कन्नी काटने की क्या जरूरत थी?
कोल्सटन की तरह ही क्या दलितों, नीच कही जाने वाली जातियों और महिलाओं के लिए घृणा के पात्र मनु की मूर्ति को भी राजस्थान हाईकोर्ट परिसर से हटाकर उसी तरह नष्ट कर दिया जाए या पानी में या कूड़ेदान में फेंक दिया जाए, लेकिन नहीं, इतिहास के सबसे बुरे और क्रूर अध्यायों को भी शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए, बचाकर रखना चाहिए.
मानसून का आगमन होने ही वाला है. बाढ़ की विभीषिका की नई तस्वीरें सामने आएगी. हम लोग उन तस्वीरों को देखकर च्च..च्च..च्च.. करेंगे और मजदूरों के पलायन की तस्वीरें धीरे-धीरे धुंधला जाएगी.
भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत को सुदृढ़ करने के लिए मज़बूत नेतृत्व और निर्णायक कार्रवाइयों की ज़रूरत है. राष्ट्रवाद की बातों भर से काम नहीं चलेगा.
हिंदुत्व ब्रिगेड को गोवध या पशुओं की बलि देने में कोई परहेज नहीं है बशर्ते इससे दलित, मुसलमान, ईसाई या आदिवासी जुड़े हों, यानी उनका विरोध और शोर शराबा नकली है.
पाकिस्तान और चीन से ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका व बंगलादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ भी हमारे संबंध अच्छे नहीं हैं. क्या इसके लिए हम एकतरफा तौर पर सारा ठीकरा इन पड़ोसी देशों पर ही फोड़कर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं?
दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है.