अमेरिका को चुनौती देना भारत के किसी नेता के लिए आमतौर पर निजी जोखिम नहीं होता. विदेशी दबाव की बात आते ही देश एकजुट होकर उस नेता के साथ खड़ा हो जाता है जिसे वे इस लड़ाई में अपना अगुआ मानते हैं.
सिराज जैसा नाम राष्ट्रीय गर्व के साथ लिया जाना अपने आप में एक हल्की-सी क्रांति है. उनकी सफलता इस बात का सबूत मानी जा रही है कि मज़दूर वर्ग से जुड़े पासमांदा बैकग्राउंड के लोग भी इस मुकाम तक पहुंच सकते हैं.
भारत के रणनीतिक फैसलों से संकेत मिलता है कि अमेरिका के दोहरेपन के बारे में भारत व्यावहारिक समझ रखता है. अमेरिका-भारत रक्षा सहयोग में तेजी आई है लेकिन भारत कई सैन्य सप्लायरों को चुन रहा है.
भारत बार-बार ‘महाशक्ति’ के भ्रमजाल में फंस जाता है. सोचिए 1950 का दशक, जब नई दिल्ली ने अपनी असल संभावनाओं को वास्तविक शक्ति समझ लिया और 1962 में चीन ने उसे ज़मीन पर ला दिया.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण चुनाव जीतने की संभावना बढ़ाने के लिए किया गया लगता है, लेकिन एक बड़ा कानूनी सवाल है: क्या इससे उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है?