किसान पहले से कहते आये हैं कि हम बस इन तीन कृषि-कानूनों की वापसी चाहते हैं और वे अपनी इस बात पर अडिग हैं लेकिन दोष मढ़ा जा रहा है कि किसान बार-बार अपनी बात बदल रहे हैं.
इस नामंजूरी की जद में पिछले साल सीईसी यानी केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति की सिफारिशें हैं जिसने तमाम सरकारी दवाबों के बाद भी इस परियोजना पर गंभीर प्रश्न खड़े किए.
अब किसानों को पहले की तरह शब्दजाल में फंसाकर या सब्जबाग दिखाकर अपना काम नहीं बनाया जा सकता. क्योंकि वे और उनके नेता न सिर्फ लोकतांत्रिक चेतना से सम्पन्न हो चुके हैं, बल्कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और उनकी राह में आने वाले कानूनों की पूरी जानकारी से लैस भी हैं.
मोदी सरकार के कृषि सुधारों में वे सारी विशेषताएं और भावनाएं निहित हैं, जो मध्यवर्गीय आकांक्षाओं पर आधारित मोदी मार्का राजनीति से जुड़ी हैं लेकिन ऐसा लगता है कि वे जनता का मूड भांपने में चूक गए हैं.
अमेरिका को पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. चीनी पैसे पर मौज करती पाकिस्तानी सेना हर तरह से बुरी खबर है, चाहे मैंडरिन में कही जाए या पंजाबी या अंग्रेजी में.
कोई भी पक्ष संविधान का अक्षरश: पालन नहीं कर रहा है और भारत तेज़ी के साथ एक ऐसे नियम विहीन ज़ोन में दाखिल हो रहा है जहां कानून का नियम किसी भी चीज़ का मापदंड नहीं रह गया है.
कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह ‘जी-23’ की बगावत और अहमद पटेल के निधन के बाद राहुल गांधी निक्कोलो मैकियावेली के 16वीं सदी के ग्रंथ ‘द प्रिंस’ से राजनीति के कुछ सबक ले सकते हैं.