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Monday, 26 February, 2024
होममत-विमतभारत बंद- देश ऐसे संवैधानिक 'ग्रे जोन' में जा रहा है जहां सही और गलत का फैसला राजनीति करती है

भारत बंद- देश ऐसे संवैधानिक ‘ग्रे जोन’ में जा रहा है जहां सही और गलत का फैसला राजनीति करती है

कोई भी पक्ष संविधान का अक्षरश: पालन नहीं कर रहा है और भारत तेज़ी के साथ एक ऐसे नियम विहीन ज़ोन में दाखिल हो रहा है जहां कानून का नियम किसी भी चीज़ का मापदंड नहीं रह गया है.

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तकरीबन नामुमकिन है कि किसानों के चल रहे आंदोलन को सही या गलत ठहराने के लिए निष्पक्ष संवैधानिक सिद्धांतों को लागू किया जा सके और इससे देशभक्त भारतीयों को चिंता होनी चाहिए.

आमतौर से बलपूर्वक सार्वजनिक प्रदर्शन तथा आज के भारत बंद, संवैधानिक तरीके नहीं कहे जा सकते और ये ‘अराजकता की व्याकरण’ की उस श्रेणी में आते हैं जिससे डॉ बीआर आंबेडकर ने हमें चेताया था. लेकिन सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन और सत्याग्रह की अपनी अस्वीकृति के साथ, उन्होंने शर्त रखी थी कि ‘जहां संवैधानिक तरीके मौजूद हों, वहां ऐसे असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं हो सकता’. ये देखते हुए कि नरेंद्र मोदी सरकार ने छोटे किए गए संसद सत्र में, कृषि सुधारों को आगे बढ़ाया और सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कितना अनंत ज्ञान और असीमित धैर्य दिखाया, आंदोलनकारी किसान तर्क दे सकते हैं कि संवैधानिक तरीकों पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

लेकिन फिर, किसानों के लिए कितना न्यायसंगत है- उनकी शिकायतें कितनी भी जायज़ क्यों न हों- कि वो सड़कों को रोककर दूसरे लोगों के जीवन और जीविका को बाधित कर दें? क्या ऐसे विरोध प्रदर्शन और भारत बंद से प्रभावित, बेकसूर लोगों की जीविका और संपत्ति की रक्षा के लिए कानून को लागू नहीं किया जाना चाहिए?

दुर्भाग्यवश, कौन सही है और कौन गलत है, ये बहुत व्यक्तिपरक और ध्रुवीकृत हो गया है. जवाब इसपर निर्भर करता है कि आप किसके पक्षधर हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का विरोध करने वाला तकरीबन हर व्यक्ति किसानों की मांग की हिमायत कर रहा है. विपक्षी पार्टियां विरोध के इस रथ पर सवार हो गई हैं जो उन्हें लगता है कि मोदी सरकार को नुकसान पहुंचाएगा. मोदी सरकार के समर्थकों के लिए, जिस तरह से सुधार लाए गए उसमें कुछ भी गलत नहीं है, किसान गलत हैं, गुमराह किए गए हैं, यहां तक कि शायद ‘राष्ट्र-विरोधी’ भी हैं. बहुत कम लोग इससे अवगत हैं कि मामले के तथ्य क्या हैं और दांव पर क्या लगा है और मुझे नहीं लगता कि उन्हें परवाह भी है. बात सिर्फ राजनीतिक द्वंद की है कि इसमें कौन जीतता है.

निष्पक्ष रूप से, नीतिगत मामलों और बीजेपी तथा किसान संगठनों द्वारा अपनाए गए तरीकों के साथ बहुत सारे ‘हां, लेकिन…’ हैं. नीतिगत मामले हमेशा ऐसे ही होते हैं लेकिन सिद्धांत रूप से उन्हें सुलझाने का केवल एक ही तरीका है- संविधान का रास्ता. लेकिन कोई भी पक्ष संविधान का अक्षरश: पालन नहीं कर रहा है और भारत तेज़ी के साथ एक ऐसे नियम विहीन ज़ोन में दाख़िल हो रहा है जहां कानून का नियम किसी भी चीज़ का मापदंड नहीं रह गया है. इस त्रिशंकु की ओर जाती ये धीमी प्रवृत्ति अगर 1950 में भारत के संविधान अपनाने के फौरन बाद शुरू हुई थी तो इसने रफ्तार हाल के दशकों में पकड़ी है और अब तो ये एक भूस्खलन बन चुकी है. हमें चिंता होनी चाहिए जब वॉल्डेमॉर्ट ऐसा कहते हुए उचित लगने लगता है कि ‘…सिर्फ ताकत है और वो इतने कमज़ोर हैं कि इसे चाह नहीं सकते’. चूंकि जब हम संवैधानिक जवाब नहीं ढूंढ पाते तो फिर अंत में ताकत ही किसी मसले को तय करती है.

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विवश करने की ताकत

अगर मोदी सरकार के मंत्री किसानों के आंदोलन को सुन रहे हैं तो वो इसलिए कि हज़ारों की संख्या में किसान राजधानी की नाकाबंदी करने की स्थिति में हैं. ये उनकी सड़क की शक्ति और बयान की ताकत है- बीजेपी के लिए भी बहुत मुश्किल है कि वो सार्वजनिक रूप से किसानों को बदनाम करे- कि सरकार ने उनके साथ समझौता वार्ता शुरू की है. इससे भी सहायता मिलती है कि किसानों की एक विशेष आर्थिक मांग है जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के इर्द गिर्द घूमती है, जिसकी वजह से राजनीतिक ताकत के संतुलन से इस संकीर्ण मुद्दे पर निर्णय लिया जा सकता है.

भारत में 1962 में बलपूर्वक किए गए सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों की सियासत का विश्लेषण करते हुए राजनैतिक वैज्ञानिक डेविड बेले ने चेतावनी दी थी कि ‘कानून के शासन के विनाश और बहुमत के शासन की वजह से राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की प्रकृति एक तरह के ग्रेशम के नियम से प्रभावित होने लगती है. सीधी कार्रवाई और सामाजिक हिंसा का सहारा- चाहे धमकी हो या वास्तविक- व्यवस्थित और संवैधानिक प्रतिक्रियाओं के विकल्प को खत्म कर देता है जिनकी किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में ज़रूरत होती है. बलपूर्वक सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन अगर बेरोकटोक चलने दिए गए तो उनका अधिक व्यापक अनुकरण होगा और वो लोकतांत्रिक सरकार के ज़रिए शांतिपूर्वक बदलाव की प्रक्रियाओं के और बड़े प्रतिद्वंदी बन जाएंगे’.

मौजूदा प्रदर्शनों की हाल ही के तमिलनाडु किसानों के प्रदर्शन से तुलना कीजिए, जिनके पास इतना ताकत नहीं थी कि वो नई दिल्ली को बाधित करने की धमकी दे सकें या शाहीन बाग के सीएए/एनआरसी-विरोधी प्रदर्शनकारियों से कीजिए जो किसी आर्थिक हक की नहीं बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखने की मांग कर रहे थे. संदेश स्पष्ट है: सरकार वही करती है जो वो चाहती है और बातचीत तभी करती है जब सामने की कोई विरोधी ताकत उसे इसके लिए मजबूर करती है. एक ऐसे देश में जहां हज़ारों हित समूह हैं और लाखों शिकायतें हैं वहां संवैधानिक अड़चनों को खत्म करने से उथल-पुथल तो मचेगी ही.

हम जिस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं उसे हमारे पूर्वजों ने एक नाम दिया था: मत्स्य न्याय, जहां बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है. ऐसी दुनिया में आर्थिक तंगी, सामाजिक अशांति, राजनीतिक हिंसा और उससे भी खराब, सब कुछ होता है. इस नियति से बचने के लिए पहले हमें ये समझना होगा कि हमारी राजनीतिक संस्कृति लोकप्रियता की ओर कुछ ज़्यादा ही झुक गई है और संवैधानिक तरीके तथा इंसाफ का वादा न सिर्फ अच्छे सिद्धांत हैं बल्कि इस देश को एक बनाए रखने के लिए ज़रूरी भी हैं. समाजशास्त्री आंद्रे बेतैल ने एक बार कहा था कि ‘भारत के लोगों की नियति है कि वो निरंतर संवैधानिकता और लोकलुभावनवाद के बीच डोलते रहेंगे और कभी भी इनमें से किसी एक को त्याग नहीं पाएंगे’. हमें पीछे आ जाना चाहिए इससे पहले कि ज़्यादा देर हो जाए.

(लेखक तक्षशिला संस्थान के निदेशक हैं जो सार्वजनिक नीति में शोध और शिक्षा का एक स्वायत्त केंद्र है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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