मोदी सरकार किसान आंदोलन से निबटने के लिए जो कुछ कर रही है उससे उदार लोकतांत्रिक देश वाली हमारी छवि धूमिल हो रही है, सरकार को भूलना नहीं चाहिए कि हर नागरिक को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार है.
जबकि एक साल बाद ही यूपी विधानसभा का चुनाव होने वाला है, सभी विपक्षी दल—सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद भी— जहां के तहां खड़े नज़र आ रहे हैं. वे एक कदम भी आगे बढ़े हों ऐसा नहीं दिखता.
प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय राजधानी में उन्हीं पैंतरों को आजमाया है जो उन्हें भली भांति समझ आते हैं—'सीएम मॉडल ऑफ गवर्नेंस’ की जांची-परखी कार्यशैली.
बहरहाल चमोली के इस आमंत्रित हादसे में सौ से ज्यादा लोगों की बलि दी गई है. चूंकि बलि मजदूरों की दी गई है इसलिए मामला जल्दी ही शांत हो जाएगा. विकास की गति तेज है उसे रोका नहीं जा सकता.
प्रधानमंत्री मोदी के कागजी शेर टीवी और ट्विटर पर विपक्ष के खिलाफ खूब दहाड़ते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी लुटियंस की दिल्ली से निकलकर सिंघू, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर तक नहीं जाता.
जब हमारे सत्ताधीश हमारे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का आधा हिस्सा हजम कर गये हैं, हम क्या कर रहे हैं? उसे दुनिया का सबसे बढ़िया लोकतंत्र बनाने का कोई सपना हमारे पास बचा है या नहीं?
किसान ही नहीं, दूसरे तबकों को भी यकीन होने लगा है कि दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार अब उसका प्रतिनिधित्व नहीं करती. इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार चाहे बड़ी आसानी से कानून बना ले, उसे देखना होगा कि उन्हें व्यापक स्वीकृति कैसे हासिल होगी.
रणनीतिक तौर पर, बिना शर्ट वाला यह प्रदर्शन आत्मघाती गोल से भी बुरा था. अचानक, AI समिट की सारी गड़बड़ियां भूला दी गईं और यूथ कांग्रेस का विरोध ही मुद्दा बन गया.