उत्तराखंड के चंपावत जिले के गांव सुखीढांग के स्कूल में अगले दिन जब नई भोजन माता मिड-डे मील बनाती हैं तो स्कूल के अनुसूचित जाति के बच्चे खाने से मना कर देते हैं. सुनीता देवी कहती हैं कि 'जब उनके हाथ से सवर्णों ने नहीं खाया तो उनके बच्चे क्यों सवर्णों के हाथ का खाएं?'
देखा गया है कि नौकरियों के इच्छुक वो उम्मीदवार, जो किन्हीं विषयों या पेशों में माहिर होते हैं, परीक्षाओं का ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ सामना करते हैं, अपेक्षाकृत उनके जो केवल प्रतियोगी परीक्षा पास करने के सहारे रहते हैं.
2021 भारत में जाति-विरोधी सिनेमा के लिए एक जबरदस्त साल साबित रहा. तमिल फिल्मों ने दिखा दिया कि जाति-विरोधी फिल्में ‘बॉक्स-ऑफिस-विरोधी’ हो ये जरूरी नहीं है.
नव-उदारवाद का जमाना गया, अब हस्तक्षेपवादी सरकार का वक़्त आ गया है, प्रवास का दौर गया, अब आक्रोश को भड़काने का समय आ गया है, लोकतंत्र के प्रतिष्ठित गढ़ों में भी लोकलुभावनवादियों ने क्लब बना लिया है.
नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी दोनों नए प्रस्तावों का विरोध कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए स्थिति थोड़ी अजीब है. पार्टी के लिए परिसीमन का समर्थन करने से उसे जम्मू में भी फायदा नहीं होगा.
जो बात मुझे परेशान करती है, वह यह है कि हर चीज़ को बहुत जल्दी वफादारी की कसौटी पर कसा जाने लगता है. जैसे भारतीय मुसलमानों को एक तरह से सोचना चाहिए और भारतीय हिंदुओं को दूसरी तरह से. इसका अंत कहां है?