Tuesday, 25 January, 2022
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जय भीम से लेकर कर्णन तक- जाति विरोधी सिनेमा का साल रहा है 2021

2021 भारत में जाति-विरोधी सिनेमा के लिए एक जबरदस्त साल साबित रहा. तमिल फिल्मों ने दिखा दिया कि जाति-विरोधी फिल्में ‘बॉक्स-ऑफिस-विरोधी’ हो ये जरूरी नहीं है.

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मारी सेल्वाराज की 2021 की फिल्म कर्णन में एक यादगार सीन है. जमाने से चले आ रहे ‘सामाजिक बहिष्कार’ के चलते दलित बस्ती में कभी न रुकने वाली बस को एक दलित लड़का गुस्से में पत्थर फेंककर रोकता है. उसी घटना के बाद अन्याय के खिलाफ लड़ाई का आगाज़ होता है.

कर्णन फिल्म का ये लड़का नागराज मंजुले की क्लासिक फैंडरी (2013) के दलित जाबया की याद दिलाता है. वो भी फिल्म के अंत में अन्यायकारी ‘ऊंची जाति’ की भीड़ पर संघर्ष रूपी पत्थर फेंकता है. कर्णन का ड्रामा ठीक वहीं पर शुरू होता है, जहां फैंडरी का खत्म होता है.

2021 भारत में जाति-विरोधी सिनेमा के लिए एक जबरदस्त साल साबित रहा. तमिल फिल्मों ने दिखा दिया कि जाति-विरोधी फिल्में ‘बॉक्स-ऑफिस-विरोधी’ हो ये जरूरी नहीं है.


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भारतीय सिनेमा की दुखती रग

जाति और जातिवाद लंबे समय से भारत की दुखती रग रहे हैं लेकिन भारतीय सिनेमा इस समस्या की अनदेखी करता रहा और भीषण जातिगत वास्तविकताओं को अमीर बनाम गरीब की जोड़ी या दया के चश्मे से देखता रहा. जिसमें अक्सर कोई सवर्ण ‘रक्षक’ होता था. जरूर कुछ दलित अग्रणी भूमिका वाली अच्छी फिल्में भी आईं लेकिन उन्हें जल्द ही भुला दिया गया और वो कोई गहरा असर छोड़ने में नाकाम रहीं.

उस मायने में 2021 की फिल्मों ने वो कर दिखाया है, जो किसी और साल ने नहीं दिखाया. इस साल न सिर्फ एक के बाद एक बहुत सारी आलोचनात्मक जाति-विरोधी फिल्में रिलीज़ हुईं बल्कि उन फिल्मों के अभिनेताओं और निर्देशकों को राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिला. ज्यादा अहम ये कि तमिल, मराठी, तेलुगू और कुछ हद तक हिंदी फिल्मों को बॉक्स-ऑफिस सफलता भी मिली.

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चलिए एक नज़र डालते हैं इस साल जाति-विरोधी/सामाजिक न्याय वाली फिल्मों को मिले विशेष सम्मान की सूची पर.


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2021 में दलित फिल्मों की विशेष सराहना

एक दलित बॉक्सर के गौरव और आत्मबोध की लड़ाई दिखाने वाले पा. रंजीत की सरपट्टा परंबराई को न्यूयॉर्क टाइम्स की ओटीटी पर ‘जरूर देखने वाली अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों’ की सूची में विशेष उल्लेख किया गया. भेदभाव से निपटने के लिए आंबेडकर की न्यायपालिका में आस्था से प्रेरित सूर्या अभिनीत जय भीम, आईएमडीबी पर शॉशेंक रिडेम्पशन (1994) और दि गॉडफादर (1972) को पीछे छोड़ते हुए अभी तक की सबसे ऊंची रैंक की फिल्म बन गई.

धनुष द्वारा अभिनीत, संघर्षमय ग्रामीण दलित की कहानी दिखाने वाले मारी सेल्वाराज की कर्णन ने बेंगलुरू के इनोवेटिव इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म का पुरस्कार जीता. ‘टॉलीवुड’ (तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री) ने 2021 में जाति-विरोधी विषयों पर अब तक की सबसे अधिक फिल्में बनाईं. लव स्टोरी, उप्पेन्ना और श्रीदेवी सोडा सेंटर जैसी सभी फिल्मों में दलित किरदार प्रमुख भूमिका में दिखाई दिए.

एक दलित मैला उठाने वाले की अपनी दुर्गंध से छुटकारा पाने की चाह पर बनी विनोद कांबले की कस्तूरी (2019)- मराठी मूवी को सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इस बीच, नीरज घेवान की व्यापक रूप से प्रशंसित अजीब दास्तान्स: गीली पुच्ची में एक दलित महिला किरदार (भारती मंडल) परदे पर बखूबी रंग से दिखने के लिए कोंकणा सेन शर्मा को अग्रणी भूमिका में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए एशियन एकेडमी क्रिएटिव अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.

नेटफ्लिक्स के सीरियस मेन में एक तमिल दलित- अय्यन मणि का किरदार अदा करने के लिए नवाजुद्दीन सिद्दीकी को विश्व प्रतिष्ठित एमी अवॉर्ड के लिए नामांकित किया गया. अभिनेता धनुष को वेत्रीमारन-निर्देशित असुरन में दलित किरदार सिवासामी को प्रस्तुत करने पर शानदार अभिनय के लिए राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसी रोल के लिए उन्हें ब्रिक्स फिल्म समारोह में भी सर्वश्रेष्ठ एक्टर का अवॉर्ड मिला.


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क्षेत्रीय सिनेमा में बदलाव

ये देखना दिलचस्प है कि ये बदलाव दरअसल कैसे आया. अच्छे से लिखी गईं दलितों की कहानियों को मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा में एक तरह से अछूत सा माना गया. लेकिन तमिल फिल्म उद्योग में बनी निरंतर अग्रणी फिल्मों ने खासकर पा. रंजीत की कबाली (2016), काला (2018) और पेरियेरम पेरुमल (2018)- जिसका उन्होंने निर्माण भी किया, उन सब पर बहुत जरूरी गहरा असर डाला, जो इस बदलाव को घटते देख रहे थे और वो भी, जिनमें सवर्ण फिल्म निर्माता भी शामिल थे, आहिस्ता-आहिस्ता बहती गंगा में हाथ धोने लगे.

अगर मलयालम, कन्नड़ और हिंदी फिल्म उद्योग बदलाव के अनिच्छुक रहे हैं, तो 2021 निश्चित ही उन्हें फिर से सोचने को मजबूर कर देगा. इस साल ने यकीनन इस तथ्य को मजबूत किया कि दबे कुचलों के सही चित्रण के न केवल दर्शक बढ़े हैं, बल्कि उनकी सराहना भी बढ़ी है.

लगता है कि तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री ने तमिल सिनेमा से एक छोटा सा संकेत लिया है. आंध्र और तेलंगाना में दलित-विरोधी अत्याचारों में उछाल देखा गया है, जिनमें अंतर्जातीय विवाह के लिए दलितों पेरुमला प्रणय कुमार और शंकर की नृशंस हत्या भी शामिल है. लेकिन फिर भी, टॉलीवुड प्रमुख दलित किरदारों वाले जाति-विरोधी सिनेमा के निर्माण से झिझकता रहा था, जिस तरह कॉलीवुड था. लेकिन 2021 ने उसे बदल दिया.

इस साल, जाति-विरोधी विषयों पर तीन बड़े बजट की तेलुगू फिल्में बनाई गईं. बुची बाबू सना की उप्पेना में एक अंतर्जातीय प्रेम कहानी दिखाई गई, जिसमें एक दलित ईसाई मछुआरा था और एक ‘ऊंची जाति’ की हिंदू लड़की थी. इस फिल्म की 2021 में सबसे बड़ी ओपनिंग हुई, हालांकि लीड के रूप में वैष्णव तेज की ये पहली फिल्म थी. उप्पेना के अलावा शेखर कम्मुला की लव स्टोरी और करुणा कुमार की श्रीदेवी सोडा सेंटर थी, जो भारत में जाति की वास्तविकताओं का प्रतिबिंब थीं.

इस बीच, कॉलीवुड सिर्फ जाति भेदभाव दिखाने से आगे बढ़कर, मुखर दलित किरदार दिखाने लगा. निर्देशक मारी सेल्वाराज ने एक जबर्दस्त फिल्म कर्णन बनाई. इसमें, कर्णन (धनुष) ‘पिछड़ी जाति’ के एक छोटे से गांव में एक मुखर किरदार है, जो व्यवस्था के खिलाफ लड़ता है और गुलामी में संतुष्ट पड़े गांव वालों को जगाता है.

तीन साल बाद निर्देशन में लौट रहे पा. रंजीत ने, एक क्लासिक फिल्म सरपट्टा परंबराई पेश की. ये सिर्फ कोई पीरियड फिल्म नहीं थी, इसमें न सिर्फ बॉक्सर कबीलन (आर्य) की सामाजिक मुखरता को मजबूती से पेश किया, बल्कि बुद्ध की शिक्षा ‘अत्त दीप भव:’- को खुद अपने साथ उसकी लड़ाई को फिल्म के एक गाने नीये ओली के जरिए रेखांकित किया . फिल्म की देर तक याद रह जाने वह दृश्य है जब पृष्ठभूमि में दीवार पर लगे आंबेडकर के चित्र के सामने कबीलन का एक दोस्त उसे सलाह देता है- ‘ये हमारा मौका है, कुछ ऐसा करो कि तुम्हारा दुश्मन डर से कांपने लगे.’

उसके बाद जय भीम आई जिसने नेटफ्लिक्स पर सारे रिकॉर्ड्स तोड़ दिए और आईएमडीबी पर सबसे ऊंची रैंक वाली फिल्म बन गई. बीबीसी, द इंडिपेंडेंट और खलीज टाइम्स– सबने इस फिल्म और इसके असर को कवर किया.

आंबेडकरवादी (चंद्रू) का किरदार निभाने वाला सूर्या, पुलिस द्वारा गलत ढंग से प्रताड़ित गरीब आदिवासियों को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी पूरी कोशिश करता है. अभी तक ‘जय भीम’ इस शब्द का ताल्लुक, दलितों और उनके अभिवादन से होता था लेकिन मूवी ने इसमें शानदार बदलाव लाकर इसे हर उस व्यक्ति से जोड़ दिया, जो मानवाधिकारों के लिए लड़ता है. बुद्ध, पेरियार की तस्वीरें, आंबेडकर की आवाज और जस्टिस चंद्रू का आंबेडकर के लेखन और भाषणों को श्रेय देना अपनी तरह से पहली बार था, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों को आंबेडकर के लेखन और भाषणों की ओर आकर्षित करेगा.

साल के अंत में जयंती रिलीज की गई, जो कोविड से उत्पन्न लॉकडाउन के बाद थिएटर्स के फिर से खुलने पर रिलीज होने वाली पहली मराठी फिल्म थी. इस मूवी में, संतया (रुतुराज वानखेड़े) जब आंबेडकर, फुले, और शिवाजी महाराज के जीवन और उनके कार्यों को पढ़ता है, तब वो पूरी तरह बदल जाता है. फिल्म में आंबेडकर की प्रमुख किताब हू वर द शूद्राज़ ? और गोविंद पनसारे के हू वॉज़ शिवाजी? का भी मुख्य तौर से उल्लेख किया गया है.


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बॉक्स ऑफिस सफलता

दलित लीड किरदार वाले लगभग सभी जाति-विरोधी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की है. 50 प्रतिशत थिएटर ऑक्युपेंसी के बावजूद तमिल मूवी कर्णन ने, धनुष को उनकी सर्वश्रेष्ठ बॉक्स ऑफिस ओपनिंग दी. फिल्म ने पहले ही दिन 10 करोड़ रुपए की कमाई की- जो एक्टर के शानदार करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था.

एक रिपोर्ट के अनुसार, व्यापक रूप से सराही गई सरपट्टा परंबराई को, अमेज़ॉन प्राइम पर 150 देशों में देखा गया. जय भीम को भी इसी तरह की सफलता मिली. महाराष्ट्र में 50 प्रतिशत थिएटर ऑक्युपेंसी होते हुए भी जयंती कामयाबी के साथ अपने चौथे सप्ताह में चल रही थी.

2021 में देखा गया कि पा. रंजीत तमिल सिनेमा में इस बदलाव के केंद्र में रहे हैं. सबसे हाल में एक्टर विक्रम ने ऐलान किया कि अपनी अगली फिल्म चियान 61 के लिए वो निर्देशक पा. रंजीत के साथ मिलकर काम करेंगे. निर्देशक ने भी अपनी अगली फिल्म राइटर की घोषणा की.

तमिल, मराठी और अब कुछ हद तक तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री, अपने सांचे से बाहर आकर सामाजिक वास्तविकताएं और दलित मुखरता को दिखा रहे हैं लेकिन मलयालम, हिंदी और कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री बहुत पीछे हैं.

जय भीम, जयंती, उप्पेना, कर्णन, सरपट्टा परंबराई– जो सब 2021 में रिलीज हुईं, उनकी कामयाबी ने निश्चित रूप से नैरेटिव को बदल दिया है. बॉलीवुड अब इस बड़े बदलाव की अनदेखी नहीं कर सकता और उसे अब सवर्ण कहानियों की कल्पित परी-कथाओं से दूरी बनाने पर विचार करना होगा. वंचित बच्चों पर बनने वाली नागराज मंजुले की पहली हिंदी फिल्म झुंड, जिसमें अमिताभ बच्चन नजर आएंगे और जो 2022 में रिलीज होगी, इस दिशा में एक शुरुआत हो सकती है.

जय भीम के साउंड ट्रैक ‘पावर ’ में हम आंबेडकर की असली आवाज सुन सकते हैं, जिसके लिए रैपर अरिवू ने फिल्म का सबसे असरदार गीत लिखा है. ये आवाज उनके बीबीसी रेडियो इंटरव्यू से है जिसमें वो कहते हैं: ‘हम चाहते हैं कि अस्पृश्यता समाप्त हो जाए. हम 2,000 साल से छुआछूत करते आ रहे हैं, किसी ने इसके बारे में परवाह नहीं की है’.

निर्देशक पा. रंजीत ने ट्वीट किया: ‘ये समुदाय है जिसने जाति-विरोधी और जाति-समर्थक संतुलन देखा है. यहां ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं, जैसे छिपे हुए और अस्वीकृत रासा कन्नू की कहानी. ये हमारी पीढ़ियों को बदल देंगी’.

वास्तव में, अगर ऐसे वंचित लोगों की कहानियां जारी रहीं, तो ये निश्चित रूप से भावी पीढ़ियों के नज़रिए को बदल देगा. वास्तविक दुनिया में, कोविड-19 महामारी की वजह से 2021 एक त्रासदी पूर्ण साल रहा है लेकिन ‘परदे की दुनिया’ ने यकीनन हमें कुछ अच्छा दिया है. 2021 वास्तविक बदलाव का एक उत्प्रेरक साबित हुआ है- ऐसा बदलाव जो बहुत लंबे समय तक समाज पर असर करेगा.

(रवि शिंदे एक स्वतंत्र लेखक और स्तंभकार हैं. वो सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर लिखते हैं और विविधता के समर्थक हैं. वो @scribe_it पर ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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