Wednesday, 25 May, 2022
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नेहरू अच्छे राष्ट्र निर्माता थे या मोदी हैं?, दोनों में खास फर्क नहीं

मोदी के आलोचक कहेंगे कि वे बस सीमेंट-इस्पात के ढांचे खड़े करते रहे, शासन की संस्थाओं को उन्होंने कमजोर कर दिया जबकि नेहरू ने उन्हें मजबूत किया, लेकिन नेहरू के कुछ विचार समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरे.

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नरेंद्र मोदी एक ऐसे बिल्डर के रूप में उभरे हैं जिनकी विविध परियोजनाओं ने देश के भौतिक नक्शे और मानसिक आकाश पर उस तरह अपनी छाप छोड़ी है जिस तरह जवाहरलाल नेहरू के बाद से शायद किसी ने नहीं छोड़ी थी. नई दिल्ली में सत्ता प्रतिष्ठानों के ढांचों में परिवर्तन की बात हो या नया संसद भवन बनाने की, या दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाने की, मोदी प्रतीकात्मक तथा प्रदर्शनात्मक महत्व की परियोजनाओं को हाथ में लिया. अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास करके, वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करके और हिमालय में स्थित प्राचीन तीर्थों तक बेहतर पहुंच बनाने के लिए चार धाम सड़क परियोजना पर ज़ोर देकर हिंदू जनमानस में अपना स्थान पका कर लिया है.

उनकी सरकार ने देश के भौतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए संसाधन के तौर पर मोटी रकम देने का वादा किया है जिनमें केन-बेतवा नदियों को जोड़ने (वास्तविकता से दूर ऐसी 30 योजनाओं में एक), नये हाईवे और एक्सप्रेस-वे बनाने, बुलेट ट्रेन चलाने, तेज गति वाले माल ढुलाई रेल कॉरिडोर बनाने, नये हवाई आदेड़े बनाने, उत्तर-पूर्व को जोड़ने के लिए बड़े पुल व सड़क बनाने (देश का सबसे लंबा 4.9 किलोमीटर का रेल-सड़क पुल और सबसे लंबा 19 किमी का पुल) बनाने की परियोजनाएं शामिल हैं.

ये विविध परियोजनाएं देश के प्रथम प्रधानमंत्री के कार्यों से तुलना आमंत्रित करती हैं. मोदी ने भौतिक और सांस्कृतिक-धार्मिक दायरों में कदम रखा है. सांस्कृतिक-धार्मिक दायरों में इसलिए ताकि अपनी पार्टी के ठोस जनाधार को मजबूती देते हुए अपनी असाधारण छवि स्थापित कर सकें. उनकी तुलना में नेहरू ने उन सब पर ज़ोर दिया जिन्हें वे ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा करते थे. इसके फलस्वरूप बड़ी जल-विद्युत परियोजनाएं आईं (भाखड़ा-नांगल, हीराकुड, रिहंद, और दामोदर घाटी परियोजना); भारी उद्योग के उल्लेखनीय उपक्रमों का आधार तैयार किया गया ताकि इस्पात, ताप बिजली, स्टीम और डीजल रेलवे इंजन, रेलवे कोच, युद्धक टैंक, आदि का उत्पादन हो; और चंडीगढ़ शहर का निर्माण हुआ.

नेहरू ने भौतिक ढांचों के अलावा भी बहुत कुछ बनाया. उन्होंने अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के कार्यक्रम बनाए, आईआईटी संस्थानों की स्थापना की, नये कृषि विश्वविद्यालयों और कई अनुसंधान संस्थानों की स्थापना की. इनके अलावा राष्ट्रीयकरण और एकीकरण करके स्टेट बैंक, जीवन बीमा निगम, इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन, तेल व प्राकृतिक गैस आयोग, एअर इंडिया (जिसे नेहरू के जमाने में काफी प्रतिष्ठा हासिल थी और जिसने सिंगापुर को अपना अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन स्थापित करने में मादा दी थी) जैसे मजबूत कॉर्पोरेट संस्थान स्थापित किए.


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समानताएं और अंतर

तुलना शायद मोदी के लिए न्यायपूर्ण नहीं होगी क्योंकि वे अभी नेहरू के 17 वर्षों के कार्यकाल का आधा भी नहीं पूरा कर पाए हैं. इसका जवाब यह हो सकता है कि नेहरू ने जो भी पहल की या उनकी जो परियोजनाएं थीं वे उनके कार्यकाल के पहले दशक की ही थीं, जब देश में संसाधनों की भारी कमी थी, 80 फीसदी से ज्यादा आबादी अनपढ़ थी, और लोगों की अधिकतम औसत उम्र 30-40 साल के बीच की ही थी. लेकिन नेहरू ने बचत और निवेश के स्तर में 50 फीसदी की (जीडीपी की तुलना में) वृद्धि की, जबकि आर्थिक वृद्धि की दर में चौगुना इजाफा किया.

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संस्थात्मक क्षमता निर्माण के मामले में मोदी इस तरह से बराबरी कर सकते हैं कि उन्होंने डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया जिसकी वजह से वित्त सेक्टर का डिजिटाइजेशन हुआ, स्टार्ट-अप उपक्रमों की बाढ़ आई, सरकार के लाभकारी कार्यक्रमों का लाभ लोगों तक बेहतर ढंग से पहुंचाया जा सका है. उन्होंने अर्थव्यवस्था को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढालने की पहल भी की और औद्योगिक विकास के लिए बड़े बजट का वादा भी किया है.

दोनों के रिकॉर्ड में समानताएं भी हैं और विरोधाभास भी हैं. दोनों आधुनिकता के पक्षधर रहे हैं लेकिन मोदी पुनरुत्थानवादी भी हैं. दोनों ने ज्यादा सफल पूर्वी एशियाई देशों द्वारा डाली गई नींव पर कम ज़ोर दिया—स्तरीय सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा, और स्वस्थ्य तथा पोषण के बुनियादी स्तरों पर. मोदी के आलोचक कहेंगे कि उन्होंने सीमेंट और इस्पात के ढांचे तो खड़े किए मगर शासन के संस्थानों को कमजोर किया जबकि नेहरू ने उन्हें मजबूती दी थी. यह भी कि, मोदी जो इन्फ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं वे देश को करीबी से जोड़ेंगे, लेकिन उन्होंने लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांट दिया. इसके बरअक्स बड़े बांधों को अब बहुत बड़े विचार के रूप में नहीं देखा जाता, लेकिन नदियों को जोड़ने के बारे में भी ऐसा ही सोचा जाता है. नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र पर ज़ोर दिया था, इसकी वजह भी थी क्योंकि निजी क्षेत्र उस समय छोटा था. लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र पर ज़ोर देना अंततः कारगर नहीं साबित हुआ.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(बिजनेस स्टैंडर्ड से विशेष प्रबंध द्वारा)


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