Tuesday, 24 May, 2022
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स्मृति ईरानी का ‘लाल सलाम’ : ये मोदी सरकार पर कैसे टिप्पणी करता है

ईरानी नरेंद्र मोदी के कैबिनेट की पहली मंत्री हैं जिन्होंने उपन्यास लिखा है. वैसे, पद पर रहते हुए पुस्तक लिखने वाली वे चौथी मंत्री हैं.

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भारत में मंत्रियों को कथा-कहानी लिखने का समय शायद ही मिल पाता है. अपने पद की जिम्मेदारियों के कारण उन्हें अपनी रचनाशीलता को दबाए रखना पड़ता है या मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे कपिल सिब्बल की तरह यदा-कदा फूट कर बाहर आने की छूट देनी पड़ती है. दरअसल, उन्हें भारत का पहला ‘मोबाइल कवि’ माना जा सकता है क्योंकि कार में या विमान में सफर करते हुए मोबाइल फोन पर लिखी उनकी कविताओं का संकलन ‘विटनेस : पार्शियल ऑब्जर्वेशन्स’ 2008 में ही प्रकाशित हुआ था.

इसलिए, महिला एवं बाल विकास विभाग की केंद्रीय मंत्री स्मृति ज़ुबिन ईरानी के पहले उपन्यास ‘लाल सलाम’ का नई दिल्ली में शनिवार को जब विमोचन हुआ तो जाहिर है कि वह अवश्य पठनीय पुस्तकों की मेरी सूची में सबसे ऊपर दर्ज हो गई. इसकी यह वजह नहीं है कि मैं कथा-कहानी पढ़ने का बहुत शौकीन हूं, बल्कि यह है कि मंत्री महोदया का पहला उपन्यास सत्ता के गलियारे से दुनिया की झलकियां दिखाने का वादा करता है. सिब्बल की तरह, ईरानी का मोबाइल ही उनका कागज-कलम था. उन्होंने यात्राएं करते हुए आठ महीने में मोबाइल पर यह उपन्यास लिख डाला.

मैंने वीकेंड में पढ़ने के लिए ‘लाल सलाम’ उठा लिया. पढ़कर मजा या, खासकर तब से जब मैंने इसके साथ एलेक्सा पर ‘जग्गा जासूस’ के ‘उल्लू का पट्ठा…’ जैसे गाने लगा दिए. अगाथा क्रिस्टी या सुजाता मैस्सी जैसों के प्लॉटों ने मुझे उतना नहीं आकर्षित किया जितना ईरानी के प्लॉट ने किया और मैं माओवादियों और ‘अर्बन नक्सलों’ के बारे में भाजपा तथ्य के रूप में जो पेश करती रही है उसमें से गल्प को अलग करने की कोशिश करता रहा. उनके उपन्यास का प्लॉट 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरईपीएफ के 76 जवानों की बर्बर हत्या की वारदात पर आधारित है. यहां अंबुजा के एसपी विक्रम प्रताप सिंह अपने सबसे अच्छे दोस्त और सहकर्मी आइपीएस अधिकारी दर्शन तथा सीआरपी के अफसरों एवं जवानों की अंबुजा में माओवादियों द्वारा की गई हत्याओं को अंजाम देनी वालों की खोज में जी-जान लगा देते हैं.

ईरानी ने ठीक ही कहा है कि कथा-कहानी क्या संदेश दे रही है, यह कोई नहीं देखता. लेकिन तथ्य यह भी है कि कहानी कितनी भी काल्पनिक क्यों न हो, वह लेखक के जीवन, आंतरिक भावनाओं, और उसकी विश्वदृष्टि को दिशा देने वाले अनुभवों को जरूर प्रतिबिंबित करती है. इसलिए पहले हम कुछ तथ्यों का निबटारा कर लें.

मोदी सरकार में मंत्री-लेखक

ईरानी नरेंद्र मोदी के कैबिनेट की पहली मंत्री हैं जिन्होंने उपन्यास लिखा है. वैसे, पद पर रहते हुए पुस्तक लिखने वाली वे चौथी मंत्री हैं. सबसे पहले, पिछले वर्ष हिंदी उपन्यास ‘बलवा’ लिखा अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी ने. यह 1990 के दशक के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले दौर में दो धर्म के प्रेमियों की कहानी कहता है. जब पिछले साल एलएसी पर भारत और चीन के बीच तनाव चल रहा था, विदेश मंत्री एस. जयशंकर अपनी किताब ‘द इंडिया वे : स्ट्रेटेजी फॉर ऐन अनसर्टेन वर्ल्ड’ लिख रहे थे और उस पर व्याख्यान दे रहे थे. श्रम, रोजगार और पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव ने भी अर्थशास्त्री इला पटनायक के साथ मिलकर ‘द राइज़ ऑफ बीजेपी : द मेकिंग ऑफ द वर्ल्ड्स लारजेस्ट पॉलिटिकल पार्टी’ किताब लिख डाली है.

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इस पूरी कहानी का सबक यह है कि मंत्रालयों को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) भले चला रहा हो और मंत्री लोग लगभग अप्रासंगिक नज़र आते हों, लेकिन मोदी पर कोई यह आरोप नहीं लगा सकता कि वे उनकी रचनाशीलता को कुंठित कर रहे हैं.

आज कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां इतनी संख्या में कार्यरत मंत्री किताब लिख रहे हों. इसका अर्थ यह नहीं है कि जो मंत्री किताब नहीं लिख रहे हैं वे मंत्रालय के काम के बोझ से दबे हुए हैं. प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने कई मंत्रियों को उन राज्यों का प्रभारी या सह-प्रभारी बना दिया है, जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. उनमें से कुछ नाम ये हैं- धर्मेंद्र प्रधान, अनुराग ठाकुर, गजेन्द्र सिंह शेखावत, प्रह्लाद जोशी, और भूपेन्द्र यादव.


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फुल टाइम मंत्रियों का हाल

यह वैसा है जैसे शासन को पूरी तरह सियासी जरूरतों का पिछलग्गू बना दिया जाता है. दूसरे कई मंत्री ऐसे हैं जिन्हें कोई राजनीतिक या चुनावी ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है लेकिन वे कामकाज के मामले में उतने ही अच्छे या बुरे हैं जितने अच्छे या बुरे लेखक-बने-मंत्री हैं. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अक्टूबर में खबर दी कि वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन उद्योग एवं आंतरिक व्यापार विकास विभाग (डीपीआइआइटी) ने उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा जारी ई-कॉमर्स के नियमों के मसौदे में ‘कई विसंगतियों की ओर उंगली उठाई और कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए.’ सरकारी विभागों में किसी मसले पर मतभेद सामान्य बात है मगर यहां तो दोनों विभाग एक ही मंत्री पीयूष गोयल के अधीन हैं.

कोविड की दूसरी लहर खत्म होने के बाद अर्थव्यवस्था अक्टूबर में जब सुधर रही थी तब सप्लाइ की अड़चनों के कारण भारत कोयले की कमी का सामना कर रहा था. केंद्रीय बिजली मंत्री आर.के. सिंह ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए इंटरव्यू में कहा कि वे मुश्किल भरे ‘अगले पांच-छह महीने’ की तैयारी कर रहे हैं क्योंकि ईंधन की कमी को दूर करना संदिग्ध मामला हो सकता है.

यह एक विडंबना ही थी, क्योंकि नीति-निर्माताओं से अपेक्षा की गई थी कि वे कोविड के बाद मांग में वृद्धि का पूर्वानुमान लगा चुके होंगे और ईंधन की कमी का रोना रोने की जगह सप्लाइ को दुरुस्त करने पर ज़ोर दे रहे होंगे. पूर्व कोयला सचिव अनिल स्वरूप सरीखे सेवानिवृत्त साहसी नौकरशाह ने ‘दिप्रिंट’ के लिए लिखे लेख में इस बात की ओर ध्यान खींचा कि इतने वर्षों में कोयले की कमी किन वजहों से पैदा हुई है, और हमारे नीति-निर्माता उनसे मुंह मोड़े रहे.

जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि मेडिकल के पीजी कोर्स में दाखिले के लिए ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों’ और ओबीसी के लिए आरक्षण का एक ही आर्थिक कसौटी-सालाना 8 लाख रुपये की आमदनी-किस आधार पर तय की गई है, तो सरकार के कानून अधिकारी कोई स्पष्ट जवाब न दे पाए. इसकी वजह यह थी कि न तो केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण मंत्रालय के पास और न ही कार्म्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के पास कोई जवाब था. जस्टिस डीवाइ चंद्रचूड़ हैरान थे कि क्या सरकार में बैठे किसी शख्स को 8 लाख रु. वाली कसौटी का सपना आया था? या यह किसी जादू से हासिल की गई?

कथा लेखिका ईरानी की विश्वदृष्टि

जो भी हो, जिन फैसलों में उनका कोई हाथ नहीं होता उनके बारे में उन मंत्रियों से कोई सवाल करनी अनुचित ही होगा. सेनापति द्वारा किए गए फैसले के लिए सैनिकों को क्यों दोष दिया जाए? वास्तव में, कई मंत्री अब इस बात की तारीफ करने लगे हैं कि सरकार में एक केंद्रीकृत कमान और नियंत्रण ढांचा हो तो यह कोई बुरी बात नहीं है. यह उन्हें अपनी पसंद के दूसरे काम करने का अवसर मुहैया कराता है.

एक लेखिका के रूप में ईरानी के नये अवतार की ही बात करें तो कहा जा सकता है कि उन्होंने एक कहानी के जरिए भी अपनी पार्टी के सार्वजनिक रुख को सामने रखा है, कि माओवादी क्रूर हत्यारे हैं जिन्हें किसी विचारधारा या व्यापक सामाजिक लक्ष्य से कोई वास्ता नहीं है. वे दूसरे बर्बर अपराधियों की तरह बस बलात्कार और हत्याएं करते हैं.

उनके उपन्यास के पात्रों और माओवादियों से संबंध रखने के लिए मुकदमा झेल रहे असली लोगों में काफी समानताएं हैं. उदाहरण के लिए, एक पात्र है दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रोफेसर प्रकाश पद्मनाभ, जो व्हीलचेयर पर आश्रित है. उसका जन्म 1967 में आंध्र प्रदेश के एक गरीब परिवार में हुआ था. संयोग से, डीयू के प्रोफेसर साईबाबा का, जिन्हें माओवादियों से जुड़े होने के कारण उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी, जन्म भी 1967 में हुआ था और वे बचपन से ही व्हीलचेयर पर आश्रित हैं. फर्क इतना है कि ईरानी के उपन्यास में प्रोफेसर पद्मनाभ एक खलनायक है, जो साथी माओवादियों के साथ मिलकर एक नाबालिग बच्ची का बलात्कार और हत्या कर देता है.

उसके अधीन एक पीएचडी स्कॉलर रुद्र है, जिसके ई-मेल में सीआरपी जवानों की हत्या के भयानक वीडियो मौजूद हैं. एसपी विक्रम सिंह, जो उपन्यास का नायक है, इस वीडियो में अपने दोस्त दर्शन की हत्या के दृश्य देखने के बाद पुलिस हिरासत में रुद्र की इतनी पिटाई कर्ता है कि वह लहूलुहान हो जाता है और उसकी पसलियां टूट जाती हैं. उसे अस्पताल में भर्ती किया जाता है. नायक कहता है, ‘किसी कैदी पर मैंने पहली बार हाथ उठाया, लेकिन मुझे कोई अफसोस नहीं है.’ उपन्यास में उन एनजीओ और डॉक्टरों का भी वर्णन है, जो गांवों नक्सलों का उपचार करते हैं.

लेखिका ईरानी ने माओवादियों, नेताओं, ठेकेदारों, और पुलिसवालों की मिलीभगत और साठगांठ को बेबाकी से उजागर किया है. याद रहे कि उनके उपन्यास का प्लॉट उस काल से जुड़ा है जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी और 2003 से 2018 तक रमन सिंह मुख्यमंत्री थे. ‘अर्बन नक्सलों’ का पर्दाफाश करते हुए ईरानी ने उपन्यास के नायक एसपी विक्रम सिंह के जरिए राज्य के सरकारी तंत्र और माओवादियों के बीच की साठगांठ को भी उजागर किया है.

यहां व्यक्त विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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