Thursday, 7 July, 2022
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मोदी और शाह को किन तीन वजहों से चुनाव में ‘गणित’ और ‘फिजिक्स’ से ज्यादा ‘केमेस्ट्री’ पर भरोसा है

मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर कांग्रेस के खिलाफ मोदी-शाह की पारी तो शानदार रही है. लेकिन विधानसभा चुनाव का रिकॉर्ड उनकी नाकामी को दर्शाता है.

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2019 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में एक समारोह में कहा था, ‘इस बार केमेस्ट्री ने अंकगणित को हरा दिया है.’ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को कहा, ‘राजनीति फिजिक्स नहीं, बल्कि केमेस्ट्री है.’ वह 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन और 2019 के लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी-सपा-राष्ट्रीय लोक दल गठबंधन की विफलता का जिक्र कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘लोग जागरूक हैं. वोट बैंक के आधार पर बने गठबंधन अब लोगों का लुभा नहीं कर सकते.

क्या कहते हैं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चुनावी आंकड़े

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुख्य रणनीतिकार के हवाले से ही आने के कारण उनके तर्कों को खारिज करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है. अब जबकि पार्टी अगले तीन महीनों के दौरान यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनावों के अगले दौर की तैयारी में जुटी है, यह कुछ डेटा बताता है कि पूर्व में उसका प्रदर्शन कैसा रहा है.

सितंबर 2013 से लेकर, जब मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था, अब तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा के लिए 50 बार चुनाव हो चुके हैं.*

इन 50 चुनावों में से भाजपा ने या तो अपने दम पर या चुनाव पूर्व गठबंधन सहयोगियों के साथ मिलकर 38 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट के साथ केवल 19 में जीत हासिल की है.**

भाजपा ने जिन 19 चुनावों में जीत हासिल की है, उनमें से 14 उन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में हुए थे, जहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस के साथ था—इसमें असम (दो चुनाव), अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली (2013 तक), हरियाणा (दो चुनाव), हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पुड्डुचेरी, राजस्थान और उत्तराखंड शामिल हैं. बाकी पांच राज्यों में बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, त्रिपुरा और नागालैंड शामिल हैं. मोदी को पीएम पद के लिए भाजपा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद बीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दो बार चुनाव हुए हैं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने उनमें से आठ (सितंबर 2013 और सितंबर 2021 के बीच हुए चुनावों में) में पहली बार अकेले सबसे बड़े दल के तौर पर जीत हासिल की—इनमें असम, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली शामिल हैं. लेकिन पांच साल बाद इन राज्यों में फिर चुनाव हुए तो पार्टी इनमें से केवल दो-असम और हरियाणा को ही बरकरार रख पाई. इसने 2018 में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ और 2019 में महाराष्ट्र और झारखंड जैसे कुछ प्रमुख राज्यों को भी गंवा दिया.***

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मोदी लहर ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जीत दिलाई

ऊपर उल्लिखित ये तथ्य आखिरकार क्या दर्शाते हैं? मोटे तौर पर इसे तीन प्वाइंट में समझा जा सकता है.

आइए सबसे पहले शुरू करें उस बात से जो सैकड़ों ही बार दोहराई जा चुकी है. यह एक तथ्य है कि मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में छाने के साथ शुरुआती कुछ सालों में विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन तेजी से सुधरा है. सितंबर 2008 और सितंबर 2013 के बीच 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव हुए; इनमें से सात में पार्टी ने जीत हासिल की. अगले पांच वर्षों में इसी अवधि के दौरान, जब मोदी प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आ चुके थे, 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव हुए; इनमें से 12 में भाजपा ने जीत हासिल की. और इसमें मणिपुर, गोवा, बिहार (2017 में नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने के बाद) और अरुणाचल प्रदेश (2016 में पेमा खांडू के भाजपा में शामिल होने के बाद) शामिल नहीं हैं. अगर इन चार राज्यों को भी शामिल कर लिया जाए तो इसका मतलब होगा कि मोदी के पीएम बनने से पहले पांच वर्षों में भाजपा ने 29 में से सात में जीत हासिल की और उनके आने के बाद 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 16 में उसे सफलता मिली.

मोदी-शाह के चुने मुख्यमंत्रियों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा

इस तथ्य से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि मोदी ने विधानसभा चुनावों में भाजपा के चुनावी प्रदर्शन के संदर्भ में एक बहुत ही बड़ा बदलाव किया है. एक तरफ जहां लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचाने के लिए वोट किया, वहीं विधानसभा चुनाव में भी वे उनके लिए ही वोट दे रहे थे.

और अब बात मेरे दूसरे प्वाइंट की. मोदी-शाह के चुने मुख्यमंत्री लोगों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे. या यूं भी कह सकते हैं कि मोदी-शाह ने जिन मुख्यमंत्रियों को चुना उनमें से अधिकांश अपेक्षित प्रदर्शन में नाकाम रहे. एक बार फिर नजर डालते हैं ऊपर दिए गए डेटा पर. एनडीए ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, जहां मोदी शासनकाल के दौरान दो बार चुनाव हुए, में 20 विधानसभा चुनावों में से आठ में जीत हासिल की. लेकिन असम और हरियाणा को छोड़कर इनमें से छह सरकारें पांच साल बाद सत्ता से बाहर हो गईं. अगर इस तथ्य पर गौर करें कि हरियाणा में बहुमत खोने के बाद भी भाजपा सरकार बनाने में सफल रही, तो इसे आठ में से सात माना जाना चाहिए. असम के चुनावी मोर्चे पर हेमंत बिस्वा सरमा एकमात्र सूरमा साबित हुए हैं. सर्बानंद सोनोवाल भले ही उत्तर-पूर्वी राज्य में लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे हों, लेकिन वह सरमा ही थे जिनके लिए 2021 के चुनाव में मतदाताओं ने वोट डाला.

दूसरों पर निर्भरता

तीसरी बात, विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन के लिहाज से बात की जाए तो भाजपा का रिकॉर्ड शानदार रहा है—19 जीत में से 14 में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से था, क्षेत्रीय स्तर पर गैर-कांग्रेस वाले मोर्चों पर पार्टी संघर्ष करती दिखी. बाकी पांच—बिहार, यूपी, झारखंड, त्रिपुरा और नागालैंड—में से भाजपा केवल यूपी और त्रिपुरा में अपने बलबूते पर सफलता का दावा कर सकती है. बिहार में सत्ता में बने रहने के लिए उसे अभी भी नीतीश कुमार की जरूरत है, जबकि 2014 में आदिवासी बहुल राज्य झारखंड में जीत हासिल करने वाली पार्टी दोबारा चुनाव में हेमंत सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेतृत्व वाले गठबंधन से हार चुकी है. नागालैंड में यह पूर्व कांग्रेसी नेफियू रियो पर निर्भर है.

त्रिपुरा में लगातार 25 वर्षों तक सरकार चलाने वाली वामपंथी सरकार को हटाना निश्चित तौर पर कोई आसान काम नहीं था. लेकिन भाजपा को इसके लिए कांग्रेस को धन्यवाद भी देना चाहिए.


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एक और सूरमा मैदान में है?

यही वजह है कि आगामी यूपी विधानसभा चुनाव इतना महत्वपूर्ण हो गया है. निश्चित तौर पर यही इकलौता राज्य है जहां भाजपा एक क्षेत्रीय दल, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को उखाड़ फेंकने में सफल रही है. क्या भाजपा यूपी की सत्ता बरकरार रख पाएगी? यह बात पार्टी नेतृत्व को उत्साहित करने के लिए काफी है कि मोदी-शाह के चुने अन्य मुख्यमंत्रियों की तुलना में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी हेमंत बिस्वा सरमा की तरह एक जननेता के तौर पर उभरने में कामयाब रहे हैं. और यही वजह है कि अगर योगी वापसी में सफल रहते हैं तो इसका क्रेडिट लेने को ध्यान में रखकर ही शायद भाजपा के शीर्ष नेता यूपी में पूरी शिद्दत के साथ प्रचार में उतर रहे हैं. लेकिन अखिलेश यादव की विजय यात्राओं में उमड़ती भीड़ को देखकर ऐसा लगता है कि भाजपा ने जितना सोचा था, वह उससे ज्यादा बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं.

गैर-कांग्रेसी-वामपंथी दलों के खिलाफ भाजपा के भारी पड़ने को लेकर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, झारखंड और यहां तक कि महाराष्ट्र में भी काफी हवा बनाई गई. लेकिन ये दल कोई गांधी नहीं हैं जो विदेश की सैर करते रहें और यह उम्मीद पाले रहें कि एक न एक दिन मतदाता कांग्रेस को सत्ता में पहुंचा देंगे. जरा गौर कीजिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने हुजूराबाद विधानसभा उपचुनाव में अपनी पार्टी की हार पर कैसी प्रतिक्रिया दी. 2009 से हुजूराबाद का प्रतिनिधित्व करते आ रहे उनके पूर्व सहयोगी एटाला राजेंद्र पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गए थे और उनकी वजह से भाजपा यह उपचुनाव जीतने में सफल भी रही. इसके बाद केसीआर ने राज्यसभा सदस्य बंदा प्रकाश को इस्तीफा दिलाया और उन्हें विधान परिषद के लिए नामित किया. राजेंद्र की तरह ही वह भी मुदिराज समुदाय से आते हैं और उन्हें केसीआर कैबिनेट में शामिल किए जाने की संभावना है.

कांग्रेस को मुख्य चुनौती के रूप में सामने रखें तो मोदी और शाह की पारी शानदार रही है, लेकिन विधानसभा चुनावों में उनका रिकॉर्ड, खासकर 2018 के बाद से, बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है. वे क्षेत्रीय क्षत्रपों के आगे हथियार डालने को लेकर गांधी परिवार से अपसेट हो सकते हैं लेकिन फिर सवाल उठता है कि आखिर ये क्षत्रप मोदी और शाह के सामने क्यों टिक पा रहे हैं.

*यदि इस अवधि के दौरान किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में दो या तीन बार चुनाव हुए तो इसे दो या तीन चुनावों के तौर पर गिना गया है.

**इसमें गोवा, मणिपुर और मेघालय शामिल नहीं हैं, जहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी लेकिन चुनाव के बाद भाजपा या एनडीए ने गठबंधन की सरकार बनाई; लेकिन दिल्ली चुनाव 2013 और हरियाणा चुनाव 2019 शामिल हैं जिसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. इसमें महाराष्ट्र 2019 के चुनाव भी शामिल नहीं हैं.

***इसके अलावा, 20 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में जहां दो बार चुनाव हुए, एनडीए ने कुछ नई सफलता हासिल की—जिसमें पुड्डुचेरी, अरुणाचल प्रदेश और बिहार शामिल हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

डी.के. सिंह दिप्रिंट के राजनीतिक संपादक हैं. उनका ट्विटर हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त विचार निजी हैं.


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