Saturday, 21 May, 2022
होममत-विमतरोजा पार्क्स की बगावत पर अमेरिकी अश्वेत उठ खड़े हुए थे और अब भारत में सुनीता देवी बोल पड़ीं

रोजा पार्क्स की बगावत पर अमेरिकी अश्वेत उठ खड़े हुए थे और अब भारत में सुनीता देवी बोल पड़ीं

उत्तराखंड के चंपावत जिले के गांव सुखीढांग के स्कूल में अगले दिन जब नई भोजन माता मिड-डे मील बनाती हैं तो स्कूल के अनुसूचित जाति के बच्चे खाने से मना कर देते हैं. सुनीता देवी कहती हैं कि 'जब उनके हाथ से सवर्णों ने नहीं खाया तो उनके बच्चे क्यों सवर्णों के हाथ का खाएं?'

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इतिहास हजारों छोटी-बड़ी घटनाओं और प्रक्रियाओं का सम्मिलित रूप होता है. इन हजारों घटनाओं और लाखों पात्रों में से कौन सी घटना या कौन सा पात्र इतिहास की धारा मोड़ देता है, उसका पता अक्सर उस समय नहीं चल पाता, जब ये घटना होती है. इतिहास हमेशा राजा, नवाब और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री नहीं लिखते. मामूली लोग भी कई बार बेहद गैर-मामूली काम कर देते हैं और इतिहास में उनका नाम स्थायी तौर पर दर्ज हो जाता है.

उत्तराखंड में चीन की सीमा के पास, चंपावत जिले के सूखीढांग स्कूल में मिड-डे मील बनाने के लिए नियुक्त की गई अनुसूचित जाति की महिला सुनीता देवी के साथ जो हुआ और अब वे जो कर रही हैं, उसकी युगांतकारी भूमिका हो सकती है. मेरा मानना है कि नस्लवाद के खिलाफ वैश्विक संघर्ष में अमेरिकी महिला रोजा पार्क्स का नाम जिस तरह अमिट हो गया है, उसी तरह जातिवाद विरोधी संघर्ष में सुनीता देवी को याद किया जाएगा. किया जाना चाहिए.

मैं ये बात किस आधार पर कह रहा हूं ये जानने के लिए सुनीता देवी और रोजा पार्क्स दोनों के संघर्ष को जान लेना जरूरी है. सबसे पहले बात सुनीता देवी की.

सुनीता देवी की कहानी पर्वतीय जिले चंपावत के गांव सुखीढांग के सरकारी इंटर कालेज यानी सेकेंडरी स्कूल की है. इस स्कूल में सरकारी योजना के तहत बच्चों को मिड-डे मील दिया जाता है. मिड-डे मील बनाने वाली दो महिलाओं में से एक की उम्र तय सीमा से अधिक हो जाने के बाद वहां सुनीता देवी को रसोईया यानी भोजन माता बनाया गया. सुनीता देवी को भोजन माता बनाए जाते समय ही वहां के अभिभावक संघ के लोगों ने इसका विरोध कर दिया. उनका तर्क था कि चूंकि स्कूल के ज्यादातर बच्चे सवर्ण यानी गैर-अनुसूचित जाति के हैं, इसलिए भोजन माता सवर्ण ही होनी चाहिए. यहां छुआछूत अब भी चलन में है. बहरहाल, सुनीता देवी भोजन माता बनी रहीं.

लेकिन गांव के सवर्णों ने इसे स्वीकार नहीं किया. स्कूल के सवर्ण बच्चों ने सुनीता देवी का बनाया हुआ मिड-डे मील खाने से इनकार कर दिया. वे अपने घर से लाया हुआ टिफिन खाने लगे. इस दौरान मिड-डे मील सिर्फ अनुसूचित जाति के बच्चे ही खा रहे थे. भोजन बहिष्कार की खबर लोकल मीडिया में छपने के बाद हंगामा मचा और फौरी जांच के बाद सरकारी अधिकारियों ने सुनीता देवी को काम से हटा दिया और उनकी जगह तात्कालिक तौर पर एक ब्राह्मण महिला को खाना बनाने का काम सौंप दिया. मीडिया ने लिखा कि मामले का पटाक्षेप हो गया है.

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उत्पीड़न से प्रतिरोध तक

यहां तक की कहानी जाति प्रभुत्व की है और ऐसा हजारों जगह होता है. लेकिन यहां से कहानी में एक नाटकीय मोड़ आता है और मामला उत्पीड़न की जगह प्रतिरोध का बन जाता है.

अगले दिन जब नई भोजन माता मिड-डे मील बनाती हैं तो स्कूल के अनुसूचित जाति के बच्चे खाने से मना कर देते हैं. सुनीता देवी कहती हैं कि ‘जब उनके हाथ से सवर्णों ने नहीं खाया तो उनके बच्चे क्यों सवर्णों के हाथ का खाएं?’ गौरतलब है कि सुनीता देवी के दो बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते हैं और भोजन माता की नियुक्ति का सरकारी नियम है कि अगर किसी महिला के बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं, तो उन्हें नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाएगी.

अनुसूचित जाति के बच्चों द्वारा किए गए बहिष्कार के बाद मामला पूरी तरह बिगड़ जाता है. इसी मोड़ पर राजनीतिक नेताओं और मुख्यमंत्री का प्रवेश होता है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं. जांच डीआईजी करेंगे. कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस घटना पर चिंता जताते हुए उपवास रखा तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने घोषणा की है कि अगर सुनीता देवी को उसी स्कूल में फिर से बहाल नहीं किया गया तो भीम आर्मी मुख्यमंत्री का घेराव करेगी. वहीं दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा है कि सुनीता देवी को दिल्ली सरकार नौकरी देगी.

अभी ये कहना मुश्किल है कि ये घटना क्या मोड़ लेती है क्योंकि अब इस मामले में जो भी होगा, उसके राजनीतिक परिणाम होंगे. लेकिन अब तक जो हो चुका है, उसके आधार पर ये कहा जा सकता है कि उत्तराखंड के अनुसूचित जाति के लोग अब यथास्थिति यानी पुराने दौर को जस का तस स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. वे न तो उस तरह का दमन स्वीकार करेंगे और न ही छुआछूत को चुपचाप बर्दाश्त करेंगे.

उत्तराखंड की विशिष्ट सामाजिक संरचना में ये काम आसान नहीं था. यहां अनुसूचित जाति की आबादी बेशक अच्छी-खासी (18.8%) है. लेकिन चूंकि यहां ओबीसी और अन्य मझोली जातियों की संख्या बेहद कम है, इसलिए उनके सामने सवर्णों (ब्राह्मणों और ठाकुरों) की विशाल आबादी होती है. वैसे तो उत्तराखंड की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से बेहतर है, लेकिन जैसा कि अब साबित हो चुका है कि साक्षर या शिक्षित होना किसी को जातिवाद से मुक्त करने के लिए काफी नहीं है. उत्तराखंड में अनुसूचित जाति में शहरीकरण कम हुआ है और उनमें लगभग 80% अब भी गांवों में रहते हैं, जो जातिवाद के गढ़ हैं.

उत्तराखंड राज्य निर्माण में जाति का तत्व

उत्तराखंड अलग राज्य बनने की कहानी में भी जाति का महत्वपूर्ण योगदान है. जैसा कि पहले ही बताया गया है कि उत्तराखंड में ओबीसी और अन्य मध्यवर्ती जातियां कम हैं. एक तरफ दलित हैं तो दूसरी ओर ब्राह्मण और ठाकुर. पुराने उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों की सामाजिक संरचना के बारे में समाज विज्ञानी जोआन मोलर के शोध की ये पंक्तियां महत्वपूर्ण हैं: ‘इस इलाके के पूरे इतिहास में द्विज स्वच्छ जातियां और दूषित बाहरी जातियों के बीच सामाजिक और कर्मकांडीय भेद स्थायी तौर पर रहा है. हालांकि, इस बीच राजनीतिक और कृषि संबंधों में बदलाव आया है और भारत में ‘निम्न जातियों’ की स्थिति में अंतर आया है, लेकिन उत्तराखंड में ब्राह्मण-ठाकुर बनाम ‘निम्न जातियों के अछूतों’ के बीच जो अंतर्विरोध है वह यहां के लोगों की धारणाओं और व्यवहार को लगातार प्रभावित करता रहा.’

उत्तर प्रदेश से बंटकर अलग होने से पहले, पर्वतीय जिलों में ‘बाहरी’ दो तरह के लोग होते थे. एक तो जाति बाह्य लोग यानी अनुसूचित जाति के लोग और दूसरे वे लोग जो यूपी के मैदानी इलाकों से यहां आकर बसे थे या रह रहे थे. 1994 में जब एसपी-बीएसपी सरकार के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यूपी में सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 27% आरक्षण देने का इरादा जताया तो पहाड़ी जिलों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. यूपी में 22 प्रतिशत एससी-एसटी आरक्षण पहले से लागू था. पहाड़ के सवर्णों को लगा कि 27% ओबीसी आरक्षण को लेने के लिए पहाड़ी जिलों में तो ओबीसी हैं नहीं. इसका मतलब मैदान से आकर ओबीसी जातियों के लोग यहां प्रशासन में भर जाएंगे. उन्हें अपनी नौकरियों के अवसर भी कम होते दिखे.

आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन जल्द ही पहाड़ों में अरसे से चल रहे अलग राज्य आंदोलन से जुड़ गया और उसे गति मिल गई. आखिरकार, वर्ष 2000 में उत्तरांचल अलग राज्य बन गया, जिसका नाम बाद में उत्तराखंड कर दिया गया. इसके बाद कुछ पर्वतीय इलाकों की पूरी आबादी को ओबीसी घोषित करके राज्य में ओबीसी की एक लिस्ट भी बना दी गई और उनका आरक्षण भी लागू कर दिया गया. लेकिन वे अति पिछडी जातियों के लोग नहीं हैं. इस तरह पहाड़ी जिलों में हमेशा से चला आ रहा ब्राह्मण-ठाकुर वर्चस्व, उत्तराखंड बनने के बाद राजनीतिक और सामाजिक जीवन में ही नहीं, प्रशासनिक क्षेत्र में भी कायम रहा.


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सुनीता देवी का शौर्य

इस तरह के जातिवादी समाज में सुनीता देवी या सूखीढांग स्कूल के बच्चों का सवर्ण वर्चस्व के खिलाफ उठ खड़ा होना साधारण बात नहीं है. खासकर इसलिए भी कि वहां की तमाम संस्थाएं इस जातिवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए काम करती हैं. राजनीतिक दल चुनावी गणित की वजह से अनुसूचित जाति के पक्ष में उसी हद तक जा सकते हैं, जहां सवर्णों के हित प्रभावित न होते हों. सुनीता देवी ने अपना साहस एक ऐसे राज्य में साबित किया है, जहां निष्पक्ष होने का दावा करने वाला प्रशासन भी जातीय वर्चस्व को चुनौती नहीं देता.

रोजा पार्क्स ह्यूमन राइट्स म्यूजियम | विकीमीडिया कॉमन्स

उनके इस शौर्य की तुलना अमेरिकी अश्वेत महिला रोजा पार्क्स (1913-2005) के ऐतिहासिक कृत्य से की जा सकती है. 1 दिसंबर, 1955 को सिविल राइट्स कार्यकर्ता रोजा पार्क्स अलाबामा के मोंटगोमरी शहर में एक बस में सवार हुईं. तब वहां सार्वजनिक स्थलों पर गोरे और कालों के बीच विभाजन होता था. बस में वे उस सीट पर बैठ गईं, जो श्वेत लोगों के लिए रिजर्व थी. इस दुस्साहस के लिए और नियम तोड़ने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया. इस छोटी सी नजर आने वाली घटना की अश्वेत समाज में और मानवाधिकार समर्थक श्वेत लोगों में तीखी प्रतिक्रिया हुई, जिसके कारण 381 दिनों तक बसों का बहिष्कार हुआ और आखिरकार बसों में बैठने को लेकर लंबे समय से चला आ रहा रंगभेद खत्म हुआ. रोजा पार्क्स को अमेरिकी कांग्रेस ने सम्मानित किया और उन्हें ‘अमेरिका के आधुनिक नागरिक अधिकार आंदोलन की मां’ कहा गया. रोजा पार्क्स ने ‘गलत जगह’ बैठकर अमेरिकी इतिहास की लाइन सीधी कर दी.

कोई कह सकता है कि रोजा पार्क्स को कानून का पालन करना चाहिए था और कानून बदलने के लिए संवैधानिक कोशिश करनी चाहिए थी. उसी तरह कोई कह सकता है कि सुनीता देवी और अनुसूचित जाति के बच्चों ने विरोध का आंदोलनात्मक तरीका अपनाकर गलत किया. उन्हें कानून की मदद लेनी चाहिए थी. कोई ये भी कह सकता है कि भारत के संविधान की प्रस्तावना, अनुच्छेद 17, 1955 का सिविल राइट्स एक्ट, 1989 का एससी-एसटी एक्ट सब कुछ तो सुनीता देवी के पक्ष में है. उन्होंने इसका सहारा क्यों नहीं लिया?

ऐसा कहने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि देश और समाज सही तरीके से चले ये काम पूरी तरह से कानून और सरकार के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता है. सरकार और कानून घर-घर और गली-गली घुसकर अपनी इच्छा को लागू कर भी नहीं सकते. हालांकि सुनीता देवी के केस में सरकार तो खुद ही उनके खिलाफ खड़ी हो गई. अगर ऐसा न भी होता तो भी सामाजिक परिवर्तन में समाज की भूमिका और उसकी पहल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

इस बात को समझाते हुए एक ट्विटर स्पेस में राजनीति विज्ञानी अरविंद कुमार ने दिलचस्प उदाहरण दिया- ‘मान लीजिए कि मैं अनुसूचित जाति का हूं और किसी रास्ते से अक्सर गुजरता हूं. रास्ते में खड़ा होकर एक आदमी जब भी मुझे देखता है तो थूक देता है. इससे मेरा अपमान तो हो रहा है, लेकिन क्या मैं इसकी शिकायत पुलिस में करके न्याय ले पाऊंगा? शायद नहीं. ऐसे सवाल समाज के स्तर पर ही हल होंगे.’ पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने अध्ययन के आधार पर वे बताते हैं कि उत्पीड़न के कई मामले अब इसलिए नहीं होते, क्योंकि दलितों ने स्थानीय स्तर पर विरोध कर दिया.

ऐसा लगता है कि सुनीता देवी या रोजा पार्क्स ऐसी ही सामाजिक प्रक्रियाओं की अग्रणी योद्धा हैं. कोई भी सामाजिक बदलाव ऐसे मामूली लोगों के गैरमामूली प्रयासों के बिना नहीं हो सकते.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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