भारत में यह माना जाता रहा कि ऊपर के लोगों का विकास होगा तो रिसकर नीचे तक पहुंचता है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. आज असमान विकास के नाम पर भारत के सामने जस की तस चुनौती बनी हुई है.
कितना अच्छा होता कि आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में हम अपने प्यारे भारत को उनकी कल्पनाओं का देश बनाने की दिशा में बढ़ते लेकिन जो हालात हैं, उनमें कोई इसका सपना भी भला कैसे देखें?
जब भारत 2022 में आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है तो यहां एक सवाल सबसे जरूरी हो जाता है कि हमारे लिए आजादी के मायने क्या हैं, क्या इसका मतलब हम लोगों के बीच ठीक तरह से ले जा पाए?
यह याद दिलाती है कि इमरजेंसी में सरकार प्रायोजित जबरन परिवार नियोजन से प्रजनन दर में नहीं के बराबर फर्क. 2022 में तो जबरन कार्यक्रम चलाने की कोई कोशिश मोटे तौर पर बेवजह, क्योंकि दर लगातार घट रही.
भाजपा जिस तरह से क्षेत्रीय दलों को अमर्यादित और अनैतिक तरीक़ों से नेस्तनाबूद करने में लगी थी, ऐसे में राजद यह अपनी ज़िम्मेदारी समझता है कि अपनी पूरी ताक़त से बीजेपी का मुक़ाबला करे और क्षेत्रीय पार्टियों को बचाए.
बुद्धिमानी तो इसी में है कि पैर उतना ही पसारिए जितनी चादर लंबी है लेकिन भारत में लोग रियायतों के इतने आदी हो चुके हैं कि उन्हें वे उपाय जमते नहीं जिनसे भविष्य में बेहतर नतीजा हासिल होता हो.