दुनिया के वित्तीय, रणनीतिक, आर्थिक केंद्र बने अमेरिका, चीन, यूरोप आज चुनौतियों से रू-ब-रू हैं, ऐसे में उन सुर्खियों से आगे देखने की जरूरत है, जो संरचनात्मक दरारों और अराजकता पर ज़ोर दे रही हैं.
बेहद ध्रुवीकृत समय में, हाशिये पर धकेले गए अल्पसंख्यक पीछे मुड़कर अपनी उन जड़ों और बुनियादों को बचाने में जुट जाते जो उन्हें बहुत प्रिय होते हैं लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह एक खतरनाक जाल बुन सकता है.
अमेरिकी फेडरल बैंक दरें बढ़ा रहा है, तो रिजर्व बैंक को भी रुपये में गिरावट और विदेशी मुद्रा के भंडार को सिकुड़ने से रोकने के लिए दरें बढ़ानी पड़ेंगी लेकिन इससे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार थम सकती है.
सेना सरकार के ‘वस्तुनिष्ठ नियंत्रण’ में है, जो उसे हमेशा स्वायत्तता देती रही है लेकिन या तो सेना ने सरकार को ‘औपनिवेशिक’ प्रतीकों के मामले में तार्किक सलाह नहीं दी या वह अपनी मर्जी से उसकी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ गई.
इतिहास के इस मुकाम पर हम अपने आपस के झगड़ों में उलझे नहीं रह सकते. पॉल सैम्युल्सन की तर्ज पर मैं भी सबसे पूछना चाहता हूं, ' जब स्थिति बदलती है तो मैं अपना आकलन बदल लेता हूं लेकिन आप क्या करते हैं, जनाब?'
चीन के डेवलपमेंट मॉडल के केंद्र में प्रॉपर्टी सेक्टर था—घरों का निर्माण, ज़मीन की बिक्री और रियल एस्टेट में निवेश. अब इस निर्भरता के नतीजे साफ दिखने लगे हैं.