तेजस्वी यादव के बारे में लोगों ने जितना सोचा था, वह उससे कहीं अधिक सयाने राजनेता बन गए हैं. राजद के प्रस्ताव से ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार शायद इससे वाकिफ हैं.
तांत्रिक क्रियाओं से जुड़ी हत्याओं को अंधविश्वास और अशिक्षा से जोड़ना आसान लगता है लेकिन ऐसे मामलों से शिक्षित, मध्यवर्गीय परिवारों से जुड़े लोग भी शामिल पाए गए हैं. इसलिए इनका गहरा विश्लेषण करने की जरूरत है.
आप बीजेपी के उग्र राष्ट्रवाद का प्रतिकार किसी अमूर्त अंतर्राष्ट्रीयतावाद के सहारे नहीं कर सकते. आज जिस झूठे और धर्मान्ध राष्ट्रवाद का प्रचार किया जा रहा है उसकी कारगर काट भारतीय समाजवादियों के सकारात्मक राष्ट्रवाद से ही की जा सकती है.
सवाल उठता है कि ‘धर्म’ भी तो अतीत का विषय है. उसे भूलने की जरूरत क्यों नहीं है? धर्म से जुड़ी अनेक बुराइयां पूरे संसार में रही हैं, फिर उसे याद रखने की जरूरत क्यों?
गुजरात में मुस्लिम युवाओं की कोड़े से पिटाई जैसी घटनाओं पर ही भारत जैसे बहुलतावादी, लोकतांत्रिक गणतंत्र से राजनीतिक आवाज़ उठाने की अपेक्षा की जाती है लेकिन भाजपा के प्रतिद्वंद्वी मुसलमानों के साथ दिखने से भी डर रहे हैं.
पूर्व सीजेआई रमना ने हाल ही में जजों की नियुक्ति के मामले में विविधता को सुनिश्चित करने के लिए किसी मैकेनिज़म के न होने की बात कही थी. हालांकि, उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान इस पर कोई काम नहीं किया.
हिजाब पहनने के लिए ज़ोर देना धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक मामला ही है इसलिए इसका विरोध भी धार्मिक नहीं है, इस्लाम के खिलाफ नहीं है बल्कि राजनीति का मामला है.
सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) में व्यापक वित्तीय समावेश की संभावना, मगर भारतीय रिजर्व बैंक के कॉन्सेप्ट नोट में उपभोक्ता सुरक्षा पर जोर देना भी वाजिब है.