मुख्यधारा मीडिया में लगातार, लगभग एक जैसा नैरेटिव दिखाया जाता है: बंगाल ‘कानूनहीन’, बंगाल ‘हिंसक’, बंगाल ‘अस्थिर’. हर घटना को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है.
शहरी भारत आज जातिवाद खत्म होने के दौर में नहीं है, बल्कि ऐसा दौर है जहां लोग जातिवाद मानना नहीं चाहते. वे ऊंच-नीच के फायदे तो चाहते हैं, लेकिन इसे मानने में शर्म महसूस करते हैं.
चीन ने कोयले से गैस बनाने में पूंजी, हुनर और टेक्नोलॉजी का धैर्य के साथ निवेश किया. हम कथनी को करनी में बदलने में हमेशा पीछे रहते हैं. कच्चे तेल की कीमत गिरते ही हमारा जोश ठंडा पड़ जाता है.
डीजल से धीरे-धीरे दूर जाने की प्रक्रिया भारत की रिफाइनरी की अर्थव्यवस्था को जटिल बना सकती है क्योंकि 2032 तक पेट्रोल की मांग अपने उच्च स्तर पर पहुंचकर उसके बाद घटने लगेगी.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा आसिया अंद्राबी को महिलाओं के अधिकारों की रक्षक बताना दिखाता है कि कैसे नैरेटिव बनाए जाते हैं और क्या चीज़ें छोड़ दी जाती हैं.
आज निरंतर बदलती विश्व व्यवस्था भारत के लिए एक मौका उपलब्ध करा रही है जिसका लाभ उठाने के लिए उसे खुद को अनुशासित रखना होगा ताकि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें.