भारत ने 88 घंटे तक चले तेज़ संघर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान को मानसिक तौर पर हराकर उसके मन में फिर से यह डर बैठा दिया कि भारत उसे सज़ा दे सकता है. परमाणु हथियार रखने वाले देशों के बीच पूरी तरह निर्णायक युद्ध की कोई जगह नहीं होती. लड़ाई परमाणु हथियार इस्तेमाल होने की सीमा के नीचे ही रहनी चाहिए. इस सीमा को पार करना किसी देश के अस्तित्व पर खतरा, बड़े इलाके के नुकसान, या बहुत ज़रूरी सैन्य और आर्थिक ताकत के खत्म होने के रूप में देखा जाता है.
इस नज़रिए से देखें तो जीत को सिर्फ दुश्मन को हुए नुकसान से मापना भावनात्मक सोच है. असली जीत यह होती है कि युद्ध के दौरान OODA (Observation – Orientation – Decision – Action) यानी निगरानी-तैयारी-निर्णय-कार्रवाई के चक्र को कितनी तेज़ी से चलाकर दुश्मन को मानसिक रूप से कमज़ोर किया गया. इसका नतीजा यह होता है कि दुश्मन अपनी सैन्य ताकत होने के बावजूद जवाब नहीं दे पाता. ऑपरेशन सिंदूर में यह लक्ष्य 10 मई की सुबह तक हासिल हो गया था, जब भारतीय वायुसेना पूरे पाकिस्तान में कहीं भी हमला करने की स्थिति में थी और पाकिस्तान की वायुसेना तथा एयर डिफेंस कोई असरदार जवाब नहीं दे पा रहे थे.
लेकिन मानसिक रूप से हराने की समस्या यह है कि हारने वाला पक्ष भी खुद को विजेता बता सकता है और अपनी जीत का प्रचार कर सकता है क्योंकि उसकी सैन्य ताकत पूरी तरह खत्म नहीं होती, इसलिए उसे लगता है कि अगली लड़ाई में वह बाजी पलट सकता है. इसी वजह से ‘ऑपरेशन सिंदूर-2’ की संभावना मजबूत बनी हुई है. दोनों देशों ने ऑपरेशन सिंदूर से सबक लिया है और वे ईरान युद्ध को समझ रहे हैं. साथ ही यूक्रेन युद्ध को भी दोबारा समझ रहे हैं, जहां कमजोर पक्ष ने अलग रणनीति अपनाकर ज्यादा ताकतवर दुश्मन को पूरी जीत से रोका. इसलिए अब दोनों देश अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने में लगे हैं—अभी के लिए भी और लंबे समय के सुधार के लिए भी.
मुझे दो तरह का भविष्य दिखता है. फिलहाल भारत का डर पाकिस्तान पर हावी है, जिसका संकेत इस बात से मिलता है कि आतंकवाद से जुड़ा छद्म युद्ध अपने सबसे निचले स्तर पर है, लेकिन भारत या पाकिस्तान में सरकार के नियंत्रण से बाहर किसी तत्व की मदद से हुई कोई बड़ी घटना फिर लड़ाई का कारण बन सकती है. पाकिस्तान से सक्रिय आतंकवादी संगठन खुद को कानून से ऊपर मानते हैं और उन्हें ‘न युद्ध, न शांति’ की स्थिति पसंद नहीं है. वे जिसे सामान्य स्थिति मानते हैं, उसकी वजह से भारत जवाबी कार्रवाई कर सकता है.
पाकिस्तान बलूचिस्तान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और दूसरे संगठनों की बगावत, तथा खैबर-पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की हिंसा का सामना कर रहा है. वहां हिंसा अंदरूनी इलाकों तक फैल चुकी है. पाकिस्तान भारत पर इन बागियों को मदद देने का आरोप लगाता है. कोई बड़ी घटना पाकिस्तान की तरफ से युद्ध शुरू करने की वजह बन सकती है. ऐसे हालात में लड़ाई ऑपरेशन सिंदूर से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकती है, जिसमें मौजूदा ताकत के साथ बेहतर रणनीति अपनाई जाएगी. दूसरा भविष्य यह हो सकता है कि अगले पांच साल में दोनों देश नई तकनीक अपनाकर अपनी सैन्य रणनीतियों को और आधुनिक बना लें.
भारत ये सबक ज़रूर सीखे
भारत को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति साफ और औपचारिक रूप से घोषित करनी चाहिए और उसी के हिसाब से सेना को तैयार करने के लिए राष्ट्रीय रक्षा नीति बनानी चाहिए. यह नीति चीन और पाकिस्तान से मिलकर बनने वाले खतरे को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए. राजनीतिक नेतृत्व अपने भाषणों में जिस सुरक्षा सिद्धांत की बात करता है, उसे साफ राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में बदला जाना चाहिए. कोई भी देश कुछ आतंकवादियों की हरकतों की वजह से हमेशा लड़ाई की स्थिति में नहीं रह सकता.
भारत को किसी भी लड़ाई या युद्ध के राजनीतिक और सैन्य लक्ष्य साफ रखने चाहिए. ऑपरेशन सिंदूर का घोषित राजनीतिक लक्ष्य आतंकवादियों और उन्हें समर्थन देने वाली पाकिस्तानी सेना को सबक सिखाना था. दुर्भाग्य से सेना ने भी यही बात दोहराई, लेकिन ज्यादा सही राजनीतिक लक्ष्य पाकिस्तान के अंदर इतना डर पैदा करना होना चाहिए था कि वह दोबारा ऐसी हरकत करने की हिम्मत न करे और सेना का लक्ष्य ऐसा तेज़, लेकिन नियंत्रित अभियान चलाना होना चाहिए था, जिससे पाकिस्तान मानसिक रूप से हार जाए, लेकिन परमाणु हथियार इस्तेमाल होने की सीमा पार न हो.
राजनीतिक और सैन्य लक्ष्यों की अस्पष्टता के कारण 6 मई 2025 की रात सिर्फ आतंकवादी ठिकानों पर हमला करने की गलती हुई. इसके पहले या साथ-साथ जवाबी हवाई अभियान नहीं चलाए गए, जिनमें एयर डिफेंस को कमज़ोर करना ज़रूरी होता है. इसका नतीजा यह हुआ कि कई लड़ाकू विमान गंवाने पड़े और पाकिस्तान को खुद को बराबरी पर दिखाने और जीत का दावा करने का मौका मिल गया. किसी भी युद्ध में सैन्य ऑपरेशन के बुनियादी नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
भारत को अपने विरोधी देशों में ज्यादा मजबूत खुफिया नेटवर्क बनाना होगा, जैसा मोसाद ने ईरान में बनाया है. सोचिए, अगर भारत ने 15 दिन पहले चेतावनी देने के बाद खाली आतंकवादी अड्डों पर हमला करने के बजाय आतंकवादी सरगनाओं को खत्म किया होता, तो उसके हवाई और ड्रोन हमलों का असर कितना बड़ा होता.
‘न्यू नॉर्मल’ लागू करने के लिए रणनीतिक फैसला लेने में 15 दिन का समय बहुत ज्यादा होता है. भारत को दुश्मन को चौंकाने के लिए पहले हमला करने या रोकथाम वाली कार्रवाई का विकल्प खुला रखना चाहिए और अगर जवाबी कार्रवाई करनी ही पड़े, तो उसे 24 से 48 घंटे के भीतर करना चाहिए.
लंबी दूरी तक निशाना दागने वाले एयर डिफेंस सिस्टम और दूसरे ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ के साथ लड़ाकू विमान, मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल करके जो भी हवाई अभियान चलाया जाए, वह अलग-अलग हिस्सों में होते हुए भी एक साथ जुड़ा हुआ होना चाहिए, जैसा ऑपरेशन सिंदूर में किया गया. कल्पना कीजिए कि भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी वायुसेना को धोखे से सामने आने पर मजबूर किया हो और फिर उसे लंबी दूरी तक हवा में मारने वाली मिसाइलों और एयर डिफेंस सिस्टम से निशाना बनाया हो. साथ ही उसके एयर डिफेंस सिस्टम पर ड्रोन, हवा से ज़मीन और ज़मीन से मार करने वाली मिसाइलों से एक साथ हमला किया गया हो. तब पाकिस्तानी वायुसेना छिपने की जगह ढूंढती रहती. इसके तुरंत बाद आतंकवादी अड्डों, एयरबेस और कमांड-कंट्रोल केंद्रों को निशाना बनाया जा सकता था. यह सब 48 से 72 घंटे के भीतर किया जा सकता था.
यह कहने की ज़रूरत नहीं कि भविष्य की लड़ाइयों के लिए सेना में बड़े बदलाव जरूरी हैं. बहुउद्देश्यीय अभियान, खुफिया निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक और साइबर युद्ध, एयर फ्यूलिंग, ड्रोन युद्ध और जमीन आधारित मिसाइल सिस्टम पर तुरंत ध्यान देना होगा.
ईरान युद्ध से सबक
ईरान युद्ध ने यूक्रेन युद्ध से मिले सबक को सही साबित किया है. सबसे आधुनिक विमान, मिसाइल और ड्रोन के संयुक्त हमले भी उस कमज़ोर, लेकिन मजबूत इरादे वाले दुश्मन को नहीं हरा सकते, जो युद्ध को लंबा खींचने और ज्यादा खतरनाक बनाने के लिए अलग रणनीति अपनाता है और आपकी लागत बढ़ा देता है.
ऐसी रणनीति में दुश्मन की उन कमजोरियों पर हमला किया जाता है, जिन पर उसने ध्यान नहीं दिया हो या तैयारी न की हो. आधुनिक युद्धों में ड्रोन, ज़मीन आधारित मिसाइल, स्पीड बोट वाली ‘मॉस्क्वीटो नेवी’, इलेक्ट्रॉनिक और साइबर युद्ध तथा भूमिगत युद्ध जैसी सस्ती तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है.
कमजोर दुश्मन युद्ध को खतरनाक बनाने के लिए आर्थिक ठिकानों, आबादी वाले इलाकों, समुद्री रास्तों और जहाजों को निशाना बनाता है. वह सीमित जमीनी अभियान चलाता है और आतंकवादियों, भाड़े के लड़ाकों और ड्रोन की मदद से ‘फोर्थ जेनरेशन वॉर’ करता है.
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‘ऑपरेशन सिंदूर-2’ कैसा हो सकता है
पारंपरिक और अलग तरह की युद्ध रणनीतियों के बीच कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं होता. फर्क सिर्फ इतना है कि देश और सेनाएं एक खास तरह के युद्ध लड़ने की आदी हो जाती हैं. जब कोई अलग तरीका अपनाया जाता है, तो वह दुश्मन के लिए नई चुनौती बन जाता है, जिसकी तैयारी उसके पास कम होती है.
पाकिस्तान आर्थिक और सैन्य ताकत में इंडिया की बराबरी नहीं कर सकता. उसकी अर्थव्यवस्था भारत की अर्थव्यवस्था का सिर्फ 10 प्रतिशत है और उसका रक्षा बजट भारत के रक्षा बजट का लगभग 13 प्रतिशत है. पाकिस्तान के लिए ईरान मॉडल सबसे उपयुक्त है. भारत की बराबरी करने या उससे आगे निकलने के लिए वह सिर्फ कुछ चुनिंदा तकनीकों में निवेश करेगा. वह इनका इस्तेमाल भारत की लागत बढ़ाने और उसे परेशान करने के लिए करेगा, जैसा उसने 7 मई 2025 की हवाई लड़ाई में किया था. इसके अलावा वह युद्ध को तेज़ और लंबा खींचने के लिए अलग तरह की युद्ध रणनीति अपनाएगा.
इस उपमहाद्वीप का सैन्य इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है. 1965 में पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के तहत जम्मू-कश्मीर में सैनिकों और भाड़े के लड़ाकों की घुसपैठ कराकर युद्ध शुरू किया था, ताकि अहम इलाकों पर कब्ज़ा किया जा सके और लोगों को भड़काया जा सके. भारत ने समय रहते कार्रवाई करके और पारंपरिक युद्ध लड़कर उसे नाकाम कर दिया था. 1971 के युद्ध में मुक्ति वाहिनी ने भारत के तेज अभियान से पहले और उसके दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
‘ऑपरेशन सिंदूर-2’ में विमान, मिसाइल और ड्रोन के जरिए बड़े स्तर पर पारंपरिक सैन्य अभियान चल सकता है. दोनों पक्ष 2025 में जो कर चुके हैं, उसे इस बार ज्यादा ताकत, ज्यादा गहराई और ज्यादा खतरनाक तरीके से दोहराने की कोशिश करेंगे. यह संघर्ष समुद्र तक फैल सकता है. भारत अरब सागर पर अपना नियंत्रण मजबूत करना, बंदरगाहों और समुद्री व्यापार को रोकना चाहेगा, जबकि पाकिस्तान भारत को समुद्र से दूर रखने की कोशिश करेगा.
उच्च तकनीक वाले पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ दोनों पक्ष दूसरे क्षेत्रों में भी अलग तरह की रणनीति अपनाएंगे. युद्ध को लगातार तेज करने के लिए पहले अलग रणनीति वाले अभियान और फिर पारंपरिक सैन्य कार्रवाई हो सकती है, या इसका उल्टा भी हो सकता है. मुझे लगता है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर-2’ के हिस्से के रूप में जम्मू-कश्मीर में सीमित जमीनी कार्रवाई भी हो सकती है. इसका फायदा यह होगा कि युद्ध परमाणु हथियार इस्तेमाल होने की सीमा से नीचे रखा जा सकेगा.
इस विडंबना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में जो अलग रणनीति अपनाई गई थी, वही ‘ऑपरेशन सिंदूर-2’ में कहीं बड़े स्तर के युद्ध का हिस्सा बन सकती है और इसका असर पूरे देश पर पड़ सकता है. बिना बड़े जमीनी अभियान के भी सीमित युद्ध की तेज गूंज साफ सुनाई दे सकती है.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.
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