हैदराबाद: हैदराबाद में इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मटेरियल्स यानी ARCI के बड़े कैंपस में वैज्ञानिक भारत की कुछ सबसे बड़ी समस्याओं का हल सबसे बुनियादी स्तर पर खोजने में जुटे हैं. वे ऐसी EV बैटरियां बना रहे हैं जिनमें आग न लगे, चीन के रेयर अर्थ मैग्नेट पर भारत की निर्भरता कम करने पर काम कर रहे हैं, और रक्षा क्षेत्र के लिए तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिनमें से कुछ का इस्तेमाल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था.
ARCI भारत में लैब से उद्योग तक पहुंचने के बड़े अंतर को खत्म करने के लिए साफ तौर पर ‘मिनरल्स-टू-मार्केट्स’ रणनीति अपना रहा है.
ARCI के निदेशक आर विजय ने कहा, “अगर आप हमारी तुलना दूसरे रिसर्च संस्थानों से करें, तो हो सकता है कि हम उतने रिसर्च पेपर या स्टडीज न निकाल रहे हों, लेकिन हमारे पास सबसे ज्यादा पेटेंट हैं. हम ऐसी रिसर्च कर रहे हैं जो असली दुनिया की समस्याओं का हल निकाल रही है.”
आर विजय मटेरियल साइंटिस्ट हैं और नैनोमटेरियल्स, मैकेनिकल एलॉयिंग और हाइड्रोजन स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में उनके काम को 1,300 से ज्यादा बार उद्धृत किया जा चुका है.
केंद्र के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग से फंड पाने वाला यह स्वायत्त संस्थान मटेरियल साइंस पर काम करने वाली अपनी तरह की खास रिसर्च सुविधा है. यहां के वैज्ञानिक कई अहम असली समस्याओं पर काम कर रहे हैं. इनमें रक्षा प्रणालियों के लिए मेटल कोटिंग, चिकित्सा के लिए बायोमटेरियल्स, और यहां तक कि हाइड्रोजन चूल्हे भी शामिल हैं, जो LPG की जगह ले सकते हैं.
“हम शुरुआत से ही निजी कंपनियों को साथ जोड़ लेते हैं ताकि उनकी जरूरतों को समझ सकें. इसलिए हमारी लैब से जो भी चीज निकलती है, वह बाजार के लिए तैयार होती है और उसे व्यावसायिक स्तर पर बढ़ाने के लिए हमारे पास पहले से उद्योग साझेदार मौजूद रहते हैं.”
आर विजय, ARCI निदेशक
अब इसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक चीन के रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट पर भारत की निर्भरता कम करना है. ये मैग्नेट ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री, खासकर EVs, इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए बहुत जरूरी हैं.
इस दिशा में बड़ा कदम मार्च में उठाया गया, जब ARCI ने नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन यानी NdFeB रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के शुरू से अंत तक विकास और निर्माण के लिए एक खास सुविधा शुरू की.
भारत अभी अपने करीब 90 प्रतिशत रेयर अर्थ मैग्नेट आयात करता है, जिनमें ज्यादातर चीन से आते हैं. 2024-25 में भारत ने मैग्नेट और उनसे जुड़े सामान का लगभग 221 मिलियन डॉलर का आयात किया. इसी भारी निर्भरता की वजह से पिछले साल चीन द्वारा निर्यात नियम सख्त करने पर भारत को बड़ा झटका लगा था. सबसे ज्यादा असर ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों पर पड़ा. ऐसे में भारत में इन मैग्नेट का निर्माण शुरू करना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया.
हैदराबाद में ARCI का पायलट प्लांट भारत की घरेलू निर्माण क्षमता की कमी को दूर करने की दिशा में पहला बड़ा कदम माना जा रहा है. यह सुविधा अब काम कर रही है और नवंबर 2025 में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंजूर 7,280 करोड़ रुपये की योजना के तहत आती है, जिसका उद्देश्य सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के निर्माण को बढ़ावा देना है.
विजय ने कहा, “यह एक एंड-टू-एंड सुविधा है. इन मैग्नेट के लिए भारतीय अयस्कों का इस्तेमाल किया जाएगा और इसके जरिए हम चीन पर भारत की निर्भरता खत्म कर पाएंगे.”

मैग्नेट, मिसाइल और मोटर
ARCI के गेट किसी किले जैसे हैं, जो संस्थान के रिसर्च राज़ों की सुरक्षा करते हैं. कई सुरक्षा जांचों और लंबी पैदल दूरी के बाद 95 एकड़ के कैंपस में पहुंचा जाता है, जहां अलग-अलग खास सुविधाओं में काम चल रहा है.
हर लैब अलग क्षेत्र में प्रयोग कर रही है. इनमें ऐसी तकनीकें शामिल हैं जिनसे इंजन के पुर्जे ज्यादा लंबे समय तक चलें, एयरोस्पेस में गर्मी से बचाने के लिए सिरेमिक, माइनिंग के कचरे को बैटरी ग्रेड मटेरियल में बदलने के लिए पाउडर मेटलर्जी, ज्यादा असरदार डिटर्जेंट के लिए नैनोस्ट्रक्चर्ड टाइटेनिया, और सटीक निर्माण के लिए लेजर प्रोसेसिंग.

1980 के दशक में भारत और पूर्व सोवियत संघ के बीच ज्ञान आदान-प्रदान के रूप में स्थापित ARCI, 1997 में DST के तहत आया और अब पूरी तरह भारत की रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से काम करता है. रेयर अर्थ मैग्नेट लैब इसका सबसे नया प्रमुख केंद्र है. इस पर काम 2015 में छोटे उपयोगों जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और घड़ियों के लिए सॉफ्ट मैग्नेट रिसर्च से शुरू हुआ था और बाद में परमानेंट मैग्नेट तक पहुंचा, जो भारत के क्लीन एनर्जी और EV लक्ष्यों के लिए बहुत जरूरी हैं.
इस ‘टॉप सीक्रेट’ सुविधा के अंदर NdFeB पाउडर को बहुत सावधानी से तैयार किया जाता है, दबाया जाता है और बड़े ब्लॉक्स में बदला जाता है. फिर इन्हें जरूरत के हिसाब से काटा जाता है. यहां वैज्ञानिक मैग्नेट बनाने की नई ‘नियर प्रेसलेस’ तकनीक पर भी काम कर रहे हैं. इसमें पाउडर को मैकेनिकल प्रेस की जगह हाई-फ्रीक्वेंसी मैग्नेटिक फील्ड से एक दिशा में जमाया जाता है. इससे कच्चे माल की बर्बादी कम होती है और ज्यादा मजबूत व बेहतर तरीके से बने मैग्नेट तैयार होते हैं.
“इस लैब का अंतिम लक्ष्य भारत को अपने इलेक्ट्रिक व्हीकल मिशन में आत्मनिर्भर बनाना था.”
-अभय करंदीकर, DST सचिव
इसके लिए हालात बिल्कुल सही होने चाहिए, क्योंकि NdFeB पाउडर बहुत जल्दी प्रतिक्रिया करता है और खराब हो सकता है. यह काम पूरी तरह साफ-सुथरे ड्राई-लैब माहौल में होता है, जहां ऑक्सीजन का स्तर 1,000 ppm से नीचे रखा जाता है ताकि कोई मिलावट न हो.
DST के सचिव प्रोफेसर अभय करंदीकर ने दिप्रिंट से कहा, “इस लैब का अंतिम लक्ष्य भारत को अपने इलेक्ट्रिक व्हीकल मिशन में आत्मनिर्भर बनाना था.”
उन्होंने कहा कि अभी यह प्लांट पायलट स्तर पर है, लेकिन आने वाले सालों में इसका काम बड़े स्तर पर बढ़ाया जाएगा.

ARCI इसके लिए तैयार है. यह पहली बार ऐसी चुनौती नहीं ले रहा. लगभग तीन दशक के कामकाज में संस्थान 35 से ज्यादा तकनीक ट्रांसफर कर चुका है, करीब 50 उद्योग साझेदारों के साथ काम कर चुका है और बाजार को 350 से ज्यादा तकनीकी समाधान दे चुका है.
इसके उद्योग साझेदारों में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के लिए विमान के पुर्जे और कोटिंग, लार्सन एंड टुब्रो के लिए हाई-परफॉर्मेंस मशीन कोटिंग, रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए लिथियम-आयरन-फॉस्फेट कैथोड मटेरियल, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के लिए रिएक्टर तकनीक, और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए सरफेस इंजीनियरिंग कोटिंग और प्रोपेलेंट्स के लिए नैनोमटेरियल्स शामिल हैं.
रेयर अर्थ मैग्नेट से आगे बढ़कर ARCI रक्षा क्षेत्र का भरोसेमंद रिसर्च साझेदार भी है. कई सालों से यह स्क्रैमजेट, गन बैरल, गोलियों और मिसाइलों के लिए कोटिंग दे रहा है. ये ऐसे हिस्से हैं जिन्हें इस्तेमाल के समय बहुत तेज रफ्तार, गर्मी, दबाव, घर्षण और घिसाव झेलना पड़ता है. संस्थान ने सैन्य ड्रोन में इस्तेमाल होने वाली हाई-पावर और हाई-थ्रस्ट मोटर भी विकसित की हैं.
विजय ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी हमारी तकनीकों का इस्तेमाल हुआ. हम इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दे सकते, लेकिन इससे हमारी रिसर्च के उन्नत उपयोग साबित होते हैं.”
रिसर्च को उद्योग तक पहुंचाना
भारत उच्च गुणवत्ता वाली वैज्ञानिक रिसर्च में लगातार ग्लोबल रैंकिंग में ऊपर जा रहा है. 2025 नेचर इंडेक्स में भारत 9वें स्थान पर पहुंच गया, जबकि 2020 में वह 12वें स्थान पर था. लेकिन रिसर्च को असली दुनिया में इस्तेमाल तक पहुंचाने में अभी भी काफी कमी है.
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत “लैब-टू-इंडस्ट्री गैप” को भरने की कोशिश कर रहा है. भारत में होने वाली ज्यादातर रिसर्च या तो लैब से बाहर नहीं निकल पाती, या फिर बाजार की जरूरत के हिसाब से बड़े स्तर पर नहीं पहुंचती.
अधिकारी ने कहा, “अब हम ऐसी योजनाएं लाने की कोशिश कर रहे हैं जो रिसर्च संस्थानों और उद्योगों को साथ लाएं. जब तक रिसर्च लोगों के काम न आए, उसका कोई फायदा नहीं.”

नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड यानी RDIF शुरू किया, जिसका बजट छह साल में 1 लाख करोड़ रुपये है. इस योजना का उद्देश्य रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश बढ़ाना और निजी क्षेत्र की कंपनियों को समर्थन देना है. यह भारत के रिसर्च खर्च में लगातार बढ़ोतरी पर आधारित है, जो 2010-11 के 60,196 करोड़ रुपये से बढ़कर 2020-21 में 1.27 लाख करोड़ रुपये हो गया.
ARCI इस दिशा में पहले से आगे रहा है. यह लंबे समय से ऐसे उत्पाद और मटेरियल विकसित करने पर ध्यान देता रहा है जिन्हें बाजार में लाया जा सके. यहां की रिसर्च सटीक, जरूरत के मुताबिक और कम समय में पूरी होने वाली होती है, जिससे यह संस्थान निजी कंपनियों के लिए भरोसेमंद साझेदार बन गया है.

ऐसी ही एक उपलब्धि है हाइड्रोजन चूल्हा, जिसे ARCI ने अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण पैदा हुए LPG संकट के दौरान विकसित किया. संस्थान पहले से ही वैकल्पिक ईंधन के रूप में हाइड्रोजन पर उन्नत रिसर्च कर रहा था. बाद में इसे ऐसे कुकिंग स्टोव के हिसाब से बदला गया जो पारंपरिक LPG सिलेंडर पर निर्भर न हो. फरवरी में ARCI ने इस परियोजना के लिए एक निजी कंपनी के साथ साझेदारी की. अप्रैल में इसका पायलट परीक्षण किया गया और इसका प्रोटोटाइप हैदराबाद के कुछ रेस्तरां में पहले से काम कर रहा है.
विजय ने गर्व से कहा, “हमारी रिसर्च कई चरणों में होती है. हम शुरुआत से ही निजी कंपनियों को साथ जोड़ लेते हैं ताकि उनकी जरूरतों को समझ सकें. इसलिए हमारी लैब से जो भी निकलता है, वह बाजार के लिए तैयार होता है और उसे व्यावसायिक स्तर पर बढ़ाने के लिए हमारे पास पहले से उद्योग साझेदार मौजूद रहते हैं.”

आत्मनिर्भरता का विज्ञान
आर विजय जब 1994 में संस्थान से जुड़े थे, तब वे IIT मद्रास से निकले एक युवा वैज्ञानिक थे और उस समय ARCI पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ था. विजय ने याद करते हुए कहा कि तब संस्थान सिर्फ एक इमारत तक सीमित था, जहां क्लास में कम लोग हुआ करते थे और पूरे कैंपस में सन्नाटा हुआ करता था. सालों में ARCI हैदराबाद में एक अनजान पते से बढ़कर एक बड़े संस्थान में बदल गया.
अब, इसके साथ बढ़ते हुए और इसका निदेशक बनने के बाद, विजय इसे अगले स्तर तक ले जाना चाहते हैं. वह चाहते हैं कि हर भारतीय इसकी लैब से निकलने वाले काम के बारे में जाने.

विजय ने कहा, “ARCI की शुरुआत एक खास बाजार के लिए हुई थी, लेकिन हमने अपने काम को भारत के हर क्षेत्र तक फैलाने में सफलता हासिल की है. मटेरियल साइंस अब अपने पंख फैला चुका है और ARCI उस क्रांति की अगुवाई कर रहा है.”
उन्हें भरोसा है कि ARCI का काम भारत को ‘आत्मनिर्भरता’ की तरफ आगे बढ़ाएगा और ज्यादा उत्पादों और समाधानों के साथ यह संस्थान एक दिन IITs और IIMs की तरह हर घर में पहचाना जाने वाला नाम बन जाएगा.
विजय हंसते हुए बोले, “समस्या यह है कि कोई यह नहीं सोचता कि जो कार मैं चला रहा हूं, जिन बैटरियों का इस्तेमाल मेरे सोलर पैनल कर रहे हैं, वे आखिर आई कहां से हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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