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Saturday, 9 May, 2026
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धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई सिर्फ मुसलमान क्यों लड़ें? बंगाल में TMC की हार हमारी जिम्मेदारी नहीं

जो पार्टी खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती है, उसे मुस्लिम वोटों पर हक जैसा एहसास क्यों होने लगता है? और हिंदू वोटरों के लिए वही भावना क्यों नहीं दिखती?

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पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजे देखने के बाद सोशल मीडिया पर लोकतंत्र को लेकर कई सवाल उठे, खासकर SIR विवाद को लेकर.

मैंने भी ऑनलाइन अपना एक सवाल पूछा: क्या अब यह कहा जा सकता है कि भारत हिंदुत्व के दौर में प्रवेश कर चुका है?

और उम्मीद के मुताबिक, जवाब अलग-अलग तरह के मिले. कुछ लोगों ने गर्व के साथ कहा कि अब भारतीय राजनीति में हिंदुत्व सबसे बड़ी ताकत बन चुका है. वहीं कुछ लोग थोड़ा बचाव की मुद्रा में दिखे—जैसे वे राजनीतिक तौर पर बीजेपी का समर्थन करते हों, लेकिन खुद को सीधे तौर पर हिंदुत्व की सोच से जोड़ना नहीं चाहते हों, या कम से कम उस मतलब से नहीं, जो वे इस शब्द का समझते हैं.

लेकिन SIR, हिंदुत्व, सत्ता विरोधी माहौल, राष्ट्रवाद और विकास जैसी बहसों के बीच जिस बात ने मेरा ध्यान सबसे ज्यादा खींचा, वह थी “मुस्लिम वोट बैंक” को लेकर चर्चा.

महुआ मोइत्रा ने एक्स पर एक पोस्ट में, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया, कहा कि मुस्लिम बहुल इलाकों ने कुछ ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों को जीत नहीं दिलाई और सच कहूं तो मैं समझ सकता हूं कि ऐसी भावना क्यों आती है. यह राजनीतिक धोखे जैसा एहसास दिखाता है.

लेकिन इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया. धोखा क्यों? जो पार्टी खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती है, उसे मुस्लिम वोटों पर अधिकार जैसा एहसास क्यों होने लगता है? और जो हिंदू वोटर टीएमसी को वोट नहीं देते, उनके लिए वही भावना क्यों नहीं दिखाई देती?

अपने एक पुराने लेख में मैंने अपने परिवार के वोटिंग पैटर्न के बारे में लिखा था—असल में कोई एक पैटर्न था ही नहीं. मुसलमानों की कोई एक राजनीतिक सोच नहीं होती, न ही कोई एकजुट निर्देश. और सच कहें तो भारत जैसे देश में ऐसा होना संभव भी नहीं है.

लंबे समय तक मुझे लगता था कि मुसलमानों के एकजुट होकर वोट देने वाली बात को दक्षिणपंथ के कुछ लोग अज्ञानता या दुश्मनी की वजह से आगे बढ़ाते हैं, लेकिन अब लगता है कि दूसरी तरफ की सोच भी बहुत अलग नहीं है.

अब भी एक अंदरूनी सोच बनी हुई है कि मुसलमानों को उन पार्टियों को वोट देना चाहिए, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष कहती हैं. ऐसा इसलिए नहीं कि हर मुसलमान सच में उन मूल्यों पर विश्वास करता है, बल्कि इसलिए क्योंकि माना जाता है कि ये वोट उसी तरफ जाने चाहिए, चाहे उसी जगह पर दूसरे उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे हों.

यह भारत में धर्मनिरपेक्षता को समझने के तरीके के बारे में भी बहुत कुछ बताता है. आम तौर पर यह माना जाता है कि धर्मनिरपेक्षता सिर्फ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए होती है. लेकिन सच्चाई इतनी आसान नहीं है.

धर्मनिरपेक्षता बहुसंख्यकों के लिए भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि यह व्यक्तिगत आजादी की रक्षा करती है, समाज को हर पहचान को राजनीतिक हथियार बनाने से रोकती है, और लोगों को बिना डर के अलग-अलग तरीके से जीने की जगह देती है.

तो फिर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने की जिम्मेदारी सिर्फ अल्पसंख्यकों पर ही क्यों हो? आखिर में लोकतंत्र उसी दिशा में चलता है, जिस दिशा में बहुसंख्यक जाना चाहते हैं.

डर की राजनीति

एक और बात जो मेरे मन में आई, वह यह थी कि एक पसमांदा मुस्लिम के तौर पर मेरा बचपन किस हद तक राजनीति से जुड़े डर में बीता. बड़े होते हुए मैं लगातार यह सुनती रही कि हमें कुछ खास पार्टियों को ही वोट देना है, नहीं तो कुछ बहुत बुरा हो जाएगा. हमारे पास कोई असली विकल्प नहीं था. अगर हमें सुरक्षित रहना है और अपनी पहचान की वजह से निशाना बनने से बचना है, तो हमें उन्हीं पार्टियों का समर्थन करना होगा.

और इस राजनीति ने धीरे-धीरे समुदाय के साथ क्या किया? इसने लोगों के अंदर इतना डर और निराशा भर दी कि कई मुसलमानों ने संस्थाओं, राजनीति और यहां तक कि समाज पर भी गहरा अविश्वास करना शुरू कर दिया. हमारी राजनीतिक सोच सिर्फ किसी तरह बचे रहने तक सीमित हो गई.

हर चुनाव किसी बड़े राक्षस के खिलाफ लड़ाई जैसा बना दिया जाता था. किसी भी तरह के बदलाव या सुधार को तुरंत समुदाय पर हमला बताया जाता था. समुदाय के अंदर अलग राय रखने वालों के लिए कोई जगह नहीं थी. जवाबदेही जैसा कोई विचार ही नहीं था. हमें कहा जाता था कि जिन नेताओं को हम वोट देते हैं, उनसे ज्यादा सवाल मत पूछो, क्योंकि वे हमें “सुरक्षा” दे रहे हैं.

लेकिन अब क्या?

जिस राजनीतिक ताकत से हमें डरने के लिए कहा गया था, वही अब देश के कई हिस्सों में सत्ता में है. तो अब समुदाय आगे क्या करे? क्या अब हम अलग तरह के सवाल पूछना शुरू करेंगे, जैसे संवैधानिक ढांचे के अंदर रहकर समुदाय को कैसे मजबूत किया जाए, शिक्षा और अवसरों को कैसे बेहतर बनाया जाए, हमेशा डर में रहने के बजाय आत्मविश्वास कैसे बनाया जाए? डर से आगे बढ़कर वोट देना कैसे सीखा जाए?

अब धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा है कि असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता चाहते हैं कि डर की राजनीति चलती रहे. उनके हाल के बयान यह संकेत देते हैं कि मुसलमानों को दूसरी पार्टियों की ओर देखने के बजाय अपने समुदाय के नेताओं के पीछे एकजुट होना चाहिए.

और जाहिर है, बड़े मुस्लिम नेताओं के लिए ऐसी राजनीति काफी सुविधाजनक हो सकती है. अगर सिर्फ पहचान ही सबसे बड़ी योग्यता बन जाए, तो जवाबदेही धीरे-धीरे बातचीत से गायब हो जाती है. हैदराबाद को ही देख लीजिए. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के दशकों लंबे नेतृत्व के बावजूद, वहां बड़ी संख्या में मुसलमान अब भी कथित तौर पर गरीबी रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं.

भविष्य के लिए एक सोच

शायद यह वह समय है जब समुदाय को रुककर अपनी राजनीतिक सोच पर दोबारा विचार करना चाहिए. सिर्फ डर हमेशा के लिए आधार नहीं बन सकता.

मुसलमानों को भी, बाकी हर समुदाय की तरह, ऐसी राजनीति चाहिए जो सिर्फ प्रतीकात्मक सुरक्षा और भावनात्मक भाषणों से आगे जाए. शिक्षा, आर्थिक तरक्की, संस्थाओं में भागीदारी, संवैधानिक ढांचे के भीतर प्रतिनिधित्व, अंदरूनी सुधार और जवाबदेही जैसे सवाल हमेशा दूसरे नंबर पर नहीं रखे जा सकते.

शायद सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि हम खुद को हमेशा घिरे हुए समुदाय के रूप में देखना बंद करें, और खुद को ऐसे नागरिकों के रूप में देखना शुरू करें जिनके पास अपनी सोच, जिम्मेदारी और डर से आगे बढ़कर अपना भविष्य तय करने की क्षमता है. आखिरकार, मुसलमानों को भी भविष्य के लिए एक साफ सोच और दिशा की जरूरत है.

हमें एक राजनीतिक सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा. सत्ता में कोई भी हो, समुदाय को संस्थाओं के साथ काम करना सीखना होगा, संवैधानिक अधिकारों को समझना होगा और उनके लिए खड़ा होना होगा, सिर्फ डर और राजनीतिक निर्भरता में जीने के बजाय.

साथ ही बीजेपी को भी यह समझना होगा कि भारत जैसे देश को पूरे समुदायों को राजनीतिक रूप से अलग करके नहीं चलाया जा सकता. बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी जैसे बयान—कि वह सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करेंगे क्योंकि सिर्फ हिंदुओं ने उन्हें वोट दिया—शायद उस समय राजनीतिक रूप से फायदेमंद लगें, लेकिन ऐसी भाषा आखिरकार साझा राष्ट्र की भावना को कमजोर करती है.

इस तरह चुनाव जीते जा सकते हैं. लेकिन देश इस तरह नहीं बनाए जाते.

आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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