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Thursday, 7 May, 2026
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क्या SIR से BJP को फायदा हुआ? पश्चिम बंगाल के कांटे के चुनाव पर आंकड़े क्या बताते हैं

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की गैर-NDA दलों ने आलोचना की है. उनका कहना है कि इसी वजह से राज्य में TMC की हार और BJP की जीत हुई.

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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की उन 293 सीटों में जहां वोटिंग हुई, उनमें से 87 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जीत का अंतर, SIR के बाद हटाए गए वोटरों की संख्या से काफी ज्यादा था. दिप्रिंट के विश्लेषण में यह सामने आया. इन 87 सीटों पर बीजेपी की जीत का अंतर, SIR के बाद हटाए गए वोटरों की संख्या से 2,000 से लेकर 50,000 तक ज्यादा था.

विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कुछ सीटों पर SIR की वजह से बीजेपी को कम अंतर से जीत मिल सकती है, जबकि कई सीटों पर उसकी बढ़त इतनी ज्यादा थी कि वोटरों को हटाया नहीं जाता तब भी नतीजे शायद नहीं बदलते. वहीं तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के मामले में देखा गया कि 2021 के मुकाबले जीत के अंतर में बहुत मामूली सुधार हुआ, हालांकि कुछ सीटों पर स्थिति अलग रही.

इस विश्लेषण के लिए दिप्रिंट ने 2026 और 2021 विधानसभा चुनाव के नतीजों का अध्ययन किया. साथ ही उन 27 लाख वोटरों का सीटवार डेटा भी देखा गया जिन्हें वोट डालने की अनुमति नहीं मिली, क्योंकि SIR के फैसले को चुनौती देने वाली उनकी अपीलें अभी लंबित थीं.

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की नॉन-एनडीए पार्टियों ने आलोचना की है. उनका आरोप है कि इसी वजह से राज्य में बीजेपी ने टीएमसी को हराया. ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी लागू करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सरकार का कहना था कि यह नई श्रेणी किसी दूसरे राज्य में लागू नहीं की गई.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, वे 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने अपील कर सकते हैं. अगर ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिल जाती, तो उनके नाम वोटर लिस्ट में शामिल किए जाते, लेकिन इस चुनाव में उन्हें वोट डालने की अनुमति नहीं दी गई.

कुल मिलाकर, चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में लगभग 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए. इनमें 58 लाख ऐसे वोटर थे जो या तो मर चुके थे या राज्य से बाहर जा चुके थे. इसके अलावा 27 लाख नाम जांच प्रक्रिया के दौरान हटाए गए.

“लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी के तहत कुल 60.06 लाख नाम जांच के लिए चिन्हित किए गए थे.

कुल मिलाकर, दो चरणों में हुई वोटिंग वाली 293 सीटों में बीजेपी ने 207 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में उसके पास सिर्फ 77 सीटें थीं. वहीं टीएमसी की सीटें 2021 की 215 से घटकर इस बार 80 रह गईं. कांग्रेस और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी को दो-दो सीटें मिलीं, जबकि सीपीआई(एम) और ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट (AISF) को एक-एक सीट मिली. लेकिन सवाल यही है कि क्या SIR ने पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों को प्रभावित किया? दिप्रिंट के विश्लेषण में कुछ और दिलचस्प रुझान भी सामने आए.

BJP की जीत का अंतर > हटाए गए वोटर

हालांकि, बीजेपी ने टीएमसी से दो दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी छीनीं जहां जीत का अंतर हटाए गए वोटरों की संख्या से कम था, लेकिन विश्लेषण में कई ऐसी सीटें भी सामने आईं जहां बीजेपी की बढ़त इतनी ज्यादा थी कि वोटरों के नाम नहीं हटाए जाते तब भी नतीजा शायद नहीं बदलता.

उदाहरण के तौर पर, चुनचुरा विधानसभा सीट पर 11,828 लोगों को वोट देने के लिए अयोग्य पाया गया, जबकि इस बार बीजेपी की जीत का अंतर 43,435 वोट था. 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने यह सीट 18,417 वोटों के अंतर से जीती थी.

यह कहना मुश्किल है कि अगर इन अयोग्य घोषित वोटरों के नाम नहीं हटाए जाते तो वे किस पार्टी को वोट देते, लेकिन अगर यह मान भी लिया जाए कि सभी वोट टीएमसी को जाते, तब भी बीजेपी की जीत का अंतर काफी बड़ा रहता.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

एक और उदाहरण बालागढ़ सीट का है, जहां 7,352 नाम जांच पूरी होने तक हटाए गए थे. इस बार बीजेपी ने यह सीट 41,914 वोटों के अंतर से जीती. 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने यह सीट 5,784 वोटों से जीती थी.

इसी तरह, रानीबांध विधानसभा सीट पर 522 नाम हटाए गए थे. यहां इस बार बीजेपी की जीत का अंतर 52,269 वोट रहा. 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने यह सीट 3,939 वोटों के अंतर से जीती थी.

TMC: कहीं बढ़त बढ़ी, कहीं घटी और कहीं काफी कम हो गई

दिप्रिंट के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि पूरे पश्चिम बंगाल में टीएमसी इस बार जिन 293 सीटों पर चुनाव लड़ी, उनमें से सिर्फ 14 सीटों पर ही अपना प्रदर्शन बेहतर कर पाई. इनमें भी ज्यादातर सीटों पर सुधार बहुत मामूली था.

उदाहरण के तौर पर, बजबज सीट पर टीएमसी ने अपनी जीत का अंतर 2021 के 44,714 वोटों से बढ़ाकर इस बार 46,850 कर लिया.

इसी तरह, चोपड़ा सीट पर उसकी जीत का अंतर 2021 के 64,905 से बढ़कर 69,124 हो गया. इस सीट पर जांच प्रक्रिया के दौरान करीब 28,000 नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे.

हालांकि, कुछ अपवाद भी रहे. उदाहरण के लिए, केशपुर सीट पर टीएमसी ने अपनी जीत का अंतर 2021 के 20,720 से बढ़ाकर 50,105 कर लिया, यानी लगभग दोगुना. यहां वोटर लिस्ट से 804 नाम हटाए गए थे.

इसी तरह, कैनिंग पूर्वा सीट पर TMC ने अपनी जीत का अंतर 2021 के 53,007 से बढ़ाकर 91,954 कर लिया. यहां वोटर लिस्ट से 11,000 से थोड़ा ज्यादा नाम हटाए गए थे.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

विश्लेषण एक बड़े बदलाव की तरफ भी इशारा करता है. मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर बंगाल की कई विधानसभा सीटों पर—जिन्हें लंबे समय से टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता था—पार्टी किसी तरह सीट बचाने में तो सफल रही, लेकिन उसकी पहले जैसी बड़ी जीत का अंतर अब काफी कम हो गया है.

सीताई सीट पर, जहां जांच के दौरान 20,000 नाम हटाए गए थे, टीएमसी की जीत का अंतर 10,000 से ज्यादा से घटकर 3,000 से भी कम रह गया.

वहीं समसेरगंज सीट पर, जहां 75,000 वोटरों के नाम हटाए जाने पर सवाल उठे थे क्योंकि मुस्लिम बहुल बूथों में हटाए गए नामों की संख्या बहुत ज्यादा थी, वहां TMC की जीत का अंतर 26,000 से ज्यादा से घटकर 8,000 से भी कम रह गया.

सत्ता विरोधी लहर दोनों तरफ असर डालती दिखी

जहां तक बीजेपी का सवाल है, दिप्रिंट के विश्लेषण में सामने आया कि 2021 में जीती गई कई सीटों पर पार्टी ने इस बार अपना प्रदर्शन और बेहतर किया. उदाहरण के तौर पर, सालतोरा विधानसभा सीट पर बीजेपी ने अपनी जीत का अंतर 2021 के 4,145 वोटों से बढ़ाकर इस बार 32,135 कर लिया. यहां 449 नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे.

इसी तरह, छातना सीट पर बीजेपी ने अपनी जीत का अंतर 2021 के 7,164 से बढ़ाकर 47,174 कर लिया. यहां वोटर लिस्ट से 248 नाम हटाए गए थे.

और बांकुड़ा सीट पर बीजेपी ने अपनी जीत का अंतर 2021 के 1,468 से बढ़ाकर 54,177 कर लिया. यहां जांच प्रक्रिया के दौरान 467 नाम हटाए गए थे.

हालांकि, बड़े बदलाव के बावजूद इस चुनाव में हर जगह BJP के समर्थन में एक जैसी बढ़ोतरी नहीं दिखी. इसके उलट, कुछ ऐसी सीटों पर बीजेपी के खिलाफ झुकाव भी देखने को मिला जिन्हें उसने 2021 में जीता था और 2026 में भी बचा लिया. दार्जिलिंग इसका एक उदाहरण है. बीजेपी ने सीट तो बचा ली, लेकिन उसकी जीत का अंतर 2021 के 21,276 से घटकर 6,057 रह गया.

कुछ ऐसा ही पैटर्न बहरामपुर और तुफानगंज सीटों पर भी देखने को मिला.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

हालांकि, ये गिरावट ज्यादा बड़ी नहीं थी और दूसरे इलाकों में बीजेपी की लहर के सामने इसका खास असर नहीं पड़ा, लेकिन इससे यह ज़रूर साफ होता है कि स्थानीय नाराज़गी और सत्ता विरोधी माहौल किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं रहता. इसका असर विधानसभा सीट स्तर पर भी दिखता है और पूरे राज्य स्तर पर भी.

SIR और बीजेपी की कम अंतर वाली जीत

दिप्रिंट के विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कई सीटों पर SIR जांच प्रक्रिया बीजेपी की कम अंतर वाली जीत में मददगार हो सकती है. उदाहरण के तौर पर, 2021 में बीजेपी कुशमंडी सीट 12,584 वोटों से हारी थी. इस बार उसने यह सीट 9,063 वोटों के अंतर से जीत ली. इस सीट पर जांच के बाद कुल 13,500 लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे.

इसी तरह, 2021 में बीजेपी करंदीघी सीट 36,626 वोटों से हारी थी. इस बार उसने यह सीट 19,869 वोटों के अंतर से जीत ली. यहां 31,562 वोटरों के नाम हटाए गए थे.

हालांकि, आंकड़े यह साबित नहीं करते कि सिर्फ वोटरों के नाम हटाने की वजह से ही ये नतीजे बदले, लेकिन कई करीबी मुकाबलों में हटाए गए वोटरों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि इससे बीजेपी के पक्ष में नतीजा प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

सहज शंकरण ThePrint School of Journalism के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल दिप्रिंट में इंटर्नशिप कर रहे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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