अगर भारत को अपनी बड़ी आर्थिक, सामाजिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना है, तो मुस्लिम राजनीति को बदलना होगा. 1947 के बाद से “धर्मनिरपेक्ष” पार्टियों का तरीका—मुसलमानों को खुश करने के लिए प्रतीकात्मक रियायतें देना और फिर अलग-अलग तरीकों से हिंदू वोट बांटना—अब पुराना हो चुका है. मुसलमान और हिंदू दोनों इस रणनीति को समझ चुके हैं. मुसलमान अब “धर्मनिरपेक्ष” दलील पर पहले जैसा भरोसा नहीं कर रहे. हालांकि, अभी इतनी बड़ी संख्या में नहीं कि फर्क दिखे. वे अभी भी एक साथ वोट देकर “सांप्रदायिक” बीजेपी को रोकने की कोशिश करते हैं. वहीं हिंदू भी जाति और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के नकारात्मक असर को समझने लगे हैं और कई बार रणनीतिक तरीके से वोट दे रहे हैं—जैसे हाल के पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनावों में हुआ.
पश्चिम बंगाल में, ममता बनर्जी के पक्ष में बड़े स्तर पर मुस्लिम ध्रुवीकरण नहीं हुआ, जैसा उम्मीद की जा रही थी. द टाइम्स ऑफ इंडिया (5 मई 2026) के एक विश्लेषण के अनुसार, 142 सीटों में जहां मुस्लिम आबादी राज्य के औसत से ज्यादा थी, वहां बीजेपी ने 72 सीटें जीतीं और तृणमूल कांग्रेस ने 64 सीटें जीतीं. अगर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और तृणमूल से अलग हुए हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी का गठबंधन बना रहता और लेफ्ट या कांग्रेस के साथ सीट समझौता होता, तो ममता का प्रदर्शन शायद और खराब होता.
असम में, नई सीमांकन प्रक्रिया के कारण मुस्लिम बहुल सीटें 35 से घटकर 22 रह गईं (कुल 126 में से). यहां कांग्रेस और मुस्लिम नेतृत्व वाली एयूडीएफ को 20 सीटें मिलीं. सिर्फ केरल में मुस्लिम वोट ने बड़ा असर दिखाया, जहां यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 44 में से 38 सीटें जीतीं, जहां मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा थी और मध्य व दक्षिण केरल की 11 में से 9 सीटें जीतीं, लेकिन केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, जो 1947 से पहले विभाजन के पक्ष में थी और बाद में बदली, कांग्रेस के साथ अपनी शर्तों पर जुड़ी है. यानी वहां कोई पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष गठबंधन नहीं है, बल्कि मुस्लिम, ईसाई और हिंदू समूहों का मिला-जुला गठबंधन है. वहां भाषा एक मुख्य जोड़ने वाला तत्व है.
तमिलनाडु में, खुलकर अल्पसंख्यक पक्ष में और हिंदू विरोधी छवि वाली डीएमके को विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. वहीं तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके), जिसका नेतृत्व एक ईसाई कर रहे हैं, को काफी हिंदू वोट मिले—हालांकि, धार्मिक कारणों से नहीं. अभिनेता जोसेफ विजय, जिन्होंने दो साल पहले ही पार्टी बनाई, उन्होंने डीएमके की विभाजनकारी राजनीति से दूरी बनाई और सभी धर्मों से समान दूरी रखने की कोशिश की. इससे लगता है कि अब तमिलनाडु में वोट किसे मिलेगा, यह दिखावटी राजनीति से तय होगा, न कि कौन सी पार्टी किस समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है.
अन्य चुनावों में, एआईएमआईएम जैसी पार्टियों ने महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में समाजवादी पार्टी जैसी “धर्मनिरपेक्ष” पार्टियों को हराया है, और बिहार में भी ऐसा देखा गया है.
“धर्मनिरपेक्ष” पार्टियों द्वारा मुस्लिम वोट बैंक का लगातार इस्तेमाल अब धीरे-धीरे कम हो रहा है.
यह संदेश सभी पार्टियों के लिए है, बीजेपी के लिए भी. मुसलमान खुद गैर-धार्मिक राजनीति को कितना अपनाते हैं, यह तय करेगा कि देश में मोहम्मद अली जिन्ना जैसी अलगाववादी राजनीति बढ़ेगी या ऐसी राजनीति होगी जिसमें अलग-अलग समुदाय अपनी पहचान को पीछे रखकर बातचीत और समझौते से साथ काम करेंगे.
सच यह है कि हुमायूं कबीर जैसे नेता भी मुस्लिम वोट पाने के लिए पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने की बात करते हैं और ओवैसी अभी तक अयोध्या के राम मंदिर की वास्तविकता को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए हैं. उन्होंने यह भी नहीं माना कि कुछ जगहों पर हिंदुओं की भावनाओं को शांत करने के लिए काम बाकी है, जहां पहले मंदिर तोड़े गए थे.
भारत तब कम विभाजित होगा, जब कोई मुसलमान हिंदू बहुल सीट से चुनाव जीत सके और कोई हिंदू मुस्लिम बहुल सीट से. अभी हम उस स्थिति से दूर हैं, क्योंकि नेता नागरिक नहीं, वोट बैंक चाहते हैं.
मुसलमानों को यह भी सोचना चाहिए कि उनके बीच सुधार की बात करने वाले लोग, जैसे आरिफ मोहम्मद खान, क्यों बीजेपी में जाकर ही जगह पाते हैं और कभी-कभी उन्हें समुदाय के खिलाफ माना जाता है. उन्हें हामिद दलवाई जैसे नेताओं की सोच अपनानी चाहिए, जिन्होंने मुस्लिम समाज में सुधार की बात की, लेकिन उन्हें कभी व्यापक समर्थन नहीं मिला. आज भी वे मुस्लिम समाज के लिए बड़े नेता नहीं माने जाते, और “धर्मनिरपेक्ष” लोग भी उन्हें पसंद नहीं करते. किसी “धर्मनिरपेक्ष” पार्टी ने मुसलमानों से सुधार अपनाने को नहीं कहा. उल्टा वे वक्फ, तलाक सुधार या समान नागरिक संहिता का विरोध करती हैं, यह सोचकर कि मुसलमान यही चाहते हैं. इन पार्टियों का लक्ष्य मुसलमानों को अलग और डरा हुआ रखना है.
अब समय है कि मुसलमान खुद को सिर्फ मुसलमान के रूप में देखना बंद करें और हर बात में खुद को हिंदुओं से अलग न करें—चाहे वह योग अपनाना हो, वंदे मातरम गाना हो, या कुछ हिंदू परंपराओं को बनाए रखना हो (जिन्हें तबलीगी जमात जैसे संगठन खत्म करना चाहते हैं).
उन्हें बाकी नागरिकों से रिश्ते मजबूत करने चाहिए. उनकी कौम पूरी दुनिया नहीं, बल्कि भारत के लोग हैं. जैसे बीजेपी जैसी हिंदू पार्टियों को मुसलमानों की धर्मनिरपेक्ष मांगों को समझना चाहिए, वैसे ही मुस्लिम नेताओं को भी हिंदुओं के मुद्दों को समझना चाहिए—जैसे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना और काशी व मथुरा जैसे विवादित स्थलों पर बातचीत से समाधान निकालना.
कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की, और हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने मुस्लिम नेताओं से बातचीत की. ऑपरेशन सिंदूर के बाद असदुद्दीन ओवैसी भी उन टीमों का हिस्सा थे, जिन्हें विदेशों में भारत का पक्ष रखने के लिए भेजा गया.
लेकिन ये कोशिशें बहुत कम और बिखरी हुई हैं, जो हिंदू-मुस्लिम भरोसे की कमी को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. इन्हें बढ़ाने की ज़रूरत है.
और यह बार-बार कहना जरूरी है: अब समय है कि मुसलमान खुद आगे बढ़कर हिंदुओं और हिंदू संगठनों से बातचीत करें. ताली दो हाथ से बजती है.
आर. जगन्नाथन, स्वराज्य मैगज़ीन के पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. वह @TheJaggi हैंडल से ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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