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Thursday, 7 May, 2026
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कीवी बना किसानों की पहली पसंद, हिमाचल में तेज़ी से क्यों बढ़ रही है खेती

हिमाचल प्रदेश में किसान सेब के बागों की जगह कीवी उगा रहे हैं—जलवायु दबाव, बढ़ती मांग और ज्यादा कमाई इसकी वजह है.

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सोलन, हिमाचल प्रदेश: बारिश के कुछ दिन बाद, ठंडी हवा चल रही है और सूरज हिमालय के पीछे धीरे-धीरे छिप रहा है. 45 साल के मंदीप वर्मा सोलन में “स्वास्तिक फार्म्स” में अपनी शाम की सैर पर निकलते हैं. यह उनकी 10 साल से रोज़ की आदत है. वह लोहे की जाली जैसी संरचना देखते हैं, बेलों को हाथ से छूते हैं और फलों की जांच करते हैं.

एक दशक पहले, वर्मा गुरुग्राम में विप्रो में मैनेजर थे. आज, वह हिमाचल प्रदेश के सबसे सफल कीवी किसानों में से एक हैं.

उन्होंने कहा, “मेरे शरीर में विटामिन डी बहुत कम हो गया था. मुझे पता था कि मुझे घर वापस आना होगा.”

वर्मा 35 साल के थे जब उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ी. अपने घर से कुछ मीटर नीचे की ढलान पर उन्होंने 25 बीघा ज़मीन को कीवी के लिए साफ करना शुरू किया. उन्होंने 2015 में 150 पौधों से शुरुआत की और करीब 15 लाख रुपये का निवेश किया. पांच साल में उन्होंने यह पैसा वापस कमा लिया. अब उनके पास 1000 से ज्यादा पौधे हैं और उन्होंने 5 बीघा ज़मीन पर पुराने सेब के पेड़ों को हटाकर कीवी लगा दी है.
पिछले साल उन्होंने करीब 30 लाख रुपये कमाए.

वर्मा अकेले नहीं हैं. हिमाचल प्रदेश के मिड-हिल इलाकों में अब कई किसान सेब की जगह कीवी उगा रहे हैं. सॉफ्टवेयर इंजीनियर और बैंक मैनेजर भी इस खेती की ओर आ रहे हैं, क्योंकि इसमें ज्यादा मुनाफा और कम खर्च है.

आज राज्य में करीब 300 कीवी किसान हैं, जबकि 1990 में सिर्फ 3-4 किसान थे. प्रोडक्शन भी तेज़ी से बढ़ा है—2020 में 496 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025 में 965 मीट्रिक टन हो गया है.

हिमाचल की पहाड़ियों में जाल से ढके बाग बदलते मौसम के हिसाब से खुद को ढाल रहे हैं.

हिमाचल के बीच के पहाड़ों में बागों में फैली सुरक्षा जालियां, जहां मौसम का दबाव पारंपरिक फलों की खेती को बदल रहा है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
हिमाचल के बीच के पहाड़ों में बागों में फैली सुरक्षा जालियां, जहां मौसम का दबाव पारंपरिक फलों की खेती को बदल रहा है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

इस बढ़ोतरी की एक बड़ी वजह बदलता मौसम भी है, जो पहले उगाई जाने वाली फसलों—जैसे आड़ू, खुबानी और कुछ जगहों पर सेब, के लिए मुश्किल बनता जा रहा है. रिसर्चगेट पर प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, राजगढ़ जिले में आड़ू की खेती करने वाले किसान हर साल 20 से 30 पेड़ खो रहे हैं, क्योंकि मौसम बदल रहा है.

कीवी को सर्दियों की ठंड चाहिए, लेकिन यह सेब के मुकाबले हल्के मौसम को ज्यादा सहन कर सकती है. इसलिए यह एक अच्छा विकल्प बनकर सामने आई है.

डॉ. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, सोलन में शोध (बागवानी) के संयुक्त निदेशक सतीश कुमार शर्मा ने कहा, “कीवी हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक बन रही है, खासकर निचले हिमालयी इलाकों में. यह पारंपरिक फलों का विकल्प बन सकती है. इसकी शुरुआत 2017 में सरकारी योजनाओं से हुई और 2022 में इसकी मांग बढ़ने के बाद इसमें बड़ा उछाल आया.”

कीवी की खेती का हिसाब-किताब

हिमाचल प्रदेश के कई किसानों के लिए सेब से कीवी की ओर जाना पूरी तरह से फायदे का सौदा है.

सेब की खेती में हर साल प्रति पौधा लगभग 500 रुपये का खर्च आता है, जबकि कीवी में यह करीब 100 रुपये होता है. कीवी में शुरुआत में खर्च ज्यादा होता है—जैसे ढांचा, तार वाली जाली (ट्रेलिस सिस्टम), लोहे के सपोर्ट, लेकिन बाद में इसकी देखभाल का खर्च सेब के मुकाबले काफी कम होता है. वर्मा ज्यादातर प्राकृतिक तरीके से खेती करते हैं, जिससे उनका खर्च और कम हो जाता है.

उन्होंने कहा, “हमने पांचवें या छठे साल में लागत निकाल ली थी क्योंकि हम ज्यादातर प्राकृतिक खेती करते हैं, इसलिए खर्च बहुत कम है. अगर मैं 100 रुपये कमाता हूं, तो करीब 98 रुपये मेरे पास ही रहते हैं. केमिकल खेती में बड़ा हिस्सा खाद और कीटनाशक खरीदने में चला जाता है.”

हिमाचल में किसान पारंपरिक फसलों की तुलना में कम लागत और बेहतर रिटर्न की वजह से कीवी की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
हिमाचल में किसान पारंपरिक फसलों की तुलना में कम लागत और बेहतर रिटर्न की वजह से कीवी की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

कीवी को पकने से पहले ही तोड़ा जाता है, जिससे किसानों को उसे पैक करने और खराब होने से पहले बाज़ार तक पहुंचाने का समय मिल जाता है. वर्मा अपना फल दिल्ली भेजते हैं, जो दो दिन में पहुंच जाता है. उनका ज्यादातर माल थोक में व्यापारियों को जाता है, सीधे बिक्री कम होती है.

उन्होंने कहा, “कीवी में निवेश और धैर्य दोनों चाहिए. एक बार शुरुआती समय निकल जाए, तो कमाई अच्छी होती है.”

हालांकि, आमदनी तय नहीं होती. कीवी पर कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं है, इसलिए कीमत मार्केट के हिसाब से बदलती रहती है. पिछले तीन साल में कीमत 250 से 350 रुपये प्रति किलो के बीच रही है.

वर्मा ने कहा, “एक साल हमने करीब 350 रुपये प्रति किलो के हिसाब से 10 टन कीवी बेची—यानी लगभग 35 लाख रुपये की कमाई हुई. अगले साल आयात बढ़ने से कीमत 250 रुपये प्रति किलो रह गई, जबकि उत्पादन 12 टन हो गया. इसलिए आमदनी बाजार पर निर्भर करती है.”

उन्होंने कहा, “खर्च और मेहनत को देखते हुए हमने धीरे-धीरे खेती बढ़ाई, एक साथ नहीं.”

‘मुझे पागल कहा गया था’

58 साल के छेरिंग पालजंग नेगी ने 2006 में कीवी की खेती शुरू की, जब राज्य में इस फल को ज्यादा लोग नहीं जानते थे. उनके घर के पीछे की ज़मीन, जहां उनके पिता 20 साल से सेब उगा रहे थे, धीरे-धीरे कीवी के लिए इस्तेमाल होने लगी. उन्होंने प्रति पौधा 1500 रुपये का निवेश किया. उनके पड़ोसी और उनके पिता को लगा कि वह पागल हो गए हैं.

नेगी ने कहा, “मेरे पिता और पड़ोसी मुझे पागल कहते थे. लेकिन मुझे पता था कि कीवी में बहुत संभावनाएं हैं. यह हमेशा मांग में रहने वाला फल है.”

उनका यह फैसला बाद में सही साबित हुआ. 2020 तक वह कीवी से 4 लाख रुपये कमा रहे थे और 2025 तक यह बढ़कर 11 लाख रुपये हो गया.

उन्होंने कहा, “यूनिवर्सिटी में कीवी पर कई सालों से काम हो रहा था और ट्रेनिंग भी मिलती थी, लेकिन किसान शुरू में ज्यादा खर्च होने की वजह से हिचकिचाते थे—ढांचा, तार और सपोर्ट सिस्टम इसे महंगा बना देते थे.”

नेगी, जो पर्सिमन (एक और फल) भी उगाते हैं, अब देख रहे हैं कि कीवी की लोकप्रियता हिमाचल से बाहर भी फैल रही है.

उन्होंने कहा, “उत्तराखंड और कश्मीर के किसान भी नर्सरी से पौधे ले रहे हैं.”

सोलन में एक किसान अपने कीवी के बाग का निरीक्षण कर रहा है, यह उन शुरुआती लोगों की वजह से हो रहा बदलाव है जो सेब से दूर हो गए हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
सोलन में एक किसान अपने कीवी के बाग का निरीक्षण कर रहा है, यह उन शुरुआती लोगों की वजह से हो रहा बदलाव है जो सेब से दूर हो गए हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

राज्य में नर्सरी के कारोबार में भी इसका असर साफ दिख रहा है. 2024 में सोलन के पुराने कीवी किसान प्रकाश राणा ने अपनी निजी नर्सरी से करीब 5 लाख पौधे बेचे, जबकि वर्मा ने 12,000 पौधे बेचे.

वर्मा ने कहा, “पिछले साल मैंने दो बैंक मैनेजर को पौधे बेचे, जिन्होंने नौकरी छोड़कर अपने गांव में कीवी की खेती शुरू की.”

पौधों की बढ़ती मांग से साफ है कि कीवी की खेती में दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है. राणा के मुताबिक, हिमाचल की सरकारी और निजी दोनों नर्सरी में पौधों की कमी पड़ रही है. पहले जहां एक सीजन में 10,000 पौधे तैयार होते थे और 3,000 बिकते थे, अब 10 लाख पौधे भी मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं.

तीन दशक, एक शोधकर्ता

हिमाचल प्रदेश में कीवी की कहानी किसी किसान से नहीं, बल्कि एक शोधकर्ता से शुरू होती है.

भारत में कीवी की शुरुआत शुरुआती प्रयोगों से हुई—बेंगलुरु के लालबाग बॉटनिकल गार्डन में और शिमला के फागली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थान में, लेकिन इन दोनों जगहों पर व्यावसायिक तौर पर सफल नतीजे नहीं मिले, क्योंकि वहां का मौसम सही नहीं था. असली सफलता हिमाचल के अलग-अलग इलाकों—कुल्लू, सोलन और अन्य जगहों में किए गए परीक्षणों से मिली, जहां यह साबित हुआ कि कीवी 900 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर ठंडे मौसम में अच्छी तरह उगती है. पहला व्यावसायिक बाग डॉ. यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री में लगाया गया.

1992 में, जब प्रकाश राणा ने पहली बार चीड़ के पेड़ों और जंगली घास से ढकी जमीन पर चार कीवी बेलें लगाईं, उसी साल विशाल राणा ने इस यूनिवर्सिटी में पीएचडी शुरू की. तब से वह लगातार इस पर काम कर रहे हैं. आज विशाल राणा यूनिवर्सिटी में रिसर्च के जॉइंट डायरेक्टर हैं. स्थानीय किसान उन्हें “भारत का कीवी मैन” कहते हैं. उनके ऑफिस की दीवारों पर कीवी के पोस्टर लगे हैं और कंप्यूटर की स्क्रीन पर भी कीवी की तस्वीर है. उन्होंने 30 पीएचडी छात्रों को गाइड किया है, जिनमें से 15 ने कीवी पर काम किया. वह 25 साल से ज्यादा समय से इस फसल पर काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे कई जगहों से नौकरी के ऑफर मिले—पूर्वोत्तर में भी, जहां सैलरी ज्यादा थी, लेकिन मैंने यहीं रहने का फैसला किया, क्योंकि मुझे इस फल और अपने विषय से प्यार है.”

राणा और उनकी टीम ने कई सालों तक एक बड़ी समस्या पर काम किया—भारतीय और आयातित कीवी के बीच गुणवत्ता का अंतर. भारत में उगाई गई कीवी स्वाद और आकार में आयातित कीवी से पीछे थी. उनकी टीम ने सिरमौर और सोलन के चार किसानों के साथ मिलकर बाग की देखभाल, पेड़ों की छंटाई, तोड़ाई का तरीका, पोषण और पानी का प्रबंधन और परागण पर काम किया. धीरे-धीरे कीवी की गुणवत्ता बेहतर हुई.

करीब पांच साल पहले राणा ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल शुरू किया. अब उनके कीवी खेती से जुड़े वीडियो को औसतन 90,000 व्यू मिलते हैं. वह अभी एक नई किस्म पर काम कर रहे हैं, जो न्यूजीलैंड की प्रीमियम किस्म Zespri Gold को टक्कर दे सके.

उन्होंने कहा, “हमारी कीवी का स्वाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो गया है.”

शेड नेट के नीचे शुरुआती स्टेज के कीवी के पौधे, बागों से फ़ायदा मिलने से पहले ज़रूरी इन्वेस्टमेंट और सब्र को दिखाते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
शेड नेट के नीचे शुरुआती स्टेज के कीवी के पौधे, बागों से फ़ायदा मिलने से पहले ज़रूरी इन्वेस्टमेंट और सब्र को दिखाते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

प्रकाश राणा की कहानी भी इसी शोध के साथ-साथ चलती है. उन्होंने चार पौधों से शुरुआत की और दो साल में 8 बीघा ज़मीन पर 300 पेड़ लगा दिए. वह खुद अपना फल लेकर लुधियाना और दिल्ली बाज़ार जाते थे. आज उनकी जमीन पर करीब 300 कीवी के पौधे हैं, जिनके आसपास शहर का विस्तार और चीड़ के पेड़ दिखाई देते हैं.

उन्होंने कहा, “उस समय मैं कीवी 100-120 रुपये प्रति किलो बेचता था. मैंने उन्हें अच्छे से पैक किया और लुधियाना और दिल्ली में बेचना शुरू किया. मैंने कीवी का बाजार बनाया. यह अमीर लोगों का फल था.”

शुरुआती दिनों में एक कीवी की कीमत एक डॉलर तक थी. पिछले साल राणा ने इससे 20 लाख रुपये कमाए.

सरकारी मदद और बढ़ता बाज़ार

2017 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री कीवी प्रोत्साहन योजना शुरू की, जिसमें किसानों को पौधे, ट्रेलिस सिस्टम और बाग लगाने पर 50 प्रतिशत सब्सिडी दी गई. इस योजना का बजट 2 करोड़ रुपये था. 2024-25 के बीच 39 किसानों को इसका फायदा मिला.

अरुणाचल प्रदेश ने भी इसी तरह की योजना शुरू की. वहां 2022-23 में करीब 4,500 मीट्रिक टन कीवी उत्पादन हुआ, जिसकी कीमत 67.4 करोड़ रुपये रही. आज भारत के कुल कीवी उत्पादन का 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अरुणाचल से आता है और यहां देश की पहली प्रमाणित ऑर्गेनिक और जीआई टैग वाली कीवी भी है.

मांग की बात करें तो शहरों में इसकी खपत तेज़ी से बढ़ रही है. दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में हर साल 10-12 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है. दुनिया भर में 2025 में कीवी का मार्केट 54.4 अरब डॉलर का है, जो 2029 तक 95.4 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. भारत में हर साल करीब 19,000 मीट्रिक टन की मांग है, जो अभी ज्यादा तर आयात से पूरी होती है—सिर्फ न्यूजीलैंड से ही हर साल करीब 4,000 मीट्रिक टन कीवी आती है.

सतीश कुमार शर्मा ने कहा, “बागवानी लंबी अवधि का निवेश है. आज पौधा लगाओ और 3-4 साल बाद कमाई शुरू होती है. कीवी उन किसानों के लिए सही है जो इंतजार कर सकते हैं और लंबे समय तक स्थिर कमाई चाहते हैं.”

हिमाचल के लिए चुनौतियां, भारत के लिए मौका

हालांकि, कीवी की खेती बढ़ रही है, लेकिन इसका कारोबार आसान नहीं है और किसानों को सतर्क रहना पड़ता है.

अक्टूबर में जब भारत में कीवी की फसल आती है, तब बाज़ार में एक साथ ज्यादा माल आ जाता है और सस्ते आयातित फलों से मुकाबला होता है. ईरान, चिली, स्पेन और न्यूजीलैंड से आने वाली कीवी कीमतें कम कर देती हैं. एमएसपी नहीं होने के कारण कीमत में उतार-चढ़ाव का पूरा जोखिम किसानों को उठाना पड़ता है, जैसा वर्मा की आय में फर्क से दिखता है.

कीवी की किस्म भी बदल रही है. पहले भारतीय किसान एलिसन किस्म उगाते थे, जो छोटी लेकिन ज्यादा मीठी होती है. अब बाजार की मांग बड़ी साइज वाली हेवर्ड किस्म की तरफ बढ़ गई है, क्योंकि आयातित फल इसी तरह के होते हैं.

कीवी की अलग-अलग किस्में दिखाई जा रही हैं, किसान और रिसर्चर ग्लोबल क्वालिटी और मार्केट की मांग को पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
कीवी की अलग-अलग किस्में दिखाई जा रही हैं, किसान और रिसर्चर ग्लोबल क्वालिटी और मार्केट की मांग को पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

वर्मा ने कहा, “पहले एलिसन किस्म का ज्यादा क्रेज था—यह मीठी है लेकिन छोटी होती है. अब बाजार में बड़ी साइज की हेवर्ड किस्म की मांग बढ़ गई है, क्योंकि ईरान, चिली और न्यूजीलैंड से आने वाले फल ऐसे ही होते हैं. इसलिए हम भी अब हेवर्ड की तरफ जा रहे हैं.”

हिमाचल प्रदेश देश में कीवी उत्पादन में आगे है, लेकिन अब दूसरे राज्यों से चुनौती मिल रही है. जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के किसान हिमाचल की नर्सरी से पौधे लेकर अपने बाग लगा रहे हैं. अरुणाचल प्रदेश भी एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बन रहा है. ऐसे में हिमाचल के लिए अपनी बढ़त बनाए रखना मुश्किल हो सकता है.

विशाल राणा, जिन्होंने तीन दशकों में कीवी को प्रयोग से व्यापार तक पहुंचते देखा है, बताते हैं, “आने वाले समय में भारत कीवी खेती में दुनिया का बड़ा खिलाड़ी बन सकता है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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