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Monday, 4 May, 2026
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पाकिस्तान, चीन के खिलाफ भविष्य के युद्ध के लिए भारत क्या तैयारी करे

चीन, भारत और पाकिस्तान के पास आधुनिक सेनाएं हैं, जो परमाणु युद्ध की सीमा तक जाकर लड़ सकती हैं. विषम रणनीति कमजोर सेना को दुश्मन पर रणनीतिक हार थोपने में सक्षम बनाती है.

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ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़रायल की जंग ने आधुनिक युद्ध से जुड़े एक अहम सवाल को साफ कर दिया है. ज्यादा ताकतवर देश जब हवाई हमले शुरू करता है, तो शुरुआत में उसका दबदबा बन जाता है, लेकिन इससे साफ और पूरी जीत नहीं मिलती. ताकतवर पक्ष चाहता है कि पहल उसी के हाथ में रहे. वह पहले हमला करता है और विमान, मिसाइल और ड्रोन के जरिए दुश्मन की सैन्य ताकत को कमजोर करता है. इन हमलों के पीछे ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की ताकत भी होती है, ताकि मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर दुश्मन को हराया जा सके.

कमजोर दुश्मन अगर जवाबी हमला कर सकता है, तो वह शुरुआती हमलों को सह लेता है और युद्ध को लंबा खींचने के लिए विषम रणनीति अपनाता है, जिससे वह दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचा सकता है. यह तरीका परमाणु ताकत वाले देशों के लिए ज्यादा उपयोगी होता है, क्योंकि वे युद्ध को परमाणु स्तर से नीचे रखना चाहते हैं. ऐसे युद्ध में जमीन, अर्थव्यवस्था और सेना—हर स्तर पर भारी नुकसान हो सकता है.

भारत के लिए यह सिर्फ थ्योरी नहीं है. भविष्य में चीन छोटा, हाई-टेक और जल्दी खत्म होने वाला युद्ध लड़ना चाहेगा. पाकिस्तान इसे लंबा और असमान (विषम) युद्ध बनाना चाहेगा. दोनों देश परमाणु ताकत के असर में कदम उठाएंगे, जिससे युद्ध बहुत ज्यादा नहीं बढ़ेगा, लेकिन जोखिम लेने की कोशिश जारी रहेगी. भारत-पाकिस्तान युद्ध में चीन का सहयोग खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही (ISR) तक सीमित रह सकता है, जिसमें अंतरिक्ष और साइबर युद्ध भी शामिल होंगे, लेकिन भारत-चीन युद्ध में पाकिस्तान जरूर दूसरा मोर्चा खोल देगा.

(यह लेख ‘दिप्रिंट’ में प्रकाशित मेरे पिछले लेख ‘ईरान युद्ध ने भारत के लिए अगले युद्ध का खाका पेश कर दिया है’ की अगली कड़ी है)

पाकिस्तान की विषम रणनीति

भारत से बराबरी की सीधी लड़ाई लड़ने में पाकिस्तान की कोई रुचि नहीं होगी. उसका नजरिया वही होगा जो ईरान ने दिखाया—सीधी टक्कर से बचो, ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाओ और तनाव की सीमा का फायदा उठाओ.

उसने अपनी सोच ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में दिखा दी है. लड़ाई के पहले घंटे में जवाबी हवाई हमले करके उसने भारतीय वायुसेना को नुकसान पहुंचाया, लेकिन इसके बाद अगले 87 घंटे तक वह अपने सुरक्षित ठिकानों में छिपा रहा. फिर 72 घंटे तक उसने ड्रोन के झुंड से करीब 600 हमले किए. इन हमलों में भारत के एयर डिफेंस सिस्टम वाले सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया.

इसी दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करने और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध पर जोर दिया. 9 मई 2026 की रात पूरे पाकिस्तान पर बड़े हवाई हमले किए गए. पाकिस्तान की रणनीति सही थी, लेकिन उसे लागू करने में गलती हो गई. इसके अलावा उसके पास मजबूत मिसाइल और अच्छे ड्रोन नहीं थे. मेरा अनुभव कहता है कि पाकिस्तान अगली बार यही रणनीति फिर अपनाएगा. वह अपने लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से लैस करेगा, एयर डिफेंस सिस्टम मजबूत करेगा, बेहतर मिसाइल और ड्रोन लाएगा, अपने रक्षा ढांचे को और मजबूत बनाएगा और अंडरग्राउंड युद्ध को ज्यादा अपनाएगा.

उसकी विषम रणनीति भारत के अंदरूनी इलाकों और समुद्री ऑपरेशनों में, लक्ष्य चुनने और भाड़े के सैनिकों/एजेंटों के इस्तेमाल से दिखेगी.

पाकिस्तान विमान, मिसाइल और ड्रोन से न सिर्फ सैन्य ठिकानों पर हमला करेगा, बल्कि बड़े शहरों को भी निशाना बनाएगा ताकि मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक असर पड़े. वह अपने नैतिक पक्ष को ऊंचा दिखाकर भारत के नैतिक पक्ष को चुनौती देने की कोशिश करेगा और नीति बनाने वालों को उलझन में डालेगा.

पाकिस्तान रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बिगाड़ने के लिए पावर ग्रिड, तेल रिफाइनरी, पेट्रोल डिपो, ट्रांसपोर्ट हब और कम्युनिकेशन नेटवर्क जैसे ज़रूरी ढांचे को भी निशाना बना सकता है.

चीन के साथ मिलकर वह बैंक, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और शेयर बाजार जैसे आर्थिक और वित्तीय सिस्टम पर साइबर हमले कर सकता है. इनका मकसद पूरी तरह नष्ट करना नहीं, बल्कि कुछ समय के लिए सिस्टम को ठप करना होगा, जिसका बड़ा असर पड़ सकता है.

1990 से ही पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर और बड़े शहरों में आतंकवाद के जरिए छद्म युद्ध चला रहा है. इस युद्ध का चेहरा रहा है—एके-47 लिए, हथगोले फेंकते और देसी बम लगाते आतंकवादी. आगे चलकर ये आतंकवादी ड्रोन जैसे आधुनिक हथियारों से लैस हो सकते हैं क्योंकि ड्रोन एके-47 से सस्ते हैं, इसलिए सैन्य, नागरिक, आर्थिक, इन्फ्रास्ट्रक्चर और नेतृत्व से जुड़े सभी ठिकानों पर पीछे से हमले हो सकते हैं.

समुद्र भी विषम युद्ध का दूसरा क्षेत्र बन सकता है. नौसेनाएं समुद्र पर नियंत्रण के लिए लड़ेंगी, लेकिन विषम रणनीति के तहत ड्रोन और मिसाइल से व्यापारिक जहाजों और टैंकरों पर हमले हो सकते हैं. बंदरगाहों को बारूदी सुरंगों से निशाना बनाया जा सकता है. ‘मोस्क्वीटो नेवी’ 500-600 किमी तक के समुद्री क्षेत्र को जहाजों के लिए खतरनाक बना सकती है.

चीन के खिलाफ भारत की विषम रणनीति

अनुभव बताते हैं कि बड़ी ताकतें जल्दी जीत चाहती हैं. मेरा मानना है कि अनिश्चितता के कारण चीन के साथ सीमित युद्ध की संभावना कम है, लेकिन भारत की बढ़ती ताकत और सीमा विवाद के कारण चीन दबाव बनाने के लिए ताकत दिखा सकता है.

अमेरिका की तरह वह भी कम समय और सीमित क्षेत्र में लड़ाई करके जल्दी जीतने की कोशिश करेगा, बिना पहाड़ों में लंबी पारंपरिक लड़ाई के. भारत का लक्ष्य होना चाहिए कि वह चीन के तकनीकी हमलों का जवाब दे और उसकी विषम रणनीति को नाकाम करके उसे रणनीतिक रूप से हराए.

पूर्वी लद्दाख संकट के दौरान भारत ने चीन की भारी तैनाती और लगभग 1,000 वर्गकिमी क्षेत्र पर कब्ज़े की कोशिश का शांत तरीके से जवाब दिया. इससे गतिरोध तो बना, लेकिन भारत अपनी कमजोर स्थिति के कारण बातचीत में पुरानी स्थिति वापस नहीं ला सका.

भूगोल के कारण चीन को पहले कदम उठाने का फायदा मिलता है, इसलिए भारत को सिर्फ शांत रहने की बजाय मजबूत कदम उठाने होंगे. अपने पिछले लेख में मैंने कहा था कि ताकतवर दुश्मन के हवाई हमलों का सबसे अच्छा जवाब अंडरग्राउंड युद्ध है. इसे पूरी तरह लागू करना चाहिए. साथ ही मजबूत एअर डिफेंस भी बनाना चाहिए.

हवाई और ज़मीनी जवाबी कार्रवाई सीमा के दूसरे हिस्सों में भी करनी चाहिए, जहां हमें भौगोलिक बढ़त मिल सकती है. मलक्का जलडमरूमध्य चीन की अर्थव्यवस्था की बड़ी लाइफलाइन है. अंडमान-निकोबार द्वीप इसके पास हैं, इसलिए भारत यहां दबाव बना सकता है.

अरब सागर में भी ग्वाडर, पासनी और कराची बंदरगाहों तक पहुंच रोककर चीन की अर्थव्यवस्था पर असर डाला जा सकता है. ‘मोस्क्वीटो फ्लीट’ बनाना भी फायदेमंद हो सकता है. तिब्बत के धार्मिक और राजनीतिक नेता दलाई लामा और उनकी सरकार भारत में है. जानकारी के मुताबिक 10-12 हजार तिब्बती सैनिक स्पेशल फोर्स के रूप में प्रशिक्षित हैं और भारत के साथ लड़ते रहे हैं. तिब्बत चीन की कमजोरी है. अगर चीन हमारी संप्रभुता का सम्मान नहीं करता, तो हमें भी तिब्बत में रणनीतिक कदम उठाने से नहीं हिचकना चाहिए. हमें अपने लक्ष्य सावधानी से चुनने चाहिए और मुख्य रूप से चीनी सेना ‘PLA’ पर ध्यान देना चाहिए.

एक चेतावनी

विषम रणनीति में दुश्मन की कमजोरियों को निशाना बनाया जाता है या उसकी कम तैयारी का फायदा उठाया जाता है. यह नई बात नहीं है—इतिहास में ‘ट्रोजन वार’ से लेकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य तक इसके उदाहरण हैं. पारंपरिक और विषम रणनीति अलग-अलग नहीं हैं. हर देश अपनी जरूरत के हिसाब से युद्ध का तरीका अपनाता है.

विषम रणनीति का जवाब दिया जा सकता है, लेकिन इसमें नुकसान होता है क्योंकि यह अक्सर प्रतिक्रिया में किया जाता है. चीन, भारत और पाकिस्तान—तीनों के पास आधुनिक सेनाएं और परमाणु ताकत है. इसलिए युद्ध में सीमाएं रहेंगी.

विषम रणनीति कमजोर देश को ताकतवर दुश्मन के खिलाफ खड़ा होने और उसे रणनीतिक हार देने में सक्षम बनाती है. असली चुनौती यह है कि ऐसी रणनीति को पहले से समझकर उसे कैसे रोका जाए और जरूरत पड़ने पर उसका फायदा कैसे उठाया जाए.

लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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