अफगानिस्तान पर मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशन की आठवीं बैठक सोमवार को रूस की राजधानी में खत्म हुई. इसमें अफगानिस्तान, भारत, ईरान, कजाकिस्तान, चीन, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जबकि मिस्र और बेलारूस मेहमान के तौर पर शामिल हुए.
बैठक में कोई साझा बयान सामने नहीं आया. शायद यह इस फॉर्मेट के इतिहास में पहली बार हुआ है कि पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के कारण सभी पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पाई. रूस ने इस नतीजे पर निराशा जताई, लेकिन इसके बावजूद कहा कि यह फॉर्मेट आगे भी काम करेगा और बिना साझा बयान के भी जारी रहेगा.
मॉस्को फॉर्मेट की पिछली बैठकों में साझा बयान अफगानिस्तान को लेकर भाग लेने वाले देशों की स्थिति समझने में मददगार रहे हैं. भले ही इन बयानों का प्रतीकात्मक महत्व रहा हो, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे व्यवहार में क्षेत्रीय सहमति को दिखाते हों. इसलिए अगर इस बार भी कोई अंतिम दस्तावेज़ जारी होता, तब भी यह सवाल उठता कि क्या यह फॉर्मेट खुद अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कर रहा है, क्योंकि अभी अफगानिस्तान को लेकर यह सबसे व्यापक क्षेत्रीय मंच है?
मॉस्को फॉर्मेट क्या है?
रूस ने 2017 में भारत, चीन, ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ मिलकर मॉस्को फॉर्मेट शुरू किया था. इसके कुछ समय बाद मध्य एशिया के गणराज्य (CARs) भी इसमें शामिल हो गए. तब से मॉस्को फॉर्मेट अफगानिस्तान की स्थिरता और प्रगति पर चर्चा करने का एक नियमित मंच बन गया है.
पहली बैठक में तालिबान मौजूद नहीं था. लेकिन 2018 में दूसरी बैठक में उसने एक प्रतिनिधिमंडल भेजा. उस बैठक में अफगानिस्तान की हाई पीस काउंसिल के सदस्य भी मौजूद थे. यह अफगान सरकार की ओर से बनाई गई संस्था थी, जो अफगानिस्तान के अंदर बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय संस्था के रूप में काम कर रही थी.
करीब तीन साल के अंतराल के बाद तीसरी बैठक अक्टूबर 2021 में हुई. यह तालिबान के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद की बात है. उस साल तालिबान ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजा, लेकिन 2022 में उसे आमंत्रित नहीं किया गया.
इसके बावजूद, 2021 से 2024 तक जारी किए गए बयानों में तालिबान से एक समावेशी सरकार बनाने की अपील की गई. इसमें अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों समेत सभी जातीय समूहों के मौलिक अधिकार सुनिश्चित करने की बात कही गई. उदाहरण के लिए, 2023 के बयान, जिसे कजान घोषणा कहा गया, में कहा गया था, “दुख की बात है…वास्तव में समावेशी सरकार बनाने में कोई प्रगति नहीं हुई है.”
अक्टूबर 2025 में हुई सातवीं बैठक तक साझा बयान से इस तरह के किसी भी संदर्भ को सुविधाजनक तरीके से हटा दिया गया था. यह संयोग नहीं था कि उसी साल जुलाई में मॉस्को ने तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता दे दी थी और तालिबान पहली बार इस फॉर्मेट में पूर्ण सदस्य के तौर पर शामिल हुआ था.
अगर इस साल साझा सहमति वाला कोई दस्तावेज अपनाया जाता, तो संभावना थी कि उसमें समावेशी शासन का ज़िक्र नहीं होता. ऐसा लगता है कि यह मुद्दा बैठक में शामिल देशों की प्राथमिकताओं में नहीं है. इसके बजाय, आतंकवाद से निपटने, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे बड़े हितों पर ज्यादा ध्यान है. इन क्षेत्रों में तालिबान को खुश रखना व्यावहारिक तरीके से साथ काम करने के लिए जरूरी माना जा रहा है.
शब्दों में बदलाव का एक कारण यह भी हो सकता है कि मॉस्को तालिबान को इस्लामिक स्टेट – खोरासान प्रांत (ISKP) के खिलाफ एक इच्छुक साझेदार के तौर पर देखता है और उसे नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहता. ISKP तालिबान का दुश्मन है और उसने मार्च 2024 में हुए क्रोकस सिटी हॉल हमले की जिम्मेदारी ली थी.
हालांकि, एक बात लगातार बनी हुई है: अफगानिस्तान में अमेरिका की कार्रवाई को लेकर असहमति का संकेत. इसे इस तरह कहा जाता है कि अफगानिस्तान में 20 साल तक सैन्य मौजूदगी रखने वाली ताकतों को युद्ध के बाद अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी उठानी चाहिए.
हाल के बयानों में देशों की ओर से अफगानिस्तान में अपनी सैन्य व्यवस्था या सैन्य ढांचा तैनात करने की कोशिशों को “अस्वीकार्य” बताया गया है. इस बात का महत्व तब और बढ़ गया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान में बगराम एयर बेस पर फिर से नियंत्रण हासिल करने की बात कही.
इन बयानों में मानवीय मदद को राजनीतिक बनाने का भी लगातार विरोध किया गया है. इन सभी बातों को व्यापक रूप से वॉशिंगटन यानी अमेरिका के लिए संदेश के तौर पर देखा जाता है.
मूल्यों और हितों के बीच, अफगानों को भुगतना पड़ रहा है
अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद जो खाली जगह बनी, उसे रूस और चीन ने भरने की कोशिश की है.
लेकिन न तो रूस और न ही चीन अपनी विदेश नीति में मूल्यों को सबसे अहम मानते हैं और न ही उनके पास उन्हें अमेरिका की तरह लागू कराने के साधन हैं. हालांकि हाल तक, दोनों ही देश कम से कम समावेशी सरकार की मांग का समर्थन करते थे.
अमेरिका का मूल्यों पर आधारित तरीका, जिसमें तालिबान के मानवाधिकारों के मामले में सुधार के आधार पर बातचीत और मदद दी जाती है, ने अफगानों की स्थिति और खराब कर दी है. इसकी वजह यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान से हटने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय मदद देने वाला सबसे बड़ा डोनर रहा है, लेकिन मॉस्को और बीजिंग का पूरी तरह अपने हितों पर आधारित तरीका भी उतना ही गलत है, क्योंकि इसमें तालिबान के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाने की बहुत कम गुंजाइश है. अफगानिस्तान को इन दोनों तरीकों के बीच एक संतुलित रास्ते की जरूरत है.
ऐसा नहीं होने पर मॉस्को फॉर्मेट सिर्फ बातचीत का मंच बनकर रह जाने का खतरा है, जहां बार-बार वही बातें दोहराई जाएंगी और दूसरे देशों पर निशाना साधा जाएगा. चूंकि यह रूस की अगुवाई वाला मंच है, इसलिए इसमें पश्चिमी देशों की आलोचना की कुछ हद तक उम्मीद की जा सकती है. जैसे, रूस ने तालिबान को “NATO की सैन्य मौजूदगी से अफगानिस्तान की आज़ादी की 5वीं वर्षगांठ” पर बधाई दी. लेकिन इस तरह के एजेंडे को मंच की मुख्य चर्चा पर हावी नहीं होना चाहिए.
अफगानिस्तान के लिए रूस के विशेष दूत ने इस फॉर्मेट को “क्षेत्रीय सहयोग के तालमेल” के लिए एक मंच बताया था, न कि दो देशों के बीच मतभेद सुलझाने के लिए. लेकिन ऐसा लगता है कि बाद वाली बात ही इस मंच पर हावी हो रही है.
पाकिस्तान ने भी मॉस्को फॉर्मेट पर अपना अलग बयान जारी किया. इसमें दूसरी बातों के अलावा कहा गया कि आतंकवाद अफगानिस्तान की समस्याओं के केंद्र में है, अफगानिस्तान से फैलने वाले आतंकवाद के कारण 4,700 निर्दोष पाकिस्तानियों की जान जा चुकी है और तालिबान सरकार इसमें शामिल है. दूसरी तरफ, तालिबान ने आतंकवाद को अफगानिस्तान से जोड़ने पर आपत्ति जताई. हालांकि, पिछले बयानों में भी इसका जिक्र किया गया था. इसी वजह से साझा बयान को मंजूरी नहीं मिल सकी.
तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने कहा कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाया जा सकता है, लेकिन पाकिस्तान सिर्फ सैन्य भाषा का इस्तेमाल करता है.
अफगानिस्तान अब वैश्विक एजेंडे से पीछे जा चुका है और देश की स्थिति पर चर्चा करने वाले मंच भी बहुत कम रह गए हैं. ऐसे में दो देशों के बीच के विवादों से ऊपर न उठ पाना चिंता की बात है.
इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटेन की मोज़ेक ग्लोबल फाउंडेशन की ओर से यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के प्रसिद्ध हॉल में आयोजित पांचवें कैम्ब्रिज अफगानिस्तान सीरीज कॉन्फ्रेंस के अंत में अपनीई गई घोषणा एक स्वागत योग्य कदम है.
इसका नाम ‘Cambridge Declaration on Democratic Cooperation and Convergence for Afghanistan’ है. इसमें सम्मेलन में शामिल लोगों की सहमति से आठ सिद्धांत तय किए गए हैं. इनमें अफगानिस्तान के कई विपक्षी नेता, सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ता, पूर्व सरकारी नेता और शिक्षाविद शामिल थे. यह घोषणा शायद अब तक किसी भी पहल की ओर से अफगानिस्तान के लिए तैयार किया गया सबसे व्यापक और सबसे समावेशी रोडमैप है. इसमें महिलाओं, अल्पसंख्यकों और हर समुदाय के लिए पूरे अधिकार और प्रतिनिधित्व की मांग की गई है. साथ ही अफगानिस्तान के भविष्य के लिए अफगानिस्तान की अगुवाई में राजनीतिक प्रक्रिया की बात कही गई है. यही वे प्रतिबद्धताएं हैं, जिनका मॉस्को फॉर्मेट के बयानों से धीरे-धीरे गायब होना शुरू हो गया है.
हालांकि, इस घोषणा से अपने आप कुछ बदलने की संभावना कम है, फिर भी अफगानिस्तान से जुड़े किसी भी मंच के लिए इससे सीख लेना अच्छा होगा. तालिबान के साथ बातचीत और संपर्क रखना व्यावहारिक तरीका है. लेकिन ‘जरूरी बुराई’ के नाम पर उसकी निंदनीय नीतियों को सामान्य मान लेना आगे का रास्ता नहीं हो सकता, भले ही तालिबान के शासन को पांच साल हो चुके हों.
बंटीरानी पात्रो दिप्रिंट में स्टाफ राइटर हैं. उनका एक्स हैंडल @bantirani_patro है. यह उनके निजी विचार हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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