नई दिल्ली: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ रहा है. 1 अक्टूबर को इस्लामाबाद ने अफगानिस्तान के हेलमंद और कुनार प्रांतों में नए हवाई हमले किए और दावा किया कि इनमें 22 “आतंकवादी” मारे गए. संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन इन अफगानिस्तान (UNAMA) ने 10 नागरिकों की मौत की पुष्टि की, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. ये हमले अफगानिस्तान की जमीन पर पाकिस्तान के हमलों की एक और कड़ी थे.
इसी माहौल में पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और सूचना मंत्री मुशाहिद हुसैन सैयद ने बताया है कि अफगानिस्तान को अपने हिसाब से ढालने की पाकिस्तान की दशकों पुरानी कोशिशों ने उन सुरक्षा समस्याओं को पैदा करने में कैसे योगदान दिया, जिनका सामना पाकिस्तान अब कर रहा है.
पाकिस्तान: अफगानिस्तान युद्ध का फायदा उठाने वाला
25 सितंबर को जारी हुए पॉडकास्ट ‘खानकास्ट’ में बोलते हुए मुशाहिद ने कहा कि अफगान जिहाद के दौरान अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) ने पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) को 2.1 अरब डॉलर दिए थे. इसका इस्तेमाल “1 लाख मुजाहिदीन और 20,000 अरब स्वयंसेवकों” को प्रशिक्षण देने के लिए किया गया, जिनमें मारे जा चुके अल-कायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन और संगठन के नेता अयमान अल-जवाहिरी भी शामिल थे. वह 9/11 हमलों की मुख्य योजना बनाने वालों में से एक था.
उन्होंने कहा कि सऊदी अरब ने CIA के योगदान के बराबर 2.1 अरब डॉलर और दिए, और 1979 से 1989 तक सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर कब्जे के दौरान कुल कम से कम 5 अरब डॉलर अफगानिस्तान में इस्तेमाल किए गए.
ब्राउन यूनिवर्सिटी के शोध का हवाला देते हुए मुशाहिद ने कहा कि अमेरिका ने अक्टूबर 2001 से अगस्त 2021 के बीच अफगानिस्तान में 2.2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए, यानी लगभग 10 करोड़ डॉलर रोजाना. ब्राउन के कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2001 से वित्त वर्ष 2022 तक अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में खर्च का अनुमानित हिस्सा 2.3 ट्रिलियन डॉलर था. जब पूर्व सैनिकों की देखभाल से जुड़ी भविष्य की जिम्मेदारियों को भी इसमें शामिल किया जाता है, तो यह आंकड़ा 3.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाता है.
यह पूछे जाने पर कि पैसा कहां गया, मुशाहिद ने कहा कि अमेरिकियों, अफगानिस्तान के अमीर लोगों और कुछ पाकिस्तानियों को इससे फायदा हुआ.
उन्होंने कहा कि भू-राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान पश्तूनों को हुआ, जबकि उनके अनुसार अफगान जिहाद का सबसे बड़ा फायदा यह था कि इसके दौरान पाकिस्तान परमाणु शक्ति बन गया.
मुशाहिद ने याद किया कि 1975 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के उन विपक्षी नेताओं को शरण दी थी, जिनमें अहमद शाह मसूद, गुलबुद्दीन हिकमतयार, अब्दुल रब रसूल सय्याफ और बुरहानुद्दीन रब्बानी शामिल थे. ये लोग दाऊद खान की सरकार का विरोध करते थे. खबरों के अनुसार, पाकिस्तान ने यह कदम दाऊद की ‘पश्तूनिस्तान’ नीति के जवाब में उठाया था, जिसने इस्लामाबाद के साथ रिश्ते खराब कर दिए थे. उन्होंने कहा, “अफगान जिहाद की तैयारी 1975 में ही शुरू हो गई थी.”
‘अफगान किसी के नहीं होते’
मुशाहिद ने कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से अपने पसंदीदा नेताओं या गुटों का समर्थन करके अफगानिस्तान को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करता रहा है. लेकिन उन्होंने कहा, “अफगान किसी के नहीं होते. वे गरीब लेकिन गर्व करने वाले लोग हैं. वे सिर्फ अपने हैं और सबसे पहले राष्ट्रवादी हैं.” उन्होंने कहा कि जहीर शाह से लेकर नजीबुल्लाह, करजई और यहां तक कि तालिबान तक, देश के सभी नेता “सबसे पहले अफगान” रहे हैं.
उन्होंने अफगान नेताओं या गुटों को पाकिस्तान का “बंदा” या प्रतिनिधि मानने की कोशिशों को खारिज किया. उन्होंने इसकी तुलना पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति से की, “जहां सेना प्रमुख चाहता है कि उसका आदमी प्रधानमंत्री बने, जबकि प्रधानमंत्री चाहता है कि उसका आदमी सेना प्रमुख बने.”
उनके अनुसार, 2004 में करजई को सत्ता में लाने में पाकिस्तान की अहम भूमिका थी. मुशाहिद ने कहा कि जब करजई ने जनरल परवेज मुशर्रफ से मदद मांगी, तो मुशर्रफ ने मदद करने पर सहमति जताई और अफगान शरणार्थियों से उनके लिए वोट करने को कहा. इससे करजई की जीत हुई.
मुशाहिद ने अफगानिस्तान के लिए अमेरिका के पूर्व विशेष दूत रिचर्ड हॉलब्रुक के साथ हुई बातचीत को भी याद किया. उन्होंने कहा कि हॉलब्रुक ने पूछा था कि देश का राष्ट्रपति किसे बनाया जाना चाहिए, क्योंकि वह “करजई नाम के आदमी से छुटकारा पाना” चाहते थे. हॉलब्रुक अपने साथ संभावित उम्मीदवारों की एक सूची लेकर आए थे. मुशाहिद ने कहा कि उन्होंने मजाक में जवाब दिया, “करजई आपसे ज्यादा जिंदा रहेगा.” उनका मतलब राजनीतिक रूप से था, लेकिन आखिरकार करजई हॉलब्रुक से ज्यादा जिंदा रहे. हॉलब्रुक की 2010 में मौत हो गई थी.
यह पूछे जाने पर कि क्या पाकिस्तान अब भी अफगानिस्तान को अपना “पांचवां प्रांत” मानता है, मुशाहिद ने कहा कि सेना प्रमुख आसिम मुनीर के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार ऐसी सोच न रखने वाली और तालिबान को अपना न मानने वाली पहली सरकार है.
TTP से बातचीत?
मुशाहिद ने 5 जुलाई 2022 को हुई एक राष्ट्रीय सुरक्षा बैठक को भी याद किया. इसमें उस समय के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा, लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम, DG-ISI और उस समय पेशावर के कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद शामिल हुए थे. फैज ने इस बात पर जानकारी दी कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के साथ बातचीत शुरू करना क्यों जरूरी था.
मुशाहिद ने कहा कि केवल तीन लोगों ने इस कदम पर सवाल उठाया था. वे खुद और राजनीतिक नेता मोहसिन डावर (नेशनल डेमोक्रेटिक मूवमेंट) और बिलावल भुट्टो जरदारी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) थे.
यह पूछे जाने पर कि क्या पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान TTP के साथ बातचीत के पक्ष में थे, उन्होंने कहा कि खान ने तो यह भी सुझाव दिया था कि TTP का पेशावर में एक कार्यालय होना चाहिए.
मौजूदा सुरक्षा स्थिति पर मुशाहिद ने कहा कि 2026 में अब तक भारी मानवीय नुकसान हुआ है. खैबर पख्तूनख्वा में 200 पुलिसकर्मी मारे गए हैं और लगभग 600 आतंकवादी हमले दर्ज किए गए हैं.
उन्होंने कहा, “पाकिस्तान को अपने घरेलू राजनीतिक मामलों के साथ-साथ अफगानिस्तान की नीति में भी सुधार और राहत की जरूरत है.” उन्होंने कहा कि भू-राजनीति, आतंकवाद से लड़ाई और पाकिस्तानी राजनीति का मेल इतना खतरनाक हो गया है कि यह किसी भी समय फट सकता है. उन्होंने कहा कि चीन, तुर्की, ईरान, कतर, रूस और उज्बेकिस्तान का मानना है कि पाकिस्तान का तरीका गलत है.
पॉडकास्ट का अंत मुशाहिद के इस बयान के साथ हुआ कि पाकिस्तान नई गलतियां कर सकता है, लेकिन उसे अपनी पुरानी गलतियां दोहरानी नहीं चाहिए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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