भारत में PhD में दाखिलों की संख्या लगभग तीन गुना हो गई है. यह 2014-15 में 1.17 लाख से बढ़कर 2023-24 में 3.44 लाख हो गई है, जैसा कि दिप्रिंट ने हाल ही में बताया था. लेकिन जून में सरकारी आंकड़ों के एक विश्लेषण में पाया गया कि 23 IITs में मंजूर किए गए फैकल्टी पदों में से करीब 38 प्रतिशत खाली थे. हम रिसर्च में ज्यादा लोगों को ला रहे हैं, जबकि उन संस्थानों में स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं जिन्हें रिसर्च का नेतृत्व करना है.
डॉक्टरेट की डिग्री होने का यह मतलब जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति हर अकादमिक खाली पद के लिए सही या नौकरी के लायक हो. विशेषज्ञता, रिसर्च की गुणवत्ता और भर्ती में होने वाली देरी, ये सभी महत्वपूर्ण बातें हैं. लेकिन इस अंतर से एक और असहज सवाल भी उठना चाहिए: क्या हमने अकादमिक करियर को उन लोगों के लिए पर्याप्त आकर्षक बनाया है, जिनसे हम इसे आगे बढ़ाने की उम्मीद करते हैं?
हम अपने सबसे अच्छे संस्थानों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने की उम्मीद करते हैं, जबकि उनकी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा सरकारी वेतनमान से जुड़ा रहता है. हम छात्रों को रिसर्च के लिए कई साल तक ट्रेनिंग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन उसके बाद उनके लिए उपलब्ध करियर के बारे में पर्याप्त नहीं सोचते. फिर हम हैरान होते हैं कि प्रतिभाशाली लोग दूसरी जगह क्यों चले जाते हैं.
जूनियर रिसर्च फेलोशिप को ही देखिए. पहले दो सालों के लिए इसमें हर महीने 37,000 रुपये मिलते हैं, जो सीनियर रिसर्च फेलोशिप के स्तर पर बढ़कर 42,000 रुपये हो जाते हैं. किसी शहर में रहने का खर्च पूरा करने के लिए यह रकम मुश्किल से पर्याप्त है. अमेरिका में MIT डॉक्टरेट रिसर्च असिस्टेंट्स के लिए सालाना 50,000 डॉलर से ज्यादा की शुरुआती सैलरी बताता है. मुद्रा और रहने के खर्च में अंतर को ध्यान में रखने के बाद भी, MIT की सैलरी से अपेक्षाकृत आराम से रहा जा सकता है.
इसलिए भारत में अकादमिक क्षेत्र के बाहर काम करना आर्थिक रूप से ज्यादा समझदारी भरा हो सकता है. PhD करने पर विचार कर रहा कोई होनहार ग्रेजुएट पहले से ही एक अच्छी सैलरी वाली प्रोफेशनल नौकरी पा सकता है. आर्थिक सुरक्षा चाहने का मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति पढ़ाई या रिसर्च को लेकर कम गंभीर है. विश्वविद्यालयों को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि रिसर्च से प्यार करने वाला व्यक्ति किराए, परिवार की जिम्मेदारियों और भविष्य से जुड़े हर सवाल को नजरअंदाज कर देगा.
सिर्फ सैलरी से आगे का पैकेज
अच्छे फैकल्टी सदस्यों को भर्ती करना एक और चुनौती है. IITs पहले से कुछ अतिरिक्त सैलरी देते हैं, लेकिन जो संस्थान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित रिसर्चरों को लाना चाहते हैं, उन्हें प्रतिस्पर्धी पैकेज पर बातचीत करने की ज्यादा आजादी चाहिए. सैलरी उस पैकेज का एक हिस्सा है. रिसर्च के लिए फंडिंग, अच्छे और सक्षम सहकर्मी और अपने काम को स्वतंत्र रूप से करने की आजादी भी उसी पैकेज का हिस्सा हैं.
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर कोई प्रोफेसर रिसर्च टीम नहीं बना सकता या उसे बुनियादी प्रशासनिक मदद नहीं मिल सकती, तो ज्यादा सैलरी से भी बहुत कम फायदा होगा. भारतीय विश्वविद्यालयों में इस तरह की मदद पर जितना ध्यान मिलना चाहिए, उतना नहीं मिलता. हार्वर्ड लॉ स्कूल में 50 से ज्यादा फैकल्टी और एग्जीक्यूटिव असिस्टेंट की एक टीम है, जो करीब 200 फैकल्टी सदस्यों, विजिटिंग प्रोफेसरों और लेक्चररों की मदद करती है. भारतीय विश्वविद्यालयों को ऐसी मदद को जरूरी खर्च मानना चाहिए. UGC के वर्कलोड नियमों के तहत, फैकल्टी सदस्य औसतन हर हफ्ते करीब 15 घंटे सीधे पढ़ाने में लगाते हैं. क्लास की तैयारी, रिसर्च की निगरानी और प्रशासनिक काम इन घंटों के अलावा भी समय लेते हैं.
डॉक्टरेट छात्रों के पढ़ाने के काम के लिए भी उतनी ही साफ व्यवस्था की जरूरत है. हार्वर्ड में जूनियर टीचिंग फेलो के लिए प्रति टर्म, प्रति सेक्शन 5,860 डॉलर की दर तय है और इसमें हर हफ्ते सात घंटे काम जुड़ा है. यह भुगतान डॉक्टरेट की फंडिंग के पैकेज का हिस्सा है. IIT बॉम्बे में भी एक व्यवस्था तय है: हर हफ्ते आठ घंटे टीचिंग असिस्टेंस के बदले 37,000 रुपये महीने से शुरू होने वाली असिस्टेंटशिप दी जाती है. दोनों व्यवस्थाओं में फंडिंग को पढ़ाने के काम से जोड़ा गया है. सवाल यह है कि क्या यह फंडिंग पर्याप्त है, काम का बोझ उचित है और क्या रिसर्चर के पास रिसर्च के लिए अभी भी पर्याप्त समय बचता है.
अच्छी रिसर्च को खुलकर काम करने की जगह चाहिए
सिर्फ पैसा विश्वविद्यालयों को स्वतंत्रता नहीं देगा. उनके काम करने और फैसले लेने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है. सरकारी फंडिंग के लिए जवाबदेही जरूरी है, लेकिन अकादमिक फैसलों को सरकारी व्यवस्था से ज्यादा दूरी की जरूरत है. उदाहरण के लिए, NLU दिल्ली की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में वित्त, उच्च शिक्षा और कानून के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ शिक्षाविद और बार के प्रतिनिधि भी शामिल हैं.
विश्वविद्यालय की संस्थाओं में शिक्षाविदों की आवाज ज्यादा मजबूत होनी चाहिए, जबकि पूर्व छात्रों और दूसरे स्वतंत्र सदस्यों को भी अपनी विशेषज्ञता देने का मौका मिलना चाहिए. फैकल्टी को अपने पढ़ाने और रिसर्च के काम में मनमाने हस्तक्षेप से बचाने के लिए भी साफ सुरक्षा होनी चाहिए.
एक और समस्या यह है कि रिसर्च को बेहतर बनाने की हमारी कोशिशें अक्सर ऐसी चीजों पर ज्यादा केंद्रित रही हैं जिन्हें आसानी से मापा जा सकता है. किसी व्यक्ति ने कितने पेपर प्रकाशित किए, यह प्रमोशन की फाइल में आसानी से लिखा जा सकता है. लेकिन किसी रिसर्च के मौलिक योगदान को समझने में समय और विशेषज्ञता लगती है. इसलिए जो चीज गिनना सबसे आसान है, उसे इनाम देने का लालच रहता है.
दार्शनिक और वैज्ञानिक माइकल पोलानी ने अपने निबंध ‘द रिपब्लिक ऑफ साइंस’ में ऊपर से वैज्ञानिक खोज को नियंत्रित करने के खिलाफ चेतावनी दी थी. उन्होंने लिखा, “आप विज्ञान की प्रगति को खत्म या नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन उसे अपनी इच्छा के मुताबिक दिशा नहीं दे सकते.” उनका तर्क यह समझने में मदद करता है कि लक्ष्य और सूचियां अकादमिक विशेषज्ञों के फैसले की जगह क्यों नहीं ले सकतीं.
प्रेडेटरी जर्नल का अनुभव हमें सावधान करना चाहिए. 2017 में Nature में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया कि संदिग्ध घटिया जर्नल्स में शामिल 1,907 पेपर के नमूने में भारत से “सबसे ज्यादा सबमिशन” थे. UGC की मंजूर जर्नल्स की सूची की आलोचना हुई थी, क्योंकि उसमें संदिग्ध जर्नल्स भी शामिल थे. बाद में इसकी जगह कंसोर्टियम फॉर एकेडमिक एंड रिसर्च एथिक्स (UGC-CARE) आया. 2025 में UGC ने CARE सूची को भी बंद कर दिया और उसकी जगह ऐसे दिशानिर्देश लाए जिनके तहत विश्वविद्यालयों और रिसर्चरों को खुद जर्नल्स की गुणवत्ता जांचनी है. यह पूरा इतिहास हमें प्रकाशनों की संख्या और सरकारी सूचियों को अच्छी रिसर्च का सबूत मानने में ज्यादा सावधानी बरतने के लिए मजबूर करता है.
रिसर्च करने की एक वजह
लगातार मिलने वाली फंडिंग से विश्वविद्यालयों को ऐसी रिसर्च को समर्थन देने की ज्यादा गुंजाइश मिलेगी, जिसकी अहमियत साफ होने में समय लगता है. भारत में इसके कुछ अच्छे उदाहरण भी हैं. IIT मद्रास ने बताया है कि उसने 2025-26 में CSR और पूर्व छात्रों से मिले दान के जरिए 513 करोड़ रुपये जुटाए. IIT दिल्ली के पास पहले से ही एक एंडोमेंट फंड है. इन कोशिशों को और बढ़ाने की जरूरत है. दुनिया के एक प्रमुख संस्थान के पास उपलब्ध संसाधनों की तुलना के लिए देखें तो MIT को 2025 के वित्तीय वर्ष में दान और किए गए वादों के तहत 677.9 मिलियन डॉलर मिले.
कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की फंडिंग बहुत मदद कर सकती है. Fulcrum की भारत सीएसआर परफॉर्मेंस रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में भारत में CSR पर 40,794 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें शिक्षा के लिए 13,877 करोड़ रुपये मिले. विश्वविद्यालयों को पहले से ही CSR से मदद मिलती है, जैसा कि IIT मद्रास का उदाहरण दिखाता है. अगला कदम यह होना चाहिए कि लंबे समय तक चलने वाले अकादमिक काम के लिए फंडिंग देना आसान बनाया जाए.
हालांकि, लंबे समय की रिसर्च के लिए नियमों में बदलाव की जरूरत है. फिलहाल किसी संस्थान के मुख्य फंड में दिया गया योगदान CSR खर्च में शामिल नहीं माना जाता. कोई “चल रहा प्रोजेक्ट” शुरू होने वाले साल के बाद अधिकतम तीन वित्तीय वर्षों तक चल सकता है. कंपनी अधिनियम की अनुसूची VII में विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मेडिसिन में रिसर्च के लिए खास तौर पर प्रावधान है, हालांकि शिक्षा के लिए अलग और ज्यादा व्यापक प्रावधान मौजूद है. कानून, मानविकी और सामाजिक विज्ञान में लंबे समय तक रिसर्च की फंडिंग के लिए साफ रास्ता बनाया जाए, तो अनिश्चितता दूर होगी.
सरकार को CSR खर्च के एक सीमित हिस्से को सही तरीके से चलाए जाने वाले विश्वविद्यालय एंडोमेंट फंडों में लगाने की अनुमति देनी चाहिए, और यह भी सार्वजनिक रूप से बताया जाना चाहिए कि उस फंड से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है. रिसर्च प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग की अवधि उस काम की जरूरत के हिसाब से होनी चाहिए. विश्वविद्यालयों को फैकल्टी की सैलरी और फीस तय करने में भी ज्यादा आजादी होनी चाहिए, साथ ही ऐसी भरोसेमंद आर्थिक मदद होनी चाहिए कि पैसे की कमी के कारण छात्र पढ़ाई से बाहर न हो जाएं.
सोचिए कि कॉरपोरेट खर्च का एक छोटा हिस्सा क्या कर सकता है. रिलायंस, टाटा या अडानी जैसी कंपनियां हर महीने 2 लाख रुपये की डॉक्टरेट फेलोशिप दे सकती हैं. 100 स्कॉलर्स को इस दर पर फंड करने में रिसर्च और प्रशासनिक खर्चों से पहले हर साल 24 करोड़ रुपये लगेंगे. यह 2024-25 में रिलायंस इंडस्ट्रीज के बताए गए 2,156 करोड़ रुपये के CSR खर्च का करीब 1 प्रतिशत है.
ऐसी फेलोशिप किसी प्रतिभाशाली कानून के ग्रेजुएट को प्रैक्टिस में करियर बनाने के साथ-साथ रिसर्च के बारे में गंभीरता से सोचने की एक मजबूत वजह देगी. इसके लिए अभी भी कठिन चयन प्रक्रिया, अच्छी गाइडेंस और अकादमिक नौकरी में जाने का भरोसेमंद रास्ता जरूरी होगा. लेकिन इससे उन लोगों के लिए यह विकल्प आर्थिक रूप से संभव हो जाएगा, जो शायद पहले कभी आवेदन ही नहीं करते.
जिस तरह शिक्षाविद हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड में पढ़ाने का सपना देखते हैं, उसी तरह कोई IIT में पढ़ाने का सपना नहीं देखता. जब तक सैलरी और उसके पीछे की व्यवस्था नहीं बदलती, सबसे अच्छे लोग यहां से जाते रहेंगे, पहले छात्र के रूप में और फिर प्रोफेसर के रूप में. बहुत से स्कॉलर भारत में ही अपना करियर बनाना चाहते हैं. हमें उनके लिए ऐसा करना आसान बनाना चाहिए.
राघव पांडे हार्वर्ड लॉ स्कूल में विजिटिंग स्कॉलर हैं और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली में इन्सॉल्वेंसी और रीस्ट्रक्चरिंग स्टडीज़ चेयर हैं. विचार निजी हैं.
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