मौजूदा छात्र प्रदर्शनों को सिर्फ कुछ समय की राजनीति के नजरिए से देखना बहुत सीमित सोच होगी. भारत की युवा पीढ़ी जो कर रही है, वह भारत और दुनिया दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
सत्ता में बैठे लोगों की ज्यादतियों को देखते हुए, जेन-ज़ी उस चीज़ को पलटने की कोशिश कर रही है जिसे 1975-77 के आपातकाल के बाद भारत के लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला माना जाना चाहिए. इसे उसी रूप में पहचाना जाना चाहिए. इसे इस बात तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए कि हमें अभिजीत दिपके और उनका बैकग्राउंड पसंद है या नहीं, या हमें राहुल गांधी पसंद हैं या नहीं. राहुल गांधी इस समय इस राजनीतिक माहौल से फायदा पाने वाले “पार्टी-राजनीतिक” नेता हैं और फिलहाल बढ़ती राजनीतिक लहर पर सवार हैं.
यह राजनीतिक माहौल लंबे समय तक रहेगा और बड़े बदलाव लाएगा, या मोदी सरकार और ज्यादा दमन के साथ पलटवार करेगी, यह अपने आप में अनुमान का सवाल है. हालांकि, इस वजह से यह सवाल गलत नहीं हो जाता. कुछ कॉलमनिस्ट को पूरा भरोसा है कि इससे और ज्यादा दमन होगा. मुझे इतना यकीन नहीं है. मुझे नहीं लगता कि उथल-पुथल वाली राजनीति के दौर में पक्की भविष्यवाणी की जा सकती है. राजनीति के अहम दौर में भविष्य आमतौर पर अनिश्चित होता है.
मेरे हिसाब से यह कल्पना करना मुश्किल है कि मोदी सरकार लगातार खराब होती स्थिति को कैसे रोक पाएगी, जिसे कभी उसकी बढ़ती हुई गहरी पकड़ कहा जाता था, खासकर राम मंदिर के निर्माण और फिर बंगाल में उसकी बड़ी चुनावी जीत के बाद. क्या वह अब वास्तव में वापसी कर सकती है? अगर हां, तो किस तरह? सच कहें तो किसी को नहीं पता.
लेकिन मौजूदा स्थिति का निश्चित रूप से एक वैचारिक और प्रासंगिक तरीके से विश्लेषण किया जा सकता है. ऐसा विश्लेषण सिर्फ सैद्धांतिक मामला नहीं है. कुछ मौकों पर सिद्धांत का वास्तविक स्थिति पर बहुत बड़ा असर हो सकता है.
भारत ने लोकतंत्र के सिद्धांतकारों को लंबे समय तक क्यों उलझाए रखा
लोकतंत्र के सिद्धांतकार लंबे समय से मानते रहे हैं कि भारत का लोकतंत्र ऐतिहासिक रूप से असाधारण रहा है. सबसे बड़ा मुद्दा आय और औद्योगीकरण था. सिर्फ अमीर और औद्योगिक देशों में ही लंबे समय तक लोकतंत्र बना रहा. तेल से अमीर मध्य-पूर्वी देशों को छोड़ दें तो लोकतंत्र मूल रूप से अमीर देशों का ही खेल रहा है. सिंगापुर एकमात्र ऐसा गैर-तेल-समृद्ध देश है, जो लोकतांत्रिक नहीं है और अब प्रति व्यक्ति आय के मामले में अमेरिका से भी ज्यादा अमीर है.
आज़ादी के बाद कई दशकों तक भारत गरीब और बहुत कम औद्योगीकृत था, फिर भी वह लोकतांत्रिक रहा. भारत के लोकतंत्र के लंबे समय तक टिके रहने की संभावना बहुत कम मानी जाती थी. इसलिए लोकतंत्र पर शोध करने वाले विद्वानों के लिए भारत का महत्व बहुत ज्यादा था.
1966 में ही बैरिंगटन मूर जूनियर, जो बेहद महत्वपूर्ण किताब ‘सोशल ओरिजिन्स ऑफ डिक्टेटरशिप एंड डेमोक्रेसी’ के लेखक थे, ने लिखा था:
“…एक राजनीतिक प्रजाति के रूप में, (भारत) आधुनिक दुनिया का हिस्सा है. 1964 में नेहरू की मृत्यु के समय राजनीतिक लोकतंत्र को 17 साल हो चुके थे. अगर यह अपूर्ण था, तो भी यह लोकतंत्र सिर्फ दिखावा नहीं था. एशियाई माहौल में और औद्योगिक क्रांति के बिना राजनीतिक लोकतंत्र काफी अजीब लग सकता है.”
इसके बाद 1989 में आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांत के जाने-माने संस्थापक रॉबर्ट डाल ने लिखा कि भारत लोकतांत्रिक सिद्धांत के लिए “आज के समय का एक प्रमुख अपवाद” था. आखिर में 2001 में पिछले कई दशकों के सबसे ज्यादा सांख्यिकीय तरीके से काम करने वाले लोकतंत्र सिद्धांतकार एडम प्रेजेवोर्स्की ने लिखा: “भारत में लोकतंत्र के खिलाफ संभावनाएं बेहद ज्यादा थीं.”
लेकिन यह दावा मुख्य रूप से भारत के चुनावी लोकतंत्र (electoral democracy पर लागू होता है. भारत ने उदार लोकतंत्र (liberal democracy) के रूप में उतना अच्छा काम नहीं किया है. उदार लोकतंत्र और चुनावी लोकतंत्र दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं. चुनावी लोकतंत्र का दायरा व्यापक है, क्योंकि सिर्फ चुनाव ही लोकतंत्र के सभी पहलुओं को पूरा नहीं करते.
स्वतंत्र और वास्तविक मुकाबले वाले चुनाव और सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार नहीं हो, तो आधुनिक लोकतंत्र संभव नहीं है. यह एक जरूरी शर्त है. लेकिन लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है.
उदार लोकतंत्र की अवधारणा में सिर्फ चुनाव ही नहीं आते, बल्कि यह भी शामिल है कि चुनी हुई सरकारें चुनावों के बीच कैसे काम करती हैं. एक उदार लोकतंत्र हमेशा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है, खासकर बोलने की आजादी और संगठन बनाने की आजादी की जिसे आज के समय में इसे “सिविल सोसाइटी” कहा जाता है.
उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि उदार लोकतंत्र अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है. तर्क यह है कि बहुसंख्यक अपनी संख्या के आधार पर खुद की रक्षा कर सकते हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों के पास इतनी संख्या नहीं होती. इसलिए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बिना लोकतंत्र सिर्फ बहुसंख्यकों की ताकत बन सकता है.
और अगर बोलने की आज़ादी के व्यक्तिगत अधिकार और नागरिकों के स्वतंत्र रूप से गैर-सरकारी संगठन बनाने के अधिकार की सुरक्षा न हो, तो चुनावी लोकतंत्र सामान्य रूप से एक कठोर सत्तावादी ताकत भी बन सकता है, भले ही चुनाव की आज़ादी मौजूद हो.
उदार लोकतंत्र के कमजोर होने से चुनावी लोकतंत्र के कमजोर होने तक
भारत में 2014 के बाद लोकतंत्र के चुनावी और उदार दोनों पहलुओं के बीच गहरा टकराव पैदा हुआ. कुल मिलाकर भारत का चुनावी लोकतंत्र काफी मजबूत बना रहा, लेकिन इसकी राजनीतिक व्यवस्था की उदारता में गंभीर गिरावट आई, क्योंकि बोलने की आजादी, सिविल सोसाइटी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमले हुए. पहले उदार लोकतंत्र कमजोर हुआ.
2024 के चुनावों के बाद चुनावी लोकतंत्र का कमजोर होना भी शुरू हुआ, जो स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) तक पहुंच गया. व्यावहारिक रूप से यह नागरिकों के वोट देने के अधिकार पर हमला है.
एसआईआर में दो वैचारिक बातें काम कर रही हैं:
(ए) वोट देने की पात्रता के लिए दस्तावेजों का पर्याप्त होना जरूरी मानना.
(बी) मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन की जिम्मेदारी नागरिकों पर डालना, जबकि परंपरागत रूप से यह सरकार की जिम्मेदारी रही है.
भारत के संस्थापकों की सोच थी कि गरीब नागरिकों के पास वोट के लिए खुद आगे आकर रजिस्ट्रेशन कराने की पर्याप्त शिक्षा या क्षमता नहीं होगी. इसलिए सरकार को गरीबों तक पहुंचना चाहिए और उन्हें मतदाता सूची में शामिल करना चाहिए और ऐसा किया भी गया.
अब चुनाव आयोग पर्याप्त दस्तावेज़ मांग रहा है, जिन्हें नागरिकों को देना होगा. बहुत बड़ी संख्या में खासकर गरीबों के पास पात्रता या नागरिकता साबित करने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ होने की संभावना कम है. कई अमीर लोग भी इससे प्रभावित होंगे, लेकिन वे इस समस्या को उस तरीके से ठीक कर सकते हैं जो गरीबों के लिए बेहद मुश्किल होगा. उनके खिलाफ परिस्थितियां हैं.
अमेरिका में, जहां वोट देने की पात्रता के लिए दस्तावेज़ के पर्याप्त होने की अवधारणा शुरू हुई थी, SIR के पीछे के विचार को सिद्धांत रूप में “वोटर सप्रेशन” यानी मतदाताओं को वोट देने से रोकना (Voter Suppression) कहा जाता है. ऐतिहासिक रूप से अश्वेत मतदाता और आज गरीब हिस्पैनिक मतदाता भी ऐसी जरूरतों से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. वी-डेम ने अमेरिका को लोकतांत्रिक गिरावट का सामना करने वाला देश बताया है. लोकतंत्र के कमजोर होने वाली सूची में भारत अकेला देश नहीं है.
लोकतंत्र के लिए जेन-ज़ी की लड़ाई
लोकतंत्र के अंधेरे होते रास्ते को पलटना ही वह लक्ष्य है, जिसे जेन-ज़ी हासिल करने की कोशिश कर रही है. यह सिर्फ सीजेपी या विपक्षी दलों को फायदा पहुंचाने की बात नहीं है. यह नागरिकों के मतदाता होने के सिद्धांत की बात है. चुनाव आयोग इस सिद्धांत का इस्तेमाल एक हथियार की तरह कर रहा है और इसका नतीजा यह हो रहा है कि लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किए जा सकते हैं.
इसे एक काव्यात्मक उदाहरण से समझें तो Gen Z वह चीज़ हासिल करना चाहती है, जिसे महान कवि साहिर लुधियानवी ने एक अलग संदर्भ में “वो सुबह कभी तो आएगी” कहा था—यानी “वह सुबह किसी दिन जरूर आएगी.”
साहिर एक वामपंथी आदर्श समाज चाहते थे. Gen Z लोकतंत्र वापस चाहती है. साहिर की फिल्मों के किरदार उम्मीद और दुआ कर रहे थे. भारत की Gen Z लड़ रही है, दुआ नहीं कर रही. और बिना डरे लड़ रही है.
आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.
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