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Wednesday, 7 October, 2026
होमदेशIDFC फर्स्ट बैंक फ्रॉड: CBI ने IAS आईएएस मोहम्मद शायिन की भूमिका पर उठाए सवाल

IDFC फर्स्ट बैंक फ्रॉड: CBI ने IAS आईएएस मोहम्मद शायिन की भूमिका पर उठाए सवाल

CBI का कहना है कि IAS अधिकारी मोहम्मद शायिन ने IDFC फर्स्ट बैंक को HPGCL के बैंकिंग मामलों में लाने में मदद की, जिससे 50 करोड़ रुपये उस अकाउंट में ट्रांसफर हो गए जिसका इस्तेमाल बाद में फ्रॉड में किया गया.

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गुरुग्राम: 19 फरवरी 2024 को हरियाणा पावर जनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीजीसीएल) के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने फोन पर छोटी सी बातचीत की. मैनेजिंग डायरेक्टर मोहम्मद शायिन ने अपने डायरेक्टर (फाइनेंस) अमित दीवान को एक मोबाइल नंबर भेजा और लिखा, “आईडीएफसी बैंक से रिभव मिलना चाहता है.”

इसके बाद दूसरा मैसेज आया. “अगर आप वहां हैं तो कृपया मिल लें या सीएओ को मिलने के लिए कहें.”

दीवान ने जवाब दिया कि वह समय तय कर देंगे. कोई नोट आगे नहीं बढ़ाया गया था. कोई फाइल नहीं खोली गई थी. एचपीजीसीएल में किसी ने नए बैंक खाते की जरूरत दर्ज नहीं की थी.

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का कहना है कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी मामले में एचपीजीसीएल से जुड़ी कड़ी, जिसमें हरियाणा सरकार और चंडीगढ़ नगर निगम के करीब 645 करोड़ रुपये के सरकारी पैसे का गबन हुआ, इसी बातचीत से शुरू होती है.

दो सितंबर 2026 को दाखिल अपनी चार्जशीट में एजेंसी का कहना है कि शायिन ने खुद रिभव ऋषि को निगम के बैंकिंग मामलों में शामिल किया. उस समय रिभव चंडीगढ़ के सेक्टर-32 में बैंक की शाखा के मैनेजर थे. सीबीआई का कहना है कि 20 महीने बाद शायिन फाइनेंस डिपार्टमेंट में बैठे और इस बात की सीमा हटा दी कि कोई सरकारी विभाग उसी बैंक में कितना सरकारी पैसा जमा कर सकता है.

सीबीआई इस भूमिका को एचपीजीसीएल से जुड़े साजिश वाले हिस्से में “शुरुआत की भूमिका” कहती है.

ये एजेंसी के आरोप हैं. इनमें से किसी आरोप को अदालत में पेश नहीं किया गया है. चार्जशीट में शायिन का पक्ष दर्ज नहीं है. उन्हें आरोपी नंबर 19 के तौर पर दर्ज किया गया है और उनकी गिरफ्तारी की स्थिति वाले कॉलम में “गिरफ्तार नहीं” लिखा है.

दिप्रिंट ने व्हाट्सऐप पर मैसेज के जरिए शायिन से संपर्क किया. अगर उनका जवाब मिलता है, तो इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

हरियाणा कैडर के 2002 बैच के आईएएस अधिकारी शायिन 8 जुलाई 2019 से 3 दिसंबर 2024 तक एचपीजीसीएल के मैनेजिंग डायरेक्टर थे. इसके बाद वह फाइनेंस डिपार्टमेंट में चले गए और इंस्टीट्यूशनल फाइनेंस एंड क्रेडिट कंट्रोल ऑफिस के डायरेक्टर-जनरल बने, जिसे आईएफसीसी कहा जाता है. आईएफसीसी उन नियमों को तय करता है कि सरकारी विभाग किन बैंकों का इस्तेमाल कर सकते हैं और उनमें कितना पैसा जमा कर सकते हैं. चार्जशीट के आरोपी से जुड़ी जानकारी वाले पेज पर उन्हें कमिश्नर और सेक्रेटरी, हाउसिंग फॉर ऑल बताया गया है.

सीबीआई ने भारतीय न्याय संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अलग-अलग धाराओं के तहत आपराधिक साजिश, सरकारी कर्मचारी द्वारा आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी, खातों में हेरफेर और अनुचित फायदा उठाने के आरोप लगाए हैं.

यह पैसा किसका था?

चार्जशीट HPGCL चैप्टर की शुरुआत ओनरशिप पर एक पॉइंट से करती है. HPGCL एक सरकारी कंपनी है. हरियाणा के गवर्नर के पास इसके 95.91 परसेंट शेयर हैं. 2024-25 में, राज्य ने 205.07 करोड़ रुपये की फ्रेश इक्विटी डाली. CBI का कहना है कि कॉर्पोरेशन के अधिकारियों ने जो भी रुपया हैंडल किया, वह पब्लिक का पैसा था, जिसे ट्रस्ट में रखा गया था.

इसे हैंडल करने के नियम थे. बैंकों के साथ डील करने के लिए फाइनेंस डिपार्टमेंट की 13 मार्च 2018 की पॉलिसी के अनुसार, नया अकाउंट खोलने से पहले IFCC से पहले अप्रूवल लेना ज़रूरी था. 12 जुलाई 2024 के एक मेमो में लिमिट जोड़ी गईं. इसने पहली बार राज्य की लिस्ट में दो नए बैंक, IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक को शामिल किया. इसमें कहा गया कि कोई डिपार्टमेंट किसी ऐसे फर्स्ट-टाइम बैंक में 50 करोड़ रुपये से ज़्यादा नहीं रख सकता जो स्मॉल फाइनेंस बैंक न हो. स्मॉल फाइनेंस बैंकों के लिए यह लिमिट 25 करोड़ रुपये थी. इसमें यह भी कहा गया कि हर बार डिपॉजिट करते समय ड्यू डिलिजेंस किया जाना चाहिए.

HPGCL के पास बैंकों की कमी नहीं थी. CBI का कहना है कि 19 फरवरी 2024 को, उसने अपना पैसा इंडसइंड, यस बैंक, केनरा, इंडियन ओवरसीज, HDFC और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में फैले 10 सेविंग्स अकाउंट में रखा था. उसके पास 10 कैश क्रेडिट लिमिट भी थीं.

एक दिन में अकाउंट खाली

ऋषि का ऑफर लेटर उसी दिन, 19 फरवरी 2024 को HPGCL पहुंचा, जिस दिन चैट हुई थी. यह मैनेजिंग डायरेक्टर के नाम पर था.

लेटर में कहा गया था कि IDFC फर्स्ट बैंक “अलग-अलग सरकारी डिपार्टमेंट और PSU में एम्पैनल्ड था”. CBI का कहना है कि यह झूठ था. राज्य ने बैंक को लगभग पांच महीने बाद, 12 जुलाई 2024 को एम्पैनल्ड किया.

सीनियर अकाउंट्स ऑफिसर दीप्ति कौशिक ने उसी दिन एक नोट भेजा. उन्होंने ड्राई फ्लाई ऐश फंड के नाम पर IDFC फर्स्ट बैंक में एक सेविंग्स अकाउंट का प्रस्ताव दिया, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल “फाइनेंशियल समझदारी दिखाते हुए भविष्य के मौकों का फायदा उठाने के लिए” किया जा सकता है. दीवान मान गए और फाइल भेज दी. 20 फरवरी को, शायिन ने उस पर दो शब्द लिखे: “खोला जा सकता है.”

फाइल शुरू होने से लेकर अप्रूवल तक लगभग एक दिन में हो गई.

चार्जशीट में कहा गया है कि 2018 की पॉलिसी को नज़रअंदाज़ किया गया. IFCC से कोई अप्रूवल तब या बाद में नहीं लिया गया. एम्पैनल्ड बैंकों से कोई कोटेशन नहीं मंगाए गए. फाइल में यह रिकॉर्ड नहीं था कि एक और अकाउंट की ज़रूरत क्यों थी. CBI ने आगे कहा कि शायिन ने एम्पैनलमेंट के बारे में ऋषि के दावे को फाइनेंस डिपार्टमेंट या बैंक के अपने रिकॉर्ड से चेक नहीं किया.

अकाउंट 27 फरवरी 2024 को खोला गया था. यह पंचकूला में ऊर्जा भवन में कॉर्पोरेशन के हेडक्वार्टर के पास नहीं खोला गया था. यह चंडीगढ़ के सेक्टर 32 में ऋषि की अपनी ब्रांच में खोला गया था.

फिर यह खाली पड़ा रहा. 27 फरवरी और 10 नवंबर 2024 के बीच, लगभग आठ महीने के गैप में कोई पैसा नहीं गया. CBI इस अकाउंट को “आगे होने वाले जुर्म की तैयारी का एक हिस्सा” बताती है.

6 नवंबर की मुलाकात

6 नवंबर 2024 को चीफ अकाउंट्स ऑफिसर बहादुर सिंह गोसाईं को मैनेजिंग डायरेक्टर के चैंबर में बुलाया गया.

चार्जशीट के मुताबिक, रिभव पहले से वहां बैठे थे और बातचीत चल रही थी. शायिन ने गोसाईं से कहा कि ड्राई फ्लाई ऐश खाते में उन्हें कुछ पैसे दिए जाएं.

गोसाईं दीवान के पास गए और उन्हें बताया कि एमडी ने क्या कहा है. सीबीआई का कहना है कि इसके बाद जो फैसला लिया गया, वह शायिन, दीवान और कौशिक ने “फाइल के बाहर” लिया. कोई नोट बनने से पहले ही उन्होंने पैसे जुटाने के लिए इंडसइंड बैंक में चल रही एक फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़ने का फैसला कर लिया.

एचपीजीसीएल के पास 108.47 करोड़ रुपये थे. इस पर ब्याज मिल रहा था. इसके बाद कौशिक ने नुकसान और फायदे का हिसाब तैयार किया. सीबीआई का कहना है कि उन्होंने यह हिसाब फैसला लिए जाने के बाद तैयार किया, ताकि फाइल नियमित प्रक्रिया के तहत चलती हुई दिखे. इसमें समय से पहले एफडी तोड़ने पर ब्याज के रूप में 1.65 करोड़ रुपये का नुकसान दिखाया गया. इसमें आईडीएफसी फर्स्ट बैंक से 14 प्रतिशत की दर पर 2.70 करोड़ रुपये का ब्याज मिलने की बात कही गई. एचपीजीसीएल को कुल 1.04 करोड़ रुपये का फायदा दिखाया गया.

यह हिसाब 11 नवंबर 2024 से 28 मार्च 2025 तक की अवधि के लिए था. 28 मार्च वह दिन था, जब इंडसइंड बैंक की एफडी मैच्योर होने वाली थी. वीकेंड से पहले सिर्फ दो कामकाजी दिन बचे थे, इसलिए हिसाब सोमवार से शुरू किया गया. सीबीआई का कहना है कि रकम, अवधि और ब्याज की दर पहले ही तय की जा चुकी थी. एजेंसी के मुताबिक, यह हिसाब “पहले से लिए गए फैसले के मुताबिक तैयार किया गया था”.

11 नवंबर को रिभव ने मैनेजिंग डायरेक्टर को एक चिट्ठी दी, जिसमें उस अवधि के लिए खाते पर सालाना 14 प्रतिशत ब्याज देने की पेशकश की गई थी. गोसाईं ने उस पर लिखा, “निर्देश के मुताबिक, इंडसइंड बैंक की एफडी से कुछ रकम समय से पहले निकालकर 50.00 करोड़ रुपये आईडीएफसी बैंक में ट्रांसफर करें.”

सीबीआई का कहना है कि “निर्देश के मुताबिक” का मतलब शायिन के निर्देश से था. उसी दिन रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) के जरिए 50 करोड़ रुपये भेज दिए गए.

चार्जशीट में यह भी बताया गया है कि सामान्य तौर पर फाइल किस तरह आगे बढ़नी चाहिए थी. एक सामान्य मामले में बैंक की चिट्ठी पहले आती. इसके बाद वह अधिकारियों की तय व्यवस्था के मुताबिक ऊपर जाती. हर स्तर पर यह देखा जाता कि एफडी तोड़ने से कितना नुकसान होगा और बैंक की ओर से दिए जा रहे ब्याज से कितना फायदा होगा. इस चर्चा के बाद फैसला लिया जाता, लेकिन यहां चिट्ठी पर की गई टिप्पणी खुद दिखाती है कि फैसला फाइल के जरिए नहीं लिया गया था.

14 प्रतिशत की पेशकश

चार्जशीट में इस ब्याज दर के बारे में कई पन्नों में जानकारी दी गई है. 11 नवंबर 2024 को आरबीआई की रेपो रेट 6.50 प्रतिशत थी. यह फरवरी 2025 में ही घटकर 6.25 प्रतिशत हुई. सीबीआई का कहना है कि सेविंग्स अकाउंट पर ब्याज की दर पहले से तय और सार्वजनिक होती है. किसी एक ग्राहक के लिए एक तय और अजीब समय अवधि के लिए इस दर पर बातचीत नहीं की जाती. एजेंसी के मुताबिक, रेपो रेट से दोगुने से भी ज्यादा ब्याज की पेशकश से किसी भी अधिकारी को समझ जाना चाहिए था कि यह बैंक की सामान्य पेशकश नहीं थी.

चिट्ठी पर अभय कुमार के हस्ताक्षर थे और सेक्टर-32 शाखा की मुहर लगी थी. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने सीबीआई को बताया है कि यह चिट्ठी कभी असली थी ही नहीं, बैंक के रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं थी और शाखा के कर्मचारियों ने बिना अधिकार के इसे जारी किया था. बैंक का कहना है कि उसने इस खाते पर कभी ऐसी ब्याज दर की पेशकश नहीं की.

सीबीआई इस पेशकश को एक जाल के तौर पर देखती है. एजेंसी के मुताबिक, रिभव अपने बैंक के लिए जमा राशि हासिल करने वाले शाखा मैनेजर की तरह काम नहीं कर रहे थे. बैंक के लिए सेविंग्स अकाउंट पर 14 प्रतिशत रिटर्न देने का वादा नुकसान वाला था. सीबीआई का कहना है कि इस जमा राशि का मकसद पैसा रिभव के निजी नियंत्रण में लाना था और “वादा किया गया ब्याज सिर्फ एक जाल था”.

ब्याज का भुगतान कैसे किया गया

इसके बाद सीबीआई ने यह देखा कि वादा किया गया ब्याज वास्तव में कैसे दिया गया.

सीबीआई का कहना है कि बैंक ब्याज की रकम सिस्टम में एक एंट्री के जरिए खाते में डालता है और स्टेटमेंट में ब्याज से जुड़ी जानकारी के साथ यह एंट्री दिखाई देती है. इस खाते में मिलने वाला असली ब्याज भी इसी तरह आया था और वह सामान्य सेविंग्स रेट के हिसाब से था. लेकिन बाकी रकम डिमांड ड्राफ्ट के जरिए आई. इन ड्राफ्ट के लिए पैसा निजी संस्थाओं के खातों से दिया गया था.

चार्जशीट में कहा गया है कि इन खातों में आया पैसा दूसरे सरकारी विभागों से लिए गए पैसों से आया था. इसमें हरियाणा स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड, वेलफेयर बोर्ड और पंचायत डिपार्टमेंट समेत कई अन्य विभागों के नाम दिए गए हैं. सीबीआई का कहना है कि इस तरह एचपीजीसीएल को कहीं और से लिया गया सरकारी पैसा ब्याज के रूप में दिया गया. एजेंसी के शब्दों में, एचपीजीसीएल को ब्याज के रूप में मिला पैसा “कानून की नजर में चोरी की संपत्ति था”.

कौशिक कई महीनों तक अभय कुमार और रिभव से बाकी रकम देने के लिए संपर्क करती रहीं. उन्होंने 7 जनवरी 2025 को लिखा और 21 और 24 जनवरी को याद दिलाया. 24 जनवरी को कुमार ने जवाब दिया कि एक “आंतरिक समस्या” की वजह से रकम खाते में आने में देरी हुई और इसे जमा कर दिया जाएगा. सीबीआई इस जवाब को इस बात के तौर पर देखती है कि दोनों बैंक अधिकारियों ने 14 प्रतिशत ब्याज देने के वादे की जिम्मेदारी ली थी. एजेंसी का कहना है कि कोई अधिकारी ऐसी रकम के लिए किसी व्यक्ति के पीछे नहीं पड़ता, जिसे बैंक अपने सिस्टम से अपने आप खाते में डालता है.

29 मार्च 2025 को 51,55,59,059 रुपये एचपीजीसीएल के पंचकूला स्थित एचडीएफसी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिए गए.

चार्जशीट में कहा गया है कि एचपीजीसीएल की किताबों में दर्ज ब्याज की एंट्रियां झूठी थीं. इसमें कहा गया है कि ब्याज के सर्टिफिकेट फर्जी थे. सीबीआई के मुताबिक, बैंक से 14 प्रतिशत की दर पर मिलने वाली ब्याज की रकम का ऐसा कोई संपत्ति वाला अधिकार कभी था ही नहीं. एजेंसी के शब्दों में, खातों में “एक काल्पनिक हक को दिखाया गया था”.

काली स्याही का निशान

चार्जशीट में इसके बाद एचपीजीसीएल एम्प्लॉयी पेंशन फंड ट्रस्ट का मामला आता है. शायिन इसके चेयरमैन और ट्रस्टी थे और साथ ही मैनेजिंग डायरेक्टर भी थे.

16 जुलाई 2024 को आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के गवर्नमेंट बैंकिंग ग्रुप के एरिया हेड शमीम दार ने ट्रस्ट का खाता खोलने का प्रस्ताव भेजा. एचपीजीसीएल को यह प्रस्ताव 18 जुलाई को मिला. 2 अगस्त को एक डिविजनल अकाउंटेंट ने एक नोट आगे बढ़ाया, जिसमें ब्याज दरों के आधार पर चार बैंकों में खाते खोलने का प्रस्ताव था. ये बैंक थे—आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (सेक्टर 8, पंचकूला), बंधन बैंक, जना स्मॉल फाइनेंस बैंक और उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक.

नोट कई अधिकारियों और ट्रस्टियों के पास गया. सीबीआई का कहना है कि सभी ने इसे उसी तरह आगे बढ़ाया. शायिन ने काली स्याही से एक बैंक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक, पर निशान लगा दिया. उन्होंने इसकी कोई वजह दर्ज नहीं की.

मंजूरी पंचकूला के सेक्टर 8 स्थित शाखा के लिए थी, जो ऊर्जा भवन के पास है. खाता 14 अगस्त 2024 को चंडीगढ़ के सेक्टर 32 में खोला गया. खाता खोलने का फॉर्म लेने आए बैंक के प्रतिनिधि भी सेक्टर 32 शाखा से ही आए थे.

सीबीआई का कहना है कि शायिन ने नोट के आखिरी हिस्से को ध्यान से नहीं पढ़ा और उन्हें “आईडीएफसी फर्स्ट बैंक को प्राथमिकता” थी. उन्होंने “उसकी योग्यता पर विचार किए बिना” उस पर निशान लगा दिया. एजेंसी का कहना है कि सेक्टर 32 शाखा के अधिकारियों के साथ उनकी नजदीकी को देखते हुए वहां खाता खुलना “उनसे जुड़ा हुआ है”.

शुरुआत में खाते में पैसा नहीं आया. ट्रस्ट ने ब्याज दर के आधार पर पैसा लगाने का फैसला किया था और आईडीएफसी की दर प्रतिस्पर्धी नहीं थी. 26 सितंबर 2024 को ईमेल के जरिए ट्रस्ट को एक चिट्ठी मिली, जिसमें एक हफ्ते के लिए 8.6 प्रतिशत ब्याज देने की पेशकश की गई थी. इसके बाद 26 और 27 सितंबर को तीन बार में कुल करीब 12.25 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए.

इसके बाद चार्जशीट में बताया गया है कि खाते से कितना पैसा निकला. मार्च से सितंबर 2025 के बीच नौ डेबिट के जरिए इस खाते से 19,71,74,595 रुपये निकाले गए. इसमें से ज्यादातर पैसा दो ऐसी कंपनियों को गया, जिन्हें सीबीआई ने शेल कंपनियां बताया है. इनके नाम कैपको फिनटेक सर्विसेज और स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स हैं. कुछ पैसा उसी शाखा में मौजूद एक दूसरे ड्राई फ्लाई ऐश खाते में गया. सीबीआई का कहना है कि ये रकम फर्जी डेबिट नोट के जरिए निकाली गई, जिन पर फर्जी हस्ताक्षर थे. जून 2025 में एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में खोले गए ट्रस्ट के दूसरे खाते से भी एक ही डेबिट में 25 करोड़ रुपये और निकाल लिए गए.

चार्जशीट में इन नुकसानों को उस साजिश में शामिल नुकसान बताया गया है, जिसमें शायिन का नाम है. इसमें यह नहीं कहा गया है कि ये डेबिट शायिन ने किए थे.

हॉस्पिटैलिटी वाला पहलू

चार्जशीट में तीन बिल दिए गए हैं, जिनकी कुल रकम 1,67,101 रुपये है. सीबीआई इन्हें रिभव की ओर से दिए गए अनुचित फायदे के तौर पर देखती है.

पहला बिल चंडीगढ़ के सेक्टर 17 स्थित हयात सेंट्रिक का है. यह 8 मई 2025 का है और रकम 73,073 रुपये है. यह टेबल नंबर 42 का बिल था, जो शायिन के नाम पर था और इसका भुगतान नकद किया गया था. सीबीआई का कहना है कि रिभव ने सात या आठ दिन बाद यह नकद रकम दी थी.

दूसरा बिल उसी होटल के कोयो रेस्टोरेंट का है. यह 3 नवंबर 2025 का है और रकम 35,629 रुपये है. मेहमान का नाम “शायिन” लिखा था और मोबाइल नंबर भी दिया गया था. सीबीआई का कहना है कि उनके साथ आए लोग बाहर के हिस्से में बैठे थे और पार्टी का भुगतान रिभव ने किया था.

तीसरा बिल 10 जनवरी 2025 को कॉर्बीज रेस्टोरेंट का है. इसकी रकम 58,399 रुपये थी. खाने का बिल 35,444 रुपये था. शराब का बिल 22,955 रुपये था. दोनों का भुगतान नकद किया गया. होटल के असिस्टेंट फूड एंड बेवरेजेज मैनेजर ने सीबीआई को बताया कि पार्टी के बाद उन्होंने शायिन को बताया कि “सब कुछ श्री रिभव ऋषि ने संभाल लिया था”. इसका मतलब था कि भुगतान रिभव ने किया था. होटल के जनरल मैनेजर ने एक व्हाट्सऐप चैट भी दी, जिसमें उन्होंने पूछा था कि पार्टी कैसी रही. शायिन ने जवाब दिया कि सब अच्छा था.

तीनों तारीखें शायिन के एचपीजीसीएल छोड़ने के बाद की हैं. पहली तारीख उनके एचपीजीसीएल छोड़ने के पांच हफ्ते बाद की है. सीबीआई का कहना है कि इससे उसका मामला कमज़ोर नहीं होता. एजेंसी के मुताबिक, यह फायदा उस समय स्वीकार किया गया, जब एचपीजीसीएल से जुड़े लेन-देन अभी चल रहे थे और शायिन के फाइनेंस डिपार्टमेंट में जाने के बाद भी यह जारी रहा. चार्जशीट में कहा गया है कि उन्होंने न तो इसे लेने से इनकार किया, न पैसा वापस किया और न ही इसकी जानकारी दी.

सीबीआई ने हेमराज के बयान पर भी भरोसा किया है, जो कई सालों तक रिभव की गाड़ी चलाता था. हेमराज ने सीबीआई को बताया कि उसने आठ से नौ बार रिभव को चंडीगढ़ के सेक्टर 16ए में शायिन के घर के बाहर छोड़ा था. यह कोने वाला घर है. उसे याद है कि रिभव फोन पर कुमार से कहते थे, “शायिन साहब के घर चलना है, मीटिंग है.” हेमराज ने कहा कि जब रिभव शायिन से बात करते थे तो उनका बोलने का अंदाज बदल जाता था और वह उन्हें “शायिन सर” कहते थे.

हेमराज ने यह भी बताया कि रिभव कभी-कभी सेक्टर 32 शाखा के पास अपनी गाड़ी छोड़ देते थे और आरोपी नंबर 18 विक्रम वाधवा के साथ दूसरी गाड़ी में घर जाते थे. हेमराज के मुताबिक, रिभव ने उसे बताया था कि वाधवा ने उसकी मुलाकात शायिन समेत वरिष्ठ अधिकारियों से कराई थी. सीबीआई का कहना है कि गाड़ी पीछे छोड़ना दिखाता है कि इन मुलाकातों का कोई रिकॉर्ड या सुराग न रहे, इसका ध्यान रखा गया था.

सीमा

मामले का आखिरी हिस्सा फाइनेंस डिपार्टमेंट से जुड़ा है.

12 जुलाई 2024 को डिपार्टमेंट ने एक सीमा तय की थी. कोई भी विभाग पहली बार सूची में शामिल किए गए बैंक में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा नहीं कर सकता था.

सितंबर 2025 में जमा रकम की सीमा से जुड़ी एक फाइल मुख्यमंत्री के पास गई. सीबीआई का कहना है कि 23 सितंबर को उन्होंने तीन चीजों को मंजूरी दी. डीसीबी बैंक को सूची में शामिल किया जाएगा. बंधन बैंक के लिए 50 करोड़ रुपये की सीमा हटा दी जाएगी. एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक और जना स्मॉल फाइनेंस बैंक की सीमा बढ़ाकर 50 करोड़ रुपये की जाएगी. इस मंजूरी में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक का नाम नहीं था.

जब फाइल वापस आई तो शायिन, जो अब आईएफसीसी के डायरेक्टर-जनरल थे, ने उस पर लिखा, “जारी करने से पहले ड्राफ्ट दिखाएं.”

26 सितंबर को बैंकिंग एसोसिएट अजय शर्मा ने ड्राफ्ट आगे बढ़ाया. चीफ फाइनेंशियल एडवाइजर किरण लेखा वालिया ने लिखा कि बंधन और आईडीएफसी पहली बार सूची में शामिल किए गए दो बैंक थे, जो स्मॉल फाइनेंस बैंकों के अलावा थे. उन्होंने लिखा कि “नीति के मुताबिक” दोनों के लिए सीमा बढ़ाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि बाकी बिंदुओं को दूसरे ड्राफ्ट, डीएफए-2, में लिया जाएगा और इसे “उचित मंजूरी के बाद” बदला जाएगा.

सीबीआई “उचित मंजूरी” का मतलब उसी अधिकारी यानी मुख्यमंत्री की मंजूरी से लेती है. एजेंसी का कहना है कि शायिन ने इसे अपनी मंजूरी समझ लिया, मुख्यमंत्री के सीमित फैसले को सभी बैंकों के लिए सीमा हटाने के सामान्य फैसले में बदल दिया और नोटिफिकेशन जारी होने दिया.

सीबीआई ने इस बारे में कई बातें कही हैं.

एजेंसी का कहना है कि आगे कोई मंजूरी नहीं ली गई, जबकि इसके लिए रास्ता मौजूद था. यह बात मूल प्रस्ताव में शामिल की जा सकती थी, बाद में इसकी मंजूरी ली जा सकती थी या नई नोटशीट के जरिए इसे आगे बढ़ाया जा सकता था. फाइल कुछ ही दिन पहले मुख्यमंत्री के पास गई थी. सीबीआई का कहना है कि 12 जुलाई 2024 की नीति में सीमा हटाने के बारे में कुछ नहीं कहा गया था और ऐसा कोई नियम भी नहीं था कि एक बैंक को दी गई छूट सभी बैंकों पर लागू करनी होगी. एजेंसी के शब्दों में, एकरूपता की दलील “बाद में नीति का रूप देकर पेश की गई बात” है.

सीबीआई का कहना है कि फाइल पर आवेदन बंधन, एयू और जना की ओर से आए थे. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने आवेदन नहीं किया था. कर्नाटक बैंक और कैपिटल स्मॉल फाइनेंस बैंक ने भी आवेदन किया था, लेकिन पात्रता पूरी नहीं होने के कारण उन्हें कुछ नहीं मिला. फिर भी जिस बैंक ने कुछ मांगा ही नहीं था, उसे सबसे बड़ा फायदा मिला.

नोटिफिकेशन में इक्विटास, उज्जीवन और उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंकों का नाम भी था. सीबीआई का कहना है कि इन बैंकों में बहुत कम या कोई सरकारी जमा रकम नहीं थी. इससे इस फैसले को “सामान्य नीति के फैसले जैसा रूप” मिला. एजेंसी का कहना है कि असल में इसका फायदा केवल आईडीएफसी फर्स्ट बैंक को मिला और उसके अंदर भी सेक्टर 32 शाखा को.

चार्जशीट में कहा गया है कि नोटिफिकेशन के बाद पंचकूला नगर निगम ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा किए. इसमें कहा गया है कि पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की ओर से पहले तय सीमा से ज्यादा पैसा जमा किया जाना, जो तब तक नियमों का उल्लंघन था, इस नोटिफिकेशन के बाद सही हो गया.

सीबीआई एक सर्कुलर का भी हवाला देती है. जुलाई 2025 में, इस घटना से कुछ हफ्ते पहले, फाइनेंस डिपार्टमेंट ने सभी विभागों को बैंकों के साथ काम करने में गंभीर और लगातार नियमों का पालन नहीं करने के बारे में लिखा था. इसमें बिना जरूरी नजदीकी नियमों के खाते खोलने, निजी पसंद के आधार पर बैंक चुनने और “पक्षपात के संकेत” मिलने की बात कही गई थी. इसमें उदाहरण दिया गया था कि पंचकूला के कार्यालय बिना किसी वजह के चंडीगढ़ में खाते खोल रहे थे. सीबीआई का कहना है कि ऐसा सर्कुलर जारी करने वाला विभाग शायिन का अपना आईएफसीसी था. एजेंसी का कहना है कि उन्हें पूरी जानकारी थी कि ये नियमों से हटकर किए गए काम काफी हद तक आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और उसकी सेक्टर 32 शाखा से जुड़े थे.

चार्जशीट में ज्यादा सीमा तय करने की जरूरत या उसके फायदे पर सवाल नहीं उठाया गया है. इसे “वित्तीय नीति का मामला” बताया गया है. सीबीआई की आपत्ति बदलाव लाने के तरीके और इस बात पर है कि शायिन ने इसकी कोई वजह दर्ज नहीं की.

सीबीआई का अनुमान है कि शायिन यह कह सकते हैं कि फाइल पर मौजूद एक नोट में आईएफसीसी के डायरेक्टर-जनरल को सक्षम अधिकारी बताया गया था. सीबीआई का कहना है कि उनकी भूमिका केवल मुख्यमंत्री की मंजूरी को नोटिफिकेशन में बदलने तक थी, इससे ज्यादा नहीं.

बैंक ने क्या कहा

बैंक ने इस मुद्दे पर भी कुछ कहा है. गवर्नमेंट बैंकिंग के रीजनल हेड अनीश कपूर ने 14 मई 2026 को सीबीआई को बताया कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने 50 करोड़ रुपये की सीमा हटाने का कोई प्रस्ताव कभी नहीं भेजा था. उन्होंने कहा कि सीमा हटाए जाने पर बैंक “हैरान” था. उन्होंने कहा कि अगर बैंक की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव दिया गया था, तो उन्हें नहीं पता कि इसे किसने दिया था.

चार्जशीट में 14 प्रतिशत वाली चिट्ठी पर भी बैंक का पक्ष दर्ज है. बैंक ने सीबीआई को बताया कि उसने कभी ऐसी ब्याज दर की पेशकश नहीं की थी.

सीबीआई का कहना है कि उसके पास क्या सबूत हैं

एजेंसी ने शायिन के खिलाफ अपने सबूतों की सूची दी है. इसमें 19 फरवरी 2024 की व्हाट्सऐप चैट और कॉल रिकॉर्ड, 19 और 20 फरवरी की पेशकश वाली चिट्ठी और नोट, और 12 जुलाई 2024 का बैंक सूची में शामिल करने वाला मेमो शामिल है. इसमें 11 नवंबर 2024 की चिट्ठी और बैंक का जवाब भी शामिल है, जिसमें उसने कहा था कि उसने ऐसी पेशकश कभी नहीं की. इसमें पेंशन फंड की फाइल में काली स्याही से लगाया गया निशान, आईएफसीसी की फाइल और 9 अक्टूबर 2025 का मेमो, होटल के रिकॉर्ड और वालिया, गोसाईं और हेमराज के बयान भी शामिल हैं.

सीबीआई ने साजिश से जुड़े नुकसान के तौर पर ड्राई फ्लाई ऐश खाते में 59.46 करोड़ रुपये और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में पेंशन फंड ट्रस्ट के खाते में 19.71 करोड़ रुपये का नुकसान बताया है. इसके अलावा एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में 25 करोड़ रुपये और इंडसइंड बैंक की एफडी को समय से पहले तोड़ने पर एचपीजीसीएल को हुए 1.66 करोड़ रुपये के नुकसान को भी इसमें जोड़ा गया है.

चार्जशीट में कहा गया है कि शायिन ने रिभव, दीवान, कौशिक, राजेश गोयल और अन्य लोगों के साथ साजिश की. इसमें विश्वासघात, धोखाधड़ी, मूल्यवान दस्तावेज की जालसाजी, खातों में हेरफेर, गबन की गई संपत्ति से लेन-देन, सबूत के तौर पर जरूरी दस्तावेजों को छिपाने और अनुचित फायदा लेने के आरोप लगाए गए हैं.

मामला पंचकूला की सीबीआई स्पेशल जज की अदालत में है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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