वाह! मामला इतनी जल्दी इतना बढ़ गया! हम फिर ऐसे वीडियो देख रहे हैं, जिनमें पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी कर रहे हैं. ऐसा तब हो रहा है, जब उन्होंने पहले अपने नाम वाले बैज हटा दिए, जिन्हें पहनना उनके लिए ज़रूरी है और ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग ने भारत के लोगों से झूठ बोला, जब उसने यह कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने विवादित फॉर्म 6 को मंजूरी दी है. इस फॉर्म की वजह से मतदाताओं को काफी परेशानी हुई है और चुनाव आयोग की ईमानदारी पर भी और सवाल खड़े हुए हैं.
जब जंतर-मंतर पर पहले प्रदर्शन शुरू हुए थे, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि उनका बहुत ज्यादा असर होगा. इससे पहले पेपर लीक को लेकर भी प्रदर्शन हुए थे, लेकिन वे काफी जल्दी खत्म हो गए थे और जहां तक कॉकरोच जनता पार्टी का सवाल है, राजनीतिक व्यवस्था ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. इसे सोशल मीडिया की एक घटना माना गया, जिसे जमीन पर बहुत कम समर्थन मिलने की बात कही गई.
यही वजह है कि सरकार ने इतना गलत अनुमान लगाया. उसे लगा कि सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी को अपने पक्ष में किया जा सकता है और ऐसा हुआ भी और प्रदर्शन शांत हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
उन्होंने प्रदर्शनकारियों की उम्र और लिंग को लेकर भी गलत निष्कर्ष निकाला और माना कि अगर पुलिस आतंक का माहौल बना देगी, तो युवा लोग और खासकर महिलाएं डरकर अपने घर चली जाएंगी.
लेकिन जैसा कि अब हम जानते हैं, दिल्ली पुलिस की बर्बरता और उनके साथ आए गुंडों के व्यवहार ने ही भारत के लोगों को बहादुर प्रदर्शनकारियों का साथ देने के लिए मजबूर किया. इनमें से कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी के गुंडों से डरा नहीं.
मैंने तब लिखा था कि इस पूरी नाकामी से बाहर निकलने के लिए सरकार ने दो तरफ की रणनीति बनाई थी. एक तरफ, वह युवाओं तक सीधे पहुंचने की कोशिश करेगी. इसके लिए वह युवाओं के बातचीत करने के तरीके की नकल करने की कोशिश करेगी, जिसमें नाक आगे करके बनाए गए सेल्फी वीडियो और ऐसे शब्दों का इस्तेमाल शामिल था, जिन्हें वह युवाओं की भाषा मानती थी. दूसरी तरफ, वह अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों का इंतजार करेगी. उसे भरोसा था कि वह चुनाव जीत जाएगी और इसके बाद यह दावा कर सकेगी कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और नैतिक प्रभाव दोनों अभी भी कायम हैं. उसे पता था कि आगे और भी आंदोलन हो सकते हैं, लेकिन जैसे ही यूपी के नतीजे आएंगे, वह यह दावा करेगी कि प्रदर्शनकारी देश के लोगों की सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे.
ज्ञानेश कुमार की समस्या
इस रणनीति को सफल बनाने के लिए चुनाव आयोग की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी. मुख्य चुनाव आयुक्त को बस कुछ महीनों तक चुपचाप काम करना था और यह सुनिश्चित करना था कि बीजेपी यूपी में जीत जाए. समस्या यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेवकूफी से ज्यादा सिर्फ उनका घमंड है.
इसका एक साफ उदाहरण दिल्ली में एसआईआर की प्रक्रिया है. सच कहें तो दिल्ली में मतदाता सूची में हेरफेर करने से बीजेपी को बहुत ज्यादा फायदा मिलने वाला नहीं था, क्योंकि यहां अगला विधानसभा चुनाव 2030 तक नहीं होना है और लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली से सीटों की संख्या काफी कम है.
फिर भी ज्ञानेश कुमार की इतनी बेवकूफी थी और पश्चिम बंगाल में बीजेपी की शानदार सफलता के बाद उनमें इतना घमंड आ गया था कि उन्होंने लगभग सभी लोगों की आपत्तियों के बावजूद, यहां तक कि चुनाव आयोग में अपने साथियों की आपत्तियों के बावजूद, ऐसी प्रक्रिया को मंजूरी दे दी, जिसमें एसआईआर की गणना के दौरान दिल्ली की करीब 1.45 करोड़ मतदाता आबादी में से लगभग 47 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. बाकी बचे करीब 97 लाख मतदाताओं में से लगभग 33 लाख लोगों को नोटिस जारी किए गए.
इनमें से बहुत से लोग वास्तव में बीजेपी के मतदाता थे और दूसरे ऐसे बुजुर्ग लोग थे, जिन्होंने पहले वोट दिया था और अक्सर हर चुनाव में वोट दिया था. भले ही आप विपक्ष के इस दावे को मान लें कि ज्ञानेश सीधे-सादे व्यक्ति नहीं हैं, फिर भी यह चुनाव में धांधली का सबूत नहीं था (वह बाद में सामने आता है), बल्कि पूरी तरह अक्षमता का सबूत था. तब तक ज्ञानेश को संदेह का लाभ देने को तैयार रहे लोगों ने भी मान लिया कि वह या तो अक्षम हैं या फिर बेईमान हैं. आखिर वह भारत के लोकतंत्र की बुनियादी चुनावी व्यवस्था के साथ इतनी पूरी तरह छेड़छाड़ क्यों करते?
दिल्ली में नाम हटाए जाने को लेकर हुए हंगामे के साथ ही द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल भी सामने आई. इसमें बताया गया कि ज्ञानेश ने अपने साथी चुनाव आयुक्तों के विरोध को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया और मतदाता सूची तैयार करने में मदद करने वाली केंद्रीकृत कंप्यूटर प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.
इनमें से एक मुद्दा फॉर्म 6 में बदलाव का था, जिसे सभी मतदाताओं को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए भरना होता है. एक्सप्रेस की पड़ताल में कहा गया कि विवादित बदलाव दूसरे चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद मनमाने तरीके से किए गए थे. उन्होंने बताया था कि चुनाव आयोग अपनी मर्जी से इस फॉर्म में बदलाव नहीं कर सकता क्योंकि इसका प्रारूप 1960 के रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स के तहत तय किया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने फिर भी बदलाव कर दिए. जब यह पड़ताल सामने आई, तो उन्होंने आयोग से यह कहने को कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फॉर्म 6 को मंजूरी दी है.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ था. कम से कम सोमवार को कोर्ट ने साफ तौर पर यही कहा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “हमने किसी भी बदले हुए फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है. यह बात साफ है.”
तो क्या ज्ञानेश कुमार अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए झूठ बोल रहे थे? विपक्ष ने तो यही दावा किया. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “अब यह पूरी तरह साबित हो गया है कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म 6 में गैरकानूनी और एकतरफा तरीके से बदलाव किया. यह उनके पद का दुरुपयोग करके बीजेपी की मदद करने का एक और सबूत है.”
आयोग के लिए यह थप्पड़ जैसा झटका लगभग अभूतपूर्व है. जंतर-मंतर के प्रदर्शनों की पूरी नाकामी के बाद, जो इसलिए बड़ा मामला बन गया था क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने में बहुत देर कर दी थी, साफ समाधान यह था कि सरकार ज्ञानेश को चुनाव आयोग से हटा दे और उन्हें किसी राज्य का राज्यपाल या ऐसा ही कोई पद दे दे.
प्रधानमंत्री ने ऐसा दो वजहों से नहीं किया. पहली वजह वही पुरानी थी: मोदी को लगता है कि जनता के दबाव के आगे झुकने से वह कमजोर दिखेंगे. दूसरी वजह ज्यादा महत्वपूर्ण थी: बीजेपी को यूपी चुनाव जीतने में मदद के लिए ज्ञानेश की जरूरत है.
प्रदर्शनकारियों को मिला विरोध का नया मुद्दा
इस सख्त रुख के साथ सरकार ने जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों को विरोध का एक नया मुद्दा दे दिया है. हम पहले हुए परीक्षा विरोध प्रदर्शनों की धीमी गति वाली तस्वीर फिर से देख रहे हैं, जिसमें पुलिस की मनमानी कार्रवाई और बर्बरता के वैसे ही आरोप सोशल मीडिया पर गूंज रहे हैं, लेकिन इस बार सामने कोई आसान समाधान नहीं है. सरकार की मदद करने के लिए कोई वांगचुक नहीं है. कुर्बानी देने के लिए कोई प्रधान नहीं है और कॉकरोच जनता पार्टी जानती है कि अगर उसने प्रदर्शन छोड़ दिया, तो उसका असर कम हो जाएगा. इसलिए वह प्रदर्शन को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश करेगी.
अब दो चीज़ें हो सकती हैं. पहला विकल्प यह है कि सरकार अपना सख्त रुख बनाए रखे. ऐसी स्थिति में लोगों को लगेगा कि चुनाव में धांधली करने के लिए उसे बदनाम हो चुके ज्ञानेश की जरूरत है और यूपी में कोई भी जीत अपनी विश्वसनीयता खो देगी. यह साबित करने के बजाय कि सरकार की नैतिक ताकत अभी भी कायम है, इसका उल्टा असर होगा. अगर बीजेपी समझौता किए जा चुके चुनाव आयोग की मदद से जीतती है, तो लड़ाई सड़कों पर आ सकती है.
देश के दूसरे हिस्सों में युवाओं के प्रदर्शन शायद धीरे-धीरे शांत हो जाएं, लेकिन अगली बार जब कोई घोटाला या विवादित मुद्दा सामने आएगा, तो वे फिर नए जोश के साथ सड़कों पर उतर सकते हैं. और पिछले एक महीने की घटनाओं को देखते हुए ऐसा जल्द ही होने की संभावना है. यूपी में चाहे जो भी हो, मुझे नहीं लगता कि जब तक ज्ञानेश अपने पद पर हैं, तब तक प्रधानमंत्री मोदी की नैतिक ताकत बढ़ेगी.
दूसरा विकल्प यह है कि ज्ञानेश को हटाकर एक झटके में प्रदर्शन खत्म कर दिया जाए. हां, इससे प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ेगा, लेकिन अगर सरकार समझदारी से अपने पत्ते खेले, तो इसका श्रेय सीजेपी को दिया जा सकता है और कांग्रेस और सीजेपी के बीच दरार पैदा करके विपक्ष को बांटा जा सकता है. हां, ज्ञानेश के बिना यूपी हारने का खतरा हो सकता है, लेकिन यह जोखिम उठाना फायदेमंद हो सकता है—अगर ज्ञानेश की मदद के बिना बीजेपी यूपी जीत जाती है, तो वह अपने कई आलोचकों को चुप करा देगी और बीजेपी नैतिक बढ़त का दावा कर सकेगी.
मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी कुछ दिन इंतज़ार करेंगे, देश के माहौल को समझेंगे और फिर तय करेंगे कि आगे क्या करना है, लेकिन यह फैसला देर-सवेर नहीं, बल्कि जल्द लेना होगा.
वीर सांघवी प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडस है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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