भारतीय जनता पार्टी का कांग्रेस जैसा बनना कोई नई बात नहीं है. हाईकमान की संस्कृति, ज्यादातर राज्यों में कमजोर नेतृत्व को आगे करना, चापलूसी, सत्ता का घमंड और ऐसी ही कई बातें बीजेपी में दिखाई देने लगी हैं.
आखिरी वाली बात का एक उदाहरण देखिए. राजधानी में बार-बार बलात्कार और हत्या की घटनाओं के बावजूद केंद्र सरकार की चुप्पी पर गौर कीजिए. दिल्ली में महिलाओं के विरोध प्रदर्शन का भी कोई असर नहीं पड़ा.
कांग्रेस पार्टी की एक और बड़ी आदत थी कबीर की इस सलाह के बिल्कुल उलट काम करना—“काल करे सो आज कर” यानी जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लो. इसके उलट कांग्रेस फैसले लेने से बचने के लिए काम को लगातार टालती रहती थी. बीजेपी ने कांग्रेस की इस आदत को बड़े स्तर पर अपना लिया है.
जब तक पार्टी ने जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी को पार्टी अध्यक्ष बनाने का फैसला किया, तब तक नड्डा अपना दूसरा कार्यकाल लगभग पूरा कर चुके थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब भी अपने मंत्रियों को असमंजस में रखे हुए हैं क्योंकि कैबिनेट में बदलाव को लेकर सस्पेंस जारी है. कई मंत्री अब एक से ज्यादा मंत्रालय संभाल रहे हैं. वहीं कई दूसरे मंत्री राजनीतिक समझौते के कारण पद पर बने हुए हैं. इसका असर अब सरकार के कामकाज में भी दिखाई देने लगा है.
मिसाल के तौर पर Micro, Small and Medium Enterprises (MSME) मंत्रालय को देखिए. यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है. हो सकता है आपको MSME मंत्री का नाम याद न हो. यह आपकी याददाश्त की समस्या नहीं है. बल्कि इसलिए कि उन्होंने ऐसा बहुत कम काम किया है जिसे याद रखा जाए.
मंत्री का नाम जीतन राम मांझी है. वह आखिरी बार तब सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने विधायकों को सलाह दी थी कि वे अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाले फंड से 5 से 10 प्रतिशत कमीशन या कट ले लें.
वह हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेकुलर) के प्रमुख हैं. बिहार में उनकी पार्टी का एक लोकसभा सदस्य और पांच विधायक हैं. फिर प्रधानमंत्री मोदी ने 81 साल के इस नेता को इतना महत्वपूर्ण मंत्रालय क्यों दिया है?
शायद इसलिए क्योंकि वह मुसहर समुदाय से आते हैं. मुसहर बिहार की आबादी में करीब 3 प्रतिशत हैं और यह दलितों की एक उप-जाति है. मोदी कैबिनेट में एक और महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने वाले दलित नेता चिराग पासवान हैं. वह पासवान/दुसाध उप-जाति से आते हैं और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता हैं. वह फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज़ मंत्री हैं. दुसाध बिहार की आबादी का 5.31 प्रतिशत हैं.
बिहार से कैबिनेट में दो और सदस्य हैं, जिनके पास बहुत महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं. ये हैं बीजेपी के कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह और जनता दल (यूनाइटेड) के पंचायती राज एवं मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह. दोनों भूमिहार समुदाय से आते हैं. बिहार की आबादी में भूमिहारों की हिस्सेदारी 2.9 प्रतिशत है.
इस तरह प्रधानमंत्री को छोड़कर 29 कैबिनेट मंत्रियों में से चार बिहार से हैं. हो सकता है आपको उनके मंत्रालयों के बारे में सिर्फ औपचारिक भाषणों और सामान्य बैठकों के अलावा ज्यादा सुनने को न मिले, तो फिर प्रधानमंत्री मोदी उन्हें कैबिनेट में क्यों बनाए हुए हैं?
निश्चित रूप से उनके मंत्री के तौर पर प्रदर्शन की वजह से नहीं. बल्कि उनके काम न करने के बावजूद. यह राजनीतिक समझौते की बात है. इनमें से तीन बीजेपी के सहयोगी दलों से हैं, जिनके लोकसभा में 18 सांसद हैं. अगर उनकी जातियों को भी ध्यान में रखा जाए, तो ये सभी मिलकर बिहार की कुल आबादी का करीब 11 प्रतिशत हिस्सा बनते हैं.
एक गहरी खामोशी
आप जब दूसरे कैबिनेट मंत्रियों के कामकाज को देखना शुरू करते हैं, तो समझ आता है कि सरकार आगे बढ़ने के बजाय भटकती हुई क्यों नज़र आ रही है.
संसद का मानसून सत्र सात हफ्ते से खत्म नहीं किया गया है. इसे अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद से सात हफ्ते बीत चुके हैं. सरकार यह तय नहीं कर पा रही है कि वह 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन आगे बढ़ाना चाहती है या इससे पूरी तरह पीछे हटना चाहती है.
कई सालों तक कांग्रेस को ऐसा लगता रहा कि बीजेपी उससे बहुत बेहतर पार्टी है. उसके पास समर्पित कार्यकर्ताओं का मजबूत संगठन है. उसके पास ऐसा नेतृत्व है जो जल्दी और निर्णायक फैसले लेता है और दूर की सोच रखता है. उसके पास तेज रणनीतिक सोच भी है. इसके अलावा उसके पास एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) उसका वैचारिक आधार है. आरएसएस नए नेताओं और कार्यकर्ताओं को तैयार करने का एक बड़ा जरिया भी है. कांग्रेस ने बस यह मान लिया था कि अब कुछ नहीं किया जा सकता और उसे अपनी किस्मत के भरोसे रहना होगा. लेकिन हाल के दिनों में लगता है कि विपक्षी पार्टी में अब लड़ने की इच्छा पैदा हुई है.
बदलाव हो रहा है
बस देखिए कि पार्टी के हाईकमान ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के पद से अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को हटाने का फैसला कितनी तेज़ी से लिया. उनकी जगह भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को राज्य का प्रभारी बनाया गया, ताकि पार्टी को जमीन से सही और निष्पक्ष जानकारी मिल सके और जरूरी कदम उठाए जा सकें.
गौर करने वाली बात यह है कि राहुल गांधी को वड़िंग तब से पसंद करते रहे हैं, जब उन्होंने भारतीय युवा कांग्रेस में “आंतरिक चुनाव” की प्रक्रिया शुरू की थी. उस समय वड़िंग IYC में राष्ट्रीय पदाधिकारी थे. फिर भी जब ज़रूरत पड़ी, गांधी ने उन्हें हटा दिया.
कुछ महीने पहले गांधी ने कर्नाटक में भी ऐसा ही फैसला लिया. उन्होंने सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बना दिया. इससे कुछ हफ्ते पहले 56 साल के गांधी ने केरल में भी वी.डी. सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में मजबूती से हस्तक्षेप किया था. इसके लिए उन्हें अपने करीबी और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल के DAWON KI ANDEKHI KARNI PADI. लेकिन गांधी परिवार का इस तरह निर्णायक फैसला लेना कोई नई बात नहीं है. 1990 में राजीव गांधी ने बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के वीरेंद्र पाटिल को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया था. इससे लिंगायत समुदाय का एक बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए कांग्रेस से दूर हो गया. अब फर्क यह है कि उनके बेटे राहुल गांधी ऐसा कोई एकतरफा आदेश देकर नहीं कर रहे हैं. वह सभी संबंधित लोगों से बड़े स्तर पर बातचीत कर रहे हैं और सभी पक्षों की राय ले रहे हैं, ताकि बदलाव आसानी से हो सके.
पिछले महीने राहुल गांधी ने महाराष्ट्र कांग्रेस के पूर्व विधायक राहुल बोंद्रे को देर रात फोन किया और उन्हें बीजेपी में शामिल होने से रोकने में सफल हुए. कुछ दिन पहले उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के नतीजों और हार की समीक्षा के लिए बैठक की. इस दौरान उन्होंने NSUI के प्रभारी कन्हैया कुमार को हार के लिए जवाबदेह ठहराया.
आखिरी बार कब किसी ने राहुल गांधी को पार्टी के बड़े संगठनात्मक हित के लिए अपने करीबी नेताओं को हटाते देखा था? या फिर किसी पूर्व विधायक को पार्टी छोड़ने से रोकने के लिए उन्हें इतनी कोशिश करते देखा था?
गांधी को आम तौर पर ऐसे नेता के रूप में जाना जाता है, जिनके वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ उनके बर्ताव की वजह से कई नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी. उनका ‘संगठन सृजन अभियान’, यानी पार्टी संगठन को फिर से मजबूत करने का अभियान भी काफी सफल रहा है. इसके तहत जिला कांग्रेस अध्यक्षों का चुनाव और नियुक्ति बड़े स्तर पर बातचीत और विचार-विमर्श के बाद की गई है.
चाहे प्रधानमंत्री आवास के बाहर उन्हें जबरदस्ती हटाया जाना हो, घायल छात्र की एफआईआर दर्ज कराने के लिए दिल्ली के एक पुलिस थाने में उनका सात घंटे तक धरने पर बैठना हो, उनका “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम हो या फिर उनका हालिया “सत्याग्रह” अभियान, जिसमें उन्होंने लोगों से अपनी कहानियां उनके साथ साझा करने को कहा, राहुल गांधी अचानक एक बिल्कुल अलग नेता नज़र आ रहे हैं. बीजेपी के कई नेताओं ने निजी बातचीत में मुझसे भी यही बात कही है.
पहले बीजेपी जिन चीज़ों के लिए राहुल गांधी का मजाक उड़ाती थी—उनके कपड़े पहनने का तरीका, उनके भाषण, उनकी जल्दबाजी वाली राजनीति या यहां तक कि अपने पालतू जानवर के लिए उनका प्यार दिखाना—अब उन्हीं चीज़ों को इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर और देश के युवाओं के बीच काफी समर्थन मिल रहा है.
यह बदलाव कैसे आया? शायद राहुल गांधी ने आखिरकार विपक्ष के नेता की भूमिका को स्वीकार कर लिया है और उसे निभाना सीख लिया है. या फिर वह अपने राजनीतिक विरोधियों की ओर से वर्षों तक किए गए तानों, मजाक और “पप्पू बनाने” की कोशिशों के बाद और मजबूत होकर सामने आए हैं.
या फिर उन्हें जेन ज़ी से अचानक मिल रहे बड़े समर्थन ने नई ऊर्जा दी है.
उनके हालिया भाषणों से लगता है कि अब उन्हें विश्वास हो गया है कि प्रधानमंत्री मोदी का प्रभाव कम हो रहा है और 13 साल तक सत्ता में रहने के बाद वह कमजोर स्थिति में आ गए हैं. तो अब राहुल गांधी यहां से कहां जाएंगे?
अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव बताएंगे कि सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच राहुल गांधी को मिल रहा समर्थन कांग्रेस के लिए कितने वोटों में बदलता है. इससे हमें कांग्रेस के भविष्य की दिशा का भी कुछ अंदाजा मिलेगा.
डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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