हाल ही में उत्तर भारत की सुर्खियों में हरियाणा के आधुनिक सफाई व्यवस्था के प्रयासों की तारीफ की गई है. इसकी महत्वाकांक्षी योजना में पर्यटन और धार्मिक स्थलों पर चार हिस्सों वाले हाई-टेक कूड़ेदान लगाए जा रहे हैं. इनमें IoT से जुड़े सेंसर और जियो-टैग के जरिए निगरानी की व्यवस्था भी है.
यह देखकर अच्छा लगता है कि पड़ोसी राज्य आधुनिक कचरा प्रबंधन की दिशा में सकारात्मक कदम उठा रहा है. लेकिन पंजाब के लिए सिर्फ हरियाणा के तरीके की नकल करना, बड़े शहरों में स्मार्ट कूड़ेदान लगाना और फिर काम खत्म समझ लेना सही नहीं होगा. जमीन पर कचरे को अलग-अलग करना जरूरी है, लेकिन नगर निगम की ज्यादातर कचरा व्यवस्था इसके बाद के चरणों में खराब हो जाती है. इनमें घर-घर नियमित कचरा उठाना, सही तरीके से कचरे को ले जाना और सबसे जरूरी, काम करने वाली कचरा प्रसंस्करण सुविधाएं शामिल हैं.
काम करने वाले प्रसंस्करण प्लांट के बिना हाई-टेक कूड़ेदान सिर्फ सड़ते हुए कचरे को रखने के आकर्षक डिब्बे हैं.
शहरों की बदहाल स्थिति
पंजाब के किसी भी बड़े शहर. अमृतसर, लुधियाना, जालंधर या बठिंडा. में घूमने पर लगभग एक जैसी समस्या दिखाई देती है. नगर निगम का कचरा, हरे पेड़-पौधों का कचरा और निर्माण का मलबा सड़कों के किनारे, खाली प्लॉटों और सिंचाई नहरों के किनारे बिखरा पड़ा रहता है.
नीति दस्तावेजों में कचरे से बिजली बनाने और खाद बनाने की सुविधाओं की अक्सर बात की जाती है, लेकिन जमीन की हकीकत कुछ और है.
आंकड़े इस अंतर को समझाते हैं. 2021-22 में पंजाब में हर दिन 4,222 मीट्रिक टन नगर निगम का ठोस कचरा पैदा हुआ और 4,207 मीट्रिक टन कचरा इकट्ठा किया गया. लेकिन सिर्फ 1,471 मीट्रिक टन कचरे का ही उपचार किया गया. यानी पैदा हुए कुल कचरे का सिर्फ 35 प्रतिशत. CAG ने कम प्रसंस्करण दर की वजह पर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमी और मौजूद बुनियादी ढांचे के कम इस्तेमाल को बताया.
राज्य में कचरा प्रसंस्करण का बुनियादी ढांचा या तो मौजूद ही नहीं है या फिर बहुत कम इस्तेमाल हो रहा है. बिना अलग-अलग प्रक्रिया किए घरों का कचरा बड़ी मात्रा में खुले कचरे के ढेरों तक पहुंचाया जाता है. वहां यह दशकों तक सड़ता रहता है और जहरीला गंदा पानी पैदा करता है, जो आसपास की मिट्टी और भूजल के लिए खतरा बनता है.
अगर कचरे का आखिरी ठिकाना खुला लैंडफिल ही रहना है, तो हाई-टेक कूड़ेदानों पर पैसे खर्च करना व्यर्थ है.
पंजाब की कचरा प्रबंधन की समस्या को खत्म करने के लिए अधिकारियों को असली समस्या का सामना करना होगा. यह समस्या है सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था में मौजूद ढांचागत अक्षमता और जवाबदेही की बहुत बड़ी कमी है.
दशकों से चली आ रही सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने अनौपचारिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था को लगभग एकाधिकार जैसी स्थिति में काम करने दिया है. क्योंकि कर्मचारियों को अक्सर लगता है कि इस क्षेत्र में बाहर से प्रतिस्पर्धा नहीं होने के कारण उनकी जगह कोई नहीं ले सकता, इसलिए कई कर्मचारी नियमित रूप से ड्यूटी के घंटे छोड़ देते हैं, ज्यादा छुट्टियों की मांग करते हैं और कचरे को उसके स्रोत पर अलग करने के नियमों को नजरअंदाज करते हैं. नगर निगम के अधिकारी अक्सर इसके जवाब में बड़े स्तर पर “सफाई अभियान” चलाते हैं. ये अच्छे प्रचार के काम तो होते हैं, लेकिन व्यवस्था की असली समस्याओं को दूर नहीं करते.
पंजाब में कचरे की समस्या की सबसे विडंबना यह है कि राज्य में बौद्धिक क्षमता की इतनी बड़ी मौजूदगी होने के बावजूद उसका कचरा प्रबंधन में कोई योगदान ना होना या सरकार की तरफ से कोई इस्तेमाल नहीं करना.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) रोपड़, पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) लुधियाना और गुरु नानक देव इंजीनियरिंग कॉलेज (GNDEC) जैसे संस्थानों के पास बहुत बड़ी तकनीकी विशेषज्ञता है. ये संस्थान ठोस कचरे के प्रसंस्करण, हरे कचरे से खाद बनाने और निर्माण के कचरे को रिसाइकिल करने के लिए कम लागत वाले समाधान तैयार करने की खास क्षमता रखते हैं.
फिर भी राज्य सरकार स्थानीय शैक्षणिक प्रतिभा के इस भंडार का फायदा उठाने में नाकाम रही है. अपनी जरूरत के हिसाब से इंजीनियरिंग समाधान तैयार करने के बजाय, नगर निकाय पुराने ठेकेदार-आधारित तरीकों पर निर्भर रहते हैं, जो लगातार कामयाब नहीं हो पाते.
सीखने से काम करने तक
क्षमता बढ़ाने की योजनाएं सिर्फ अधिकारियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. जमीन पर काम करने वाले कर्मचारी शहरी सफाई व्यवस्था की रीढ़ हैं और उन्हें सिर्फ भाषणों या दिखावटी सफाई अभियानों से ज्यादा की जरूरत है.
पंजाब सरकार ने हाल ही में स्कूल शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा मॉडल सीखने के लिए सिंगापुर भेजकर सुर्खियां बटोरी थीं. इसी तरह का तरीका सफाई कर्मचारियों के लिए भी अपनाया जाना चाहिए. सरकार को मुख मंत्री तीर्थ यात्रा योजना की बसों का इस्तेमाल करके कम से कम 500 सफाई सेवकों के एक समूह को मध्य प्रदेश के इंदौर ले जाना चाहिए.
इंदौर को लगातार भारत का सबसे साफ शहर माना जाता है. उसने अपने जमीन पर काम करने वाले कर्मचारियों की कार्य संस्कृति में बदलाव करके, लैंडफिल में कचरा भेजने को पूरी तरह खत्म करने की नीति लागू करके और कचरे को उसके स्रोत पर 100 प्रतिशत अलग करके अपने शहरी क्षेत्र को बदल दिया. इस पूरी व्यवस्था को अपनी आंखों से देखने से पंजाब के सफाई कर्मचारियों को प्रेरणा मिलेगी और उनमें आधुनिक काम करने की संस्कृति विकसित होगी. इसके बाद चुने हुए सुपरवाइजरों और सफाई कर्मचारियों के एक समूह को सिंगापुर भेजा जा सकता है, ताकि वे आधुनिक कचरे से बिजली बनाने वाले प्लांट, स्वचालित सड़क सफाई मशीनें और ऐसी रिसाइक्लिंग व्यवस्था का अध्ययन कर सकें जिसमें कचरे का दोबारा इस्तेमाल होता रहे.
इंदौर मॉडल की एक मुख्य विशेषता सफाई और समुदाय से जुड़े कामों में महिलाओं को सक्रिय रूप से भर्ती करना है. महिला कर्मचारी घर-घर कचरा उठाने के काम में अनुशासन, बारीकियों पर ध्यान और समुदाय के साथ मजबूत जुड़ाव लेकर आती हैं.
यह पंजाब के सामने कर्मचारियों की कमी दूर करने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्य पूरा करने का अच्छा मौका है. मावां धियां सत्कार योजना के तहत मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल सफाई के क्षेत्र में महिलाओं की भर्ती, प्रशिक्षण और रोजगार के लिए किया जा सकता है. इस तरीके से दोहरा फायदा होगा. महिलाओं की औपचारिक रोजगार में भागीदारी बढ़ेगी और नगर निकाय की जरूरी खाली जगहें एक भरोसेमंद और अनुशासित कार्यबल से भरी जा सकेंगी.
हरियाणा के हाई-टेक मॉडल के कुछ हिस्सों को अपनाना एक सही शुरुआत है, लेकिन इससे पंजाब की समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी. मुख्यमंत्री और नगर निकाय के नेताओं को चार बड़े सुधारों को प्राथमिकता देनी चाहिए:
- बड़े शहरों में कचरा प्रसंस्करण प्लांट बनाए जाएं और उन्हें चालू किया जाए, ताकि इकट्ठा किया गया कचरा वास्तव में प्रक्रिया से गुजर सके.
- रोजाना कचरा उठाने और ले जाने के काम में कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए और एकाधिकार जैसी व्यवस्था को खत्म किया जाए.
- IIT रोपड़, PAU और GNDEC जैसे बड़े शैक्षणिक संस्थानों को हरे कचरे और निर्माण कचरे की समस्याओं का समाधान निकालने के काम में जोड़ा जाए.
जमीन पर काम करने वाले सफाई सेवकों के लिए इंदौर और सिंगापुर की अध्ययन यात्राएं आयोजित की जाएं और महिलाओं को सक्रिय रूप से इस कार्यबल में शामिल किया जाए.
सिर्फ कचरा उठाने, उसका प्रसंस्करण करने और कर्मचारियों की जवाबदेही पर एक साथ काम करके ही पंजाब अपने शहरी केंद्रों को हमेशा के लिए साफ कर सकता है.
कर्नल जसजीत सिंह गिल एक एनवायरमेंटलिस्ट हैं. वह लुधियाना की DISHA कमेटी के सदस्य हैं और बूढ़ा दरिया रेजुवेनेशन प्रोजेक्ट के लिए पंजाब स्टेट टास्क फोर्स के पूर्व सदस्य रह चुके हैं.
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