भारत का जन्म बंटवारे के दौरान हुए उत्पात और कश्मीर को लेकर जंग के बीच हुआ. आज़ादी के बाद से लगभग हर दशक में भारत को बाहरी या आंतरिक हिंसक संघर्ष का सामना करना पड़ा है. लेकिन भारत को युद्ध करना चाहिए, इसे सबसे पहले किसने उचित ठहराया? और उनका नैतिक तर्क क्या था?
इस सवाल का जवाब मैं थोड़ी देर बाद देता हूं. इसके पहले यह शाश्वत प्रश्न: क्या भारत एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ (नरम देश) है, जो ‘दूसरा गाल भी पेश करने’ के गांधीवादी ‘ब्रेनवाश’ से ग्रस्त रहा है? या यह उपनिवेशवादी दौर के बाद के लोकतांत्रिक देशों में सबसे ज्यादा कठोर देश रहा है, और सुविधा के हिसाब से गांधीवादी दिखावा करता रहा है? मेरा तो यही मानना है कि यह दिखावा ही करता रहा है.
महात्मा गांधी की जयंती हमें सभी राजनीतिक धाराओं में फैली इस धारणा की समीक्षा करने का मौका देती है कि क्या भारत एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ है, और उसने अपने बाहरी तथा आंतरिक दुश्मनों को बहुत फायदा उठाने दिया, और यह कि काश हम सरदार पटेल, नेताजी और सावरकर के बताए रास्ते पर चले होते!
इसी सोच के तहत यह भी कहा जाता है कि इस गांधीवादी घुट्टी को नेहरू की शांतिवादी विदेश नीति ने और बुरा रूप दे दिया. यह सब उनके बाद आई सरकारों के दौरान भी चलता रहा. यह आज भी चल रहा है, जबकि डोनल्ड ट्रंप हमें जिस तरह ‘शर्मसार’ कर रहे हैं उसका कोई जवाब नहीं दिया जा रहा है, और इसके अलावा चीन के साथ रिश्ते सुधारने की एकतरफा कोशिश की जा रही है जबकि उसके साथ हमारा व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर के बराबर हो गया है और एलएसी पर सेनाओं की वापसी के बाद भी तनाव कायम है.
ट्रंप वाले मामले को ‘सुपरपावर’ के आगे घुटने टेकना कहा जाता है, तो चीन के मामले में कहा जाता है कि हमने एक ‘डिप्टी सुपरपावर’ तथा अपने सबसे विशाल पड़ोसी की बराबरी करने के सारे इरादे त्याग दिए हैं. मोदी दौर के इस 13वें वर्ष में इसे इस बात का प्रमाण बताया जा रहा है कि भारत का निर्माण नरम, दब्बू गांधीवादी राज्य के विचार की नींव पर हुआ, जिसमें एक ‘हार्ड स्टेट’ बनने की कोशिश करने की न तो क्षमता है और न इसकी तैयारी है.
लेकिन तथ्य और इतिहास इससे उलटी बात बताते हैं. भारत की जो आर्थिक और सैन्य सीमाएं हैं उनके हिसाब से तो वह अपनी क्षमता से ज्यादा ही कर गुजरने में सफल रहा है.
आधुनिक भारत की छवि पर गांधी की छाया भले ही हावी रही हो, यह कभी गांधीवादी देश नहीं रहा. इस गणतंत्र के संस्थापकों ने, चाहे वे नेहरू रहे हों या पटेल, उनके विचारों को नहीं अपनाया. और संविधान सभा के सदस्य भले गांधी के इस विचार से आकर्षित रहे हों कि ‘भारत गांवों में बसता है’, बड़े नेताओं, खासकर बी.आर. आंबेडकर ने इस विचार को बड़ी सफाई और पक्के इरादे के साथ दरकिनार कर दिया.
और, आपने ठीक ही यह अनुमान लगाया होगा कि भारत ने जो पहली लड़ाई लड़ी उसे गांधी का समर्थन हासिल था. गांधीवादी भावनाओं से हट कर गांधी ने आजादी के बाद दसवें सप्ताह में ही देश को यह पाठ पढ़ाया कि अगर लक्ष्य जायज है तो युद्ध करना जायज है. इसका प्रकाशित प्रमाण हमारे पास एक आला योद्धा के हवाले से उपलब्ध है.
लायनेल प्रोतीप सेन (जो बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बने) 30 अक्टूबर 1947 को ‘डायरेक्टोरेट ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस’ में कर्नल के पद पर आसीन थे. उस दौर के सभी आला अधिकारियों की तरह वे भी सैंधर्स्ट में प्रशिक्षण पाए ‘KCIO’ (किंग्स कमीशन इंडियन ऑफिसर) थे. 30 अक्टूबर 1947 की सुबह कश्मीर में हालात बहुत नाजुक हो गए थे. उस राज्य की सेना के कमांडर ब्रिगेडियर रजिंदर सिंह पाकिस्तानी छापामारों से उरी को बचाने की लड़ाई लड़ते हुए शहीद हो गए थे (बाद में, सबसे पहले महावीर चक्र से उन्हें मरणोपरांत सम्मानित किया गया).
महाराजा ने कश्मीर के विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत कर दिया था. भारतीय सेना को श्रीनगर की ओर कूच करने का आदेश दे दिया गया था, और वहां पहुंचते ही उसे झटका लगा था. 161 ब्रिगेड के कमांडर, ब्रिगेडियर जे.सी. कटोच के पैर में गोली लगी और उन्हें वहां से हटा लिया गया. जनरल सर रॉब लॉकहार्ट (उस समय भारत और पाकिस्तान के ब्रिटिश सेनाध्यक्ष ही थे) ने सेन को तरक्की देकर ब्रिगेडियर बनाया और उन्हें तुरंत कटोच की ज़िम्मेदारी संभालने का आदेश दिया. उन्हें श्रीनगर के लिए डकोटा विमान पर सवार होने से पहले राजनीतिक नेताओं से भी परामर्श करने की सलाह दी गई.
अपने सीनियर अधिकारी, भावी सेनाध्यक्ष ब्रिगेडियर पी.एन. थापर के साथ वे सरदार पटेल से मिले, जिन्होंने उनको सलाह दी कि वे कश्मीर रवाना होने से पहले महात्मा को भी सूचना दे दें. गांधी से उनकी मुलाक़ात 1 नवंबर 1947 की शाम बिरला हाउस में हुई. इस मुलाक़ात में क्या कुछ हुआ, इसका विवरण हमें सेन के संस्मरण ‘स्लेंडर वाज द थ्रेड’ में मिलता है. उन्होंने यह लिखा है –
उन्होंने (गांधी) मेरी बातों को बहुत ध्यान से सुना. अपनी बात खत्म करके मैंने उनसे कहा कि अगर उन्हें कुछ सवालों के जवाब चाहिए तो वे पूछें. उनका जवाब था: “नहीं, कोई सवाल नहीं है.”
कुछ क्षणों तक खामोश रहने के बाद उन्होंने कहा: “युद्ध मानवता के लिए एक श्राप हैं. वे बिलकुल मूर्खतापूर्ण हैं. उनसे तकलीफ और बरबादी के सिवा कुछ नहीं हासिल होता.” एक सैनिक होने के नाते, जो कुछ घंटे बाद ही एक लड़ाई लड़ने जा रहा था, मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूं. मैंने पूछा: “कश्मीर में मुझे क्या करना चाहिए?”
महात्मा गांधी ने मुस्कराते हुए कहा: “आप बेकसूर लोगों की रक्षा करने, उन्हें तकलीफ़ों से बचाने और उनकी जायदाद को तबाही से बचाने के लिए जा रहे हैं. जाहिर है कि इस मकसद को पूरा करने के लिए आपको अपने पास मौजूद हर साधन का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए.” उन्हें आखिरी बार जीवित देखने का मुझे यही मौका मिला.
हमारे इतिहास का यह कम चर्चित मौका है जब गांधी ने हिंसा और युद्ध का समर्थन किया था. युद्ध का समर्थन आगे भी जारी रहा. नेहरू की हमेशा आलोचना की जाती है कि वे कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए. लेकिन तथ्य यह है कि वे सैन्य तरीकों से भी भारत के हितों को मजबूत करने की कोशिश करते रहे.
पाकिस्तान ‘NATO’ के स्तर के आधुनिक हथियारों और सैन्य प्रशिक्षण के बूते जो बढ़त बनाने की कोशिश करता रहा, नेहरू उस अंतर को पाटने की कोशिश करते रहे. उस दशक में भारत ने ब्रिटेन से मदद के रूप में नहीं बल्कि सीधी खरीद के रूप में हंटर विमानों, सेंचुरियन टैंकों को हासिल करना शुरू किया. सार यह कि प्रधानमंत्री नेहरू को अपने करीब 17 साल के कार्यकाल में कई असफलताओं, खासकर चीन के साथ युद्ध में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन भारत किसी भी लिहाज से ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं था. उसने पाकिस्तान से लोहा लिया, चीन का असफल मुक़ाबला किया, हैदराबाद में निजाम/रजाकारों की चुनौती को निबटाया, गोवा को पुर्तगाली कब्जे से आजाद कराया.
उसी दौरान नगा बगावत भी शुरू हो गई थी. नेहरू वहां सेना भेजने और ‘आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट’ लागू करने में कतई नहीं झिझके. आज का ‘AFSPA’ कथित शांतिवादी नेहरू की ही देन है.
नेहरू कई मामलों में असफल इसलिए नहीं रहे क्योंकि उन्होंने सख्त ताकत के इस्तेमाल से परहेज किया. उनके उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री सेना के इस्तेमाल से कश्मीर को हड़पने की पाकिस्तानी कोशिश को हमेशा के लिए नाकाम करने के लिए अमर हो चुके हैं.
इंदिरा गांधी का इतिहास तो ताजा ही है, जिसमें 1971 की लड़ाई शामिल है. मुझे नहीं लगता कि कोई व्यक्ति इंदिरा गांधी पर भारत को ‘सॉफ्ट स्टेट’ बनाने का आरोप लगा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी इस बात के लिए आलोचना की है कि उन्होंने आइजोल पर मिज़ो बागियों की घेराबंदी तोड़ने के लिए वायुसेना का इस्तेमाल किया. इंदिरा गांधी ने यह आदेश जनवरी 1966 में शपथ ग्रहण करने के छह सप्ताह के भीतर ही दे दिया था. अपने ही नागरिकों के खिलाफ वायुसेना के इस्तेमाल की नैतिकता पर इतिहास तो बहस करेगा, लेकिन क्या ‘हार्ड स्टेट’ ठीक यही नहीं किया करते?
मोरारजी देसाई को हम एक शांतिवादी प्रधानमंत्री के रूप में ले सकते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर से कही गई उनकी यह बात काफी चर्चित हुई थी कि नेहरू के आदर्श थे मेकियावली लेकिन उनके आदर्श हैं गांधी. लेकिन चंद महीनों तक चली उनकी सरकार ने जैगुआर विमानों की खरीद के ऑर्डर दिए, जिन्हें भारतीय वायुसेना आज भी उड़ा रही है.
इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, और सियाचिन मसले पर शानदार कदम उठाया गया. उन्हें स्वर्ण मंदिर में सेना भेजनी चाहिए थी या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. लेकिन उन्होंने भारत को एक ‘हार्ड स्टेट’ ही बनाया.
राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए भारी बहुमत मिला लेकिन उनके पांच साल गड्डमड्ड रहे. उन्होंने पहली बार भारत की सैन्य शक्ति का इस्तेमाल विदेश में किया. हम श्रीलंका और मालदीव की बात कर रहे हैं. डिफेंस पर उन्होंने जितना खर्च किया उतना किसी दूसरे प्रधानमंत्री ने नहीं किया. उनकी सरकार के रक्षा बजट ने जीडीपी के 4 प्रतिशत की सीमा को तोड़ा. आज अगर कोई युद्ध हुआ तो उसमें वही साजोसामान इस्तेमाल होंगे जिनकी खरीद के ऑर्डर राजीव गांधी ने दिए थे. उन्होंने भारत को कहीं ज्यादा ‘हार्ड’ ही नहीं बल्कि हस्तक्षेपकारी स्टेट बनाया.
उनके बाद गठबंधनों का दौर आया और भारत को एक ऐसी सरकार मिली जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में कमजोर थी. वी.पी. सिंह की सरकार ने अपने गृह मंत्री की बेटी को बंधकों से छुड़ाने के लिए आतंकवादियों की रिहाई के सौदे के साथ शुरुआत की. पंजाब में आतंकी कांड करने वाले कई आतंकवादियों को रिहा कर दिया गया लेकिन 1990 की गर्मियों में पाकिस्तान ने जब परमाणु हथियारों की धमकी दी तो उन्होंने करारा जवाब दिया. इस सरकार की सबसे अच्छी बात यह रही कि यह अल्पजीवी रही. संयोग से, इसे भाजपा का समर्थन हासिल था.
पी.वी. नरसिंह राव ने जब सत्ता संभाली तब राष्ट्रीय सुरक्षा बेतरतीब हाल में थी, पंजाब और कश्मीर सुलग रहे थे, अमेरिकी क्लिंटन शासन तीखे तेवर दिखा रहा था, और मानवाधिकार संगठन भारत के गले पर सवार थे. राव ने जिस तरह पंजाब और कश्मीर में बगावत खत्म की, अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारे वे भारत को ‘हार्ड स्टेट’ के रूप में बहाल करने की कहानी ही कहते हैं.
उनके उत्तराधिकारी अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने दो सबसे जोखिम भरे फैसले किए: परमाणु परीक्षण करने का, और अमेरिका के साथ परमाणु संधि करने का. मनमोहन सिंह ने 26/11 हमले का जवाब न देकर गलती की या नहीं, इस पर बहस चलती रहेगी.
अंत में, मोदी का दौर. घुसकर मारने की घोषणा के साथ सख्त तेवर सामने आ गए. सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, ऑपरेशन सिंदूर ने सामान्य स्थिति का एक नया पैमाना स्थापित किया. मोदी ने सिर्फ यह भूल की कि अपने शुरू के 11 वर्षों में डिफेंस पर पर्याप्त खर्च नहीं किया, और ‘एक रैंक, एक पेंशन’ के लिए रक्षा बजट में अतिरिक्त प्रावधान नहीं किया.
मनमोहन सिंह जिसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे, मोदी राज में उस हथियारबंद माओवाद का खात्मा किया गया.
और अंत में, कुछ ऐसा जिसे जवाबी कार्रवाई कहा जा सकता है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आक्रमण रोक देने के लिए मोदी के खिलाफ ‘नरेंदर सरेंडर’ जैसे नारे लगाए गए. या बालाकोट में एक हवाई हमले के बाद हमले रोक देने के फैसले को ही लें. दोनों मामलों को मैं कमजोरी का नहीं बल्कि ताकत का प्रदर्शन मानूंगा. जब आपके पास अपनी कामयाबी दिखाने के लिए काफी कुछ हो तब टकराव से बचने को ‘हार्ड स्टेट’ की निशानी ही माना जाएगा. इस लिहाज से आज देश की जो स्थिति है उससे गांधी संतुष्ट ही होते.
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