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Tuesday, 6 October, 2026
होमदेशIDFC फर्स्ट बैंक फ्रॉड: 100 करोड़ रुपये के ट्रेल से IAS पंकज अग्रवाल तक कैसे पहुंची CBI

IDFC फर्स्ट बैंक फ्रॉड: 100 करोड़ रुपये के ट्रेल से IAS पंकज अग्रवाल तक कैसे पहुंची CBI

सीबीआई के मुताबिक, पंकज अग्रवाल ने दो विभागों में IDFC First Bank के खाते खुलवाने पर जोर दिया. उन्होंने एक अधिकारी से कहा कि पैसे गायब होने पर घबराने की जरूरत नहीं है. उन पर ‘अवैध रूप से पैसे लेने’ का भी आरोप है.

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चंडीगढ़: साल 2024 के आखिरी कामकाजी दिन सुबह 11 बजे से थोड़ा पहले का समय था. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर भूपिंदर सिंह, हरियाणा के स्कूल एजुकेशन डिपार्टमेंट के तत्कालीन कमिश्नर और सेक्रेटरी पंकज अग्रवाल के कमरे में बैठे थे. उसी दिन भूपिंदर को विभाग से रिलीव किया जाना था.

हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद (एचएसएसपीपी) के फाइनेंस और अकाउंट्स कंट्रोलर रणधीर सिंह एक फाइल लेकर कमरे में आए.

सीबीआई को दिए अपने बयान के मुताबिक, अग्रवाल ने रणधीर से उस आईडीएफसी फर्स्ट बैंक खाते के बारे में पूछा, जिसका प्रस्ताव रिभव ऋषि नाम के एक बैंकर ने दिया था. रणधीर ने कहा कि स्टेट प्रोजेक्ट डायरेक्टर बाहर गए हुए थे, लेकिन उस दिन वापस आ गए थे और फाइल पर हस्ताक्षर कर देंगे. इसके बाद, रणधीर ने बताया, फाइल मंजूरी के लिए फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास जाएगी.

बयान के मुताबिक, अग्रवाल को गुस्सा आ गया. उन्होंने रणधीर से कहा कि अगर प्रस्ताव फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास गया, तो इसे कभी मंजूरी नहीं मिलेगी. रणधीर ने तब बताया कि फाइनेंस डिपार्टमेंट के सर्कुलर के मुताबिक, ऐसे खाते में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं रखे जा सकते.

सीबीआई ने अग्रवाल का जवाब हिंदी में दर्ज किया है: “ज्यादा कानून मत सिखाओ, जब फाइल फाइनेंस डिपार्टमेंट जाएगी ही नहीं तो 50 करोड़ डालो या 100 करोड़.”

इसी बयान के मुताबिक, अग्रवाल ने फिर उनसे कहा कि एग्जीक्यूटिव इंजीनियर भी उसी दिन विभाग से जा रहे हैं और उन्हें जाकर जल्दी से एक नई नोटशीट तैयार करनी चाहिए.

रणधीर और भूपिंदर कमरे से बाहर चले गए. भूपिंदर के ऑफिस में उन्होंने राकेश कुमार नाम के एक अकाउंटेंट के साथ मिलकर एक नई नोटशीट तैयार की. इसमें खाता खोलने और उसमें 100 करोड़ रुपये डालने का प्रस्ताव था. इसमें पुरानी तारीखें ही लिखी गई थीं.

आठ दिन बाद, 8 जनवरी 2025 को, परिषद के कोटक महिंद्रा बैंक खाते से 100 करोड़ रुपये निकले और चंडीगढ़ के सेक्टर 32 में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की नई शाखा के एक खाते में पहुंच गए. उसी दिन पहली कथित धोखाधड़ी वाली रकम भी इस खाते से निकाली गई.

घटनाओं का यह क्रम सीबीआई की 2 सितंबर को स्पेशल जज, सीबीआई, पंचकूला के सामने दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में दिए गए सबसे विस्तृत घटनाक्रमों में से एक है. इस चार्जशीट में 19 और आरोपियों के नाम हैं, जिनमें छह आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं. यह मामला हरियाणा सरकार की आठ संस्थाओं के पैसों से जुड़ी धोखाधड़ी का है. इन संस्थाओं के पैसे चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की शाखा में भेजे गए और फिर कथित तौर पर निकाल लिए गए.

पंकज अग्रवाल के वकील विशाल गर्ग ने सितंबर में दिप्रिंट से बात करते हुए पहले ही अपने मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया था और कहा था कि वह निर्दोष हैं.

उन्होंने यह भी कहा था कि अग्रवाल के घर पर की गई तलाशी के दौरान भी उनसे कोई रकम बरामद नहीं हुई थी.

कौन हैं पंकज अग्रवाल?

पंकज अग्रवाल 1974 में जन्मे 2000 बैच के आईएएस अधिकारी हैं. इस मामले में वह आरोपी नंबर 30 हैं. चार्जशीट में उनका पता सेक्टर 19-बी, चंडीगढ़ दिया गया है.

उन्हें इस साल 22 जून को गिरफ्तार किया गया था और 25 जून को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. सीबीआई ने पहले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत उनकी जांच की अनुमति मांगी थी और उसे मंजूरी भी मिल गई थी.

जांच एजेंसी का कहना है कि उन्होंने यहां से जुड़े दो अहम पदों पर काम किया था. जब एचएसएसपीपी का खाता खोला गया, तब वह स्कूल शिक्षा विभाग के कमिश्नर और सेक्रेटरी थे. बाद में जब हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड (एचएसएएमबी) का खाता खोला गया, तब वह कृषि और किसान कल्याण विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी थे. चार्जशीट के मुताबिक, वह बोर्ड के चेयरमैन भी थे.

दिलचस्प बात यह है कि अग्रवाल हरियाणा की बीजेपी सरकार के सबसे भरोसेमंद सरकारी अधिकारियों में से एक रहे हैं. उन्हें 2019 में विधानसभा चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई थी और फिर 2024 में भी चुनाव से पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी के तौर पर यह जिम्मेदारी दी गई. इतना ही नहीं, उन्हें हरियाणा में 2026 के द्विवार्षिक राज्यसभा चुनाव के लिए रिटर्निंग ऑफिसर भी बनाया गया था. उस चुनाव में बीजेपी लगभग दूसरी सीट जीत गई थी, जिसे संख्या के हिसाब से तब कांग्रेस के लिए आसान माना जा रहा था. बाद में कांग्रेस ने रिटर्निंग ऑफिसर के तौर पर अग्रवाल के काम करने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए थे.

सीबीआई का कहना है कि उन पर भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 61(2), 241, 316(5), 317(4), 318(4), 336(3), 338, 340(2) और 344 के तहत और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 7(सी), 7ए, 8, 9, 10 और 13(1)(ए) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. मुख्य अपराधों के लिए एजेंसी ने भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 316(5), 241 और 79 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं 7(सी), 12 और 13(2), जिन्हें 13(1)(ए) के साथ पढ़ा गया है, लगाई हैं.

आसान शब्दों में कहें तो ये धाराएं तीन तरह की गलतियों या अपराधों से जुड़ी हैं. पहली तरह की धाराएं धोखाधड़ी से जुड़ी हैं. भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2) आपराधिक साजिश से जुड़ी है. इसका मतलब है किसी अपराध को करने के लिए दूसरे लोगों के साथ मिलकर योजना बनाना. धारा 316(5) सरकारी अधिकारी द्वारा भरोसे का आपराधिक उल्लंघन है. यह तब लागू होती है, जब सरकारी पैसे की जिम्मेदारी वाले अधिकारी की वजह से उस पैसे का गलत इस्तेमाल होता है. इसमें उम्रकैद तक की सज़ा हो सकती है.

धारा 318(4) ऐसी धोखाधड़ी से जुड़ी है, जिसमें किसी व्यक्ति से संपत्ति या पैसा सौंपने के लिए कहा जाता है. धारा 317(4) ऐसी संपत्ति से जुड़े लेन-देन से संबंधित है, जिसके चोरी का होने का पता हो. दूसरी तरह की धाराएं कागज़ों और रिकॉर्ड से जुड़ी हैं. धारा 336(3) धोखाधड़ी के लिए की गई जालसाजी से जुड़ी है, धारा 338 किसी कीमती दस्तावेज की जालसाजी से, धारा 340(2) जाली दस्तावेज को असली बताकर इस्तेमाल करने से और धारा 344 खातों में गलत जानकारी दर्ज करने से जुड़ी है. धारा 241 किसी दस्तावेज को सबूत के तौर पर इस्तेमाल होने से रोकने के लिए उसे नष्ट करने या हटाने से जुड़ी है. सीबीआई ने बदली गई नोटशीट के मामले में इस धारा का इस्तेमाल किया है.

तीसरी तरह की धाराएं भ्रष्टाचार से जुड़ी हैं. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(सी) ऐसे सरकारी अधिकारी से जुड़ी है, जो किसी अनुचित फायदे के बदले अपना सरकारी काम गलत तरीके से या बेईमानी से करता है. अनुचित फायदे में सिर्फ पैसे ही नहीं, बल्कि किसी भी तरह का फायदा शामिल हो सकता है. धारा 7ए सरकारी अधिकारी को भ्रष्ट तरीके या निजी प्रभाव से प्रभावित करने के लिए अनुचित फायदा लेने से जुड़ी है. धारा 8 सरकारी अधिकारी को अनुचित फायदा देने से जुड़ी है.

धारा 9 और 10 किसी कारोबारी संगठन की ओर से सरकारी अधिकारी को रिश्वत देने और ऐसे संगठन के जिम्मेदार व्यक्ति से जुड़ी हैं. धारा 12 इन अपराधों में मदद करने या उकसाने की सज़ा से जुड़ी है. धारा 13(1)(ए) आपराधिक कदाचार से जुड़ी है. यह तब लागू होती है, जब कोई सरकारी अधिकारी उसके भरोसे सौंपी गई संपत्ति का बेईमानी से गलत इस्तेमाल करता है या किसी दूसरे व्यक्ति को ऐसा करने देता है. धारा 13(2) इसकी सजा बताती है, जिसमें चार से 10 साल तक की जेल हो सकती है.

अग्रवाल पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिए भी मामला दर्ज किया गया है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 79, डब्ल्यू-3 के बयान से जुड़ी है. यह किसी महिला की मर्यादा का अपमान करने के इरादे से बोले गए शब्द, किए गए इशारे या किसी काम, या उसकी निजता में दखल देने से संबंधित है.

ये जांच एजेंसी के आरोप हैं. अग्रवाल पर अभी मुकदमा चला नहीं है और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों की अदालत में जांच होना अभी बाकी है. चार्जशीट में अग्रवाल की ओर से बचाव का कोई बयान नहीं दिया गया है.

उनके कमरे में रखा गया प्रस्ताव

एचएसएसपीपी से जुड़े मामले में सीबीआई का घटनाक्रम 17 दिसंबर 2024 से शुरू होता है. उस दिन रणधीर सिंह ने अकाउंटेंट अनीता नेगी से परिषद के हर बैंक खाते में मौजूद रकम का ब्योरा मांगा. उन्होंने उसी दिन उन्हें एक एक्सेल शीट भेज दी.

सीबीआई का कहना है कि उस दिन परिषद की फाइल में ऐसी किसी जानकारी की मांग नहीं की गई थी. उस समय कोटक महिंद्रा बैंक और आईडीबीआई बैंक के खातों में कुल करीब 230.9 करोड़ रुपये थे और इन्हीं खातों से कार्यालयों का खर्च चल रहा था. कोई नई योजना मंजूर नहीं हुई थी और किसी अधिकारी ने नए खाते की मांग नहीं की थी.

इसी तारीख यानी 17 दिसंबर को आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की सेक्टर 32 शाखा के तत्कालीन ब्रांच मैनेजर रिभव ऋषि का एक पत्र सामने आता है. इसका शीर्षक ‘बैंकिंग प्रपोजल’ था और इसे कमिश्नर और सेक्रेटरी, एजुकेशन के नाम भेजा गया था.

सीबीआई के मुताबिक, 19 दिसंबर को ऋषि शिक्षा सदन में अग्रवाल के ऑफिस गए और प्रस्ताव उन्हें खुद दिया. उस समय रणधीर सिंह भी वहां मौजूद थे. अग्रवाल ने प्रस्ताव लिया और उसी दिन इसे स्टेट प्रोजेक्ट डायरेक्टर और फाइनेंस कंट्रोलर के पास यह कहते हुए भेज दिया कि जरूरी कार्रवाई की जाए.

सीबीआई इसे सामान्य प्रक्रिया से अलग मानती है. एचएसएसपीपी एक फील्ड ऑफिस है. इसके बैंक खाते खोलने का फैसला आम तौर पर स्टेट प्रोजेक्ट डायरेक्टर करते हैं. किसी प्रशासनिक सेक्रेटरी की रोजमर्रा के वित्तीय काम में कोई भूमिका नहीं होती. चार्जशीट में कहा गया है कि सामान्य प्रक्रिया के तहत अग्रवाल को बैंकर से प्रोजेक्ट डायरेक्टर से संपर्क करने के लिए कहना चाहिए था, लेकिन सीबीआई के मुताबिक, अग्रवाल ने ऐसा नहीं किया.

सीबीआई का यह भी कहना है कि दूसरे बैंकों से कभी कोई कोटेशन नहीं मांगा गया, जबकि एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने फाइल पर लिखा था कि सूची में शामिल बैंकों से कोटेशन लिए जाएं. जांच एजेंसी के मुताबिक, फैसला फाइल से बाहर पहले ही लिया जा चुका था और बाद में फाइल को इस तरह आगे बढ़ाया गया, ताकि पूरी प्रक्रिया नियमों के मुताबिक दिखाई दे.

सीबीआई ने चार्जशीट में जिन कॉल रिकॉर्ड को शामिल किया है, उनसे भी एक पैटर्न सामने आता है. अगले कुछ दिनों में रणधीर सिंह के फोन पर अग्रवाल के मोबाइल और ऑफिस लैंडलाइन से और ऋषि की ओर से कॉल आए. 23 दिसंबर को अग्रवाल के लैंडलाइन से रणधीर को फोन आया. सीबीआई का कहना है कि इस कॉल में पूछा गया था कि प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है.

महत्वपूर्ण फोन कॉल

सीबीआई का कहना है कि इसके बाद अग्रवाल ने ऐसा काम किया, जिसे वह अपने मामले का सबसे अहम हिस्सा मानती है.

20 दिसंबर को उन्होंने अपने मोबाइल फोन से फाइनेंस डिपार्टमेंट की तत्कालीन चीफ फाइनेंशियल एडवाइजर किरण लेखा वालिया को फोन किया. कॉल रिकॉर्ड के मुताबिक, यह फोन 5 मिनट 51 सेकंड तक चला.

वालिया के हस्ताक्षर उन सर्कुलर पर हैं, जिनमें बैंक खातों से जुड़े नियम दिए गए हैं. उनके बयान के मुताबिक, उन्होंने अग्रवाल से दो बातें कही थीं. पहली, इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए फाइनेंस डिपार्टमेंट के पास भेजना जरूरी है. दूसरी, इसकी सीमा 50 करोड़ रुपये है, इसलिए इससे ज्यादा रकम ट्रांसफर नहीं की जानी चाहिए.

चार्जशीट में कहा गया है कि अग्रवाल ने पूछा था कि क्या आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के खाते में 100 करोड़ रुपये डाले जा सकते हैं. उन्होंने बताया कि ऐसा नहीं किया जा सकता.

सीबीआई का कहना है कि परिषद के अधिकारियों ने अग्रवाल को पहले ही यही नियम बताए थे. उन्होंने यह भी बताया था कि फाइनेंस डिपार्टमेंट ने पहले कोटक महिंद्रा बैंक के एक खाते को बाद में मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. इसके बावजूद, जांच एजेंसी का कहना है कि वह 100 करोड़ रुपये की रकम पर ही जोर देते रहे.

वालिया की सलाह के साथ क्या हुआ, यह चार्जशीट का अगला अहम बिंदु है. इसे फाइल में नहीं लगाया गया. मामले की प्रक्रिया देख रहे अधिकारियों को भी इसकी जानकारी नहीं दी गई. और सीबीआई के मुताबिक, इस सलाह पर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई.

एक नोटशीट से दो नोटशीट बनीं

अकाउंटेंट राकेश कुमार ने जो मूल नोटशीट तैयार की थी और जिसे एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने आगे भेजा था, उसमें कहा गया था कि खाता खोलने से पहले फाइनेंस डिपार्टमेंट की मंजूरी ली जाए.

सीबीआई का कहना है कि हिरासत में पूछताछ के दौरान रणधीर सिंह ने बताया कि नोटशीट के दो सेट थे. उन्होंने कहा कि अग्रवाल के कहने पर मूल नोटशीट में बदलाव किया गया था. सीबीआई का कहना है कि हरियाणा पुलिस ने रणधीर के ऑफिस की दराज से एक कॉपी और उनके घर से मूल नोटशीट बरामद की.

सीबीआई ने सरकार के ऑनलाइन सिस्टम में फाइल के आगे बढ़ने का रिकॉर्ड भी दिखाया है. इसमें लिखा है, “फाइल को आगे की जरूरी कार्रवाई के लिए सीएफए के पास भेजा जा सकता है.” यह टिप्पणी मूल नोटशीट में थी, लेकिन बदली गई नोटशीट में नहीं थी. जांच एजेंसी का कहना है कि अकाउंटेंट राकेश कुमार ने भी पुष्टि की कि नोट में बदलाव किया गया था.

बदली गई नोटशीट में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक को चुनने की वजह उसकी ज्यादा ब्याज दर बताई गई थी. सीबीआई का कहना है कि इस वजह की कभी जांच नहीं की गई. किसी बैंक से कोटेशन नहीं मांगा गया और न ही अलग-अलग बैंकों की ब्याज दरों की तुलना फाइल में रखी गई.

एक और अहम बात है. स्टेट प्रोजेक्ट डायरेक्टर जितेंद्र कुमार के पास ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी देने का अधिकार था. लेकिन उन्होंने इसे मंजूरी नहीं दी. चार्जशीट के मुताबिक, उन्होंने फाइल अग्रवाल के पास भेज दी और अग्रवाल ने खुद इसे मंजूरी दे दी.

100 करोड़ रुपये और दो छोटे जवाब

खाता नंबर 10211500056, 4 जनवरी 2025 को खोला गया था. चार्जशीट के मुताबिक, रणधीर सिंह और एक एग्जीक्यूटिव इंजीनियर गौरव बरगुजार को इस खाते से लेन-देन करने के लिए अधिकृत किया गया था. खाते में दर्ज मोबाइल नंबर रणधीर का था.

8 जनवरी को कोटक महिंद्रा बैंक से 100 करोड़ रुपये तीन बार में ट्रांसफर किए गए: 40 करोड़ रुपये, 40 करोड़ रुपये और 20 करोड़ रुपये. सीबीआई का कहना है कि इस खाते के लिए बैंक की सीमा 50 करोड़ रुपये थी.

सीबीआई का कहना है कि रणधीर सिंह ने हर कदम पर व्हाट्सऐप के जरिए अग्रवाल को जानकारी दी. 4 जनवरी को अग्रवाल ने जवाब दिया, “ओके. थैंक्स.” 8 जनवरी को रणधीर ने 100 करोड़ रुपये दिखाने वाला बैंक स्टेटमेंट भेजा, जिसके बाद अग्रवाल ने लिखा: “नोटेड थैंक्स.”

सीबीआई के मुताबिक, 8 जनवरी से ही खाते से पैसे निकलने शुरू हो गए और यह सिलसिला 17 सितंबर 2025 तक चला. ये पैसे रिभव ऋषि और दूसरे लोगों के नियंत्रण वाली संस्थाओं को भेजे गए. इनमें कैपको फिनटेक सर्विसेज, आरएस ट्रेडर्स, स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स, मां वैभव लक्ष्मी इंटीरियर्स और एसआरआर प्लानिंग गुरुस प्राइवेट लिमिटेड शामिल थीं. अक्सर पैसे का कुछ हिस्सा वापस खाते में डाल दिया जाता था और फिर उसे दोबारा निकाल लिया जाता था. सीबीआई का कहना है कि ऐसा खाते में पर्याप्त पैसा दिखाने और परिषद के असली भुगतान जारी रखने के लिए किया जाता था.

सीबीआई के मुताबिक, विभाग के अपने खातों के आधार पर परिषद को 50.54 करोड़ रुपये का कुल नुकसान हुआ. ब्याज जोड़ने पर यह रकम 53.86 करोड़ रुपये हो जाती है. एजेंसी का कहना है कि 10 दिसंबर 2024 से 16 जून 2025 के बीच 134.94 करोड़ रुपये की कुल 83 कथित धोखाधड़ी वाली निकासी हुईं. उस समय अग्रवाल विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे.

सीबीआई एक कमी को लेकर साफ है. उसका कहना है कि किसी भी निकासी से जुड़े ऐसे दस्तावेज पर अग्रवाल के हस्ताक्षर नहीं हैं. पैसे रियल-टाइम ग्रॉस सेटलमेंट यानी आरटीजीएस के पत्रों और डेबिट नोट के जरिए निकाले गए. दोनों अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं ने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्होंने इन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. जांच एजेंसी के मुताबिक, निकासी इस तरह की गईं कि वे ऐसी किसी भी फाइल का हिस्सा न बनें, जिसे अग्रवाल को देखना पड़ता. इसलिए ऐसे किसी दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर मिलने की उम्मीद नहीं है.

दूसरा विभाग

इसके बाद चार्जशीट पंचकूला स्थित मार्केटिंग बोर्ड के मामले पर आती है.

अग्रवाल ने जून 2025 में कृषि विभाग ज्वाइन किया था. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने 21 मई को बोर्ड को बैंकिंग प्रस्ताव भेजा था. इसमें बचत खातों पर 7 प्रतिशत ब्याज देने की पेशकश की गई थी. यह प्रस्ताव बिना किसी कार्रवाई के पड़ा रहा.

सीबीआई के मुताबिक, 1 जुलाई 2025 को अग्रवाल ने व्हाट्सऐप पर रिभव का नाम और मोबाइल नंबर बोर्ड के फाइनेंस और अकाउंट्स कंट्रोलर राजेश सांगवान को भेजा. रिभव और सांगवान के बीच पहली फोन कॉल अगले दिन दर्ज हुई. नंबर भेजे जाने के बाद अग्रवाल और सांगवान के बीच भी व्हाट्सऐप कॉल हुई.

जांच एजेंसी इसे एक तरह का परिचय मानती है. यह परिचय आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में खाता खोलने का कोई प्रस्ताव विभाग में आगे बढ़ने से पहले कराया गया था.

2 जुलाई को रिभव और बैंक के एरिया हेड शमीम दार बोर्ड के ऑफिस पहुंचे. उसी दिन एक नोटशीट तैयार की गई. 4 जुलाई को चीफ एडमिनिस्ट्रेटर मुकेश कुमार आहूजा ने इसे मंजूरी दे दी. 10 जुलाई को चंडीगढ़ की सेक्टर 32 शाखा में खाता खोल दिया गया.

सीबीआई ने बताया कि इसमें कई बातें असामान्य थीं. बोर्ड के पास पहले से 11 बचत खाते थे, जिनमें कुल करीब 281.94 करोड़ रुपये थे. नोट में 12वां खाता खोलने की कोई वजह नहीं बताई गई थी, सिवाय ज्यादा ब्याज दर के. फाइनेंस डिपार्टमेंट से कोई मंजूरी नहीं ली गई और किसी दूसरे बैंक से कोटेशन भी नहीं लिया गया. आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की एक शाखा पंचकूला के सेक्टर 11 में बोर्ड के ऑफिस से दो से तीन किलोमीटर की दूरी पर थी, लेकिन खाता चंडीगढ़ में खोला गया.

आहूजा ने सीबीआई को बताया कि सांगवान उनके पास तीन या चार बार आए और कहा कि अग्रवाल आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में खाता खोलने के लिए “दबाव” बना रहे थे. आहूजा ने यह भी दावा किया कि एक आधिकारिक बैठक में अग्रवाल ने इस बैंक में खाता खोलने का निर्देश दिया था और इसके बाद उन्होंने सांगवान से प्रस्ताव पर कार्रवाई करने के लिए कहा.

चार्जशीट के मुताबिक, आहूजा ने अग्रवाल की इस दिलचस्पी को असामान्य बताया. उन्होंने कहा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी से ऐसी दिलचस्पी की उम्मीद नहीं की जाती.

पैसे आना शुरू हो गए. अगस्त 2025 तक खाते में रकम 50 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी और फिर खाते से पैसे निकाले जाने लगे.

10 करोड़ रुपये की निकासी

14 जनवरी 2026 को बोर्ड के खाते से 000006 नंबर के चेक के जरिए 10 करोड़ रुपये निकाले गए. सीबीआई का कहना है कि तारीख में गलती के कारण इस चेक को कई महीने पहले ही रद्द कर दिया गया था और इसकी जगह सीरीज का अगला चेक इस्तेमाल किया गया था. यह पैसा एसआरआर प्लानिंग गुरुस को 9.75 करोड़ रुपये और मन्नत कॉन्ट्रैक्टर्स को 25 लाख रुपये दिया गया. सीबीआई के मुताबिक, एसआरआर का मालिक अंकुर शर्मा और कमलेश ऋषि हैं. कमलेश, रिभव ऋषि की मां हैं.

सीबीआई का कहना है कि चेक के साथ लगाया गया डेबिट वाउचर भी जाली था और बैंकरों की “पुष्टि वाली कॉल” भी पहले से तय की गई थी. ये आरोप एजेंसी ने बैंकरों पर लगाए हैं. अग्रवाल के मामले में एजेंसी ने उस सुबह हुई घटनाओं की ओर इशारा किया है.

14 जनवरी को सुबह 10.54 बजे रिभव ने अग्रवाल को एक एसएमएस भेजा. इसमें लिखा था: “भैया गुड मॉर्निंग! बैलेंस सिर्फ 12.23 करोड़ रुपये है, यह सही है और मैं सांगवान जी के साथ बैठा हूं.” अग्रवाल ने जवाब दिया: “गुड मॉर्निंग, मुझे जब बात करनी होगी बता देना.”

सांगवान के ऑफिस के सामने स्थित हरको बैंक से जब्त किए गए निगरानी कैमरे की फुटेज में रिभव सुबह 10.51 बजे कमरे में जाते और 11:24 बजे बाहर निकलते दिखाई देते हैं.

सीबीआई इन संदेशों को दोनों के बीच नजदीकी के संकेत के तौर पर देखती है. उसका कहना है कि “भैया” शब्द से दोनों के बीच नजदीकी दिखाई देती है और अग्रवाल के जवाब से लगता है कि जरूरत पड़ने पर वह सांगवान को मनाने के लिए तैयार थे. एजेंसी ने यह भी बताया है कि 13 और 14 जनवरी को अग्रवाल, रिभव और सांगवान के बीच फोन कॉल दर्ज हुई थीं. ये जांच एजेंसी के निष्कर्ष हैं और चार्जशीट में इन्हें इसी रूप में बताया गया है.

धोखाधड़ी सामने आने पर उन्होंने क्या कहा

कैशियर अनीता देवी ने फरवरी की शुरुआत में जनवरी के बैंक स्टेटमेंट में हुई निकासी देखी. यह मामला सांगवान तक पहुंचा.

चार्जशीट के मुताबिक, 17 फरवरी को सांगवान ने अग्रवाल को संदेश भेजकर मिलने का समय मांगा. वह रात करीब 9 बजे अग्रवाल के घर गए. चार्जशीट के मुताबिक, सांगवान ने बताया कि रिभव भी वहां मौजूद थे. अग्रवाल ने उनसे घबराने को नहीं कहा और बैंक से जुड़े दस्तावेज इकट्ठा करने के लिए कहा.

दो दिन बाद, 19 फरवरी को सांगवान और अनीता देवी मिनी सचिवालय में अग्रवाल के ऑफिस गए. उन्हें पता चला था कि एसआरआर प्लानिंग गुरुस के एक डायरेक्टर कमलेश ऋषि हैं, जो रिभव ऋषि के रिश्तेदार हैं.

चार्जशीट के मुताबिक, अग्रवाल ने उन्हें राज्य सरकार का एक पत्र दिखाया, जिसमें हिसाब मिलाने के लिए 4 अप्रैल तक यानी एक महीने का समय दिया गया था. उन्होंने कहा कि मामले को सरकार के स्तर पर पहले ही देखा जा रहा है. सांगवान ने जब 10 करोड़ रुपये की बात बताई तो उनके मुताबिक अग्रवाल ने कहा: “ये तो पहले से ही होता आ रहा है.” उन्होंने रिभव को अच्छी पहुंच वाला व्यक्ति भी बताया और कहा कि उसके लिए 10 से 20 करोड़ रुपये कोई बड़ी बात नहीं है. उन्होंने उन्हें भरोसा दिलाया कि पैसा वापस आ जाएगा.

सीबीआई का कहना है कि विभाग के प्रशासनिक सेक्रेटरी होने के बावजूद अग्रवाल ने न तो सांगवान से विभाग में शिकायत दर्ज कराने को कहा और न ही पुलिस के पास जाने की बात की. एजेंसी का कहना है कि उन्होंने उन्हें चुप रहने की सलाह दी.

इसके बाद सांगवान आहूजा के पास गए. आहूजा ने उन्हें तुरंत एफआईआर दर्ज कराने को कहा. सांगवान ने पहले बैंक से संपर्क करने का सुझाव दिया. आहूजा ने कई दिनों तक मामला दबाकर रखने के लिए उन्हें डांटा. सीबीआई के मुताबिक, 20 फरवरी को आहूजा के कहने पर बैंक को ईमेल के जरिए शिकायत भेजी गई, अग्रवाल के कहने पर नहीं.

23 फरवरी को बोर्ड के अधिकारियों ने हरियाणा लोक सेवा आयोग के ऑफिस में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अधिकारियों से मुलाकात की. बैंक से रकम ब्याज समेत वापस करने को कहा गया. उसी दिन बैंक ने 10 करोड़ रुपये के साथ 7,28,227 रुपये का ब्याज भी वापस कर दिया. सीबीआई के मुताबिक, पैसा तभी वापस आया जब अग्रवाल को इस प्रक्रिया से अलग रखा गया.

यहां एक और फुटेज का ज़िक्र है. चंडीगढ़ के हयात होटल के कोयो रेस्टोरेंट की सीसीटीवी फुटेज में अग्रवाल इस साल 6 फरवरी को रिभव और एक अन्य आरोपी बैंकर अभय कुमार से मिलते दिखाई देते हैं. सीबीआई का कहना है कि तब तक दोनों आईडीएफसी फर्स्ट बैंक छोड़ चुके थे और अग्रवाल को यह पता था. इसके बावजूद वह अपने अधिकारियों को बैंक से जुड़े मामलों में रिभव के साथ ही बात करने का निर्देश देते रहे.

पार्टी में लोग

सीबीआई के मामले का दूसरा हिस्सा उस चीज़ से जुड़ा है, जिसे वह अनुचित फायदा कहती है. जांच एजेंसी का कहना है कि रिभव और उसके साथियों ने इसके लिए लगभग पूरा भुगतान नकद में किया.

सीबीआई का मुख्य आरोप जिरकपुर के एक फार्महाउस जेड मैनर में हुई पार्टियों को लेकर है. आयोजन स्थल के रिकॉर्ड के मुताबिक, जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच ऐसी 10 पार्टियां हुईं. इनकी बुकिंग चार्जशीट में डब्ल्यू-1 कही गई एक महिला या किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर की गई थी. डब्ल्यू-1 रिभव की दोस्त थी. उसने सीबीआई को बताया है कि रिभव के कहने पर और उसके पैसों से उसने आयोजन स्थल बुक किया और डांसरों का इंतजाम किया.

सीबीआई का कहना है कि इनमें से चार पार्टियां 1 नवंबर, 9 नवंबर और 13 दिसंबर 2025 और 16 जनवरी 2026 को अग्रवाल की मांग पर आयोजित की गई थीं और वह इनमें शामिल हुआ था. एजेंसी ने डब्ल्यू-1 के बयान के साथ-साथ रिभव के ड्राइवर हेमराज, कैटरर के मैनेजर और जेड मैनर के तत्कालीन मैनेजर के बयान का भी हवाला दिया है. चार्जशीट के मुताबिक, वोडाफोन से मिले अग्रवाल के फोन के कॉल और इंटरनेट रिकॉर्ड भी इन रातों में उन्हें फार्महाउस में मौजूद दिखाते हैं.

डब्ल्यू-1 के मुताबिक, रिभव कभी-कभी अग्रवाल को उनकी व्हाट्सऐप कॉल में जोड़ देता था और अग्रवाल अगली पार्टी के बारे में पूछते थे.

डब्ल्यू-1 ने अग्रवाल के साथ हुई दो घटनाओं के बारे में भी बताया. उसने सीबीआई को बताया कि 1 नवंबर 2025 को रिभव ने पार्टी में उसकी मुलाकात अग्रवाल से कराई थी. रिभव ने उन्हें हरियाणा सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में बताया था. उसने कहा कि अग्रवाल उसे अलग ले गए और उसे अपने कमरे में लड़कियों को भेजने के लिए कहा.

उसने बताया कि 9 नवंबर को वह पार्टी के बीच अकेली खड़ी थी और रिभव पास में था. तभी अग्रवाल उसके पास आए, एक कमरे की तरफ इशारा किया और उसे उनके साथ अंदर चलने के लिए कहा. उसने मना कर दिया. उसके मुताबिक, रिभव बीच में आया और उसने अग्रवाल से कहा कि वह उसकी दोस्त है और वह किसी दूसरी लड़की के साथ जा सकते हैं. डब्ल्यू-1 ने कहा कि अग्रवाल की बातों और उनके व्यवहार से साफ था कि उनका इरादा गलत था. उसने उन्हें बताया कि वह ऐसा काम नहीं करती.

चार्जशीट में दर्ज है कि उसने कहा कि उसे अपमानित, शर्मिंदा और बहुत बुरा महसूस हुआ.

सीबीआई ने एक दूसरी महिला, डब्ल्यू-3 का भी हवाला दिया है. उसका कहना है कि नवंबर और दिसंबर 2025 में दो बार अग्रवाल जेड मैनर में उस कमरे में आए, जहां वह मौजूद थी. डब्ल्यू-3 के बयान के आधार पर सीबीआई ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 79 लगाई है. यह धारा किसी महिला की मर्यादा का अपमान करने से जुड़ी है.

चार्जशीट में तीन और घटनाओं का ज़िक्र है: 24 दिसंबर 2025, होटल नोवोटेल, चंडीगढ़: सीबीआई का कहना है कि डब्ल्यू-3 को अग्रवाल के कहने पर एक अन्य आरोपी और हरियाणा सरकार के अधिकारी नरेश कुमार और अभय कुमार के जरिए होटल बुलाया गया था. कमरे की बुकिंग नरेश के नाम पर की गई थी. रिकॉर्ड के मुताबिक, अग्रवाल रात 9:43 बजे से 10:11 बजे के बीच होटल पहुंचे, लेकिन सीबीआई के मुताबिक मुलाकात नहीं हो पाई. इसकी वजह यह थी कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के वीआईपी काफिले की आवाजाही के कारण अग्रवाल को देर हो गई और डब्ल्यू-3 को भी कहीं और जाना था.

10 जनवरी 2026, होटल विंडहैम, मोहाली: सीबीआई का कहना है कि डब्ल्यू-2 को अग्रवाल के लिए दिल्ली से बुलाया गया था और उसे 75,000 रुपये नकद दिए गए थे. उसी रात 10:51 बजे नरेश कुमार ने अभय कुमार को संदेश भेजा: “पंकज सर साथ हैं.”

रिकॉर्ड के मुताबिक, रात 10:56 बजे होटल से चंडीगढ़ के सेक्टर 19 स्थित अग्रवाल के घर तक जाने के लिए उबर की सवारी बुक हुई थी. सीबीआई का कहना है कि फोन, होटल और कैब के रिकॉर्ड के मुताबिक वह रात करीब 8:30 बजे से 11 बजे तक होटल में मौजूद थे.

8 और 9 अक्टूबर 2025, एंडाज बाय हयात, एयरोसिटी, नई दिल्ली: सीबीआई का कहना है कि अग्रवाल के कहने पर रिभव ने अपने एचडीएफसी बैंक क्रेडिट कार्ड से एक कमरा बुक किया था. होटल में पहुंचने के समय अग्रवाल का पहचान पत्र जमा किया गया था.

सीबीआई ने 1 अक्टूबर 2025 को चंडीगढ़ के होटल नोवोटेल में अग्रवाल की पत्नी के लिए आयोजित एक पार्टी का भी ज़िक्र किया है. एजेंसी का कहना है कि 19,399 रुपये का बिल रिभव ने नकद में दिया था और होटल के फूड एंड बेवरेज मैनेजर ने भी अपने बयान में इसकी पुष्टि की है.

सीबीआई का कहना है कि नकद पैसा सरकारी पैसों से आया था, जिन्हें कथित तौर पर निकालकर पहले सोने में बदला गया और फिर वापस नकद में बदला गया. चार्जशीट के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ दो भुगतान ऐसे हैं, जिनका पता बैंक या यूपीआई रिकॉर्ड से लगाया जा सकता है: 9 नवंबर के डिनर के लिए 1 लाख रुपये का चेक और अभय कुमार की ओर से 40,000 रुपये का यूपीआई ट्रांसफर.

सीबीआई इसे कैसे देखती है

चार्जशीट में एक लंबे हिस्से में सीबीआई ने अग्रवाल के खिलाफ अपने मामले का सार दिया है. इसमें कहा गया है कि उन्होंने हर कदम पर सामान्य प्रक्रिया से हटकर काम किया. उन्होंने अपने कमरे में प्रस्ताव लिया, जबकि किसी फील्ड ऑफिस के लिए ऐसा काम सेक्रेटरी नहीं करता. उन्होंने फाइनेंस एडवाइजर को फोन कर तय सीमा से बचने का रास्ता पूछा. उन्होंने फाइल को फाइनेंस डिपार्टमेंट से दूर रखा. उन्होंने नोटशीट बदलवाई और खुद उसे मंजूरी दी. मार्केटिंग बोर्ड में उन्होंने बैंकर का परिचय कराया और खाता खोलने का निर्देश दिया. जब 10 करोड़ रुपये गायब हुए, तो सीबीआई का कहना है कि उन्होंने इसकी शिकायत नहीं की.

जांच एजेंसी का कहना है कि इन कामों को सिर्फ एक ब्रांच मैनेजर की जमा बढ़ाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए की गई मदद नहीं माना जा सकता. एजेंसी के मुताबिक, नियमों और सरकारी पैसों पर जो खतरा आया, वह इस तरह की किसी मदद को सही ठहराने से कहीं ज्यादा बड़ा था.

सीबीआई का यह भी कहना है कि बाद में उनके व्यवहार से उनकी भूमिका का पता चलता है. एजेंसी के मुताबिक, अगर शुरुआत में किसी व्यक्ति को गुमराह किया गया होता, तो धोखाधड़ी सामने आने के बाद वह इस तरह से व्यवहार नहीं करता.

31 दिसंबर की बैठक को लेकर सीबीआई की ज्यादातर जानकारी कमरे में मौजूद दो अधिकारियों भूपिंदर सिंह और रणधीर सिंह के बयानों पर आधारित है. रणधीर खुद भी इस मामले में आरोपी हैं. सीबीआई का कहना है कि मूल नोटशीट, सरकारी सिस्टम में फाइल के आगे बढ़ने का रिकॉर्ड और राकेश कुमार का बयान इस दावे का समर्थन करते हैं कि नोटशीट में बदलाव किया गया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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