गुरुग्राम: पिछले साल 24 अक्टूबर को दोपहर 12.52 बजे हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) के पंचकूला कार्यालय में काम करने वाले एक डेटा एंट्री ऑपरेटर ने अभय कुमार नाम के एक बैंकर को मैसेज भेजा. अभय कुमार अब IDFC फ़र्स्ट बैंक में नहीं थे. उन्हें चार महीने पहले, 10 जून 2025 को नौकरी से हटा दिया गया था. लेकिन उस मैसेज से ऐसा दिख रहा था कि वह अभी भी IDFC फ़र्स्ट बैंक का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.
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मैसेज में बोर्ड की उन फिक्स्ड डिपॉजिट्स को बांटने की बात थी, जिनकी अवधि पूरी होने वाली थी. मैसेज में लिखा था, “IDFC को 25 करोड़ रुपये, बंधन को 25 करोड़ रुपये.” ऑपरेटर सौरव शर्मा ने आगे लिखा: “यह कपिल ने लिखा है.” कपिल, बोर्ड के सदस्य सचिव के निजी सहायक थे. एक मिनट बाद पूरी लिस्ट भेजी गई. IDFC, Bandhan, IndusInd और Ujjivan को 25-25 करोड़ रुपये और HARCO (बैंक) को 77 करोड़ रुपये.
बोर्ड के चेयरमैन विनीत गर्ग, जो 1991 बैच के IAS अधिकारी हैं, ने अभी अपना आदेश पास नहीं किया था. 645 करोड़ रुपये के सरकारी पैसे के कथित गबन के मामले में IDFC फ़र्स्ट बैंक से जुड़े केस की चार्जशीट में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने ऐसा कहा है.
CBI की चार्जशीट के मुताबिक, उसी दिन जब गर्ग ने आदेश दिया, तो आंकड़े बदल गए. गर्ग उन छह IAS अधिकारियों में से एक हैं जिन्हें आरोपी बनाया गया है. उन्होंने सदस्य सचिव IAS अधिकारी प्रदीप कुमार की सिफारिश को सिर्फ मंजूर नहीं किया, बल्कि उसमें और बदलाव किया, जिससे IDFC फ़र्स्ट बैंक को फायदा हुआ.
CBI का कहना है कि गर्ग ने “अपने हाथ से इसे काट दिया” और IndusInd Bank के लिए रखे गए 25 करोड़ रुपये को IDFC फ़र्स्ट बैंक के खाते में डाल दिया. इससे उस दौर में IDFC का हिस्सा 50 करोड़ रुपये हो गया. बोर्ड के पास IDFC की कुल रकम बढ़कर 163.68 करोड़ रुपये हो गई, जो नए पैनल में शामिल किए गए बैंक के लिए 50 करोड़ रुपये की सीमा से तीन गुना से भी ज्यादा थी.
CBI ने उसी नोट में बताया है कि बंधन बैंक को 25 करोड़ रुपये तक ही रखा गया. उसने 7.30 प्रतिशत ब्याज की दर दी थी, जबकि IDFC ने 7.25 प्रतिशत की दर दी थी. IDFC का कोटेशन सिर्फ एक पेज का था. उस पर बैंक की मुहर नहीं थी और हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति का नाम भी नहीं था. उस कोटेशन की तारीख 15 अक्टूबर थी, यानी कोटेशन देने की आखिरी तारीख के एक हफ्ते बाद.
उस दोपहर के फोन रिकॉर्ड भी मामले की एक खराब तस्वीर दिखाते हैं. चार्जशीट के मुताबिक, IDFC फ़र्स्ट बैंक के सेक्टर 32 ब्रांच के पूर्व रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार के फोन में दोपहर 12.15 बजे से शाम 5.15 बजे के बीच मनीष जिंदल नाम के एक व्यक्ति के साथ 11 कॉल दिखती हैं.
दोपहर 1.09 बजे जिंदल को IDFC फ़र्स्ट बैंक के ब्रांच मैनेजर रिभव ऋषि का फोन आया. यह कॉल 4 मिनट 13 सेकंड चली. उस समय जिंदल किसी भी बैंक में कोई पद नहीं संभाल रहे थे. CBI का कहना है कि अभय कुमार के साथ अपनी चैट में जिंदल ने गर्ग को “सर” कहा था.
चार्जशीट में कहा गया है कि 24 अक्टूबर को गर्ग की कार्रवाई कोई अकेली घटना नहीं थी. इसमें कहा गया है कि 14 महीनों के दौरान ऐसे छह निवेश किए गए, जबकि गर्ग के पद संभालने से पहले बोर्ड के पैसे के लिए खुले तौर पर हुई हर बोली में बैंक हार गया था.
यह जानकारी CBI ने 2 सितंबर को पंचकूला की विशेष CBI अदालत के जज के सामने दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में दी है. यह 559 पेज की चार्जशीट दिप्रिंट ने देखी है. चार्जशीट में CBI ने आरोप लगाए गए छह IAS अधिकारियों की कथित भूमिका को एक-एक करके विस्तार से बताया है. यह रिपोर्ट आरोपी नंबर 27 गर्ग से जुड़ी है.
दिप्रिंट ने सोमवार को व्हाट्सएप पर गर्ग को मैसेज भेजकर CBI के आरोपों पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी. मैसेज के साथ CBI की 559 पेज की चार्जशीट की PDF भी भेजी गई. अगर गर्ग की तरफ से जवाब आता है, तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
चार महीने तक हार
CBI का गर्ग के खिलाफ बाकी मामला फाइलों, नोटिंग और तारीखों पर आधारित है.
HSPCB एक रेगुलेटरी संस्था है. यह उद्योगों को काम करने की अनुमति देता है, हवा और पानी की जांच करता है और प्रदूषण फैलाने वालों से पर्यावरण से जुड़ा जुर्माना वसूलता है. चार्जशीट के मुताबिक, इसके खर्च सीमित हैं और इसमें लगातार पैसा आता रहता है. इसलिए यह अपने सेविंग्स अकाउंट में काम चलाने लायक पैसा रखता है और बाकी पैसे को फिक्स्ड डिपॉजिट में डाल देता है. जब इनकी अवधि पूरी होती है, तो इन्हें फिर से जमा कर दिया जाता है.
IDFC फर्स्ट बैंक को हरियाणा सरकार के साथ काम करने के लिए पैनल में शामिल किया गया था. CBI का कहना है कि वह बोर्ड की जमा राशि हासिल करना चाहता था. गर्ग के पद संभालने से पहले करीब चार महीनों तक बैंक के चंडीगढ़ स्थित सरकारी बैंकिंग समूह के जरिए इस पैसे के लिए बोली लगाता रहा. उसके एरिया हेड शमीम दार कोटेशन भेजते थे. CBI का कहना है कि ये दरें असली थीं और बैंक से मंजूर थीं. बैंक हर बार हार गया. बोर्ड की एक भी जमा राशि उसे नहीं मिली.
गर्ग ने 2 दिसंबर 2024 को HSPCB के चेयरमैन का पद संभाला. चार्जशीट इस दिन को “टर्निंग पॉइंट” बताती है.
चार्जशीट में कहा गया है, “बैंक जो चीज बाजार में योग्यता के आधार पर हासिल नहीं कर सका, वह बाद में दूसरे तरीकों से हासिल करने लगा.”
क्या बदला
CBI ने गर्ग से जुड़ी उन बदलावों की लिस्ट दी है जो उसके मुताबिक खुद गर्ग ने किए. CBI का कहना है कि ये बदलाव लगातार हुए और हर बदलाव से बैंक को फायदा हुआ.
पहले बड़े बदलाव के रूप में, बैंक की दरों की तुलना करने और फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें (FDR) देने का काम बोर्ड के ई-ऑफिस सिस्टम से निकालकर फिजिकल फाइल में डाल दिया गया. ई-ऑफिस सिस्टम में हर एंट्री का रिकॉर्ड रहता है. चार्जशीट के मुताबिक, बोर्ड के रिकॉर्ड में बिना निशान छोड़े बदलाव नहीं किया जा सकता था, जबकि कागज की फाइल को बदला जा सकता था.
बैंक की सूची में नए शामिल किए गए प्राइवेट बैंकों और स्मॉल फाइनेंस बैंकों को भी शामिल किया गया. इससे पहले बोर्ड अपना पैसा राष्ट्रीयकृत बैंकों और तीन बड़े प्राइवेट बैंकों, HDFC, Axis और ICICI में लगाता था. CBI का कहना है कि इसी रास्ते से IDFC First Bank को अंदर आने का मौका मिला. CBI के मुताबिक, इसी खाते से बोर्ड का पैसा कथित तौर पर निकाला गया.
कहा गया है कि गर्ग ने निर्देश दिया कि बैंकों की ब्याज दरों की तुलना वाली चार्ट हमेशा नोटशीट के एक नए पेज से शुरू होनी चाहिए. इसे नोटशीट के पीछे या पहले से चल रही नोटशीट में बची हुई जगह पर नहीं लिखा जा सकता था. चार्जशीट में सदस्य सचिव के निजी सहायक कपिल के बयान का हवाला दिया गया है. कपिल ने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि पूरी नोटशीट को बदला जा सके.
सदस्य सचिव प्रदीप कुमार, जो IAS अधिकारी और आरोपी नंबर 26 हैं, हर नोटशीट को खुद गर्ग के ऑफिस ले जाते थे और साइन करने से पहले उस पर चर्चा करते थे. गर्ग जो बदलाव बताते थे, उन्हें कपिल नोटशीट में डालते थे. इसके बाद बदली हुई शीट पर प्रदीप कुमार के हस्ताक्षर होते थे और उसे गर्ग के पास भेजा जाता था. गर्ग उस पर “as proposed” लिखते थे.
फिर फरवरी 2025 से बैंक की तरफ से कोटेशन देने का तरीका बदल गया. पहले कोटेशन बैंक के Government Banking Group के शमीम दार भेजते थे. अब ये कोटेशन चंडीगढ़ के सेक्टर-32 ब्रांच से आने लगे. इन्हें उस समय के रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार के हस्ताक्षर से भेजा जाता था. पहला कोटेशन 24 फरवरी 2025 का था और उसमें 8.25 प्रतिशत ब्याज दर दी गई थी. बैंक ने CBI को बताया है कि उस समय बैंक में ऐसी कोई दर चल ही नहीं रही थी.
बिचौलिया
CBI का कहना है कि गर्ग मनीष जिंदल को पहले से जानते थे. जिंदल HDFC Bank और बाद में IndusInd Bank में रीजनल हेड रह चुके थे. उस समय गर्ग हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम में थे और उसका अकाउंट HDFC में था. चार्जशीट में कहा गया है, “दोनों के बीच पेशेवर संबंध बन गए.”
2025 में जिंदल किसी भी बैंक में कोई पद नहीं संभाल रहे थे. CBI का कहना है कि इसके बावजूद वह बैंकरों और गर्ग के बीच संदेश और काम पहुंचाते थे.
जांच एजेंसी का कहना है कि उसने जिंदल और अभय कुमार की चैट पढ़ी. CBI के मुताबिक, जिंदल ने उनमें गर्ग को “सर” कहा था, बैंकरों तक गर्ग के निर्देश पहुंचाए और काम की प्रगति की जानकारी वापस गर्ग तक पहुंचाई. CBI के मुताबिक, एक बातचीत का सिलसिला अभय कुमार और ऋषि से शुरू होकर जिंदल तक पहुंचा. दूसरा जिंदल से शुरू होकर गर्ग तक पहुंचा.
फोन रिकॉर्ड भी इस कथित कड़ी को दिखाते हैं. CBI का कहना है कि 20 फरवरी 2025 से 21 फरवरी 2026 के बीच जिंदल और ऋषि के बीच 847 कॉल हुईं. 18 फरवरी 2026 तक जिंदल और अभय कुमार के बीच 673 कॉल हुईं. 20 फरवरी 2025 से पहले जिंदल और अभय कुमार के बीच कॉल “बहुत कम” थीं. 20 फरवरी 2025 वही दिन था जब बोर्ड ने कोटेशन मांगे थे.
सोने के सिक्के
चार्जशीट में एक और घटना बताई गई है. यह घटना 2025 की दिवाली से चार या पांच दिन पहले चंडीगढ़ के सेक्टर 7A के एक गार्डन में हुई थी.
अमृतपाल, जिसे CBI ने रिभव ऋषि के लिए काम करने वाला कूरियर बताया है, ने CBI को बताया कि ऋषि ने उसे सेक्टर 35 में स्थित सावन ज्वेलर्स से 50-50 ग्राम के दो सोने के सिक्के लेने को कहा था. उसे इन्हें सेक्टर 7A के मकान नंबर 3 में पहुंचाना था. चार्जशीट में इस पते को गर्ग का वर्तमान पता बताया गया है. सावन ज्वेलर्स भी आरोपी है और उसे आरोपी नंबर 17 बनाया गया है. CBI का कहना है कि दुकान के कर्मचारी अरुण कुमार ने पैकेट उसे दिया था.
अमृतपाल शाम करीब 7 से 7.30 बजे घर पहुंचा. उसने बताया कि घर किसी सरकारी अधिकारी के घर जैसा लग रहा था. आसपास दो या तीन पुलिस गश्ती गाड़ियां खड़ी थीं और गेट पर एक गार्ड था. ऋषि के कहने पर गार्ड ने उसे अंदर जाने दिया.
ऋषि और जिंदल गार्डन में थे. अमृतपाल ने बताया कि एक दुबले-पतले व्यक्ति घर से बाहर आया. ऋषि और जिंदल ने उसे “Good Evening, Sir” कहा. ऋषि ने अमृतपाल से पैकेट लिया और उसके अंदर की चीजें उस व्यक्ति को दे दीं. इसके बाद उसने अमृतपाल को वहां से जाने का इशारा किया.
CBI का कहना है कि वह व्यक्ति विनीत गर्ग था. चार्जशीट में कहा गया है कि वह व्यक्ति लगभग गर्ग जैसा दिखता था. CBI ने 16 अक्टूबर के मोबाइल फोन रिकॉर्ड के आधार पर भी अपनी बात रखी है.
चार्जशीट के मुताबिक, गर्ग का फोन शाम 6.31 बजे सेक्टर 8B में एक मोबाइल टावर से जुड़ा था. जिंदल का फोन शाम 7.19 बजे सेक्टर 7B के एक सार्वजनिक पार्क के पास के टावर से जुड़ा. ऋषि का फोन शाम 7.21 बजे से 7.49 बजे तक उन्हीं टावरों से जुड़ा रहा. अमृतपाल का फोन शाम 7.15 बजे से 7.30 बजे के बीच सेक्टर 34 और सेक्टर 35 से सेक्टर 8B और सेक्टर 7A के पास के टावरों तक पहुंचा. CBI का कहना है कि ये रिकॉर्ड “चारों की मौजूदगी और उनके आने-जाने की पुष्टि करते हैं”.
CBI इन सिक्कों को “अनुचित फायदा” कहती है. उसका कहना है कि गर्ग ने बोर्ड के पैसे को बैंकों में रखने की मंजूरी देते समय अपना सरकारी काम “अनुचित फायदा मिलने की उम्मीद और उसके बदले” किया.
छह निवेश, एक सीमा
12 जुलाई 2024 के वित्त विभाग के एक मेमो में नए पैनल में शामिल किए गए बैंक में सरकारी संस्था कितनी रकम रख सकती है, इसकी सीमा तय की गई है. यह सीमा 50 करोड़ रुपये है. बोर्ड के अपने सदस्य सचिव ने 8 मार्च 2025 को लिखी पहली नोट में इस सीमा का जिक्र किया था.
चार्जशीट के मुताबिक, गर्ग ने मार्च 2025 से जनवरी 2026 के बीच IDFC First Bank में छह बार पैसा रखा. ये थे:
- 8 मार्च 2025: 8.25 प्रतिशत की दर से 50 करोड़ रुपये.
- 27 मार्च 2025: 8.25 प्रतिशत की दर से 17.90 करोड़ रुपये, जबकि Jana Small Finance Bank ने 8.45 प्रतिशत की दर दी थी.
- 2 जुलाई 2025: 7.10 प्रतिशत की दर से 37.78 करोड़ रुपये. IndusInd Bank ने भी यही दर दी थी.
- 1 अक्टूबर 2025: 8 करोड़ रुपये सेविंग्स अकाउंट में, एक ऐसे पत्र के आधार पर जिस पर सिर्फ एक हस्ताक्षर था और बैंक की मुहर नहीं थी.
- 24 अक्टूबर 2025: 7.25 प्रतिशत की दर से 50 करोड़ रुपये, जबकि Bandhan Bank ने 7.30 प्रतिशत की दर दी थी.
- 22 जनवरी 2026: 7.40 प्रतिशत की दर से 45.74 करोड़ रुपये.
CBI की गिनती के मुताबिक, इससे बैंक में कुल रकम 209.42 करोड़ रुपये हो गई, जबकि सीमा 50 करोड़ रुपये थी. उसकी अपनी टेबल के मुताबिक, आखिरी दो एंट्री से पहले FDR की कुल रकम 163.68 करोड़ रुपये थी.
बड़ी रकम पर कम ब्याज दर
CBI 22 जनवरी 2026 के आखिरी निवेश को सबसे साफ उदाहरण बताती है.
नए सदस्य सचिव योगेश कुमार ने पर्यावरण मुआवजा निधि के 42.22 करोड़ रुपये रोक रखे थे. उन्होंने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्होंने इसे रोकने की वजह लिखी नहीं थी, क्योंकि इस बारे में गर्ग से अनौपचारिक बातचीत हुई थी. 22 जनवरी के गर्ग के आदेश से यही पैसा जारी कर दिया गया. इसमें HARCO Bank के लिए सुझाए गए 21.99 करोड़ रुपये भी बिना कोई वजह बताए हटा दिए गए. इसके बाद 45.74 करोड़ रुपये IDFC फर्स्ट बैंक में 7.40 प्रतिशत की दर से और 18.46 करोड़ रुपये Jana Bank में 7.45 प्रतिशत की दर से डाल दिए गए.
चार्जशीट में कहा गया है, “इस तरह उन्होंने एक ही कागज के आधार पर छोटी रकम पर ज्यादा ब्याज दर और बड़ी रकम पर कम ब्याज दर लागू की.”
CBI का कहना है कि यह काम शुरू होने से पहले ही एक बोली लगाने वाले को इसकी जानकारी दे दी गई थी. 12 जनवरी को सौरव शर्मा ने अभय कुमार को मैसेज किया था कि कोटेशन मांगे जाएंगे और कुल रकम “करीब 111 करोड़” होगी. अभय कुमार को 10 जून 2025 को उनके पद से हटा दिया गया था.
एक ऐसा अकाउंट जिसके साथ किसी बैंक का नाम नहीं था
एक और फाइल इस मामले में अहम है. यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गैप फंडिंग सहायता योजना के लिए बोर्ड का विचार था. CPCB ने बोर्ड से अलग ब्याज देने वाला अकाउंट खोलने को कहा था.
23 मई 2025 को गर्ग ने अकाउंट खोलने की मंजूरी दी. CBI का कहना है कि मंजूरी में किसी बैंक का नाम नहीं था. नोटशीट में IDFC First Bank का कोई प्रस्ताव नहीं था, बैंकों की कोई तुलना नहीं थी और किसी बैंक को चुनने की बात भी नहीं थी. इसके बावजूद अकाउंट नंबर 10232117148 IDFC फर्स्ट बैंक में खोला गया.
CBI का कहना है कि अभय कुमार बोर्ड के ऑफिस आए और उन्होंने खुद फॉर्म की हर एंट्री भरी. उन्होंने सिर्फ उस समय के सीनियर अकाउंट्स ऑफिसर परवीन कुमार के हस्ताक्षर लिए. वित्त विभाग से कोई मंजूरी नहीं ली गई और बाद में भी मंजूरी लेने की कोशिश नहीं की गई.
CBI का कहना है कि परवीन कुमार की 4 जून 2025 की एक नोट में लिखा था: “Add proof of newly opened account today” (आज ही नए खुले खाते का प्रमाण जोड़ें). CBI के मुताबिक, इससे पता चलता है कि रिकॉर्ड घटना के बाद बनाया गया था.
गर्ग को क्या पता था
चार्जशीट में गर्ग की जानकारी को सिर्फ अनुमान के भरोसे नहीं छोड़ा गया है. इसमें कहा गया है कि रिकॉर्ड से यह साबित होता है.
HSPCB में आने से पहले गर्ग स्कूल शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव थे. वहां CBI का कहना है कि हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के कोटक महिंद्रा बैंक के दो अकाउंट जून 2024 में वित्त विभाग की पहले से मंजूरी के बिना खोले गए थे. बाद में मंजूरी लेने के लिए प्रस्ताव 24 सितंबर 2024 को भेजा गया. गर्ग ने 25 सितंबर को उसे मंजूर किया.
वित्त विभाग ने इसे सिर्फ एक औपचारिकता नहीं माना. उसने ऐसे सभी अकाउंट की लिस्ट और देरी की वजह मांगी. गर्ग ने 4 अक्टूबर को ये सवाल देखे और 8 नवंबर को जवाब को मंजूरी दी. बाद में मंजूरी देने से इनकार कर दिया गया. 2 दिसंबर 2024 को उनका ट्रांसफर हो गया. उसी दिन उन्होंने प्रदूषण बोर्ड में काम शुरू किया.
इसलिए CBI का कहना है कि गर्ग को तीन बातें पता थीं. पहली, पहले से मंजूरी लेना जरूरी था. दूसरी, यह मंजूरी अपने आप नहीं मिलती थी. तीसरी, बिना मंजूरी खोले गए अकाउंट पर सवाल उठ सकते थे.
इसके बाद HSPCB में, चार्जशीट के मुताबिक, उन्होंने “पूरे समय चुप रहना चुना”. CBI का कहना है कि IDFC के अकाउंट को वित्त विभाग के पास भेजने से दो चीजें हो सकती थीं. मंजूरी देने से मना किया जा सकता था. और जांच होने पर उस गलत दर का पता चल सकता था, जिसके आधार पर बैंक को बार-बार सबसे ज्यादा बोली लगाने वाला दिखाया गया.
वह पैसा जो था ही नहीं
CBI का कहना है कि बैंक की तरफ से की गई जालसाजी इस कहानी का दूसरा हिस्सा है.
चार्जशीट के मुताबिक, 201.42 करोड़ रुपये की मूल रकम और 217.16 करोड़ रुपये की मैच्योरिटी रकम वाली सात FDR IDFC First Bank की सेक्टर-32 ब्रांच के आधिकारिक रिकॉर्ड में “दिखाई ही नहीं देतीं”. ये FDR बोर्ड के ऑफिस में हाथ से दी गई थीं. CBI का कहना है कि इन्हें अभय कुमार ने जाली बनाया था. जांच में इन FDR के ड्राफ्ट एक ईमेल अकाउंट seo.aman@gmail.com तक पहुंचे.
बोर्ड का पैसा एक ऐसे अकाउंट में गया, जिसका नंबर 10219084990 था और जिसे CBI के मुताबिक बोर्ड ने कभी खोला ही नहीं था. चार्जशीट में कहा गया है कि यह अकाउंट बिना किसी मंजूरी के खोला गया था और प्रदूषण बोर्ड ने भी कहा है कि उसने यह अकाउंट नहीं खोला. इसका वेलकम किट 3 मार्च 2025 को बोर्ड के ऑफिस पहुंचा था, यानी गर्ग की पहली रकम रखने की मंजूरी से पांच दिन पहले.
CBI का कहना है कि इस अकाउंट का मोबाइल नंबर अभय कुमार के साले अभिषेक सिंगला के नाम पर था. इसका ईमेल आईडी बोर्ड के असली ईमेल आईडी से सिर्फ एक अक्षर अलग था. कुछ ही दिनों में चेकबुक जारी कर दी गईं. CBI के मुताबिक, पहली 400 चेक की चेकबुक अभय कुमार खुद ले गए और वह बोर्ड तक कभी नहीं पहुंची.
चार्जशीट में कहा गया है कि इस अकाउंट से 187.26 करोड़ रुपये की 47 फर्जी निकासी की गईं. इसके मुकाबले सिर्फ 17.90 करोड़ रुपये की पांच रकम जमा हुईं. इस पैसे का कुछ हिस्सा स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स को गया, जिसे CBI ने एक शेल कंपनी बताया है.
CBI के आरोप
CBI ने बोर्ड को हुए नुकसान की रकम 1,59,85,95,089 रुपये (करीब 160 करोड़ रुपये) बताई है. उसने इस रकम को तीन हिस्सों में बांटा है. ब्याज का नुकसान 43,80,962 रुपये (43.8 लाख रुपये) है. पहली 50 करोड़ रुपये की रकम को छोड़कर, FDR बनाने और दोबारा बनाने के लिए जमा की गई मूल रकम 1,51,42,14,127 रुपये (151.4 करोड़ रुपये) है. 8 करोड़ रुपये जो सेविंग अकाउंट में डाले गए थे, वह तीसरा हिस्सा है.
चार्जशीट में कहा गया है कि गर्ग ने ऋषि, अभय कुमार, जिंदल, प्रदीप कुमार, परवीन कुमार, सौरव शर्मा और दूसरे लोगों के साथ “आपराधिक साजिश में शामिल होकर उसमें हिस्सा लिया”. इसमें कहा गया है कि इस साजिश का मकसद बोर्ड के पैसे को बेईमानी से अपने इस्तेमाल में लेना था.
गर्ग पर भारतीय न्याय संहिता की उन धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं जो आपराधिक साजिश, भरोसा तोड़ने, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी हैं. उन पर भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के तहत भी आरोप लगाए गए हैं, जिसमें धारा 7(c) और धारा 13(1)(a) शामिल हैं. चार्जशीट में उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया आरोपी बताया गया है.
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