नई दिल्ली: एक व्यक्ति बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट खोलने जाता है और वहां से इंश्योरेंस पॉलिसी लेकर निकलता है. एक कर्ज लेने वाले व्यक्ति से कहा जाता है कि लोन लेने के लिए इंश्योरेंस जरूरी है. एक नई कार खरीदने वाले ग्राहक को डीलर की तरफ से अक्सर इंश्योरेंस पॉलिसी दी जाती है, और उसे यह पता भी नहीं होता कि उस पॉलिसी की बिक्री से डीलर कितना कमाता है.
दुर्भाग्य से, ये बातें सिर्फ उदाहरण नहीं हैं और बहुत आम हैं. दरअसल, देश के इंश्योरेंस सेक्टर के रेगुलेटर, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI), के अनुसार, ये भारत में इंश्योरेंस बेचने और बांटने के तरीके की एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती हैं. इसमें कई बार इंश्योरेंस कंपनियों और उन्हें बेचने वालों के फायदे को ग्राहक के लिए सही पॉलिसी से ज्यादा महत्व मिल जाता है.
IRDAI के 23 सितंबर को जारी किए गए नए कंसल्टेशन पेपर, ‘Recalibrating Economics of Insurance Distribution’ (बीमा वितरण के अर्थशास्त्र को फिर से व्यवस्थित करना), ने उन इंश्योरेंस पॉलिसियों को लेकर पारदर्शिता की कमी पर ध्यान खींचा है जो आसानी से भरोसा करने वाले ग्राहकों को बेची जाती हैं. इसमें ज्यादा कमीशन, ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचना’, जबरदस्ती कई चीजों को एक साथ जोड़ना, कम पारदर्शिता और कमजोर जवाबदेही जैसी समस्याएं शामिल हैं.
रेगुलेटर की चिंता यह नहीं है कि इंश्योरेंस बेचने वालों को पैसे नहीं मिलने चाहिए. बल्कि बात यह है कि इंश्योरेंस बांटने का मौजूदा सिस्टम ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें सिर्फ ज्यादा कमीशन मिलने की वजह से कोई पॉलिसी बेच दी जाए.
पेपर के अनुसार, FY23 से FY25 के बीच डिस्ट्रीब्यूटर को मिलने वाला पैसा इंश्योरेंस प्रीमियम की तुलना में चार से पांच गुना ज्यादा तेजी से बढ़ा. जनरल इंश्योरेंस में ब्रोकर के जरिए मिलने वाला प्रीमियम FY23 और FY25 के बीच 37 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कमीशन 173 प्रतिशत बढ़ गया.
इसी अवधि में ब्रोकर का औसत कमीशन 8.5 प्रतिशत से बढ़कर 17 प्रतिशत हो गया. वहीं, रिटेल हेल्थ इंश्योरेंस का कमीशन करीब 10 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया.
कमीशन में इतनी तेज बढ़ोतरी के बाद 2023 में किए गए रेगुलेटरी बदलावों पर भी फिर से सवाल उठने लगे हैं. उस समय IRDAI ने हर प्रोडक्ट के लिए अलग-अलग कमीशन की सीमा हटा दी थी और Expenses of Management (EoM) सिस्टम के तहत इंश्योरेंस कंपनियों को ज्यादा छूट दी थी.
EoM का मतलब है कि किसी इंश्योरेंस कंपनी को अपना कारोबार चलाने में होने वाला कुल खर्च. इसमें डिस्ट्रीब्यूशन कमीशन, कामकाज का खर्च और दूसरे प्रशासनिक खर्च शामिल होते हैं.
नए कंसल्टेशन पेपर में कुछ खास कमीशन सीमाएं फिर से लाने, EoM के नियमों को सख्त करने और पॉलिसी बेचने वाले व्यक्ति को ज्यादा जवाबदेह बनाने का प्रस्ताव दिया गया है.
लेखिका, वित्तीय शिक्षा देने वाली और इंश्योरेंस एडवाइजरी कमेटी की सदस्य मोनिका हलान के लिए इस पेपर का महत्व सिर्फ प्रस्तावित कमीशन सीमा तक सीमित नहीं है.
हलान ने दिप्रिंट को बताया, “इस कंसल्टेशन पेपर में सबसे बड़ी बात वास्तव में सीमाएं नहीं हैं. सबसे बड़ी बात रेगुलेटर के नजरिए में बदलाव है.”
इंश्योरेंस कैसे कमीशन और फायदे पर आधारित कारोबार बन गया
दूसरे वित्तीय प्रोडक्ट्स के मुकाबले इंश्योरेंस अलग है, क्योंकि ग्राहक इसे खरीदते समय अक्सर यह नहीं समझ सकता कि इसका असली फायदा कितना है.
कार को तुरंत चलाया जा सकता है और मोबाइल फोन को तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन इंश्योरेंस की असली जरूरत और कीमत कई साल बाद ही सामने आ सकती है. जैसे जब पॉलिसीधारक क्लेम करता है, रिटायर होता है या उसे आर्थिक नुकसान होता है.
हलान ने कहा, “वित्तीय प्रोडक्ट दिखाई नहीं देता. इसे बेचने वाला व्यक्ति ही इसके बारे में बताता है.”
इससे बेचने वाले और ग्राहक के बीच जानकारी का अंतर पैदा होता है. अगर बेचने वाले का सबसे बड़ा फायदा सिर्फ पॉलिसी बेचने में है, न कि यह सुनिश्चित करने में कि वह पॉलिसी लंबे समय तक ग्राहक के लिए सही रहे, तो इससे बहुत ज्यादा बिक्री करने का दबाव बढ़ सकता है.
हलान ने कहा कि बैंक के जरिए इंश्योरेंस बेचने का चलन बढ़ने के साथ यह समस्या खास तौर पर बढ़ी. उन्होंने कहा, “जब प्राइवेट सेक्टर में इंश्योरेंस आया और कॉरपोरेट एजेंसियां शुरू हुईं और खासकर जब बैंकों ने इसे शुरू किया, तब यह खेल एकदम दूसरे स्तर पर चला गया.”
बैंक में किसी दूसरे वित्तीय प्रोडक्ट के लिए आने वाले ग्राहकों को बैंक या उसके कर्मचारियों को मिलने वाले कमीशन की वजह से इंश्योरेंस खरीदने की तरफ भेजा जा सकता था.
हलान ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति फिक्स्ड डिपॉजिट कराने आता है, तो उसे कमीशन कमाने के लिए इंश्योरेंस प्रोडक्ट की तरफ भेज दिया जाता था.”
यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी के पूर्व चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर तथा जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के पूर्व सेक्रेटरी जनरल नागराजा शर्मा ने भी ज्यादा इंसेंटिव को ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचने’ से जोड़ा.
उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि बिक्री से जुड़े ज्यादा इंसेंटिव डिस्ट्रीब्यूटर को ग्राहक की जरूरत के बजाय बिक्री की संख्या को ज्यादा महत्व देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं. इसके परिणामस्वरूप पॉलिसियां “ग्राहक के हित के बजाय डिस्ट्रीब्यूटर के हित में ज्यादा” बेची जा सकती हैं.
IRDAI के आंकड़े भी इस समस्या का एक और संकेत देते हैं. 61वें महीने की persistency rate (दृढ़ता दर), यानी 61 महीने बाद भी चालू रहने वाली लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों का हिस्सा, केवल 48 प्रतिशत है. ऑनलाइन बेची गई पॉलिसियों के लिए यह दर 71 प्रतिशत है.
रेगुलेटर का कहना है कि इस अंतर से पता चलता है कि जो लोग सोच-समझकर और पूरी जानकारी के साथ पॉलिसी खरीदते हैं, उनके पॉलिसी जारी रखने की संभावना ज्यादा होती है.
रेगुलेटर ने बढ़ती शिकायतों की ओर भी ध्यान दिलाया है. बीमा भरोसा पोर्टल पर जनरल इंश्योरेंस से जुड़ी शिकायतें FY23 में 78,347 से बढ़कर FY25 में 1,37,361 हो गईं. इनमें करीब 69 प्रतिशत शिकायतें क्लेम से जुड़ी थीं.
2023 में क्या बदला और IRDAI अब इसे फिर से क्यों देख रहा है
2023 में IRDAI ने एजेंटों और दूसरे डिस्ट्रीब्यूटर को कमीशन देने के तरीके में बदलाव किया. IRDAI (Payment of Commission) Regulations, 2023 के तहत उसने हर प्रोडक्ट के लिए कमीशन की अलग सीमा हटा दी और इसकी जगह इंश्योरेंस कंपनी के कुल EoM पर एक सीमा तय कर दी.
इस बदलाव से इंश्योरेंस कंपनियों को कुल EoM सीमा और अपने बोर्ड से मंजूर नीतियों के अंदर डिस्ट्रीब्यूशन पर खर्च तय करने की ज्यादा आजादी मिल गई. उम्मीद थी कि इससे नए प्रोडक्ट और डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल को बढ़ावा मिलेगा, ग्राहक को ज्यादा महत्व दिया जाएगा और इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ेगी.
लेकिन इसके बाद के तीन सालों में जमा किए गए आंकड़ों से डिस्ट्रीब्यूशन की लागत में तेज बढ़ोतरी दिखाई दी. IRDAI का कहना है कि लाइफ और जनरल इंश्योरेंस दोनों में कमीशन का भुगतान काफी बढ़ गया, जबकि कमीशन से जुड़ी नीतियों को बोर्ड की मंजूरी देना कई बार सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गया.
IRDAI में मेंबर, नॉन-लाइफ, दीपक सूद ने कहा कि 2023 में दी गई छूट से खर्चों पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं आया. सूद ने दिप्रिंट को बताया, “कमीशन की बढ़ोतरी प्रीमियम की बढ़ोतरी से ज्यादा रही.” उन्होंने कहा कि रेगुलेटर ने ऐसे मामले देखे जहां ज्यादा डिस्ट्रीब्यूशन खर्च का संबंध किए गए काम या पॉलिसीधारकों को मिले फायदे से पर्याप्त रूप से नहीं था.
सूद ने कहा, “तरीका डिस्ट्रीब्यूशन और कमीशन पर आधारित हो गया.”
FY23 और FY25 के बीच मोटर इंश्योरेंस का प्रीमियम करीब 34 प्रतिशत बढ़ा, जबकि डिस्ट्रीब्यूटर को दिए गए कमीशन में 259 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी हुई.
ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEM) से जुड़े ब्रोकर और मोटर इंश्योरेंस सर्विस प्रोवाइडर्स ने FY25 में करीब 29,000 करोड़ रुपये का प्रीमियम हासिल किया और उन्हें करीब 7,050 करोड़ रुपये का कमीशन मिला.
सर्मा ने कहा कि जिन इंश्योरेंस कंपनियों का ऑपरेटिंग खर्च अपेक्षाकृत कम था, वे 2023 में दी गई छूट का इस्तेमाल डिस्ट्रीब्यूशन पर ज्यादा खर्च करने के लिए कर सकीं.
उन्होंने कहा, “जिन कंपनियों का खर्च शुरू से ही कम था, जैसे नई पीढ़ी की कंपनियां, जो बेहतर टेक्नोलॉजी और कम कर्मचारियों के साथ आई थीं… पूरा पैसा डिस्ट्रीब्यूशन में चला गया.”
यह बढ़ोतरी खास तौर पर मोटर इंश्योरेंस में दिखाई दी, जहां ऑटो डीलरों को किए जाने वाले भुगतान डिस्ट्रीब्यूशन की एक बड़ी लागत बन गए. सर्मा के अनुसार, कुछ मामलों में इंश्योरेंस कंपनियां ग्राहक द्वारा दिए गए प्रीमियम का 60 प्रतिशत तक डीलरों को दे रही थीं.
प्रोडक्ट को एक साथ जोड़ना और ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचना’
ज्यादा कमीशन इस समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है. IRDAI ने उन मामलों पर भी ध्यान दिया है जहां इंश्योरेंस को किसी दूसरे वित्तीय प्रोडक्ट, खासकर लोन, के साथ बेच दिया जाता है.
सर्मा ने कहा कि ग्राहकों पर इंश्योरेंस खरीदने का दबाव बनाया जा सकता है, भले ही उनके पास पहले से पर्याप्त इंश्योरेंस हो. उन्होंने कहा, “अगर होम लोन देने वाला या वाहन लोन देने वाला यह कहता है कि लोन के साथ आपको मेरी ही पॉलिसी लेना जरूरी है, तो यह ग्राहक पर दबाव डालने जैसा है. उससे वह चीज खरीदवाई जा रही है जिसकी उसे वास्तव में जरूरत नहीं है.”
23 सितंबर के IRDAI कंसल्टेशन पेपर में लोन या क्रेडिट के साथ इंश्योरेंस को जबरदस्ती जोड़ने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है. हालांकि, जहां ऐसा करने से ग्राहक को वास्तविक फायदा हो और ग्राहक के पास अपनी पसंद का विकल्प रहे, वहां ऐसे कॉम्बिनेशन की अनुमति होगी.
सूद ने कहा कि लोन लेने की शर्त के रूप में ग्राहक को इंश्योरेंस खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. प्रस्तावित सिस्टम में ग्राहक को इंश्योरेंस के साथ और इंश्योरेंस के बिना लोन की शर्तें दिखाई जाएंगी. ग्राहक को किसी दूसरे प्रदाता से इंश्योरेंस खरीदने की भी अनुमति होगी. उन्होंने कहा कि इंश्योरेंस का प्रीमियम ग्राहक को अलग से देना चाहिए और उसे लोन में शामिल नहीं किया जाना चाहिए.
सूद ने कहा, “इसलिए उद्देश्य bancassurance, यानी बैंकों के जरिए इंश्योरेंस प्रोडक्ट की बिक्री, को सीमित करना नहीं है. उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यह ग्राहक की पसंद, पारदर्शिता और उसकी जरूरत के हिसाब से काम करे.”
सर्मा ने कहा कि प्रोडक्ट को एक साथ जोड़ने पर पूरी तरह रोक नहीं लगनी चाहिए. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ट्रेन या फ्लाइट टिकट के साथ ट्रैवल इंश्योरेंस बेचा जाता है. उन्होंने कहा, “लेकिन जब चीजों को एक साथ बेचा जाए, तब भी ग्राहक के पास यह चुनने का विकल्प होना चाहिए कि वह उस जुड़े हुए प्रोडक्ट को लेना चाहता है या नहीं.”
कंसल्टेशन पेपर में इस समस्या को भी दूर करने की कोशिश की गई है कि वास्तव में पॉलिसी किसने बेची और क्या उस व्यक्ति का पहले ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचने’ का रिकॉर्ड रहा है.
IRDAI का प्रस्ताव है कि पॉलिसी में सेल्सपर्सन, एजेंट या पॉइंट ऑफ सेल्स व्यक्ति की पहचान जोड़ी जाए. ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचने’ की घटनाओं की जानकारी प्रस्तावित सार्वजनिक बीमा रजिस्ट्री के जरिए लोगों के सामने रखी जा सकती है. पेपर में ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचने’ के मामलों में कमीशन वापस लेने की भी मांग की गई है.
सूद ने कहा कि रेगुलेटर ‘गलत तरीके से पॉलिसी बेचने’ का इंसेंटिव भी कम करना चाहता है. इसके लिए कमीशन का ज्यादा हिस्सा पॉलिसी के लंबे समय तक जारी रहने से जोड़ा जाएगा, बजाय इसके कि शुरुआत में ही बड़ी रकम दे दी जाए.
उन्होंने कहा, “पहले साल कमीशन कम होना चाहिए और पॉलिसी के रिन्यू होने के साथ ज्यादा कमीशन दिया जाना चाहिए.” ग्राहकों को डिस्ट्रीब्यूटर के व्यवहार से जुड़ी जानकारी हासिल करके यह भी पता होना चाहिए कि उनकी पॉलिसी किसने बेची है.
हलान जवाबदेही के इस बड़े सिद्धांत का समर्थन करती हैं, लेकिन उनका कहना है कि जिम्मेदारी सिर्फ पॉलिसी बेचने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा, “आप ब्रांच में काम करने वाले व्यक्ति को ही क्यों पकड़ रहे हैं. वह तो सिर्फ अपना टारगेट पूरा करने की कोशिश कर रहा है.” उन्होंने कहा, “आपको उन बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और टॉप मैनेजमेंट को जिम्मेदार बनाना होगा जिन्होंने ये टारगेट तय किए हैं.”
इंश्योरेंस सेक्टर को ग्राहकों के लिए बेहतर बनाना
इसलिए IRDAI का प्रस्ताव सिर्फ कमीशन कम करने तक सीमित नहीं है.
रेगुलेटर ने प्रोडक्ट और चैनल के हिसाब से अलग-अलग कमीशन की अधिकतम सीमा तय करने का प्रस्ताव दिया है. इसमें कमीशन इस बात से जुड़ा होगा कि पॉलिसी बेचने में कितना काम और कितनी मुश्किल शामिल है. सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से दिए जाने वाले सभी भुगतान, जिसमें पैसे और बिना पैसे वाले इंसेंटिव भी शामिल हैं, कमीशन के नियमों के तहत लाए जाएंगे.
EoM सिस्टम को भी धीरे-धीरे सख्त किया जाएगा. लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए IRDAI ने प्रस्ताव दिया है कि दो साल में EoM को प्रीमियम के 15 प्रतिशत तक और पांच साल में 12.5 प्रतिशत तक लाया जाए. जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह सीमा दो साल में 25 प्रतिशत और पांच साल में 20 प्रतिशत होगी.
एक प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि प्रस्तावित खर्च की सीमाएं बड़ी इंश्योरेंस कंपनियों के पक्ष में जा सकती हैं. इसकी वजह यह है कि छोटी कंपनियों के लिए डिस्ट्रीब्यूशन और कारोबार चलाने के खर्च को संभालना मुश्किल हो सकता है. इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है.
उन्होंने यह भी कहा कि इंश्योरेंस के प्रोडक्ट और उनकी कीमतों की ज्यादा तुलना होने से ग्राहकों को फायदा होगा, क्योंकि उन्हें ज्यादा विकल्प मिलेंगे और कीमतें प्रतिस्पर्धी बनी रहेंगी. लेकिन बड़ी इंश्योरेंस कंपनियां शायद ऐसी तुलना नहीं चाहेंगी. उन्होंने कहा, “कुछ ऐसी बड़ी कंपनियों का दबदबा है जो कीमतों की तुलना नहीं चाहतीं.”
IRDAI के प्रस्तावों को लेकर इंश्योरेंस ब्रोकर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IBAI) ने भी चिंता जताई है. यह संगठन 798 लाइसेंस प्राप्त इंश्योरेंस ब्रोकर का प्रतिनिधित्व करता है.
29 सितंबर को जारी एक प्रेस बयान में IBAI ने जबरदस्ती इंश्योरेंस को किसी दूसरे प्रोडक्ट के साथ जोड़ने पर रोक और गलत तरीके से पॉलिसी बेचने पर कमीशन वापस लेने जैसे कदमों का समर्थन किया. लेकिन उसने प्रस्तावित कमीशन की सीमा और कम खर्च की सीमाओं का विरोध किया.
IBAI ने कहा कि इन कदमों से छोटे शहरों में इंश्योरेंस का डिस्ट्रीब्यूशन कम हो सकता है और ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं पर असर पड़ सकता है. IBAI रेगुलेटर को अपना विस्तृत जवाब देगा.
सूद ने कहा कि IRDAI इंश्योरेंस की पहुंच कम करके खर्च घटाना नहीं चाहता. उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य निश्चित रूप से इंश्योरेंस की पहुंच की कीमत पर खर्च को कम करना नहीं है.” प्रस्तावित सिस्टम में ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में बेचे जाने वाले इंश्योरेंस के लिए अतिरिक्त कमीशन देने का प्रावधान है, क्योंकि वहां आखिरी स्तर तक इंश्योरेंस पहुंचाने में ज्यादा खर्च होता है.
IRDAI ने Bima Sugam को इंश्योरेंस के लिए एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में मजबूत करने का भी प्रस्ताव दिया है. इससे ग्राहक अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियों के प्रोडक्ट की तुलना कर सकेंगे और उन्हें खरीद या हासिल कर सकेंगे.
कंसल्टेशन पेपर का उद्देश्य सेक्टर को ऐसे सिस्टम की तरफ ले जाना है जहां इंश्योरेंस को सिर्फ एजेंट और डिस्ट्रीब्यूटर “बेचें” नहीं, बल्कि पूरी जानकारी रखने वाले ग्राहक भी उसे खुद “खरीदें”.
हलान के लिए तुरंत किए जाने वाले काम साफ हैं.
उन्होंने कहा, “मेरे हिसाब से कमीशन की सीमा और खर्च का मैनेजमेंट दो चीजें हैं और तीसरी चीज बेचने वाले की जिम्मेदारी है. ये तीनों चीजें बहुत जरूरी हैं. बदलाव की असली शुरुआत इन्हीं से होती है.”
उनका मानना है कि यह कंसल्टेशन पेपर ग्राहकों की सुरक्षा को लेकर रेगुलेटर के तरीके में बड़े बदलाव को दिखाता है.
हलान ने कहा, “यह कंसल्टेशन पेपर बहुत बड़ा बदलाव लाने वाला है, क्योंकि यह रेगुलेटर की सोच में बदलाव दिखाता है. इसमें ग्राहक को रेगुलेशन के केंद्र में रखा गया है. मुझे नहीं लगता कि यह रेगुलेटर या इसके बाद आने वाला कोई भी रेगुलेटर इस पेपर से पीछे हट सकता है.”
वहीं, सर्मा ने कहा कि डिस्ट्रीब्यूटर को ही समस्या मानना सही नहीं होगा.
उन्होंने कहा, “यह न तो IRDAI के हित में है और न ही किसी और के हित में कि कमीशन कम कर दिया जाए. उन्हें उनके काम और मेहनत के हिसाब से उचित भुगतान मिलना चाहिए.”
लेकिन हलान का मानना है कि ग्राहकों की सुरक्षा को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, “ग्राहकों की तरफ से बोलने वाली कोई आवाज नहीं है. सिर्फ ब्रोकर, बैंक और लॉबी करने वाले लोग हैं. यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है.”
उन्हें खास चिंता है कि जैसे-जैसे बैंकिंग नेटवर्क बढ़ रहा है, वही डिस्ट्रीब्यूशन चैनल इस समस्या को शहरों के ग्राहकों से आगे छोटे शहरों और गांवों तक ले जा सकते हैं.
हलान ने कहा, “मुझे डर है कि यह जहर जन धन खातों के जरिए गांवों तक फैल रहा है. ये लोग वास्तव में सबसे ज्यादा कमजोर हैं.”
IRDAI का कंसल्टेशन पेपर अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है. अंतिम नियम यह तय करेंगे कि 25 अक्टूबर तक मिलने वाली टिप्पणियों और उसके बाद होने वाली चर्चाओं के बाद इस प्रस्ताव का कितना हिस्सा लागू रहता है.
लेकिन ग्राहकों के लिए बदलाव की उम्मीद आसान है. इंश्योरेंस पॉलिसी इसलिए बेची जानी चाहिए क्योंकि उससे ग्राहक को जरूरी सुरक्षा मिलती है. ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि उससे पॉलिसी बेचने वाले व्यक्ति को सबसे ज्यादा फायदा मिलता है.
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