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Saturday, 3 October, 2026
होमइंडियन लिबरल्स मैटर'कंट्रोल-राज' बनाम स्वराज: स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में नियंत्रण की सही सीमा क्या हो?

‘कंट्रोल-राज’ बनाम स्वराज: स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में नियंत्रण की सही सीमा क्या हो?

1960 में एम. ए. श्रीनिवासन लिखा था कि स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में नियंत्रण व्यस्त राजमार्ग पर यातायात नियंत्रण की तरह होना चाहिए—ऐसा कड़ा नियमन जो यातायात को रोकता नहीं, बल्कि उसे अधिक सुरक्षित, सुचारु और तेज़ बनाता है.

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स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में नियंत्रण की बात करना पहली नज़र में विरोधाभासी और बेमेल लग सकता है—जैसे मालाबार हिल में कंगारुओं की बात करना या पेकिंग में हड़ताल की. लेकिन ऐसा सोचना सतही होगा. नियंत्रण स्वतंत्रता के विरोधी नहीं हैं. बात भले ही विरोधाभासी लगे, लेकिन सच्ची स्वतंत्रता के विकास और विस्तार के लिए कुछ नियंत्रण आवश्यक हैं.

हम अपने चारों ओर देखते हैं कि स्वतंत्रता और नियंत्रण के बीच दिखाई देने वाले इस विरोधाभास को स्वतंत्रता के विरोधी किस तरह अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं. उनका उद्देश्य लोगों को यह मानने के लिए भ्रमित करना है कि स्वतंत्रता का अर्थ ही ‘लेसे-फेयर’ है, कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मतलब जंगल का कानून है और इस तरह लोगों को हर चीज़ को सरकारी नियंत्रण में स्वीकार करने के लिए तैयार करना है.

मैं उन कुछ भाग्यशाली लोगों में हूँ जिन्हें अपना पूरा जीवन नियंत्रण की व्यवस्था के गलत छोर पर नहीं बिताना पड़ा. कुछ वर्षों तक मैंने स्वयं एक ऐसी अर्थव्यवस्था में नियंत्रण लागू करने का काम किया था, जो एक महाराजा के शासन में होने के बावजूद आज की तुलना में अधिक स्वतंत्र दिखाई देती थी.

मैसूर के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री के रूप में मैंने नियंत्रण, परमिट और लाइसेंस की एक उलझी हुई व्यवस्था को संभाला. मेरे अधिकारी और मैं चावल, रागी और गेहूं से लेकर तरह-तरह की दालों और अनाज तक हर प्रकार के खाद्यान्न को नियंत्रित और राशनबद्ध करते थे. इस्पात, कोयला, पेट्रोल, लकड़ी और रेलवे के डिब्बों पर नियंत्रण था. कपास और कपड़े, ऊन और रेशम पर भी नियंत्रण था. एक नियंत्रण तेजी से दूसरे नियंत्रण को जन्म देता था. खाद्यान्न पर नियंत्रण से ईंधन पर नियंत्रण आया, फिर चीनी और गुड़, उसके बाद आलू, मूँगफली और फिर इमली; इमली से मिर्च और मिर्च से प्याज़ तक. किसी वस्तु की कमी या उसकी ऊँची कीमत की हर शिकायत उस वस्तु पर नियंत्रण लगाने का बहाना बन जाती थी. परमिट और लाइसेंस लेने वालों की भीड़ बढ़ते हुए सरकारी दफ्तरों में जमा होती जाती थी और कतारें लंबी होती जाती थीं.

जिस चीज़ पर भी नियंत्रण लगाया गया, लगभग हर जगह यही हुआ. नियंत्रण ने कठिनाई पैदा की, कठिनाई ने असंतोष पैदा किया, असंतोष ने नियमों से बचने की कोशिश को जन्म दिया, उससे कालाबाज़ारी बढ़ी और कालाबाज़ारी से भ्रष्टाचार पैदा हुआ. यह एक बेहद निराशाजनक व्यवस्था थी.

आखिरकार युद्ध समाप्त हुआ. शांति आई और स्वतंत्रता मिलने के साथ लोगों को उम्मीद थी कि सरकारी नियंत्रण और कठोर निगरानी के दिन अब समाप्त हो जाएंगे.

जैसा कि सर्वविदित है, गांधीजी नियंत्रण और उनके जारी रहने के विरोधी थे. जब राजाजी मद्रास के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने एक ही साहसिक कदम में खाद्य नियंत्रण और राशन व्यवस्था को समाप्त कर दिया. गांधीजी और राजाजी स्वतंत्रता के प्रेमी थे. वे सत्ता के पीछे नहीं भागते थे.

युद्ध लोगों पर नियंत्रण लगाने का एक पसंदीदा बहाना है. युद्धकालीन नियंत्रण और प्रतिबंध ‘डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट’ जैसे प्रभावशाली नाम वाले एक व्यापक कानून के तहत लगाए गए थे. लेकिन शांतिकाल में भी तानाशाह और सत्ता का स्वाद चख चुके शासक जल्द ही नए युद्ध खोज लेते हैं. उदाहरण के लिए, गरीबी के खिलाफ लगातार चलने वाला युद्ध है और उसे ‘युद्ध स्तर पर’ लड़ने की अनिवार्य आवश्यकता बताई जाती है. इस तरह के युद्ध का एक फायदा यह है कि जो वास्तविक युद्ध में नहीं होता कि यह कभी समाप्त नहीं होता.

पुराने युद्धकालीन नियंत्रण सीधे, स्पष्ट और बहुत साधारण थे. आज के नियंत्रण और प्रतिबंध अधिक सूक्ष्म, अधिक परिष्कृत, अधिक व्यापक और कम दिखाई देने वाले हैं. वे कंटीले तारों की भद्दी बाड़ नहीं हैं. वे चमकदार संगमरमर की ऊँची दीवारों वाली जेलें हैं.

पुराने युद्धकालीन नियंत्रण ‘डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट’ के तहत लगाए गए थे. आज स्वतंत्रता पर जो अतिक्रमण हो रहे हैं, वे किसी विदेशी दुश्मन से भारत की रक्षा के लिए नहीं हैं. वे लोगों को स्वयं से बचाने के नाम पर हैं. सरकार के ये घुटन पैदा करने वाले संरक्षण और हाथ-पांव बांध देने वाले प्यार भरे शब्द, हमें हमारी अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाओं और पहलों, हमारे जल्दबाज़ी में किए जाने वाले प्रयासों, हमारी ‘गलत’ आदतों और स्वतंत्रता की हमारी ‘पागल’ धारणाओं से बचाने के लिए हैं. आखिर सरकार क्या हमसे बेहतर नहीं जानती कि हमारे लिए क्या अच्छा है और हमें क्या करना चाहिए या नहीं करना चाहिए?

विदेशी आक्रमण के युद्धकालीन बहाने की जगह अब हमारे पास विदेशी मुद्रा का बहाना है. इसी के कारण सरकार के पास नए-नए नियंत्रण, परमिट, कोटे और लाइसेंस लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.

इन सबका परिणाम यह है कि दिल्ली में हमारी केंद्र सरकार के हाथों में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण हो गया है और वह इतने व्यापक नियंत्रणों का संचालन करती है, जिनसे तानाशाह भी ईर्ष्या कर सकते हैं. जैसे युद्ध के दौरान साम्राज्यवादी सरकार करती थी, वैसे ही आज हमारी लोकतांत्रिक सरकार इस्पात और सीमेंट, चीनी और कागज़, कोयला और पेट्रोल तथा मिट्टी के तेल, कॉफी, चाय और रबर जैसी सैकड़ों वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित या निर्धारित करती है. इसके अलावा, हमारी सरकार परिवहन के लगभग सभी साधनों को नियंत्रित करती है; जो थोड़े-बहुत इसके नियंत्रण में नहीं हैं, उनके लिए भी कड़े लाइसेंस आवश्यक हैं. खनन उद्योग का अधिकांश हिस्सा और कई अन्य उद्योगों का बड़ा भाग राज्य के लिए आरक्षित है जिसे सार्वजनिक क्षेत्र कहा जाता है. सरकार ने यह अधिकार भी अपने पास रख लिया है कि कोई नागरिक या निजी उद्यम कौन-सा उद्योग शुरू कर सकता है या नहीं, और वह उद्योग किस तरह वित्त जुटाएगा, संगठित होगा या उसका विस्तार करेगा.

सरकार की स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन को कई महत्वपूर्ण वस्तुओं की खरीद-बिक्री में एकाधिकार या विशेष अधिकार प्राप्त है और वह लगातार अपने नियंत्रण का दायरा बढ़ाने की स्थिति में है. कृषि सुधार के नाम पर हमारी सरकार ने भूमि और कृषि पर मजबूत, लगभग पूरी तरह जकड़ लेने वालीपकड़ बना ली है. और इन सबके ऊपर, जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण करके, देश के अधिकांश बैंकों का राष्ट्रीयकरण या उन पर नियंत्रण स्थापित करके तथा ऋण और मुद्रा से जुड़े अपने कामकाज के माध्यम से सरकार ने लोगों के मौद्रिक मामलों पर इतनी मजबूत पकड़ बना ली है कि दिल्ली में बैठे कुछ लोग मानो दूर से ही नियंत्रण करके आपकी और मेरी जेब में रखे रुपयों का मूल्य घटा सकते हैं और हमारी पेंशन या बचत की कीमत को एक बटन दबाकर कम कर सकते हैं.

आज आप किसी उद्योग या व्यवसाय को न तो शुरू कर सकते हैं और न ही चला सकते हैं, जब तक कि कई अधिकारियों और मंत्रालयों से अनुमतियाँ और परमिट न मिल जाएँ और जब तक दिल्ली में उपयुक्त संपर्क बनाए रखने या उस नए ‘मक्का-काशी’ की महँगी यात्राएँ करने की व्यवस्था न हो. आप आधुनिक तकनीक सीखने या नए विचार प्राप्त करने के लिए विदेश भी नहीं जा सकते, जब तक कि अधिकारियों के दूसरे समूह से अनुमति न मिले. हां, यदि आप किसी सरकारी प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने में सफल हो जाएं, जो कृषि या अन्य प्रकार की संस्कृति जैसे संगीत या नृत्य का अध्ययन करने या उनके तरीकों का प्रदर्शन करने के लिए दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जाता है, तो बात अलग है.

हमें अपने ही हाथों से स्वास्थ्य और नैतिकता को नुकसान पहुँचाने से बचाने के लिए हमारी सरकार ने शराबबंदी लागू कर दी है. अब तक कोई निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि स्वतंत्रता के बाद लागू किए गए इस नियंत्रण ने जिन लोगों पर इसे लागू किया गया, उनके स्वास्थ्य या नैतिकता में कोई सुधार किया है या नहीं. लेकिन इस बात को लेकर किसी को संदेह नहीं है कि इसने नियंत्रण लागू करने वालों की नैतिकता में कोई सुधार नहीं किया. शराबबंदी उन अनेक नियंत्रणों में सबसे प्रमुख है, जिन्होंने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और कानून के प्रति अनादर को जन्म दिया है, जिसे हम हर जगह देखते हैं.

वर्षों से चले आ रहे नियंत्रण और सरकारी व्यवस्था ने शासित लोगों के ही नहीं, बल्कि शासकों के मन पर भी कैसा प्रभाव डाला है, इसका इससे अधिक स्पष्ट उदाहरण शायद हाल में प्रधानमंत्री का दिया गया वह बयान है जिसमें कहा गया था कि सरकार बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए कीमतों पर नियंत्रण लगाने के बारे में सोच रही है. कोई सोच सकता था कि लगभग एक दशक तक मूल्य-नियंत्रण लागू करने का अनुभव यह समझाने के लिए पर्याप्त होगा कि जब तक मुद्रास्फीति पर रोक नहीं लगती, तब तक नए मूल्य-नियंत्रण लगाकर कीमतों को रोकने की कोशिश उतनी ही प्रभावी है, जितनी थर्मामीटर तोड़कर बुखार कम करने की कोशिश.

आज हमारे दिमाग में बैठाई जा रही सरकारी धारणाओं में से एक यह है कि इस देश के लोग, व्यक्ति के रूप में या स्वतंत्र लोगों के समूह के रूप में, देश के जीवन स्तर को सुधारने के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने में सक्षम नहीं हैं. इसलिए राज्य को आगे आकर लोगों की सामान्य गतिविधियों के बढ़ते हुए क्षेत्रों की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेनी चाहिए. यह देखकर आश्चर्य होता है कि कितने लोग इस धारणा को सच मानने लगे हैं. उन्हें विश्वास दिला दिया गया है कि सरकार को अपना पैसा मेरे और आपके जैसे स्त्री-पुरुषों से नहीं मिलता, न ही हमारे नाम पर लिए गए कर्ज से मिलता है, बल्कि वह मानो आसमान से बरसता है; और राज्य को अपनी जनशक्ति हमसे, हमारे बेटों और बेटियों से नहीं मिलती, बल्कि वह मानो उस जिन्न से आती है जिसे सचिवालय में छिपे किसी अलादीन के चिराग को रगड़कर बाहर निकाला जाता है.

मैंने कहा है कि नियंत्रण स्वतंत्रता के लिए आवश्यक तत्व और उसकी रक्षा करने वाला साधन है. लेकिन स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में इन नियंत्रणों का स्वरूप और उनकी सीमा क्या होनी चाहिए?

स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में उचित स्थान उन्हीं नियंत्रणों का है जो कम-से-कम हस्तक्षेप के साथ अधिकतम सहायता प्रदान करें; जो व्यवस्था बनाएँ और सुरक्षा दें, न कि लोगों को नियंत्रित करके उनकी क्षमता समाप्त कर दें; जो सड़क के किनारे की सुरक्षा-दीवार की तरह हों, सड़क रोकने वाली बाधा की तरह नहीं; जो बाड़ की तरह हों, कंटीले तारों की घेराबंदी की तरह नहीं. स्वतंत्रता को जिन नियंत्रणों की आवश्यकता होती है और जिन्हें वह स्वीकार करती है, वे बाहर से थोपे गए नियंत्रण नहीं, बल्कि स्वयं लगाए गए और भीतर से बने नियंत्रण होते हैं. वे उस नाइट्रोजन की तरह हैं जो हम जिस हवा में साँस लेते हैं, उसमें मौजूद होती है और जिसके बिना हमारे फेफड़े ऑक्सीजन से जल सकते हैं. वे उन ग्रंथियों और हार्मोनों की तरह हैं जो हमारे हृदय की धड़कन और हमारे शरीर के आकार को नियंत्रित करते हैं और हमें न तो दानव जैसा विशाल बनने देते हैं, न बौने जैसा छोटा.

स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में नियंत्रण व्यस्त राजमार्ग पर यातायात नियंत्रण की तरह होना चाहिए—ऐसा कड़ा नियमन जो यातायात को रोकता नहीं, बल्कि उसे अधिक सुरक्षित, सुचारु और तेज़ बनाता है.

स्वतंत्रता के लिए आवश्यक सभी नियंत्रणों में सबसे पूर्ण नियंत्रण वह है जो व्यक्ति स्वयं पर लगाता है—हर व्यक्ति की अपनी अंतरात्मा द्वारा किया गया नियंत्रण. यह वही ‘स्वधर्म’ है जिसकी गांधीजी ने प्रशंसा की थी और जिसे उन्होंने राज्य की ‘हिंसा’ के विपरीत रखा था. यह ईश्वर द्वारा दिया गया नियंत्रण है. यह हर जगह मौजूद है और इसमें भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश नहीं है. यह नियमों से बचने की कोशिशों की परवाह नहीं करता. यह कालाबाज़ारी को जन्म नहीं देता.

क्या लोगों को नियंत्रित करने का इससे अधिक पूर्ण तरीका हो सकता है कि हर नागरिक के साथ एक समझदार और मित्रवत पुलिसकर्मी लगा दिया जाए? लेकिन वास्तव में अंतरात्मा का भीतर से आने वाला नियंत्रण हर व्यक्ति के साथ यही करता है—बशर्ते, निश्चित रूप से, धर्म को समाज से बाहर न कर दिया जाए और धर्म के स्थान से हटाया न जाए. क्या यह पागलपन नहीं होगा कि स्वतंत्रता के इन चार करोड़ नहीं, बल्कि चालीस करोड़ भीतर से मौजूद ‘पुलिसकर्मियों’ की शक्ति और प्रभाव को समाप्त कर दिया जाए और उनकी जगह सौ तरह के नियंत्रणों और आदेशों को लागू करने के लिए अधिकारियों और उनके अधीन काम करने वालों की एक पूरी भीड़ नियुक्त कर दी जाए?

हम ‘कंट्रोल-राज’ के अंत और ‘स्वराज’ की प्राप्ति की आशा कब कर सकते हैं? क्या उस दिन को जल्दी लाने के लिए कुछ किया जा सकता है?

निश्चित रूप से कई सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं और उठाए जाने भी चाहिए. लेकिन यह देखते हुए कि हमारे लोगों ने कितने वर्षों तक नियंत्रणों को सहा है और उनके आदी हो गए हैं, और उनके मन किस हद तक इन नियंत्रणों के अनुसार ढल चुके हैं, बहुत जल्दी परिणाम आने की उम्मीद करना शायद उचित नहीं होगा. इस उपचार में लंबा समय लग सकता है.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस निबंध को “फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज़” से उद्धृत किया गया है जिसका प्रकाशन 8 दिसंबर 1960 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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