नई दिल्ली: जिस राज्य में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के अंदर गुटबाजी लगातार बढ़ती जा रही है, वहां पार्टी ने परगत सिंह को पंजाब कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया है. सिंह राज्य के पूर्व खेल मंत्री और भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कप्तान रह चुके हैं. उन्होंने अमरिंदर सिंह राजा वडिंग की जगह ली है, जो पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे.
जालंधर कैंटोनमेंट से तीन बार विधायक रह चुके परगत ने 2012 में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनावी राजनीति में कदम रखा और सीट जीत ली. लेकिन अगले कुछ वर्षों में पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंध खराब होते गए, जिसके बाद 2016 में उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया.
इसके बाद उन्होंने SAD से इस्तीफा दे दिया और कुछ समय के लिए नवजोत सिंह सिद्धू और बैंस भाइयों के साथ मिलकर आवाज-ए-पंजाब बनाई. यह मोर्चा ज्यादा समय तक नहीं चला. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले परगत कांग्रेस में शामिल हो गए. उन्होंने SAD के सरबजीत सिंह मक्कर को 29,124 वोटों से हराकर जालंधर कैंटोनमेंट सीट फिर से जीत ली.
कांग्रेस में परगत का समय भी पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने की उनकी इच्छा के लिए जाना गया है, जबकि वह पार्टी के अंदर ही बने रहे.
वह उन कांग्रेस नेताओं में शामिल थे जिन्होंने अमरिंदर सिंह सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए थे. 2021 में, जब नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तब परगत को संगठन का प्रभारी महासचिव बनाया गया.
इसके बाद वह तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की कैबिनेट में शामिल हुए. उनके पास स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, खेल और युवा मामले तथा NRI मामले के विभाग थे. उनका मंत्री के रूप में कार्यकाल करीब छह महीने चला और कांग्रेस के 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से हारने के साथ खत्म हुआ.
हालांकि उस चुनाव में भी परगत ने जालंधर कैंटोनमेंट सीट अपने पास रखी. उन्होंने पूर्व हॉकी खिलाड़ी और AAP उम्मीदवार सुरिंदर सिंह सोढ़ी को 5,808 वोटों से हराया. यह इस सीट से उनकी लगातार तीसरी जीत थी, हालांकि उनका जीत का अंतर 2017 के 29,124 वोटों के मुकाबले काफी कम था.
पार्टी की हार के बाद भी परगत कांग्रेस में सक्रिय रहे. उन्होंने ड्रग्स, कानून-व्यवस्था और शिक्षा जैसे मुद्दों पर AAP सरकार को घेरा. बाद में उन्हें जम्मू-कश्मीर से जुड़े AICC सचिव की जिम्मेदारी दी गई. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की घोषणापत्र समिति का सह-अध्यक्ष भी बनाया गया था.
उनकी नियुक्ति पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही नेतृत्व की खींचतान के बाद हुई है. पार्टी को अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाले गुटों के बीच मतभेदों का सामना करना पड़ रहा था. वहीं प्रताप सिंह बाजवा और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे दूसरे वरिष्ठ नेताओं के भी अपने राजनीतिक आधार और महत्वाकांक्षाएं थीं. कई लोगों का मानना था कि इससे चुनाव जीतने की पार्टी की संभावनाओं को नुकसान हो रहा था.
परगत की नियुक्ति से राज्य इकाई के प्रमुख पद पर एक जाट सिख आया है, लेकिन उन नेताओं में से किसी एक को नहीं चुना गया है जिन्हें पहले से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखा जा रहा था. पंजाब कांग्रेस के किसी बड़े गुट का नेतृत्व भी परगत नहीं करते हैं.
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने परगत को चुनने से पहले विजय इंदर सिंगला, सुखजिंदर सिंह रंधावा और चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नामों पर भी चर्चा की थी.
पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष सिंह ने कहा कि नया प्रदेश अध्यक्ष चुनते समय कांग्रेस के पास सीमित विकल्प थे.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “परगत सिंह ज्यादा एक अस्थायी व्यवस्था हैं. कांग्रेस के पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं थे. वे चरणजीत सिंह चन्नी को नहीं ला सकते थे, क्योंकि इससे उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने का संदेश जाता. अगर वे सुखजिंदर सिंह रंधावा को लाते, तो उनकी निष्ठा को लेकर भी सवाल उठते, क्योंकि उन्होंने चन्नी का साथ दिया था और खुले तौर पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती दी थी.”
उन्होंने आगे कहा, “परगत जाट सिख हैं और पार्टी को एक जाट सिख चेहरे की जरूरत थी. उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं और वह खेल के ऐसे नायक हैं जिन्हें पूरे पंजाब में जाना जाता है. उन्होंने यह भी दिखाया है कि वह अपनी बात पर कायम रह सकते हैं. उन्होंने अकाली दल में रहते हुए सुखबीर सिंह बादल पर सवाल उठाए और बाद में कांग्रेस के अंदर रहते हुए अमरिंदर सिंह सरकार पर भी सवाल उठाए. इन परिस्थितियों को देखते हुए, मुझे लगता है कि कांग्रेस के लिए परगत सिंह एक अच्छा विकल्प थे.”
राजनीति में आने से पहले ही परगत पंजाब में एक जाना-पहचाना नाम थे. उन्होंने 1988, 1992 और 1996 के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और बार्सिलोना और अटलांटा खेलों में टीम की कप्तानी की. वह 1996 के अटलांटा ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में भारत के ध्वजवाहक भी थे. उन्हें 1989 में अर्जुन पुरस्कार और 1998 में पद्म श्री मिला. हॉकी से संन्यास लेने के बाद उन्होंने पंजाब पुलिस में काम किया और बाद में खेल प्रशासन के क्षेत्र में काम किया.
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