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Wednesday, 7 October, 2026
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IDFC बैंक घोटाले में 3 महिलाएं, 3 डेस्क: CBI के मुताबिक उन्होंने क्या किया और क्या नहीं किया

कौशिक, कौर और गोयल अलग-अलग डेस्क पर थीं, जब सरकारी पैसा गायब हुआ. CBI का कहना है कि एक ने रिकॉर्ड में उस फैसले को दर्ज किया, जो आधिकारिक तौर पर लिया ही नहीं गया था, एक ने एक फाइल में देरी की और एक ने फर्जी डेबिट पर मंजूरी दी.

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चंडीगढ़: 28 अक्टूबर 2025 को IDFC First Bank का एक रिलेशनशिप मैनेजर पंचकूला में हरियाणा श्रम कल्याण बोर्ड के कार्यालय पहुंचा. उसने वहां अधिकारियों को जो बताया, वह हैरान करने वाला था.

चिराग गुलाटी ने अपने बैंक के रिकॉर्ड चेक किए थे. बोर्ड का बैंक में कोई फिक्स्ड डिपॉजिट नहीं था. उसके पास सिर्फ एक सेविंग्स अकाउंट था, जिसमें 7,619.24 रुपये थे.

बोर्ड को लगता था कि उसके पास IDFC First Bank में कर्मचारियों के पैसे से किया गया 50 करोड़ रुपये का डिपॉजिट है.

गुलाटी ने अधिकारियों को यह भी बताया कि अभय कुमार, जिस बैंक कर्मचारी से बोर्ड अब तक बात करता रहा था, वह अब IDFC First Bank में काम नहीं करता था.

सुरिंदर कौर, जो डिप्टी लेबर कमिश्नर (वेलफेयर) थीं और श्रम कल्याण विभाग में जिम्मेदारी वाले पद पर थीं, ने गुलाटी की बात सुनी. सुरिंदर कौर अब CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में आरोपी बनाई गई तीन महिलाओं में से एक हैं.

सुरिंदर कौर अब CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में आरोपी बनाई गई तीन महिलाओं में से एक हैं. कौर और दो अन्य के खिलाफ मामला IDFC First Bank की चंडीगढ़ के सेक्टर-32 ब्रांच में हुए 645 करोड़ रुपये के घोटाले का हिस्सा है. इसमें हरियाणा सरकार के विभागों और नगर निकायों, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन के सरकारी पैसे को ऐसे फिक्स्ड डिपॉजिट के जरिए निकाला गया, जो असल में थे ही नहीं. इसके अलावा ऐसे चेक और डेबिट नोट इस्तेमाल किए गए, जो इन विभागों ने कभी जारी नहीं किए थे.

CBI का कहना है कि यह पैसा IDFC First Bank की चंडीगढ़ के सेक्टर-32 ब्रांच के मैनेजर और मुख्य आरोपी रिभव ऋषि और उसके सहयोगियों के नियंत्रण वाली संस्थाओं के पास गया. एजेंसी ने 2 सितंबर 2026 को पंचकूला की CBI की विशेष अदालत में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की. इसमें 19 लोगों को आरोपी बनाया गया है. इनमें IAS अधिकारी, वित्त अधिकारी, बैंक कर्मचारी और निजी लोग शामिल हैं.

चार्जशीट में बताए गए सरकारी अधिकारियों में से तीन महिलाएं हैं.

सुरिंदर कौर के अलावा बाकी दो महिलाएं हैं- हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPGCL) में सीनियर अकाउंट्स ऑफिसर दीप्ति कौशिक और IDFC First Bank की चंडीगढ़ के सेक्टर-32 ब्रांच में उस समय डिप्टी ब्रांच मैनेजर और बाद में ब्रांच मैनेजर रहीं सुधा गोयल.

इन तीनों में से किसी पर भी पैसे लेकर भाग जाने का आरोप नहीं है. CBI ने रिभव ऋषि और अभय कुमार, जो सेक्टर-32 ब्रांच चलाने वाले बैंक कर्मचारी थे, को पैसे निकालने वाले लोगों के रूप में नामित किया है.

लेकिन CBI का कहना है कि इन तीनों महिलाओं ने अलग-अलग समय पर और अलग-अलग तरीकों से पैसे निकालने की प्रक्रिया को होने दिया या उसे छिपाने में मदद की.

तीनों के नाम “गिरफ्तार नहीं” के तौर पर दर्ज हैं. चार्जशीट में कहा गया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी का इंतज़ार है.

दीप्ति कौशिक: उसी दिन आगे बढ़ाई गई नोट

कौशिक, 45 साल की हैं और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं. चार्जशीट में इस बात पर बार-बार जोर दिया गया है.

इस मामले में उनकी भूमिका 19 फरवरी 2024 से शुरू होती है. उस दिन मुख्य आरोपी ऋभव ऋषि, जो उस समय सेक्टर-32 ब्रांच के मैनेजर थे, उन्होंने हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPGCL) के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहम्मद शायिन को एक ऑफर लेटर भेजा. शायिन एक IAS अधिकारी हैं और चार्जशीट में आरोपी भी हैं.

लेटर में कहा गया था कि IDFC First Bank को सरकारी विभागों के लिए पैनल में शामिल किया गया है. CBI का कहना है कि यह गलत था. हरियाणा सरकार ने बैंक को पैनल में केवल 12 जुलाई 2024 को शामिल किया था.

उसी दिन (19 फरवरी 2024) कौशिक ने HPGCL के Dry Fly Ash Fund के नाम पर IDFC First Bank में एक नया सेविंग्स अकाउंट खोलने का प्रस्ताव देते हुए एक नोट आगे बढ़ाया. नोट में कहा गया था कि इस अकाउंट का इस्तेमाल “भविष्य में मिलने वाले मौकों का फायदा उठाने” के लिए किया जा सकता है. डायरेक्टर (फाइनेंस) अमित देवान ने उसी दिन इस पर सहमति दे दी. शायिन ने अगले दिन “May be opened” यानी “खोला जा सकता है” लिखा.

CBI का कहना है कि यह फाइल प्रस्ताव से मंजूरी तक करीब एक दिन में पहुंच गई. यह भी कहा गया है कि HPGCL के पास पहले से ही पैनल में शामिल बैंकों में 10 सेविंग्स अकाउंट और 10 कैश क्रेडिट लिमिट थीं और कहीं भी एक और अकाउंट की जरूरत दर्ज नहीं की गई थी.

यह अकाउंट करीब आठ महीने तक खाली पड़ा रहा.

इसके बाद 6 नवंबर 2024 आया. चार्जशीट के मुताबिक, शायिन ने चीफ अकाउंट्स ऑफिसर बहादुर सिंह गोसाईं को अपने कमरे में बुलाया. ऋषि पहले से वहां मौजूद थे. गोसाईं से कहा गया कि Dry Fly Ash अकाउंट में पैसा डाला जाए.

CBI का कहना है कि इसके बाद IndusInd Bank में मौजूद एक फिक्स्ड डिपॉजिट को समय से पहले तोड़ने का फैसला शायिन, देवान और कौशिक ने लिया. यह फैसला फाइल में बताए बिना और किसी नोट के मौजूद होने से पहले ही लिया गया था.

CBI के मुताबिक, कौशिक की भूमिका कागजी कार्रवाई करने की थी. उन्होंने फिक्स्ड डिपॉजिट समय से पहले तोड़ने पर HPGCL को होने वाले ब्याज के नुकसान और IDFC First Bank के वादे के मुताबिक 14 प्रतिशत ब्याज से होने वाले फायदे का हिसाब तैयार किया. इस हिसाब में 1.65 करोड़ रुपये का नुकसान, 2.70 करोड़ रुपये का फायदा और 1.04 करोड़ रुपये का कुल फायदा दिखाया गया.

CBI का तर्क है कि यह रकम फैसले का आधार नहीं थी. उसका कहना है कि पहले ही लिए जा चुके फैसले के हिसाब से यह रकम लिखी गई थी. CBI ने बताया कि रकम (50 करोड़ रुपये), अवधि (11 नवंबर 2024 से 28 मार्च 2025) और ब्याज दर (14 प्रतिशत) पहले ही तय की जा चुकी थी.

चार्जशीट में यह भी कहा गया है कि सेविंग्स अकाउंट पर 14 प्रतिशत ब्याज देना उस समय बैंक का कोई ऑफर था ही नहीं. उस समय रेपो रेट 6.50 प्रतिशत था. 11 नवंबर 2024 को IndusInd Bank में HPGCL की 108.47 करोड़ रुपये की जमा रकम में से एक हिस्से को समय से पहले तोड़कर 50 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए.

एक निजी वादे को पूरा कराने की कोशिश

जनवरी 2025 में कौशिक ने बैंक को लिखा, क्योंकि वादे के मुताबिक ब्याज नहीं आ रहा था. उन्होंने 7 जनवरी 2025 को ऋषि और बैंक की ऑथराइजर सीमा धीमान को ईमेल किया. इसके बाद 21 और 24 जनवरी को रिमाइंडर भेजे. 24 जनवरी को अभय कुमार ने जवाब दिया कि “कुछ आंतरिक समस्या” की वजह से रकम क्रेडिट होने में देरी हुई है और इसे कर दिया जाएगा.

चार्जशीट में इसे एक आरोप के तौर पर पेश किया गया है. इसमें कहा गया है कि कोई अधिकारी किसी बैंककर्मी से महीनों तक किसी ऐसी रकम के क्रेडिट के लिए संपर्क नहीं करता, जिसे बैंक का सिस्टम अपने आप जनरेट करता है. चार्जशीट का कहना है कि वह एक निजी वादे को पूरा कराने की कोशिश कर रही थीं.

CBI का कहना है कि ब्याज का भुगतान उन संस्थाओं के खातों से जारी किए गए डिमांड ड्राफ्ट के जरिए किया गया, जिन्हें आरोपियों द्वारा नियंत्रित किया जाता था. यह पैसा खुद दूसरे सरकारी निकायों से निकाला गया था. 29 मार्च 2025 को कौशिक ने अकाउंट से 51,55,59,059 रुपये पंचकूला में HDFC Bank में HPGCL के अकाउंट में ट्रांसफर किए. CBI का कहना है कि उन्होंने यह काम बिना मंजूरी के किया और इसे फाइल में भी दर्ज नहीं किया.

27 मार्च 2025 का नोट

एक और 50 करोड़ रुपये IDFC First Bank में जाने थे. इस बार यह रकम Canara Bank की एक मैच्योर हो रही जमा रकम से जानी थी. देवान ने कौशिक से इसे “कानूनी नजरिए से” जांचने को कहा. उन्होंने जवाब दिया कि इससे “राजस्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा” और यह HPGCL के वित्तीय हित में है.

CBI का कहना है कि नोट में चार बातें नहीं बताई गईं. पहली, बैंक ने पहले की जमा रकम पर वादा किया गया ब्याज नहीं दिया था. दूसरी, करीब 87 लाख रुपये अभी भी बकाया थे. तीसरी, हर बैंक में 50 करोड़ रुपये की सीमा पहले ही पूरी हो चुकी थी. और चौथी, कौशिक ने खुद अकाउंट से पैसे बाहर ट्रांसफर किए थे.

5 मई 2025 को एक ऐसे चेक के जरिए 50 करोड़ रुपये डेबिट किए गए, जो HPGCL ने कभी जारी ही नहीं किया था. अब उस चेक को जब्त कर लिया गया है. यह पैसा नौ डिमांड ड्राफ्ट के जरिए नगर निगम चंडीगढ़ और क्रेस्ट (चंडीगढ़ अक्षय ऊर्जा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संवर्धन सोसायटी) नाम की एक संस्था को गया.

डेबिट वाउचर पर कौशिक के हस्ताक्षर थे, जिन्हें CBI ने फर्जी बताया है. उस पर एक स्टांप भी लगा था और उसमें दावा किया गया था कि उनके नंबर पर पुष्टि के लिए फोन किया गया था, लेकिन CBI का कहना है कि पैसा जाने से पहले वास्तव में ऐसा कोई फोन नहीं किया गया था.

कौशिक ने “पूछताछ के दौरान” कहा कि 5 मई 2025 को ऋषि ने फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद के बारे में उन्हें पांच या छह बार फोन किया था. उन्होंने कहा कि डेबिट की जाने वाली रकम FDR के लिए थी और किसी दूसरे काम के लिए नहीं थी.

क्या कौशिक ने खतरे की घंटी बजाई थी

6 जुलाई 2025 को कौशिक को जून महीने का बैंक स्टेटमेंट मिला. इसमें ऐसे चेकों पर डेबिट दिखाए गए थे, जिन्हें HPGCL ने कभी जारी नहीं किया था और जो विभाग के पास ही पड़े थे. उन्होंने 6 जुलाई को ऋषि को ईमेल किया. अभय कुमार को भेजी गई कॉपी वापस आ गई, क्योंकि उनका ईमेल बंद किया जा चुका था. उन्होंने 8 जुलाई को दो और ईमेल भेजे.

तो क्या उन्होंने खतरे की घंटी बजाई थी? CBI का मामला यह है कि वह इससे आगे नहीं गईं.

बैंक का जवाब 28 जुलाई को आया. इस जवाब पर ऋषि की अपनी सिग्नेचर आईडी से हस्ताक्षर किए गए थे. यानी जिस व्यक्ति के बारे में शिकायत की गई थी, उसी व्यक्ति ने शिकायत का जवाब दिया.

CBI का कहना है कि जवाब में ही तीन समस्याएं साफ दिखाई दे रही थीं. पहली, 5 मई को बनाई गई बताई गई जमा रकम की वैल्यू डेट 28 मार्च थी. दूसरी, ऐसे चेकों पर हुए डेबिट, जो कभी लिखे ही नहीं गए थे, उन्हें “गलत” एंट्री बताया गया. और तीसरी, करोड़ों रुपये के डेबिट के मुकाबले केवल 1.48 करोड़ रुपये ही वापस क्रेडिट किए गए थे.

चार्जशीट में कहा गया है कि उन्होंने इस जवाब को रिकॉर्ड में रख दिया. उन्होंने बैंक के कोर सिस्टम से कोई डिपॉजिट एडवाइस नहीं मांगी और न ही किसी दूसरे बैंक अधिकारी से जानकारी मांगी. उन्होंने फाइल को अकाउंट्स ऑफिसर, दिवंगत बलवंत सिंह के पास भेजा. उनकी टिप्पणी में कहा गया कि सभी डेबिट वापस क्रेडिट कर दिए गए हैं और 50 करोड़ रुपये का एक FDR उपलब्ध है. CBI का कहना है कि दोनों बातें गलत थीं और फाइल कभी मैनेजिंग डायरेक्टर तक नहीं पहुंची.

यह बताना जरूरी है कि बलवंत सिंह ने इस साल 4 मई को पंजाब और हरियाणा सिविल सचिवालय की 8वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी. इसके एक दिन पहले CBI टीम ने उनसे पहली बार पूछताछ की थी.

CBI के मुताबिक, HPGCL के Dry Fly Ash अकाउंट से गबन की गई रकम 59,46,00,892 रुपये है. इसमें समय से पहले जमा रकम निकालने से हुए 1,66,44,453 रुपये के नुकसान को भी जोड़ा गया है. CBI ने भारतीय न्याय संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई हैं. इनमें BNS की धारा 316(5) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 12, 13(2), जिसे धारा 13(1)(a) के साथ पढ़ा गया है, शामिल हैं.

सुरिंदर कौर: फाइल पर दो शब्द

कौर, 57 साल की हैं. उन्होंने जून 2025 में अतिरिक्त जिम्मेदारी के तौर पर लेबर वेल्फेयर बोर्ड के वेलफेयर विंग का काम संभाला. तब तक पैसा काफी पहले ही जा चुका था.

उनके आने से पहले क्या हुआ, चार्जशीट में इसका विवरण दिया गया है. बोर्ड के पास करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड था. यह वह सेस था, जो कर्मचारियों के लिए शादी में मदद और स्कॉलरशिप जैसी योजनाओं के लिए नियोक्ताओं से वसूला गया था. बोर्ड ने बैंकों से ब्याज दरें मांगीं. 3 मार्च 2025 को वेलफेयर कमिश्रनर ने पांच बैंकों में IDFC First Bank को 50 करोड़ रुपये देने की मंजूरी दी.

बाकी चार बैंकों में सामान्य तरीके से जमा रकम भेजी गई. लेकिन सिर्फ IDFC First Bank के मामले में 5 मार्च 2025 को एक सेविंग्स अकाउंट खोला गया. अकाउंट खोलने वाला फॉर्म खाली हस्ताक्षर किया हुआ था और बाद में अभय कुमार ने उसमें बाकी जानकारी भरी.

50 करोड़ रुपये 6 मार्च को अकाउंट में आए. नौ दिनों के अंदर ही 12 ट्रांजैक्शन के जरिए यह पैसा Capco Fintech Services, SRR Planning Gurus और Swastik Desh Projects को भेज दिया गया. 15 मार्च तक अकाउंट में सिर्फ 74,000 रुपये बचे थे.

चार्जशीट में साफ कहा गया है कि पैसे लेने में कौर की कोई भूमिका नहीं बताई गई है.

उनका मामला 28 अक्टूबर को गुलाटी के आने के बाद की घटनाओं से जुड़ा है. CBI का कहना है कि उन्होंने 6 नवंबर से 1 दिसंबर तक फाइल अपने पास रखी. 14 नवंबर को उन्होंने फाइल वापस भेजते हुए सिर्फ दो शब्द लिखे, “Please speak”. उन्होंने 27 नवंबर को अपना आदेश दर्ज किया. बैंक को चिट्ठी सिर्फ 2 दिसंबर को भेजी गई, यानी बोर्ड को यह बताए जाने के एक महीने से ज्यादा समय बाद कि उसका पैसा जा चुका है.

CBI का कहना है कि उन्होंने फाइल Welfare Commissioner, डी. के. बेहरा के पास नहीं भेजी, हालांकि नोट पर खुद “WC” लिखा हुआ था. CBI के मुताबिक, ऑफिस के प्रमुख को इस बारे में कभी पता ही नहीं चला.

4 दिसंबर की तारीख वाला बैंक का जवाब खुद अभय कुमार ऑफिस लेकर आया. तब तक वह बैंक छोड़ चुका था और कौर को भी यह बात बताई जा चुकी थी. CBI का कहना है कि उसके फोन से उस जवाब का ड्राफ्ट बरामद किया गया. फोन में एक कंप्यूटर स्क्रीन की फोटो भी मिली, जिस पर उसी दिन दोपहर 2:01 बजे जवाब टाइप किया जा रहा था.

14 नवंबर को Finance Department ने बोर्ड से उसके सेविंग्स अकाउंट की जानकारी देने को कहा था. जो लिस्ट भेजी गई, उसमें IDBI Bank के दो अकाउंट और HDFC Bank का एक अकाउंट बताया गया. IDFC वाला अकाउंट उसमें नहीं था. यह नोट कौर के पास भेजा गया और उसी दिन उस पर कार्रवाई दर्ज कर दी गई. CBI इसे अमित कुमार (कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले क्लर्क), जुगल किशोर (Labour Welfare Board में Accounts Officer) और कौर की ओर से अकाउंट छिपाने की जानबूझकर की गई कोशिश बताता है. अमित कुमार और जुगल किशोर के नाम भी चार्जशीट में हैं.

इसके बाद फोन रिकॉर्ड की बात आती है. चार्जशीट के मुताबिक, कौर और अभय कुमार के बीच WhatsApp कॉल और मैसेज डिलीट किए गए हैं. यह भी कहा गया है कि 12 जनवरी 2026 को वह Baltana में कौर के घर गया था. CBI ने उसके फोन से मिले फोरेंसिक डेटा पर भरोसा किया है. CBI ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को गायब करने का आरोप भी जोड़ा है. इसमें BNS की धारा 49 को धारा 316(5) के साथ पढ़ा गया है.

चार्जशीट में उनके पक्ष में दिया गया तर्क भी दर्ज है. उस समय उनके पास तीन जिम्मेदारियां थीं और फाइल में हुई देरी वास्तविक काम के दबाव की वजह से हो सकती थी. CBI का कहना है कि यह तर्क “मामले को साबित नहीं करता”. उसका कहना है कि 50 करोड़ रुपये के मामले में एक महीने की देरी और ऑफिस के प्रमुख को इस पूरी प्रक्रिया से बाहर रखना सिर्फ काम के दबाव के कारण नहीं समझाया जा सकता.

सुधा गोयल: मंजूरी देने वाले हस्ताक्षर

गोयल, 41 साल की हैं. उन्होंने फरवरी 2023 में IDFC First Bank में Mohali Phase-10 ब्रांच में Banker Authoriser के तौर पर नौकरी शुरू की. 13 अगस्त 2025 को उन्हें सेक्टर-32, चंडीगढ़ ब्रांच में उप शाखा प्रबंधक के पद पर प्रमोट किया गया. वह फरवरी 2026 तक वहां रहीं और चार्जशीट में उन्हें ब्रांच मैनेजर भी बताया गया है.

CBI के मामले में यह समय बहुत महत्वपूर्ण है. जब वह ब्रांच में आईं, तब तक सरकारी खातों में हुए घोटाले की बात सामने आ चुकी थी और ऋषि और अभय कुमार को बैंक छोड़ने के लिए कहा जा चुका था. CBI का कहना है कि यह सब जानकारी होने के बावजूद उन्होंने मंजूरी देना जारी रखा.

25 सितंबर 2025 को उन्होंने Director Panchayat के MMGAY 2.0 अकाउंट खोलने के फॉर्म पर “OK to proceed” लिखा. फॉर्म में प्रिंस शर्मा का मोबाइल नंबर दिया गया था. प्रिंस शर्मा पंचायत विभाग में सुपरिटेंडेंट थे और उन्हें भी आरोपी बनाया गया है. फॉर्म में एक गलत ईमेल ID भी थी. इनमें से कोई भी जानकारी विभाग या उसके अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता की नहीं थी.

इसके बाद CBI ने उनकी ओर से दी गई मंजूरियों का हिसाब बताया है. उसका कहना है कि उन्होंने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अकाउंट से किए गए 12 फर्जी डेबिट और दूसरे अकाउंट से एक डेबिट को मंजूरी दी. इनकी कुल रकम 75,55,65,392 रुपये थी. CBI का कहना है कि उन्होंने डायरेक्टर पंचायत के अकाउंट में 11 और डेबिट को मंजूरी दी, जिनकी कुल रकम 75,26,52,302 रुपये थी. ये सभी ऐसे चेक या डेबिट नोट पर किए गए थे, जिन पर CBI के मुताबिक डी. के. बेहरा के फर्जी हस्ताक्षर थे. CBI का यह भी कहना है कि उन्होंने पंचकूला नगर निगम के अकाउंट से कम से कम तीन बड़ी रकम वाले डेबिट को मंजूरी दी. इनमें 10 करोड़ रुपये, 20 करोड़ रुपये और 20 करोड़ रुपये शामिल थे.

CBI के अपने आंकड़ों के मुताबिक, यह रकम 200 करोड़ रुपये से ज्यादा बनती है. कुल मिलाकर कम से कम 27 डेबिट थे.

इनमें से एक 4 नवंबर 2025 का डेबिट था, जो चेक नंबर 000011 पर किया गया. विभाग की जांच समिति ने बताया था कि चेक पर अंकों में 2,50,00,000 रुपये लिखे थे, लेकिन शब्दों में “Twenty-Five Crores” यानी “पच्चीस करोड़” लिखा था. बैंक ने चेक को 25 करोड़ रुपये के लिए पास कर दिया. चार्जशीट में इस डेबिट को गोयल की ओर से मंजूर किए गए डेबिट में शामिल किया गया है.

CBI का यह भी कहना है कि इन ट्रांजैक्शन पर उन्होंने “six-eye verification” किया. “Six-eye verification” एक ऐसा कंट्रोल है, जिसमें किसी ट्रांजैक्शन में पैसे भेजने से पहले एक या दो नहीं, बल्कि तीन अधिकारियों को अलग-अलग उसकी जांच और मंजूरी देनी होती है. इस व्यवस्था का मकसद यह है कि किसी बड़ी रकम वाले ट्रांजैक्शन को एक स्वतंत्र अधिकारी भी देखे. वह अधिकारी उस व्यक्ति से अलग होता है, जो ट्रांजैक्शन की एंट्री करता है और उस व्यक्ति से भी अलग होता है, जो उसकी जांच करता है. CBI का कहना है कि गोयल के मामले में यह प्रक्रिया सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई.

उनसे जुड़ी एक और दर्ज घटना 6 नवंबर 2025 की है. लेबर वेल्फेयर बोर्ड के जुगल किशोर यह जांचने के लिए ब्रांच आए थे कि बोर्ड का फिक्स्ड डिपॉजिट मौजूद है या नहीं. चार्जशीट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि उस दिन सर्वर की समस्या के कारण स्थिति की पुष्टि नहीं की जा सकती. चार्जशीट में यह भी दर्ज है कि उन्होंने CBI को बताया कि उन्होंने किशोर को अपना नंबर दिया था और उनसे कई बार संपर्क करने की कोशिश की थी, लेकिन किशोर ने उनके फोन नहीं उठाए. CBI उनके इस जवाब को उनकी ओर से किए गए एक प्रत्यक्ष काम के तौर पर देखता है.

पंचकूला नगर निगम ने ब्रांच को कई बार ईमेल भेजे. इन ईमेल में गोयल को भी कॉपी किया गया था. निगम ने अपने अकाउंट के FDR और स्टेटमेंट मांगे थे. CBI का कहना है कि उन्होंने इन ईमेल का कोई जवाब नहीं दिया. सीमा धीमान ने विभाग को तकनीकी समस्या का गलत बहाना दिया.

बैंक ने अपनी आंतरिक जांच के बाद गोयल को सस्पेंड कर दिया है. CBI का कहना है कि सरकारी खातों में घोटाले की बात सामने आने की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने आगे होने वाले फर्जीवाड़े को नहीं रोका. CBI ने BNS की धारा 316(5) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) को धारा 13(1)(a) के साथ पढ़ते हुए, दूसरी धाराओं के साथ, इन्हें भी लगाया है.

भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5) किसी सरकारी कर्मचारी, बैंककर्मी, व्यापारी या एजेंट की ओर से भरोसे के तहत मिली संपत्ति के आपराधिक दुरुपयोग से जुड़ी है. इसमें उम्रकैद या 10 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है. यह भारतीय दंड संहिता की धारा 409 की जगह लाई गई है. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(a) के तहत किसी सरकारी कर्मचारी को उसके भरोसे सौंपी गई संपत्ति का बेईमानी या धोखाधड़ी से गलत इस्तेमाल करना या किसी दूसरे व्यक्ति से ऐसा करवाना आपराधिक कदाचार है. धारा 13(2) में इसकी सजा तय की गई है: चार से 10 साल तक की जेल और जुर्माना.

चार्जशीट में एक और बात है, जो दूसरी तरफ इशारा करती है. दो फरवरी 2026 के एक व्हाट्सएप चैट में बैंक के सरकारी बैंकिंग ग्रुप के एरिया हेड शमीम डार ने अभय कुमार से कहा कि वह एक डिपार्टमेंट की घोषित आतंकवाद की बात “सुधा को सौंपें”. सीबीआई ने खुद नोट किया है कि गोयल के साथ इसका कोई सीधा संवाद नहीं हुआ था.

मामला अब कहां है

दीप्ति कौशिक, सुरिंदर कौर, सुधा गोयल उन 19 आरोपियों में शामिल हैं, जिनके नाम इस सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हैं. इसमें IAS अधिकारियों और वित्त विभाग के अधिकारियों के नाम भी हैं. CBI का कहना है कि आगे की जांच जारी है. इसमें दूसरे सरकारी कर्मचारियों, अन्य निजी लोगों और पैसों के लेन-देन की पूरी कड़ी की भी जांच शामिल है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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